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विशेष: येरुशलम! येरुशलम!! येरुशलम!!!

  • 16 May 2018
  • 20 min read

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि
दुनियाभर में हो रही आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए आखिरकार अमेरिका ने 14 मई को अपना दूतावास इज़राइल के तेल अवीव से हटाकर येरुशलम शहर में खोल दिया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पुत्री इवांका ट्रंप भी इस अवसर पर वहाँ मौजूद थीं। अमेरिका और इज़राइल का कहना है कि उनका यह कदम इस क्षेत्र में शांति कायम करने में सहायक होगा, वहीं तमाम अरब देश तथा अमेरिका के सहयोगी पश्चिमी देशों ने इसे क्षेत्र में अस्थिरता और उकसावे को बढ़ाने वाला कदम बताया है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष 7 दिसंबर को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका का दूतावास येरुशलम ले जाने का ऐलान किया था।

  • अमेरिका ने पिछले साल दिसंबर में येरुशलम को इज़राइल की राजधानी घोषित कर दिया था।
  • उल्लेखनीय है कि ऐसा करने के लिये अमेरिका में 1995 में 'येरुशलम दूतावास कानून' बनाया गया था, जिसके अनुसार अमेरिका का इज़राइली दूतावास येरुशलम में होना चाहिये।
  • लेकिन बिल क्लिंटन और जॉर्ज बुश से लेकर बराक ओबामा तक सभी अमेरिकी राष्ट्रपति इसे बेहद विवादित मानते हुए टालते रहे और हर 6 महीने बाद इस कानून से छूट लेने वाले दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करते रहे। 
  • लेकिन पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में यहूदी मतदाताओं को लुभाने के लिये डोनाल्ड ट्रंप ने इसे अपने चुनाव घोषणा-पत्र में भी शामिल किया था। 
  • विश्व में अमेरिका को इज़राइल का सबसे बड़ा सहयोगी माना जाता है और दोनों के बीच बेहद घनिष्ठ सैन्य और तकनीकी संबंध हैं।
  • विदित हो कि 1948 में अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन पहले अंतरराष्ट्रीय नेता थे, जिन्होंने इज़राइल को अलग देश के रूप में मान्यता दी थी।
  • येरुशलम में अब तक किसी भी देश का दूतावास नहीं था, अमेरिका पहला देश है जिसने यहाँ दूतावास खोला है। इसके अलावा लगभग 86 देशों के दूतावास तेल अवीव में हैं, जो येरुशलम से लगभग 70 किमी. दूर है।
  • इज़राइली प्रधानमंत्री का आवास और कार्यालय तथा वहाँ की संसद और सुप्रीम कोर्ट भी येरुशलम में ही है।

यहाँ यह बता देना भी ज़रूरी है कि अमेरिका के इस फैसले के बाद लैटिन अमेरिकी देश ग्वाटेमाला और पराग्वे ने भी अपने दूतावास येरुशलम ले जाने का ऐलान किया है। इनके अलावा होंडुरास और चेक गणराज्य ने भी ऐसा करने के संकेत दिये हैं। वैसे दुनिया के अधिकांश देश पूरे येरुशलम पर इज़राइल के दावे को मान्यता नहीं देते और दूतावासों के मामलों में यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर हैं। 

क्या कहना है अमेरिका का?

  • इज़राइल एक स्वायत्त देश है और उसे अपनी राजधानी को लेकर फैसला करने का भी अधिकार है, लेकिन कई सालों तक हम इस स्पष्ट बात को पहचानने में असफल रहे।
  • अमेरिका दोनों देशों (इज़राइल और फिलिस्तीन) के बीच लंबे समय तक टिकने वाला शांति समझौता कराने के लिये भी प्रतिबद्ध है।

