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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. भारत द्वारा हाल ही में लागू किये गये चार नये श्रम संहिताओं के अंतर्गत श्रम सुधारों के महत्त्व का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये। (250 शब्द)

    26 Nov, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • भारत में हाल ही में हुए श्रम सुधारों का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
    • इन सुधारों के महत्त्व और चुनौतियों की विवेचना कीजिये।
    • आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    भारत का श्रम विनियामक कार्यढाँचा ऐतिहासिक रूप से 29 केंद्रीय कानूनों पर आधारित था, जो जटिल, परस्पर अतिव्याप्त तथा तीव्र रूप से रूपांतरित होती अर्थव्यवस्था के लिये अपर्याप्त थे। श्रम प्रशासन को आधुनिक बनाने और श्रमिक कल्याण तथा औद्योगिक उत्पादकता दोनों को बढ़ावा देने के लिये, सरकार ने इन कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित किया है– वेतन संहिता (वर्ष 2019), औद्योगिक संबंध संहिता (वर्ष 2020), सामाजिक सुरक्षा संहिता (वर्ष 2020) तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएँ (OSHWC) संहिता (वर्ष 2020)।

    मुख्य भाग: 

     भारत में हाल ही में लागू किये गए चार नए श्रम कानूनों के तहत श्रम सुधारों का महत्त्व

    • वेतन संहिता, 2019: यह संहिता चार वेतन-संबंधी कानूनों को समेकित कर सभी श्रमिकों, जिनमें असंगठित क्षेत्र के श्रमिक भी सम्मिलित हैं, के लिये एक समान और एकीकृत वेतन प्रणाली स्थापित करती है।
      • यह एक वैधानिक न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करती है, जिसे राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी का समर्थन प्राप्त है, जिसके नीचे राज्य वेतन निर्धारित नहीं कर सकते।
      • यह संहिता लैंगिक-तटस्थ रोज़गार को प्रोत्साहित करती है, समय पर वेतन भुगतान को अनिवार्य बनाती है और सामान्य दर से दोगुनी दर पर ओवरटाइम भुगतान सुनिश्चित करती है।
      • एक समान वेतन परिभाषा, मैत्रीपूर्ण निरीक्षक-सह-सुविधाप्रदाता प्रणाली और छोटे अपराधों के लिये आपराधिक अभियोजन के स्थान पर मौद्रिक दंड के प्रावधानों के माध्यम से अनुपालन को सरल बनाया गया है।
    • औद्योगिक संबंध संहिता, 2020: यह संहिता ट्रेड यूनियनों, औद्योगिक विवादों और स्थायी आदेशों से संबंधित कानूनों को सुव्यवस्थित करती है, जिसका उद्देश्य औद्योगिक सामंजस्य, पूर्वानुमानशीलता और श्रम लचीलापन सुनिश्चित करना है।
      • यह निश्चित अवधि रोज़गार को औपचारिक मान्यता प्रदान करती है, जिसके अंतर्गत संविदा श्रमिकों को पूर्ण वेतन समानता और एक वर्ष के बाद ग्रेच्युटी का अधिकार प्राप्त होता है।
      • छँटनी, पुनर्नियोजन और स्थायी आदेशों के लिये सरकारी अनुमति की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 श्रमिक कर दी गई है, जिससे उद्योगों के लिये विस्तार करना अपेक्षाकृत सरल हो गया है।
    • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: यह संहिता नौ सामाजिक सुरक्षा कानूनों को समेकित करती है तथा असंगठित श्रमिकों, गिग श्रमिकों और प्लेटफॉर्म श्रमिकों तक सामाजिक संरक्षण का विस्तार करती है, जो भारत के कल्याणकारी ढाँचे में एक महत्त्वपूर्ण विस्तार है। 
      • यह राष्ट्रव्यापी स्तर पर ESIC के दायरे को बढ़ाती है, खतरनाक व्यवसायों के लिये इसे अनिवार्य करती है तथा समयबद्ध जाँच और कम अपील जमा राशि के माध्यम से EPF प्रक्रियाओं को सरल बनाती है।
    • व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों (OSH) संहिता, 2020: व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता 13 कानूनों को समेकित कर कार्यस्थल सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण के लिये एक एकीकृत और आधुनिक ढाँचा प्रदान करती है।
      • यह प्रतिष्ठानों के लिये एक पंजीकरण, एक लाइसेंस और एक रिटर्न की व्यवस्था लागू करती है, जिससे कागज़ी कार्य और अनुपालन भार में उल्लेखनीय कमी आती है।
      • यह संहिता सुरक्षा उपायों के साथ महिलाओं के लिये नाईट शिफ्ट में कार्य का प्रावधान कर उनके रोज़गार को प्रोत्साहित करती है तथा सभी श्रमिकों के लिये वार्षिक स्वास्थ्य जाँच और औपचारिक नियुक्ति पत्र को अनिवार्य बनाती है।
      • कार्य समय को 8 घंटे प्रतिदिन और 48 घंटे प्रति सप्ताह निर्धारित किया गया है तथा उल्लंघनों के लिये कारावास के स्थान पर मौद्रिक दंड का प्रावधान किया गया है।

