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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. आप एक सिविल सेवा प्रतियोगी हैं और आपने इस परीक्षा के प्रथम दो चरण उत्तीर्ण कर लिये हैं और हाल ही में आपको साक्षात्कार हेतु कॉल लेटर मिला है। आपने इस अवसर पर परमात्मा के प्रति अपना आभार जताने हेतु अपने निवास के पास के पवित्र तीर्थस्थल पर जाने का फैसला किया। तीर्थस्थल में प्रवेश करते ही आप एक भूत भगाने की क्रिया को देखते हैं। जहाँ एक दबंग धार्मिक व्यक्ति दो महिलाओं पर चिल्लाते हुए लगातार थप्पड़ मार रहा है तथा उसके पास ही उनका परिवार मूक-दर्शक बनकर खड़ा है। आप इस बात से आश्वस्त हैं कि महिलाएँ मनोवैज्ञानिक रूप से पीड़ित हैं किंतु इनके परिवार के सदस्यों द्वारा उनकी इस स्थिति को उनके शरीर में बुरी आत्मा की उपस्थिति के लक्षण के रूप में पेश किया जा रहा है। आप इन महिलाओं की दुर्दशा से गहराई से प्रभावित हैं तथा उनके प्रति समानुभूति रखते हैं।

    (a) आपके पास इस स्थिति में कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं तथा आप इस स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया देंगे?
    (b) भूत भगाने की प्रथा में कौन-कौन से नैतिक मुद्दे शामिल हैं? (250 शब्द) 20

    07 Jan, 2022 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • समाज में मानसिक रोगों के बारे में व्याप्त अवधारणा को बताते हुए भूमिका लिखिये।
    • उपर्युक्त केस में आपके पास मौजूद विकल्पों को बताइये।
    • अपने द्वारा चुने गए विकल्प की तर्कसंगत तथ्यों से पुष्टि कीजिये।
    • भूत भगाने की प्रथा मे निहित नैतिक मुद्दों को विश्लेषित कीजिये।

    सामान्यतया भारतीय समाज में मानसिक स्वास्थ्य एवं मनोवैज्ञानिक मुद्दे रूढ़िजन्य हैं। यहाँ ऐसी समस्याओं से पीड़ित व्यक्तियों के साथ सामाजिक भेदभाव किया जाता है। यह न सिर्प एक सिविल सेवा प्रतियोगी के रूप में बल्कि एक शिक्षित नागरिक के रूप में ऐसी भेदभावपूर्ण एवं अमानवीय प्रथा को रोकना तथा इसके खिलाफ आवाज़ उठाना मेरा कर्त्तव्य है।

    जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘‘जब तक लाखों लोग भूख और अज्ञान में रहेेंगे तब तक मैं हर उस आदमी को गद्दार मानूँगा, जिसने गरीबों की कीमत पर शिक्षा तो हासिल की लेकिन उनकी चिंता बिल्कुल नहीं की।’’

    उपर्युक्त केस स्टडी में महिलाएँ स्पष्ट रूप से अपने परिवार के गलत विश्वासों की बलि चढ़ रही हैं। इस मामले में मेरे पास उपलब्ध विकल्प निम्नवत् हैं-

    • मैं महिलाओं की इस दुर्दशा को नज़रअंदाज़ कर तीर्थस्थल पर माथा टेककर आगे बढ़ सकता हूँ। आगामी दिनों मेरे पास एक बड़ा अवसर है और मुझे अपने देश में व्यापक रूप से प्रचलित इन अंधविश्वासों पर अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहिये।
    • बुरी आत्मा को शरीर से बाहर करने के नाम पर महिलाओं से मारपीट करने वाले व्यक्ति का सामना कर इस मामले की रिपोर्ट तीर्थस्थल प्राधिकरण को देनी चाहिये।
    • परिवार के सदस्यों को समझाने की कोशिश कर उन्हें चिकित्सा विशेषज्ञ की सहायता लेने का सुझाव देना चाहिये। यदि उनके पास वित्तीय संसाधनों की कमी है तो किसी सरकारी या निजी निकाय से मानसिक समस्या के निवारण के लिये सहायता लेने का सुझाव देना चाहिये।
    • मेरे पास उपलब्ध उपर्युक्त तीन विकल्पों में से तीसरा विकल्प एक शिक्षित व्यक्ति एवं सिविल सेवा प्रतियोगी के लिये सर्वाधिक उपयुक्त है, जिसका कर्त्तव्य ऐसे लोगों की सहायता करना है जो कि इन तर्कविहीन विश्वासों का शिकार बनते हैं।
    • दूसरा विकल्प भी बेहतर प्रतीत हो रहा है, किंतु इस विकल्प में यह संभावना बनी रहेगी कि तीर्थस्थल के पदाधिकारियों से शिकायत करने के बावजूद महिलाओं की समस्या अनसुलझी ही रह जाएगी।
    • पहले विकल्प की अपनी नैतिक सीमाएँ हैं, इसका चयन करना एक नागरिक के रूप में मेरा अपने सार्वजनिक कर्त्तव्य का त्याग करना होगा।