भड़क उठी हिंसा 
अमेरिका के इस फैसले के बाद इलाके में फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों और इज़राइली सेना के बीच संघर्ष में सैकड़ों फिलिस्तीनी हताहत हो चुके हैं। इज़राइली सेना का कहना है कि गाज़ा सीमा के निकट करीब 35 हज़ार फिलिस्तीनी नागरिक हिंसक दंगों में शामिल थे और जवाब में की गई कार्रवाई नियमों के तहत थी। दूसरी ओर, फिलिस्तीन में सत्तारूढ़ 'हमास' का कहना है कि वह फिलिस्तीनी लोगों के अधिकार हासिल करने को प्रतिबद्ध है। उसका मानना है कि इस फैसले से अमेरिका ने सीधे तौर पर येरुशलम को इज़राइल का हिस्सा मान लिया है, जबकि शहर के पूर्वी हिस्से पर फिलिस्तीन अपना दावा करता है। 

  • 30 मार्च से शुरू हुए फिलिस्तीनी विरोध प्रदर्शनों का दौर 15 मई को समाप्त हुआ, जिसे ग्रेट मार्च ऑफ रिटर्न नाम दिया गया था, क्योंकि 15 मई को फिलिस्तीन में  नकबा (कयामत) के तौर पर मनाया जाता है। 
  • 1948 में 15 मई के दिन ही इज़राइल अलग देश बना था, जिसके चलते हज़ारों फिलिस्तीनियों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा था। 
  • गौरतलब है कि 30 मार्च को फिलिस्तीन ज़मीन दिवस के तौर पर मनाता है, क्योंकि इसी दिन 1976 में फिलिस्तीन पर इज़राइल के कब्जे के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले 6 नागरिकों को इजराइली सेना ने मार दिया था।

(टीम दृष्टि इनपुट)

संयुक्त राष्ट्र में हुआ अमेरिका का विरोध

  • येरुशलम को लेकर अमेरिका के इस फैसले के लगभग 15 दिन बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अमेरिका से येरुशलम को इज़राइल की राजधानी के तौर पर मान्यता देने के फैसले को वापस लेने को कहा। 
  • भारत सहित 128 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि केवल 9 देशों ने ही प्रस्ताव के विरोध में वोट दिया और मैक्सिको तथा कनाडा सहित 35 देश अनुपस्थित रहे। 
  • इस प्रस्ताव में कहा गया था कि सभी देश येरुशलम में अपने राजनयिक मिशनों को स्थापित करने से बचें।
  • अमेरिका का साथ देने वालों में कोई बड़ा देश शामिल नहीं था। इज़राइल के अलावा ग्वाटेमाला, होंडुरास, मार्शल आइलैंड्स, माइक्रोनेशिया, पलाउ, टोगो और अमेरिका ने प्रस्ताव के विरोध में वोट दिया। 

विदित हो  कि 2012 में संयुक्त राष्ट्र में पारित प्रस्ताव के तहत फिलिस्तीन को 'पर्यवेक्षक देश' का दर्जा मिला हुआ है।

इज़राइल के लिये क्या हैं इसके मायने?
इज़राइल के लिये संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव बताता है कि उसे यथास्थिति बनाए रखनी चाहिये। हालाँकि ज़्यादातर इजराइली येरुशलम को अपनी राजधानी मानते हैं और शहर पर इज़राइल का ही नियंत्रण है, लेकिन कई देश इसे इज़राइल का अवैध कब्ज़ा कहते हैं। 2016 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव पारित कर 1967 से अपने कब्ज़े में लिये फिलिस्तीनी क्षेत्र के दर्जे और जनसंख्या में बदलाव के उद्देश्य से की जा रही कार्रवाई के लिये इज़राइल  की निंदा की थी।

