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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    दिल्ली सल्तनत के दौरान सामाजिक-आर्थिक स्थिति का वर्णन करें

    05 Nov, 2019 रिवीज़न टेस्ट्स इतिहास

    उत्तर :

    प्रश्न विच्छेद

    कथन दिल्ली सल्तनत के दौरान की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के वर्णन से संबंधित है।

    हल करने का दृष्टिकोण

    दिल्ली सल्तनत की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के विषय में संक्षिप्त उल्लेख के साथ परिचय लिखिये।

    दिल्ली सल्तनत की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का वर्णन कीजिये।

    उचित निष्कर्ष लिखिये।

    दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति को लेकर विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। भारतीय इतिहास का नवीनतम मत अविच्छिन्नता एवं निरंतरता की बजाय परिवर्तन पर बल देता है।

    दिल्ली सल्तनत की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का वर्णन निम्नलिखित रूपों में वर्णित है-

    • समाज की महत्त्वपूर्ण विशेषता लोगों का उनकी राष्ट्रीयता के आधार पर विभाजन, जैसे- विदेशी मुसलमान, भारतीय मुसलमान और हिंदू थी।
    • सल्तनत काल में मुस्लिम समाज नस्ल और जातीय समूहों में विभाजित रहा। समाज में गहन आर्थिक विषमता व्याप्त थी। हिंदू समाज एवं स्त्रियों की स्थिति में भी शायद ही कोई परिवर्तन हुआ।
    • स्वार्थों के टकराव के साथ-साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक विचारों, प्रथाओं एवं विश्वासों में उपस्थित विषमताओं ने न सिर्फ तनाव पैदा किया बल्कि पारस्परिक समझदारी एवं सांस्कृतिक आत्मसातीकरण की प्रक्रियाओं को भी धीमा किया। हालाँकि जातिगत प्रतिबंधों ने मुसलमानों और उच्च जातियों के हिंदुओं एवं शूद्रों के बीच सामाजिक संसर्ग को पूर्णतया बंद नहीं किया था।
    • शहर के आर्थिक जीवन में अमीरों एवं उनके कर्मचारियों, व्यापारियों एवं दुकानदारों का प्राधान्य था। नगरों में सर्वाधिक संख्या नौकरों, दासों, कारीगरों, सैनिकों, फेरीवालों, संगीतकारों, नटों एवं भिखारियों के मिश्रित वर्ग की थी।
    • भू-राजस्व आय का प्रमुख स्रोत था। इसलिये कृषि और सिंचाई को अधिक महत्त्व दिया गया था। लोग मुख्य रूप से कृषि एवं उद्योग कार्य में संलग्न थे।
    • सल्तनत काल में व्यापार कर, गृह कर, अश्व कर, खान कर आदि एकत्र किये जाते थे। इस काल में शहरों की संख्या में वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोतरी एवं व्यापार में विकास जैसी परस्पर संबंधित क्रियाएँ भी देखी जा सकती हैं।
    • वस्त्र उद्योग प्राथमिक उद्योग था। चीनी उद्योग, कागज उद्योग, धातु का कार्य, पत्थर काटना, मोती के लिये गोता लगाना, हाथी दांत और चंदन का कार्य इस काल के अन्य उद्योग थे।
    • पश्चिम एशिया एवं इससे होते हुए भूमध्य-सागरीय जगत के साथ-साथ मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ स्थल व जल दोनों ही मार्गों के ज़रिये भारतीय व्यापार संपन्न होता था।

    निष्कर्षत: भारतीय समाज में परिवर्तन की गति सदैव तीव्र रही है। आर्थिक क्षेत्र में भी परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी नहीं थी। इतिहासकार इरफान हबीब ने भी सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में दूरगामी परिवर्तन का संकेत दिया है।

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