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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्र. क्षेत्रवाद की विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियाँ होती हैं। इस कथन की व्याख्या करते हुए इससे निपटने के उपाय सुझाइये। (250 शब्द)

    03 Oct, 2022 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाज

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • अपने उत्तर की शुरुआत क्षेत्रवाद के बारे में संक्षिप्त जानकारी देकर कीजिये।
    • विभिन्न प्रकार के क्षेत्रवाद की विवेचना कीजिये।
    • क्षेत्रवाद के कारणों की विवेचना कीजिये।
    • आगे की राह बताते हुए अपना उत्तर समाप्त कीजिये।

    परिचय

    क्षेत्रवाद एक विचारधारा है जिसका संबंध ऐसे क्षेत्र से होता है जो धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक कारणों से अपने पृथक अस्तित्व के लिये जाग्रत होती है या ऐसे क्षेत्र की पृथकता को बनाए रखने के लिये प्रयासरत रहती है।

    इसमें राजनीतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और भाषायी आधार पर क्षेत्रों का विभाजन इत्यादि से संबंधित मुद्दों को शामिल किया जा सकता है।

    जब क्षेत्रवाद की विचारधारा को किसी क्षेत्र विशेष के विकास से जोड़कर देखा जाता है तो यह अवधारणा नकारात्मक बन जाती है

    प्रारूप

    क्षेत्रीय आंदोलनों के प्रकार

    अलगाववाद: यह क्षेत्रवाद का एक रूप है जिसमें उग्रवादी और कट्टरपंथी समूह शामिल होते हैं जो जातीयता या किसी अन्य कारक के आधार पर भारत से अलग होने की वकालत करते हैं।

    पृथक्करण: यह भारतीय संघ के भीतर अलग राज्य की मांग है। इस तरह के उप-क्षेत्रवाद को 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम द्वारा मान्यता दी गई थी। सबसे हालिया उदाहरणों में उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना का गठन शामिल है।

    विभिन्न राज्यों द्वारा की जा रही पूर्ण राज्य की मांग जैेसी मांगें केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली द्वारा की जा रही मांगों से प्रेरित हैं। ऐसी अधिकांश मांगों को पहले ही स्वीकार कर लिया गया है। 1971 में, हिमाचल प्रदेश को एक पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और उसके बाद मणिपुर, त्रिपुरा, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश (पूर्व नेफा) तथा सिक्किम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।

    स्वायत्तता की मांग: राज्यों द्वारा की जा रही स्वायत्तता की मांग 1960 के दशक से, क्षेत्रीय दलों के उदय के साथ तथा केंद्रीय राजनीतिक हस्तक्षेपों के कारण अधिक से अधिक बल प्राप्त कर रही है।

    एक राज्य के भीतर क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांग: कुछ राज्यों में, विभिन्न क्षेत्रों के लोग अपनी क्षेत्रीय पहचान को मान्यता देने की मांग कर रहे हैं। ऐसी मांगों की उत्पत्ति अकुशल योजना के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय असंतुलन में निहित है, उदाहरण के लिये जम्मू-कश्मीर में, लद्दाखी एक क्षेत्रीय स्थिति की मांग कर रहे हैं।

    क्षेत्रवाद के कारण

    भाषा: भाषायी राज्यों की मांग ने क्षेत्रीयता को बढ़ावा दिया है जिसके कारण आंध्र प्रदेश, पंजाब आदि जैसे नए राज्यों का निर्माण हुआ है।

    धर्म: यह भी क्षेत्रवाद के प्रमुख कारकों में से एक है। उदाहरणतः

    जम्मू और कश्मीर में तीन स्वायत्त राज्यों की मांग धर्म पर आधारित है। उनकी माँगों के आधार हैं- मुस्लिम बहुल जनसंख्या के लिये कश्मीर, हिन्दू बहुल जनसंख्या के लिये जम्मू और बौद्ध बहुल जनसंख्या के लिये लद्दाख।

    क्षेत्रीय संस्कृति/नृजातीय पहचान: विभिन्न जनजातीय समूहों द्वारा अपनी नृजातीय पहचान को सुरक्षित बनाए रखने के प्रयास भी क्षेत्रवाद का कारण बनते हैं, जैसे- बोडोलैंड और झारखंड का आंदोलन।

    आर्थिक पिछड़ापन: सामाजिक आर्थिक विकास के असमान प्रतिरूप ने क्षेत्रीय विषमताएँ पैदा की हैं। सामाजिक आर्थिक विकास और संसाधनों के उपयोग के आधार पर राज्यों के वर्गीकरण और उप-वर्गीकरण ने नाराज़गी पैदा की है, जिससे क्षेत्रवाद को बढ़ावा मिला है। उदाहरणतः:आंध्र प्रदेश से तेलंगाना का विभाजन, विदर्भ, सौराष्ट्र आदि के लिये अलग राज्य की मांग।

    राजनीतिक दलों का उदय: गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उदय ने क्षेत्रवाद को वोट हासिल करने हेतु एक राजनीतिक उपकरण के रूप में प्रेरित किया है।

    भूमि पुत्र का सिद्धांत: यह सिद्धांत बताता है कि एक सीमित भगौलिक क्षेत्र के समस्त संसाधनों पर केवल उन्हीं लोगों का अधिकार होना चाहिये जिनका जन्म उस क्षेत्र में हुआ है। जिनका जन्म उस क्षेत्र से बाहर हुआ हो, उनका उस क्षेत्र में कोई अधिकार नहीं है। प्रवासी और स्थानीय शिक्षित मध्यम वर्ग के युवाओं के बीच नौकरियों और संसाधनों के लिये प्रतिस्पर्द्धा के कारण इस सिद्धांत का चलन बढ़ा है। उदाहरणतः

    मराठों के लिये महाराष्ट्र, गुजरातियों के लिये गुजरात आदि।

    आगे की राह

    भारतीय राष्ट्र के बहुलवादी चरित्र के लिये विविधता में एकता की प्रकृति को संरक्षित करने की आवश्यकता है।

    विविध आबादी की बहु आकांक्षाओं का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

    बॉटम-अप दृष्टिकोण: नीति आयोग का गठन बॉटम-अप दृष्टिकोण का उपयोग करके आर्थिक नीति-निर्माण प्रक्रिया में भारत की राज्य सरकारों की भागीदारी को बढ़ावा देकर सहकारी संघवाद को बढ़ाने के लिये एक सकारात्मक कदम रहा है।

    सरकारी योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन: जहाँ सरकार द्वारा समावेशी विकास के लिये केंद्र प्रायोजित योजनाओं की शुरुआत और पिछड़े राज्यों में विकास के लिये निजी खिलाड़ियों को प्रोत्साहन जैसे कई कदम उठाए गए हैं, उनके प्रभावी कार्यान्वयन की अधिक आवश्यकता है।

    शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता पर राज्यों द्वारा सामाजिक व्यय के स्तर को बढ़ाने की आवश्यकता है जो मानव संसाधन विकास के लिये महत्वपूर्ण हैं।

    राष्ट्रीय शिक्षा की एक ऐसी प्रणाली की शुरुआत करना जो लोगों की क्षेत्रीय भावनाओं को दूर करने और राष्ट्र के प्रति लगाव विकसित करने में मदद करेगी, यह क्षेत्रवाद की समस्या के दीर्घकालिक समाधान के रूप में कार्य कर सकती है।

    राष्ट्रीय एकता परिषद का पूर्ण उपयोग: 1961 में राष्ट्रीय एकता परिषद की स्थापना की गई थी, इसकी क्षमता का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग करने की आवश्यकता है।

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