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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

क्या आयुष्मान भारत एक स्वस्थ भारत का निर्माण कर सकता है?

  • 17 May 2018
  • 19 min read

संदर्भ
केंद्रीय बजट 2018-19 में वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा ‘आयुष्मान भारत’ पहल के तहत स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर दो महत्त्वपूर्ण घोषणाएँ की गईं। जहाँ एक ओर 1.5 लाख स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों के लिये 1200 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है, वहीं दूसरी ओर 10 करोड़ से अधिक गरीब और कमज़ोर परिवारों को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के लिये राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना की शुरुआत की गई है। आयुष्मान भारत के तहत सरकार की इन दो दूरगामी पहलों का लक्ष्य 2022 तक नए भारत का निर्माण करना है। 

आयुष्मान भारत क्या है?

  • इस योजना में प्रतिवर्ष प्रति परिवार के लिये पाँच लाख रुपए का लाभ कवर किया गया है।
  • इस योजना के लक्षित लाभार्थी दस करोड़ से अधिक परिवार होंगे। ये परिवार एसपीसीसी डाटा बेस पर आधारित गरीब और कमज़ोर आबादी के होंगे।
  • आयुष्‍मान भारत - राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा मिशन (Ayushman Bharat : National Health Protection Mission - AB-NHPM) में चालू केंद्र प्रायोजित योजनाएँ : राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना (Rashtriya Swasthya Bima Yojana -RSBY) तथा वरिष्‍ठ नागरिक स्‍वास्‍थ्य बीमा योजना (Senior Citizen Health Insurance Scheme -SCHIS) समाहित होंगी।

आज वाद-प्रतिवाद-संवाद के ज़रिये हम इस पर चर्चा करेंगे कि क्या आयुष्मान भारत योजना एक स्वस्थ भारत का निर्माण कर सकती है?

वाद

  • इस प्रश्न का उत्तर होगा हाँ, यह ऐसा कर सकती है। 
  • सरकार की नई स्वास्थ्य पहल आयुष्मान भारत के दो आयाम हैं। सबसे पहले, इसका उद्देश्य स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों (Health and Wellness Centres - HWCs) के साथ व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को लागू करना है।
  • 2022 तक मौजूदा उप-केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों को रूपांतरित करते हुए 1.5 लाख एचडब्ल्यूसी के एक राष्ट्रव्यापी नेटवर्क का निर्माण किया जाएगा। यह भारत की नई स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की नींव का गठन करेगा।
  • अभी तक देश की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था का मुख्य केंद्रबिंदु प्रजनन, मातृ स्वास्थ्य, नवजात और बाल स्वास्थ्य के साथ-साथ प्राथमिक संचारी रोगों को नियंत्रित करना ही रहा है। यह सब कुल आवश्यकताओं का मात्र 15% है। 
  • यही कारण है कि लंबे समय से प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के अंतर्गत गैर-संचारी रोगों की देखभाल (विशेष रूप से उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर के इलाज़ आदि), मानसिक स्वास्थ्य, वृद्धों की देखभाल,  किशोर स्वास्थ्य, सामान्य नेत्र देखभाल और दंत स्वास्थ्य आदि के संदर्भ में बेहतर की व्यवस्था किये जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
  • एचडब्ल्यूसी को काफी हद तक ब्रिटेन की सामान्य स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यविधियों की तर्ज पर बनाया गया है, लेकिन इसमें अंतर यह है कि ब्रिटेन में यह कार्य बड़े पैमाने पर नर्स और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मचारियों द्वारा किया जाता है।
  • रोकथाम और सकारात्मक व्यवहार अच्छे स्वास्थ्य, बेहतर उत्पादकता और दीर्घ जीवन की कुंजी होते हैं। स्वस्थ परिवार, गाँव और शहर ही प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का मुख्य लक्ष्य है। 
  • आयुष्मान भारत का दूसरा आयाम राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना है जिसका लक्ष्य माध्यमिक और तृतीयक देखभाल सुविधाओं वाले अस्पताल में भर्ती होने पर प्रति वर्ष 5 लाख रुपए प्रति परिवार को स्वास्थ्य कवर प्रदान करना है।
  • यह विश्व का सबसे बड़ा सरकारी वित्तपोषित स्वास्थ्य देखरेख कार्यक्रम है। इस योजना के लिये इस वर्ष 2000 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है।
  • मौजूदा राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना गरीब परिवारों को 30,000 रुपए तक का वार्षिक कवरेज प्रदान करती है। स्वास्थ्य सुरक्षा को और अधिक उच्च स्तर पर ले जाने में यह योजना सहायक होगी।
  • इस योजना के तहत 11 करोड़ से अधिक गरीब और कमज़ोर परिवारों के 50 करोड़ लोगों को उन्नत इलाज के लिये प्रतिवर्ष 5 लाख रुपए तक का स्वास्थ्य बीमा कवरेज दिया जाना है।
  • यह बीमा योजना पूर्णतः कैशलेस होगी तथा इसके अंतर्गत पहले स्वयं खर्च करने और बाद में इलाज के खर्च का भुगतान प्राप्त करने की ज़रूरत नहीं होगी। बाद में भुगतान होने की प्रक्रिया में गड़बड़ी होने की संभावनाओं के मद्देनज़र इसे कैशलेस रखा गया है।
  • आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य क्षेत्र की इन पहलों से श्रम-उत्पादकता और जनकल्याण में वृद्धि होगी तथा कार्यदिवसों की हानि और निर्धनता से बचा जा सकेगा।
  • इन योजनाओं से विशेषकर महिलाओं के लिये रोज़गार के लाखों अवसर सृजित होंगे और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।
  • यह बीमा योजना पूर्णतः कैशलेस होगी तथा इसके अंतर्गत पहले स्वयं खर्च करने और बाद में इलाज के खर्च का भुगतान प्राप्त करने की ज़रूरत नहीं होगी।
  • इस योजना के तहत बीमित व्यक्ति सिर्फ सरकारी ही नहीं बल्कि निजी अस्पतालों में भी इलाज करा सकेगा। निजी अस्पतालों को इस योजना के साथ जोड़ने का कार्य शुरू कर दिया गया है।

