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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • पश्चिम और दक्षिण भारत में धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों का प्रसार तथा उनका स्वरूप उत्तर भारत से काफी हद तक भिन्नता दर्शाता है। कथन की सकारण विवचेना करें।

    17 Dec, 2018 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    19वीं शताब्दी के धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलनों का भारतीय इतिहास में विशेष स्थान है। यह आंदोलन बहुमुखी स्वरूप और व्यापकता लिये हुए था, इसी कारण इसने देश में व्याप्त तत्कालीन जड़ता को समाप्त करने और आम जन-जीवन को बदलने का प्रयास किया। इसके पथ प्रदर्शकों ने जहाँ एक ओर धार्मिक एवं सामाजिक सुधाराें का आह्नान किया, वहीं दूसरी ओर, इसने भारत के अतीत को उजागर करके भारतवासियों के मन में आत्मसम्मान एवं आत्मगौरव जगाने का प्रयास किया। इन आंदोलनों के पीछे दो शक्तियाँ कार्य कर रही थीं_ प्रथम, अंग्रेजी शिक्षा और संस्कृति के प्रभाव से अवतरित हुई थी तो दूसरी, ईसाई मिशनरियों के कार्यों के विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया के रूप में हिंदुओं में उत्पन्न हुई।

    19वीं शताब्दी के प्रारंभ में ही इनका आविर्भाव हो चुका था, जो शताब्दी के अंत होते-होते संपूर्ण भारत (पश्चिम एवं दक्षिण) में फैल गया। किंतु उत्तर भारत के सुधार आंदोलन दक्षिण या पश्चिम भारत की तुलना में काफी भिन्नता लिये हुए था। इसे निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है।

    उत्तर भारत में धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों का प्रसार एवं स्वरूपः

    • उत्तर एवं पूर्वी भारत में सुधारकों ने किताबी आदर्शवाद को यथार्थ बनाने का प्रयास किया (यंग बंगाल आंदोलन)। इनके आदर्श और सामाजिक यथार्थता में कोई मेल नहीं था।
    • बंगाल में सुधारकों ने अंग्रेजी भाषा को प्रधानता दी न कि स्थानीय भाषा को।
    • दक्षिण के विपरीत बंगाल में कुशल नेतृत्व उपलब्ध था। इस कारण इस क्षेत्र के सुधार आंदोलन सतत् एवं दूरगामी थे।

    पश्चिम एवं दक्षिण भारत में प्रसार एवं स्वरूपः

    • पश्चिम भारत में बंगाल की तुलना में सुधारक अधिक व्यावहारिक और यथार्थवादी थे।
    • पश्चिम भारत में सुधारकों ने देशी भाषाओं का प्रयोग किया जिस कारण यह अधिक लोकप्रिय हुआ एवं जनता के निकट पहुँचा।
    • दक्षिण भारत में बंगाल के विपरीत आधुनिक शिक्षा की गति धीमी थी।
    • दक्षिण भारत में ब्राह्मण ही प्रमुख उच्च पदों पर आसीन थे। ऐसे में वे सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन लाकर स्वयं की सर्वोच्चता को क्षीण नहीं करना चाहते थे।

    इस प्रकार निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि उत्तर भारत के धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलन पश्चिम एवं दक्षिण भारत के आंदोलनों से मौलिक रूप से कुछ भिन्न थे। यहाँ तक कि पश्चिम एवं दक्षिण के आंदोलनों में भी भिन्नता देखी जा सकती है। किंतु सभी का लक्ष्य तत्कालीन सामाजिक जड़ता को समाप्त करके समाज को प्रगतिशील बनाना था।

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