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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. मंदिर वास्तुकला की नागर शैली अधिकतर उत्तरी भारत में प्रचलित थी। इस संदर्भ में नागर शैली की स्थापत्य कला की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिये। (150 शब्द)

    19 Sep, 2022 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • मंदिर वास्तुकला की नागर शैली के बारे में संक्षिप्त जानकारी देकर अपने उत्तर की शुरुआत कीजिये।
    • मंदिर स्थापत्य की नागर शैली की विशेषताओं की विवेचना कीजिये।
    • उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय

    पाँचवी शताब्दी ईस्वी के बाद से, भारत के उत्तरी भाग में मंदिर वास्तुकला की एक विशिष्ट शैली विकसित हुई, जिसे वास्तुकला की नागर शैली के रूप में जाना जाता है। नागर शैली की तरह दक्षिण भारत में मंदिर वास्तुकला की द्रविड़ शैली का प्रचलन था। नागर शैली में भी, देश के पश्चिमी, मध्य और पूर्वी हिस्सों में विभिन्न उप-शैलियों का उदय हुआ।।

    मंदिर वास्तुकला की नागर शैली की विशेषताएँ:

    • मंदिरों ने आम तौर पर निर्माण की पंचायतन शैली का पालन किया।
    • नागर शैली में शिखर अपनी ऊँचाई के क्रम में ऊपर की ओर क्रमश: पतला होता जाता है।
    • मंदिर में सभा भवन और प्रदक्षिणा-पथ भी होता था।
    • शिखर के नियोजन में बाहरी रूपरेखा बड़ी स्पष्ट तथा प्रभावशाली ढंग से उभरती है। अत: इसे रेखा शिखर भी कहते हैं।
    • शिखर पर आमलक की स्थापना होती है।
    • मुख्य मंदिर के सामने सभा हॉल या मंडप की उपस्थिति।
    • गर्भगृह के बाहर, गंगा और यमुना नदी की देवी की छवियों की उपस्थिति।
    • मंदिर वास्तुकला की द्रविड़ शैली के विपरीत मंदिर परिसर में कोई पानी की टंकी या जलाशय मौजूद नहीं है।
    • मंदिर आमतौर पर ऊँचे चबूतरे पर बनाए जाते थे।

    शिखर आमतौर पर तीन प्रकार के होते थे:

    • लैटिना या रेखा-प्रसाद: उनका आधार वर्गाकार था और दीवारें ऊपर की ओर एक बिंदु की ओर मुड़ी हुई थीं।
    • फमसाणा: उनका आधार व्यापक था और लैटिना की तुलना में ऊँचाई में छोटा था। वे एक सीधी रेखा में ऊपर की ओर झुकते हैं।
    • वल्लभी: उनके पास एक आयताकार आधार था जिसकी छत गुंबददार कक्षों के रूप में थी। उन्हें वैगन-वॉल्टेड रूफ्स भी कहा जाता था।
    • शिखर का ऊर्ध्वाधर सिरा एक क्षैतिज फ्लेवर्ड डिस्क में समाप्त होता है, जिसे अमलक के नाम से जाना जाता है। उसके ऊपर एक गोलाकार आकृति रखी गई थी जिसे कलश कहा जाता था।
    • मंदिर के अंदर, दीवार को तीन ऊर्ध्वाधर विमानों में विभाजित किया गया था जिन्हें रथ कहा जाता है। इन्हें त्रिरथ मंदिर के नाम से जाना जाता था। बाद में, पंचरथ, सप्तरथ और यहाँ तक कि नवरथ मंदिर भी अस्तित्व में आए।
    • कथात्मक मूर्तियाँ बनाने के लिए ऊर्ध्वाधर विमानों का उपयोग विभिन्न पैनलों के रूप में किया गया था।
    • द्रविड़ शैली के विपरीत, मंदिर परिसर में विस्तृत चारदीवारी या प्रवेश द्वार नहीं थे।

    कोणार्क (ओडिशा) में सूर्य मंदिर, पुरी में जगन्नाथ मंदिर, भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर आदि मंदिर वास्तुकला की नागर शैली के बेहतरीन नमूने हैं जो लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं।

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