Ayushman-Bharat

प्रतिवाद

  • इस प्रश्न का उत्तर होगा नहीं। इसे नकारने के विषय में निम्नलिखित पक्षों का अध्ययन कीजिये।
  • इस योजना की एक उप-योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना, जिसे ‘मोदीकेयर’ भी कहा जाता है, पहले से मौजूद योजना का पुन:घोषित रूप है। साथ ही इसके तहत आवंटित धन भी अपर्याप्त है। इतना है नहीं, यह योजना कई राज्य स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को ओवरलैप भी करेगी। 
  • सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह होगी कि यह योजना निवारक, प्रोत्साहन अथवा आउट पेशेंट देखभाल (outpatient care) से निपटने में कारगर नहीं है, इसलिये यह वृहद् सार्वजनिक स्वास्थ्य लाभों को हासिल करने में सक्षम प्रतीत नहीं होती है।

नई बोतल में पुरानी शराब

  • एनएचपीएस एक नई योजना नहीं है, वास्तव में इसे 2016 के बजट में घोषित किया गया था। इसमें एकमात्र अंतर यह है कि पहले इसके तहत 1 लाख रुपए का प्रावधान किया गया था जो अब बढ़ाकर 5 लाख कर दिया गया है।
  • पिछले दो वर्षों में एनएचपीएस की असफलता का मुख्य कारण यह रहा कि कई बड़े राज्यों द्वारा पहले से ही स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ संचालित की जा रही थी और इसके लिये आवश्यक राशि 1.5-2 लाख के करीब थी जो कि पर्याप्त थीं। ऐसे में ‘नई बोतल में पुरानी शराब’ जैसी यह योजना कितनी लाभप्रद होगी इसमें संशय बना हुआ है।
  • इस योजना को मौजूदा राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (Rashtriya Swasthya Bima Yojana - RSBY) के आधार पर तैयार किया गया है, लेकिन यह आरएसबीवाई से जुड़ी बहुत सी समस्याओं का समाधान करती प्रतीत नहीं होती है। 
  • इस संबंध में प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरएसबीवाई ने गरीबों के लिये स्वास्थ्य देखभाल की लागत में कोई विशेष कमी नहीं की है, यही कारण है कि कई राज्यों द्वारा इसे बंद कर दिया है।
  • यदि नई योजना के संदर्भ में बात की जाए तो इसके बारे में ऐसे कोई संकेत नज़र नहीं आते कि एनएचपीएस आरएसबीवाई से जुड़ी विकृतियों को ठीक कर पाएगी अथवा यह समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी।
  • एक अन्य जानकारी के अनुसार, एनएचपीएस ने यूनिवर्सल हेल्थ केयर की दिशा में कोई उपलब्धि हासिल नहीं की है। उदाहरण के तौर पर, अभी भी 80 करोड़ (60% आबादी) आबादी इसके दायरे से बाहर है, आउट पेशेंट देखभाल (70% लोगों के व्यय के लिये ज़िम्मेदार) को पूरी तरह से कवर नहीं किया गया है, साथ ही जैसा कि इसके पूरी तरह से हॉस्पिटलाईजेशन (hospitalization) पर केंद्रित होने की बात कही गई थी, के संबंध में कोई सबूत नहीं मिलते हैं।
  • वित्त मंत्री ने अपने एक बयान में कहा था कि एनएचपीएस 'दुनिया का सबसे बड़ा सरकारी वित्तपोषित स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम' है, यह आश्चर्यजनक है क्योंकि इस कार्यक्रम की कुल आवंटित राशि 2,000 करोड़ रुपए है। जबकि इसकी तुलना में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पर 30,000 करोड़ रुपए का वार्षिक परिव्यय किया जाता है। इतना ही नहीं भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिये सालाना 100,000 करोड़ रुपए की धनराशि आवंटित की जाती है। 