इज़राइल ने बनाया है नया कानून 
इज़राइल की संसद ने येरुशलम पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये एक विशेष कानून पारित किया है। इसके तहत इज़राइल की सरकार को येरुशलम के किसी भी हिस्से पर अपना दावा छोड़ने के लिये अब संसद में सामान्य बहुमत की जगह दो-तिहाई  सांसदों के समर्थन की ज़रूरत होगी। इज़राइल  की संसद में 120 सदस्य हैं और इस कानून के पारित होने के बाद अब 80 सदस्यों के समर्थन के बाद ही कोई सरकार येरुशलम या उसके किसी हिस्से पर अपना दावा छोड़ पाएगी। इज़राइल  के इस कदम को शांति प्रयासों के लिये बड़ी बाधा माना जा रहा है। 

फिलिस्तीन पर क्या होगा असर?
यह प्रस्ताव एक तरह से फिलिस्तीन का समर्थन है और वैसे भी संयुक्त राष्ट्र फिलिस्तीन के संघर्ष को लेकर हमेशा सहानुभूति रखता आया है। फिलिस्तीन का नेतृत्व मानता है कि अमेरिका को छोड़कर बाकी देश उसके अच्छे सहयोगी हैं। फिलिस्तीन संयुक्त राष्ट्र व अन्य वैश्विक मंचों पर अपने प्रयास जारी रखेगा जिससे फिलिस्तीन पर अवैध कब्ज़े को खत्म किया जा सके।

(टीम दृष्टि इनपुट)

तीन धर्मों के लिये समान रूप से पवित्र है ऐतिहासिक येरुशलम 
यहूदियों, मुस्लिमों और ईसाइयों की समान आस्था का केंद्र है यह शहर। दरअसल, पैगंबर अब्राहम या इब्राहीम इन तीनों ही धर्मों के पितामह माने जाते हैं और येरुशलम को इनका शहर माना जाता है। इनके अलावा भी लगभग एक दर्जन ऐसे पैगंबर हुए हैं, जिनमें तीनों ही धर्मों को मानने वालों की आस्था है।

इसीलिये येरुशलम एक ऐसा नाम है जो ईसाइयों, मुस्लिमों और यहूदियों के दिल में सदियों से विवादित अतीत के बीच बसता आ रहा है। यह दुनिया के सबसे पुराने शहरों में एक है, जिसे बार-बार जीता गया...यह बार-बार तबाह हुआ...बार-बार उठ खड़ा हुआ। तात्पर्य यह कि इसका ज़र्रा-ज़र्रा इसे इसकी अतीत की पहचान से जोड़ता है। 

संकरी गलियों और ऐतिहासिक स्थापत्य वाला पुराना शहर इसके चार हिस्सों को चार अलग-अलग मतों–ईसाइयों, मुस्लिमों, यहूदियों और आर्मेनियाइयों से जोड़ता है। यह चारों ओर पत्थर की दीवारों से घिरा है और यहाँ कुछ ऐसी जगहें हैं, जिन्हें दुनिया के पवित्रतम स्थलों में गिना जाता है। इसका हर हिस्सा अपनी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। 

होली चर्च 
ईसाई हिस्से में पवित्र सेपुलकर चर्च है, जो दुनियाभर के ईसाइयों के लिये विशिष्ट है। यह एक ऐसी जगह है जो ईसा मसीह गाथा का केंद्र है। ईसाई मतावलंबी मानते हैं कि  ईसा मसीह को यहीं सूली पर लटकाया गया था और यही वह स्थान भी है जहाँ ईसा फिर जीवित हुए थे। यह दुनियाभर के लाखों ईसाइयों का मुख्य तीर्थस्थल है, जो ईसा के खाली मकबरे की यात्रा करते हैं। इस चर्च का प्रबंध संयुक्त तौर पर ईसाइयों के अलग-अलग संप्रदाय करते हैं।