    हमारा समाज कई प्रकार की अप्रचलित एवं शोषणकारी प्रथाओं से पीड़ित है क्योंकि यहाँ अधिकांश शिक्षित और ज़िम्मेदार नागरिक बस मूकदर्शक बनकर रह जाते हैं। महाभारत में एक नागरिक के कर्त्तव्यों को बताते हुए तर्क दिया गया है कि जब कोई अपराध होता है तो उसका सिर्प आधा दोष अपराधी का होता है जबकि एक-चौथाई सह-साजिशकर्त्ता का तथा बचा हुआ एक-चौथाई दोष उन लोगों का होता है जो चुपचाप खड़े होकर इसे देखते हैं। इसलिये मुझे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुनकर सकारात्मक रूप से इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिये। मैं परिवार के सदस्यों को यह समझाने की कोशिश करूँगा कि इस प्रकार के अत्याचार से महिलाओं की स्थिति और बदतर हो जाएगी तथा उन्हें यह भी समझाऊँगा कि मानसिक समस्याएँ काउंसलिंग के द्वारा ठीक हो जाती हैं। उन्हें भूत भगाने हेतु टोटके करने की बजाय एक अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्व करना चाहिये। यदि उन्हें वित्त संबंधी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है तो मैं सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों की सहायता से उनकी मदद करूँगा। साथ ही, मैं ऐसे गैर-सरकारी संगठनों से संपर्व करूँगा जो कि तीर्थस्थलों पर होने वाली ऐसी प्रथाओं को रोकने हेतु कार्य करते हैं।

    भूत भगाने की प्रथा में शामिल नैतिक मुद्दे:

    • व्यक्ति की गरिमा व मानवाधिकारों का उल्लंघन: इन महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार किया जा रहा है जो कि इनकी गरिमा व स्वाभिमान को ठेस पहुँचाना है।
    • धार्मिक विश्वासों का दुरपयोग: परिवार के सदस्यों को मंदिर के देवत्व पर विश्वास है किंतु इसका दुरपयोग मानसिक समस्याओं के इलाज हेतु किया जा रहा है।
    • जन उदासनीता की स्थिति: श्रद्धालु ऐसे मामलों के प्रति उदासीन रवैया अपनाते हैं।
    • राज्य की भूमिका: इस प्रकार की प्रथाओं की निरंतरता जन-जागरूकता पैलाने तथा मानसिक स्वास्थ्य को सर्वसुलभ बनाने के मुद्दे पर राज्य की विफलता को दर्शाती है।
    • संवैधानिक नैतिकता: हमारे संविधान के मौलिक कर्त्तव्यों में से एक के अनुसार, ‘‘व्यक्ति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जाँच व सुधार की भावना विकसित करनी चाहिये’’ का उल्लंघन है। जो कि संवैधानिक नैतिकता पर अंधविश्वासों को वरीयता देने की स्थिति को दर्शाता है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की लगभग 7.5 प्रतिशत जनसंख्या किसी-न-किसी रूप में मानसिक विकारों का सामना कर रही है। किंतु जागरूकता की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और मनोचिकित्सकों की कम उपलब्धता के कारण लोग ऐसे अंधविश्वासों का सहारा लेते हैं। वर्तमान में ऐसी सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने की दिशा में कार्य करना समय की एक महत्त्वपूर्ण मांग है।

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