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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

क्या जस्टिस जोसेफ की पदोन्नति का विरोध करना उचित है ?

  • 04 May 2018
  • 11 min read

संदर्भ 

  • जनवरी के प्रारंभ में उच्चतम न्यायालय की कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति जोसेफ को पदोन्नति देकर शीर्ष अदालत में न्यायाधीश बनाने और वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा को सीधे उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की थी।
  • ध्यातव्य है कि सरकार ने इंदु मल्होत्रा के नाम को तो मंजूरी दे दी थी, किंतु न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम पर फिर से विचार के लिये उनकी फाइल को लौटा दिया था।
  • आज वाद-प्रतिवाद-संवाद में हम यह चर्चा करेंगे कि एक न्यायाधीश की नियुक्ति का वास्तविक अधिकार आखिर किसको है और क्या वर्तमान संदर्भ हमेशा की तरह न्यायपालिका और संसद के बीच टकराव का प्रतिफल है या उससे कुछ भिन्न?

वाद

  • उच्चतम न्यायालय ने न्यायमूर्ति जोसेफ को पदोन्नति देकर शीर्ष अदालत में न्यायाधीश बनाने के प्रस्ताव से यह स्पष्ट कर दिया है कि संविधान में हमेशा एक प्रतिस्पर्द्धा का स्थान बना रहता है।
  • संविधान की व्याख्या और उसके दायरे को लेकर न्यायपालिका और संसद के बीच होने वाले मतभिन्नताओं का वर्णन ग्रेनविल ऑस्टिन ने संविधान को हथियाने के रूप में किया है।
  • गौरतलब है कि न्यायपालिका संविधान की अपनी व्याख्यात्मक शक्ति के माध्यम से, न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी संसद के संवैधानिक अधिकार को हथिया रही है।
  • हालाँकि ऐसा करके न्यायपालिका इस तथ्य को लगातार नजरअंदाज कर रही है कि संविधान सभा ने नियुक्तियों पर मुख्य न्यायाधीश की वीटो शक्ति के प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था।
  • केंद्र सरकार द्वारा अक्सर न्यायाधीशों की नियुक्तियों के संबंध में पूछे जाने वाले प्रश्नों का न्यायपालिका द्वारा जवाब न देना न्यायपालिका के एकाधिकार को बढ़ावा देता है, जो संवैधानिक प्रणाली के ‘नियंत्रण और संतुलन’ के लिये अच्छा नहीं है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने फर्स्ट जजेज़ और सेकेण्ड जजेज़ के मामले में दूसरे न्यायाधीशों की नियुक्तियों के संदर्भ में सिफारिशों को वापस भेजने के सरकार के अधिकार को मान्यता दी थी। 

 

कैसे होती हैं न्यायिक नियुक्तियाँ? 

  • ध्यातव्य है कि संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं।
  • इसके अनुसार राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे जजों से परामर्श करने के बाद, जिनसे वह परामर्श करना उचित समझे, सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति करेगा।
  • परंतु मुख्य न्यायाधीश से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा में भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से सदैव परामर्श किया जाएगा।

न्यायिक नियुक्तियों से संबंधित महत्त्वपूर्ण मामले

फर्स्ट जजेज़ मामला (first judges case)

  • वर्ष 1981 का फर्स्ट जजेज़ मामला, जिसे एस.पी. गुप्ता मामले के नाम से भी जाना जाता है, में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से अगले 12 वर्षों के लिये न्यायिक नियुक्तियों के संदर्भ में न्यायपालिका के ऊपर कार्यपालिका को वरीयता दी गई। 

सेकेण्ड जजेज़ मामला (second judges case)

  • वर्ष 1993 के एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन एवं अन्य बनाम भारत संघ (सेकेण्ड जजेज़ केस) के मामले में नौ जजों की पीठ ने यह व्यवस्था दी है कि: 
  • यदि उच्चतम न्यायालय का सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश पदधारण करने के लिये उपयुक्त है तो उसे भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया जाना चाहिये।
  • साथ ही, उच्चतम न्यायालय के अन्य जजों की नियुक्ति की दशा में मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श का अर्थ सहमति होगा।

थर्ड जजेज़ मामला (third judges case)

  • वर्ष 1998 में इन नियुक्तियों के संदर्भ में अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श, जिसे थर्ड जजेज़ मामला भी कहते हैं, में नौ जजों की पीठ ने राय व्यक्त करते हुए पाँच जजों से मिलकर बने एक कॉलेजियम की व्यवस्था दी है।
  • इसमें भारत का मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • हालाँकि कॉलेजियम  ने न्यायमूर्ति के.एम. जोसेफ को अन्य न्यायाधीशों की तुलना में "अधिक योग्य और उपयुक्त" माना है किंतु यह संदेहास्पद है कि सिफारिश के दिनांक पर सर्वोच्च न्यायालय में छः रिक्तियाँ होने के बावजूद केवल दो नामों की ही सिफारिश क्यों की गई।
  • चूँकि अन्य नामों को रोकना शेष न्यायाधीशों की वरिष्ठता पर निश्चित प्रभाव डालेगा अतः न्यायपालिका को जवाबदेह होना चाहिये।