मुकद्दस मस्ज़िद
इसका मुस्लिम हिस्सा इन चारों में सबसे बड़ा है। यहीं पवित्र गुंबदाकार 'डोम ऑफ़ रॉक' यानी कुव्वतुल सखरह और अल-अक्सा मस्जिद है। यह एक पठार पर स्थित है जिसे मुस्लिम 'हरम अल शरीफ' या पवित्र स्थान कहते हैं। यह मस्जिद इस्लाम की तीसरी सबसे पवित्र जगह है, इसकी देखरेख और प्रशासन का ज़िम्मा एक इस्लामिक ट्रस्ट करता है, जिसे वक़्फ़ भी कहा जाता है। मुसलमान मानते हैं कि पैगंबर अपनी रात्रि यात्रा में मक्का से यहीं आए थे और उन्होंने आत्मिक तौर पर सभी पैगंबरों से दुआ की थी। कुव्वतुल सखरह से कुछ ही दूरी पर एक आधारशिला रखी गई है जिसके बारे में मुसलमान मानते हैं कि मोहम्मद यहीं से स्वर्ग की ओर गए थे।

पवित्र दीवार
येरुशलम का कोटेल या पश्चिमी दीवार का हिस्सा यहूदी बहुल माना जाता है क्योंकि यहाँ कभी उनका पवित्र मंदिर था और यह दीवार उसी की बची हुई निशानी है। यहाँ मंदिर के अंदर यहूदियों की सबसे पवित्रतम जगह 'होली ऑफ होलीज़' है। यहूदी मानते हैं यहीं पर सबसे पहले उस शिला की नींव रखी गई थी, जिस पर दुनिया का निर्माण हुआ और जहाँ अब्राहम ने अपने बेटे इसाक की कुरबानी दी थी। पश्चिमी दीवार, 'होली ऑफ होलीज़' की वह सबसे करीबी जगह है, जहाँ से यहूदी प्रार्थना कर सकते हैं। इसका प्रबंध पश्चिमी दीवार के रब्बी  करते हैं।

  • विश्व के सबसे प्राचीन और पवित्र माने जाने वाले शहर येरुशलम पर 1967 में इज़राइल का कब्ज़ा हो गया था और उसने 1980 में इसे अपनी राजधानी बनाने की घोषणा की थी।
  • जहां इज़राइल  येरुशलम को अपनी राजधानी बताता है, वहीं फिलिस्तीन भी इस शहर पर अपना दावा यह कहते हुए करता है कि 1967 में इज़राइल के नियंत्रण से पहले यह उसके कब्ज़े में था।

भारत की फिलिस्तीन नीति
बेशक भारत ने लंबे समय तक इज़राइल से कूटनीतिक संबंध नहीं रखे, लेकिन 1992 में इज़राइल से भारत के औपचारिक कूटनीतिक संबंध बने और अब यह रणनीतिक संबंध में परिवर्तित हो गए हैं तथा अपने उच्च स्तर पर हैं। दूसरी ओर, भारत-फिलीस्तीन संबंध प्रारंभ से ही काफी घनिष्ठ रहे हैं तथा भारत फिलस्तीन की समस्याओं के प्रति काफी संवेदनशील रहा है। 

  • फिलिस्तीन मुद्दे के साथ भारत की सहानुभूति और फिलिस्तीनियों के साथ मित्रता समय की कसौटी पर खरी उतरे, यह भारतीय विदेश नीति का अभिन्न अंग रहा है। 
  • 1947 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन विभाजन के विरुद्ध मतदान किया था। 
  • भारत पहला गैर-अरब देश था, जिसने 1974 में फिलिस्तीनी जनता के एकमात्र और कानूनी प्रतिनिधि के रूप में फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को मान्यता प्रदान की थी। 
  • भारत 1988 में फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में था।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा में 29 नवंबर, 2012 को फिलिस्तीन के दर्जे को एक गैर-सदस्य राज्य के दर्जे में स्तरोन्नत किया गया। भारत ने इस संकल्प को सह-प्रायोजित किया और इसके पक्ष में मतदान किया था। 
  • भारत ने जुलाई 2014 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भी फिलिस्तीन के पक्ष में मतदान किया। 
  • भारत ने अप्रैल 2015 में एशिया-अफ्रीका संस्मारक शिखर बैठक में फिलस्तीन पर बांडुंग घोषणा का समर्थन किया था। 
  • सितंबर 2015 में सदस्य राज्यों के ध्वज की तरह अन्य प्रेक्षक राज्यों के साथ संयुक्त राष्ट्र परिसर में फिलिस्तीनी ध्वज लगाने का भी भारत ने समर्थन किया था।