  • आयुष्मान भारत का दूसरा घटक 1.5 लाख स्वास्थ्य और स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से व्यापक स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करना है। इसके लिये बजट में 1,200 करोड़ रुपए के आवंटन की बात कही गई है, इतनी धनराशि से तो केवल 10,000 एचडब्ल्यूसी को ही संचालित किया जा सकता है, जो अनुमानित लक्ष्य के 7% से भी कम है।
  • यह सब देखते हुए यह कहना गलत न होगा कि ‘आयुष्मान भारत’  प्रत्येक परिवार के लिये 5 लाख के स्वास्थ्य कवर प्रदान करने के अपने वचन के बजाय एक और सरकारी 'जुमला' न बन जाए।

Urban

संवाद

  • इस योजना के दो हिस्से हैं - राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना (एनएचपीएस) तथा स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र (एचडब्ल्यूसी)। एनएचपीएस को व्यापक मीडिया कवरेज प्राप्त हुआ है, जबकि इसके विषय में आम जनता को बहुत कम जानकारी प्राप्त है। यह और बात है कि बजट भाषण में एचडब्ल्यूसी को भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की आधारशिला कहा गया था।
  • विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के देशों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को स्वास्थ्य देखभाल का मुख्य केंद्रबिंदु माना गया है।
  • वर्तमान समय में, भारत में स्वास्थ्य उप-केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केवल मातृ एवं बाल देखभाल के कुछ पक्षों तक ही सीमित हैं। साथ ही ये केवल दो या तीन प्रमुख संक्रामक रोगों का नियंत्रण करने में ही सक्षम हैं। 
  • एचडब्ल्यूसी को लाने का उद्देश्य इन केन्द्रों की क्षमता में वृद्धि करना, पुरानी बीमारी और संक्रामक रोगों के संबंध में एक वृहद् श्रृंखला का निर्माण करना है, ताकि अधिक से अधिक लोगों को प्राथमिक उपचार की सुविधा प्रदान की जा सके।
  • लेकिन इस संदर्भ में तीन महत्त्वपूर्ण पूर्व-स्थितियों पर विचार करना बहुत ज़रुरी हैं सबसे पहले, इसके लिये प्रति वर्ष प्रति एचडब्ल्यूसी लगभग 20 लाख रुपए का अतिरिक्त बजटीय आवंटन किया जाएगा।
  • यह एक बहुत बड़ी रकम है। सबसे ज़रुरी बात इसके विषय में न तो इस वर्ष के बजट में और न ही एनएचएम के विस्तार के साथ प्रस्तुत बजट आवंटन में किसी प्रकार कोई उल्लेख किया गया है।
  • दूसरी स्थिति मानव संसाधन नीति से संबंधित है, जिसमें प्रति एचडब्ल्यूसी कम-से-कम तीन (नियमित रूप से वेतन पाने वाले) सहायक स्वास्थ्य श्रमिकों की आवश्यकता है।
  • इसके अतिरिक्त इन 3 लाख स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं की भर्ती, प्रशिक्षण और इनके बने रहने के संबंध में भी आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिये ताकि आवश्यकता पड़ने पर इनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके। 
  • लेकिन ज़मीनी स्तर पर सरकार को बहुत-सी वैचारिक और वित्तीय बाधाओं से रुबरु होना पड़ रहा है, जिसके कारण इन कार्यकर्त्ताओं की भर्ती तो प्रभावित हो ही रही है साथ ही, कार्यबल को संविदाकृत करने का कार्य भी बाधित हो रहा हैं।
  • तीसरा, कारक यह है कि माध्यमिक और तृतीयक अस्पतालों में विशेषज्ञों और डॉक्टरों के मध्य एक बेहतर समन्वित रेफ़रल तंत्र की आवश्यकता होती है, लेकिन इसमें बहुत ही सीमित प्रयास और निवेश किया जाता है। संदेह तो इस बात को लेकर है कि इसके संदर्भ में बहुत कम विचार-विमर्श किया जाता है।