प्रतिवाद

  • निम्नलिखित आधारों पर किसी न्यायाधीश का नामांकन वापस किया जा सकता है:  
    ♦ कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की राय पर विचार नहीं किया गया हो।
    ♦ संवैधानिक मानदंडों के अनुरूप योग्यता न हो।
    ♦ पूर्ववर्ती या स्वास्थ्य से संबंधित कोई भी तथ्य जिसे कॉलेजियम द्वारा एक न्यायाधीश के हेतु उपयुक्त नहीं माना गया हो। 
    ♦ इसके अलावा, यदि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश का कार्यकाल बहुत कम समय का शेष रहने की संभावना हो।
  • केंद्र सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश को जस्टिस जोसेफ के नामांकन को खारिज करने से संबंधित कारणों में इनमें से किसी भी आधार का उल्लेख नहीं किया गया है। 
  • यह तय करना केंद्र सरकार का अधिकार नहीं है कि वरिष्ठता, क्षमता पर प्रबल होनी चाहिए या नहीं अथवा क्षेत्रीय और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व की कमी के मामले में अदालत की विविधता क्या होनी चाहिये।
  • केंद्र द्वारा मुख्य न्यायाधीश को लिखे गए दो पत्रों में कहा था कि उच्चतम न्यायपालिका में पहले से ही केरल को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला हुआ है न्यायमूर्ति जोसेफ भी केरल से ही हैं अतः उनको सर्वोच्च न्यायालय में पद प्रदान करने के संबंध में पुनर्विचार की आवश्यकता है।
  • केंद्र सरकार के वर्तमान संदर्भ के कार्य ने कॉलेजियम  को केवल एक अनुशंसात्मक निकाय के रूप में सीमित करने का प्रयास किया है।

संवाद 

  • यदि वैधानिकता के आधार पर देखें तो उच्च न्यायिक नियुक्तियों में सरकार ने सीमित वैधानिकता का ही प्रयोग किया है।
  • वर्तमान उच्च न्यायिक नियुक्तियों के लिये कानून फर्स्ट जजेज़ और सेकेण्ड जजेज़ मामले में निहित है।
  • हालाँकि सरकार द्वारा एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से वर्ष 2015 में इस कानून को बदलने का प्रयास किया गया जिसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था।
  • 2015 के फैसले में प्रगतिशील सुधार के लिये कहा गया है जिसके लिये न्यायाधीशों द्वारा निर्धारित मानदंडों से परे किसी भी बदलाव को या तो उच्चतम न्यायालय की बेंच या वैध संवैधानिक संशोधन से ही संभव बनाया जा सकेगा।

निष्कर्ष 

  • वर्तमान नियुक्ति संबंधी संकट केवल न्यायपालिका या केवल कार्यपालिका के कारण नहीं है। दरअसल इस संकट के लिये दोनों की पक्ष ज़िम्मेदार हैं।
  • हालाँकि, अपने काम में हस्तक्षेप किसी को पसंद नहीं आता किंतु संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देकर इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।
  • सरकार का यह कहना सही है कि जिस तरह सरकार न्यायपालिका की भूमिका में नहीं आ सकती, ठीक उसी मर्यादा का पालन न्यायपालिका को भी कार्यपालिका के संदर्भ में करना चाहिये।
  • हालाँकि, वर्तमान टकराव में जो एक सकारात्मक बात भी  सामने आई है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों अपना पक्ष रखने में कोई संकोच नहीं कर रहे।
  • संवाद की यही प्रक्रिया लोकतांत्रिक समाज की पहचान है, लेकिन इसमें दोनों पक्षों को कटुता एवं श्रेष्ठता के भाव से मुक्त रहना भी ज़रूरी है।
  • यह ज़रूरी नहीं कि हमेशा  न्यायपालिका−कार्यपालिका में संबंध प्रगाढ़ होंगे, लेकिन ऐसा नहीं होगा तो इसका लाभ सबको नहीं मिल सकेगा और न्याय के लिये विश्वास का संकट खड़ा हो जाएगा।
  • अतः बेहतर यही है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका में टकराव की स्थिति बनने ही न दी जाए। इसी से लोकतांत्रिक व्यवस्था सुदृढ़ होगी।
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