    भारत में श्रम संबंधी मुद्दों के प्रबंधन में आने वाली प्रमुख चुनौतियाँ 

    • खंडित और जटिल नियामक परिवेश: समेकन से पहले, भारत में 29 केंद्रीय श्रम कानून थे, जिनमें से कई परस्पर विरोधी और विरोधाभासी थे। 
      • नियमों की अत्यधिक संख्या ने अनुपालन को भारी बोझ बना दिया था; अध्ययनों के अनुसार, 1,536 कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत कंपनियों को प्रतिवर्ष लगभग 69,000 से अधिक अनुपालनों का सामना करना पड़ता था।
    • गिग वर्कर्स के लिये सामाजिक सुरक्षा की संरचना में कमियाँ: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 औपचारिक रूप से गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को परिभाषित करती है, लेकिन उनके लाभों के लिये वित्तपोषण संरचना अभी भी अस्पष्ट है। 
      • कानून में एग्रीगेटरों के योगदान का उल्लेख तो है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि सरकार कितनी हिस्सेदारी वहन करेगी अथवा लाभों का सतत वित्तपोषण कैसे होगा।
    • OSH संहिता और महिलाओं का रोज़गार: OSH संहिता महिलाओं को रात्रि शिफ्ट में काम करने की अनुमति देती है, लेकिन नियोक्ताओं को व्यापक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने होते हैं। यद्यपि इसका उद्देश्य अवसरों का विस्तार है, किंतु अतिरिक्त अनुपालन भार छोटे प्रतिष्ठानों को महिलाओं की भर्ती से हतोत्साहित कर सकता है।
    • औद्योगिक संबंध संहिता और मिसिंग मिडिल: औद्योगिक संबंध संहिता छँटनी के लिये सरकारी अनुमति की सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 श्रमिकों तक कर देती है। 
      • आलोचकों का तर्क है कि इससे भर्ती और बर्खास्तगी की प्रथाओं का दायरा बढ़ जाता है तथा रोज़गार सृजन के बजाय नौकरी की असुरक्षा बढ़ सकती है। 
    • युवा बेरोज़गारी और कौशल असंगति: भारत के जनांकिकीय लाभांश के बावजूद, युवा बेरोज़गारी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है, जिसमें युवा बेरोज़गारी दर (15-29 आयु वर्ग) लगभग 14.6% के आसपास है, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग तीन गुना अधिक है। 
    • ट्रेड यूनियनों और राजनीतिक विपक्ष का प्रतिरोध: श्रमिक सुधारों को ट्रेड यूनियनों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है, जो श्रमिक सुरक्षा में कमी आने की आशंका जताते हुए छँटनी की सीमा और अनिश्चित माने जाने वाले निश्चित अवधि के अनुबंधों पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
      • दस बड़े ट्रेड यूनियनों ने नवंबर 2025 में लागू किये गए चार नए श्रम कानूनों का कड़ा विरोध किया है, उन्हें श्रमिक विरोधी और धोखाधड़ी करार दिया है तथा श्रमिकों के अधिकारों में महत्त्वपूर्ण कमी का आरोप लगाया है।
    • डेटा की कमी और नीतिगत खामियाँ: भारत का श्रम प्रशासन गंभीर आँकड़ों की कमी से ग्रस्त है, जिसमें पुराने, खंडित और अपूर्ण श्रम आँकड़े शामिल हैं। 
      • एक एकीकृत श्रम बाज़ार सूचना प्रणाली (LMIS) के अभाव में वास्तविक समय पर आधारित, साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण सीमित रह जाता है।