बीमा प्रबंधन के संदर्भ में

  • यदि एचडब्लूसी के संदर्भ में व्याप्त चुप्पी एक समस्या है, तो एनएचपीएस के संबंध में यह किसी शोर से कम नहीं है। एनएचपीएस एक सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम है, जिसमें एक सीमित बजट है, जिसे माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल के खर्चों के संदर्भ में गरीबों के लिये वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने हेतु बनाया गया है।
  • कई राज्यों में पहले से ही ऐसे कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा हैं। सबसे पहले, दूरदराज़ के क्षेत्रों में अस्पताल देखभाल संबंधी पहुँच सुनिश्चित करने के लिये, कोई प्रदाता नहीं है, बीमा प्रबंधन बहुत अधिक प्रभावी नहीं है। अत: इसके लिये सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता है।
  • दूसरा, निजी क्षेत्र के संबंध में किसी प्रभावी विनियमन की अनुपस्थिति होना। जानकारी के उच्च स्तर को देखते हुए निजी स्वास्थ्य प्रदाताओं द्वारा सेवाओं की लागत को बहुत अधिक निर्धारित किया जाता है ताकि अधिक-से-अधिक मुनाफा कमाया जा सके।
  • यहाँ तक कि वित्तीय सुरक्षा के संदर्भ में भी इसके परिणाम अनिश्चित हैं। ऐसी योजनाओं के अंतर्गत आउट पेशेंट देखभाल की उपेक्षा की जाती है जो स्वास्थ्य देखभाल की ज़रूरतों के सबसे अधिक हिस्से को पूरा करती है। 
  • साथ ही स्वास्थ्य देखभाल की उच्च लागतों के कारण अधिकतर व्यय और दरिद्रता के लिये उत्तरदायी भी साबित होती हैं।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पतालों में तृतीयक देखभाल के लिये वैकल्पिक और अधिक लचीले वित्तपोषण के मार्ग के रूप में एनएचपीएस एक उपयोगी भूमिका निभा सकता है।
  • स्पष्ट रूप इसे अस्पताल के विकल्प की बजाय पूरक के रूप में तैयार किया जा सकता था जैसा कुछ राज्यों द्वारा किया भी गया है।
  • जहाँ राज्यों ने पहले ही बीमा कार्यक्रम स्थापित किये हैं, एनएचपीएस द्वारा इनका स्थान लेने की बजाय इन्हें वित्तपोषित किया जाना चाहिये। 

निष्कर्ष
स्पष्ट रूप से जहाँ इस कार्यक्रम के तहत बहुत से लक्ष्यों को प्राप्त करने की रणनीति बनाई जा रही है वहीं, कई पक्ष ऐसे भी हैं जिनके विषय में और अधिक ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। ऐसे में ज़रूरी यह है कि नए कार्यक्रमों को शुरू किये जाने की बजाय पहले से चली आ रही योजनाओं के तहत निर्धारित लक्ष्यों को पाने पर अधिक बल दिया जाना चाहिये। निश्चित रूप से बजट में जिन दो नई योजनाओं की घोषणा की गई है उनके अनुपालन से जहाँ एक ओर गरीब आदमी तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुचँ को सुनिश्चित किया जा सकेगा वहीं, स्वास्थ्य सेवाओं में आने वाली लागत में भी उल्लेखनीय कमी आएगी। साथ ही इससे रोज़गार के अवसरों का भी सृजन होगा।

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