येरुशलम विभाजन का संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 

  • संयुक्त राष्ट्र ने अरब और यहूदियों का क्षेत्र में टकराव देखते हुए फिलिस्तीन को दो हिस्सों--अरब राज्य और यहूदी राज्य (इज़राइल) में विभाजित कर दिया । 
  • ईसाइयों ,अरबों और यहूदियों तीनों के लिये धार्मिक महत्त्व का क्षेत्र होने के कारण येरुशलम को  अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन के अंतर्गत रखे जाने का प्रस्ताव 29 नवंबर, 1947 को पारित हुआ था।  
  • यहूदियों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि अरबों ने इसे नकार दिया। इस प्रस्ताव के तहत फिलिस्तीन को दो बराबर हिस्सों--अरब राज्य और यहूदी राज्य (इज़राइल) मे विभाजित किया जाना था। 
  • इस विभाजन में  सीमा तय करना काफी जटिल और उलझा हुआ था, इसलिये शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि इसे  लागू करना बेहद कठिन है। 
  • 1948 के मई महीने मे ब्रिटेन की सेनाएँ वापस लौट गईं, लेकिन तब तक इज़राइल और फिलिस्तीन की वास्तविक सीमा रेखा निर्धारित नहीं हो पाई थी और यहूदियों तथा फिलिस्तीनियों के बीच संघर्ष शुरू हो गया।
  • इसके एक साल बाद येरुशलम का बँटवारा हुआ और यह पूर्वी तथा पश्चिमी दो हिस्सों में बँट गया। 
  • पूर्वी भाग पर फिलिस्तीनियों का और पश्चिमी भाग पर इज़राइल का नियंत्रण हो गया। 
  • 1967 में इज़राइल और अरब देशों के बीच हुई ‘सिक्स डे वॉर’ में इज़राइल  ने पूर्वी येरुशलम पर भी कब्जा कर लिया।

(टीम दृष्टि इनपुट)

निष्कर्ष: इस मुद्दे पर संघर्ष की सबसे बड़ी वजह येरुशलम पर होने वाला फिलिस्तीन और इज़राइल में विवाद है। दोनों ही इस पर अपना अधिकार बताते रहे हैं। यहां की सीमा पर आए दिन झड़पों की खबरें भी सामने आती रहती हैं। 1948 से लेकर अब तक येरुशलम को लेकर फिलिस्तीन और इज़राइल के बीच विवाद चल रहा है। पिछले वर्ष 7 दिसंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने येरुशलम को इज़राइल  की राजधानी के तौर पर मान्यता देते हुए अपना दूतावास पवित्र किंतु विवादास्पद शहर येरुशलम ले जाने की बात कही थी। उन्होंने 14 मई को इसे तब सच कर दिखाया, जब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये इसका औपचारिक उद्घाटन किया। यह स्वाभाविक था कि इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जहाँ इसे एक ऐतिहासिक कदम बताया, वहीं फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इसे अस्वीकार्य और एकतरफा कदम बताते हुए कहा कि इससे  क्षेत्र में शांति बनाए रखने के प्रयासों को कई बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले से अमेरिका की विदेश नीति सवालों के घेरे में आ गई है, क्योंकि इस मुद्दे ने इज़राइल, अमेरिका या फिलिस्तीन ही नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व के देशों सहित पूरी दुनिया को प्रभावित किया है।

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