    भारत में श्रम प्रशासन को मज़बूत करने के लिये भारत द्वारा अपनाए जा सकने वाले उपाय

    • अनुपालन प्रक्रियाओं का सरलीकरण और डिजिटलीकरण: भारत को अनुपालन के भारी बोझ को कम करने के लिये एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म, एकल पंजीकरण, लाइसेंसिंग और समेकित रिटर्न के कार्यान्वयन को तीव्र करना चाहिये। 
      • सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से सीख लेते हुए, जहाँ एकीकृत डिजिटल श्रम पोर्टल नियोक्ताओं के लिये अनुपालन को आसान बनाते हैं, भारत कागज़ी कार्रवाई को कम कर सकता है तथा औपचारिकीकरण को बढ़ावा दे सकता है।
    • सूक्ष्म और असंगठित उद्यमों के लिये प्रोत्साहनों के माध्यम से औपचारिकरण को बढ़ावा: 90% से अधिक असंगठित श्रमिकों को औपचारिक क्षेत्र में लाने के लिये कर राहत, ऋण तक अभिगम्यता और सरल प्रक्रियाओं जैसे वित्तीय एवं नियामक प्रोत्साहन दिये जाने चाहिये, ताकि भारत की औद्योगिक संरचना में ‘मिसिंग मिडिल’ की समस्या को दूर किया जा सके।
    • अवसंरचना और सामाजिक समर्थन के माध्यम से महिलाओं की श्रम भागीदारी को बढ़ावा: श्रम संहिताओं में कानूनी प्रावधानों से आगे बढ़ते हुए, भारत को सुरक्षित एवं किफायती परिवहन, लैंगिक-पृथक कार्यस्थल सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण बाल-देखभाल सेवाओं में निवेश करना चाहिये, जैसा कि राष्ट्रीय जेंडर संसाधन केंद्र ढाँचे में प्राथमिकता दी गई है।
    • गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिये सामाजिक सुरक्षा कार्यढाँचे में नवाचार: गिग इकॉनमी की गतिशीलता को देखते हुए, न्यूनतम प्रशासनिक जटिलताओं के साथ पोर्टेबल और प्रौद्योगिकी-आधारित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का डिज़ाइन आवश्यक है।
    • प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी के माध्यम से प्रवर्तन क्षमता को सुदृढ़ करना: प्रवर्तन संबंधी कमियों को दूर करने के लिये राज्य श्रम विभागों की क्षमता निर्माण में निवेश करना महत्त्वपूर्ण है। 
    • ट्रेड यूनियनों और नियोक्ताओं के साथ संवाद और सहमति निर्माण: राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर श्रम संघों, नियोक्ताओं एवं सरकार को शामिल करने वाले निरंतर संवाद मंच श्रमिकों की सुरक्षा तथा व्यावसायिक लचीलेपन के बीच संतुलन बना सकते हैं। 

    निष्कर्ष:

    भारत की नई श्रम संहिताएँ श्रम प्रशासन के आधुनिकीकरण, औपचारिकीकरण, सामाजिक सुरक्षा एवं समावेश को बढ़ावा देने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के महानिदेशक गिल्बर्ट एफ. हंगबो के अनुसार, सरकार, नियोक्ताओं एवं श्रमिकों के बीच सामाजिक संवाद यह सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है कि सुधारों से श्रमिकों और व्यवसायों दोनों को लाभ मिले। आगे बढ़ते हुए, भारत को सहकारी संघवाद, डिजिटल अनुपालन और समावेशी कौशल विकास को प्राथमिकता देनी चाहिये, ताकि नीति और व्यवहार के बीच के अंतराल को न्यूनतम करते हुए एक ऐसा सक्षम श्रमबल विकसित किया जा सके जो समतामूलक आर्थिक वृद्धि को गति प्रदान करे।

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