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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC)

  • 13 Dec 2023
  • 34 min read

प्रिलिम्स के लिये:

इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC), यरूशलेम में अल-अक्सा मस्ज़िद, संयुक्त राष्ट्र चार्टर, मानवाधिकार उल्लंघन, इस्लामिक विकास बैंक (IDB), पर्यवेक्षक स्थिति, कश्मीर विवाद, भारत-OIC सहयोग, विदेश मंत्रियों की परिषद्, द इस्लामी शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन, अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी समाचार एजेंसी, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी-अरब, मध्य पूर्व

मेन्स के लिये:

समकालीन समय में OIC के साथ भारत के संबंधों का महत्त्व और मध्य पूर्व क्षेत्र में भारत की भविष्य की संभावनाएँ।

इस्लामिक सहयोग संगठन क्या है?

  • परिचय:
    • चार महाद्वीपों में फैले 57 देशों की सदस्यता के साथ इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) संयुक्त राष्ट्र के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा संगठन है।
    • यह संगठन मुस्लिम/इस्लामिक जगत की सामूहिक आवाज़ है। यह विश्व के विभिन्न लोगों के बीच अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति एवं सद्भाव को बढ़ावा देने की भावना से मुस्लिम दुनिया के हितों की रक्षा और सुरक्षा करने का प्रयास करता है।
  • पृष्ठभूमि:
    • इस संगठन की स्थापना यरूशलेम में अल-अक्सा मस्ज़िद की आपराधिक आगज़नी के बाद 25 सितंबर, 1969 को मोरक्को साम्राज्य के रबात में हुए ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन के निर्णय पर की गई थी।
    • वर्ष 1970 में विदेश मंत्रियों के शुरूआती इस्लामी सम्मेलन (ICFM) के परिणामस्वरूप जेद्दा में एक स्थायी सचिवालय की स्थापना हुई, जिसकी अध्यक्षता संगठन के महासचिव ने की थी।
  • प्रमुख उद्देश्य:
    • OIC सदस्य देशों के बीच एकजुटता स्थापित करना।
    • कब्ज़े के तहत किसी भी सदस्य राज्य की पूर्ण संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की बहाली का समर्थन करना। 
    • इस्लाम की रक्षा, बचाव और अपयश का मुकाबला करना।
    • मुस्लिम समाजों में बढ़ते असंतोष को रोकना और यह सुनिश्चित करने के लिये कार्य करना कि सदस्य राज्य संयुक्त राष्ट्र महासभा, मानवाधिकार परिषद् तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एकजुट रुख अपनाएँ।
  • चार्टर:
    • संगठन एक चार्टर का पालन करता है जो इसके उद्देश्यों, सिद्धांतों और संचालन तंत्र को निर्धारित करता है।
    • पहली बार वर्ष 1972 में अपनाए गए चार्टर को विकासशील विश्व में उभरती स्थितियों के अनुरूप कई बार संशोधित किया गया है।
    • वर्तमान चार्टर को मार्च 2008 में सेनेगल के डकार में अपनाया गया था।
    • इसमें कहा गया है कि सभी सदस्यों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध होने के साथ-साथ महान इस्लामी शिक्षाओं एवं मूल्यों से निर्देशित व प्रेरित किया जाना चाहिये।
  • सदस्यता:
    • स्थायी सदस्य: 
      • सदस्य देशों में अफगानिस्तान, अल्जीरिया, बांग्लादेश, ब्रुनेई दारुस्सलाम, बुर्किना फासो, जिबूती, मिस्र, गैबॉन, गाम्बिया, गिनी, इंडोनेशिया, ईरान, इराक, जॉर्डन, मोरक्को, मोज़ाम्बिक, नाइजर, नाइजीरिया, ओमान, पाकिस्तान, फिलिस्तीन, कतर, सऊदी अरब, सेनेगल, सोमालिया, सूडान, सीरिया, ताजिकिस्तान, तुर्की, ट्यूनीशिया, तुर्कमेनिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, उज़्बेकिस्तान, यमन, और अन्य राष्ट्र शामिल हैं।
    • पर्यवेक्षक सदस्य:

OIC की संस्थागत कार्य-प्रणाली क्या है?

  • निर्णय प्रक्रिया:
    • फोरम में सभी निर्णय लेने के लिये दो-तिहाई सदस्य देशों की उपस्थिति तथा पूर्ण सर्वसम्मति द्वारा परिभाषित कोरम (Quorum) की आवश्यकता होती है।
    • यदि आम सहमति नहीं बन पाती है तो निर्णय उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से किया जाएगा।
    • वे साझा हित के मामलों पर निर्णय तथा संकल्प लेते हैं, उनकी प्रगति की समीक्षा करते हैं, कार्यक्रमों एवं उनके बजट पर विचार व अनुमोदन करते हैं, सदस्य राज्यों को चिंतित करने वाले विशिष्ट मुद्दों पर विचार करते हैं तथा एक नए निकाय अथवा समिति की स्थापना की अनुशंसा करते हैं।
  • वित्तपोषण:
    • OIC को सदस्य देशों द्वारा उनकी राष्ट्रीय आय के अनुसार वित्तपोषित किया जाता है।
    • किसी सदस्य का मतदान अधिकार तब निलंबित कर दिया जाता है जब उनका बकाया विगत दो वर्षों के लिये उनके द्वारा देय योगदान की राशि के सामान अथवा उससे अधिक हो जाता है।
    • सदस्य को केवल तभी मतदान करने की अनुमति दी जाती है यदि विदेश मंत्रियों की परिषद् तुष्ट हो कि संबंधित विफलता सदस्य के नियंत्रण से परे विशेष स्थितियों के कारणवश हुई है।
  • इस्लामी शिखर सम्मेलन:
    • इसमें संबद्ध राजा तथा राष्ट्राध्यक्ष शामिल होते हैं तथा यह संगठन का सर्वोच्च निकाय है।
    • प्रत्येक तीन वर्ष में बैठक आयोजित करते हुए, इसका कार्य विचार-विमर्श करना, नीतिगत निर्णय लेना, संगठन से संबंधित मुद्दों पर मार्गदर्शन प्रदान करना तथा सदस्य देशों की चिंता के मुद्दों पर विचार करना है।
  • विदेश मंत्रियों की परिषद:
    • विदेश मंत्रियों की परिषद (CFM) मुख्य निर्णायक संस्था है तथा OIC की सामान्य नीतियों को कैसे लागू किया जाए, इस पर निर्णय लेने के लिये वार्षिक बैठक करती है। 
    • वे साझा हित के मामलों पर निर्णय तथा संकल्प लेते हैं, उनकी प्रगति की समीक्षा करते हैं, कार्यक्रमों एवं उनके बजट पर विचार व अनुमोदन करते हैं, सदस्य राज्यों को चिंतित करने वाले विशिष्ट मुद्दों पर विचार करते हैं तथा एक नए निकाय अथवा समिति की स्थापना की अनुशंसा करते हैं।
  • स्थायी समितियाँ: 
    • OIC के पास सूचना एवं सांस्कृतिक मामलों, आर्थिक एवं वाणिज्यिक मामलों, वैज्ञानिक एवं तकनीकी पहल तथा यरुशलम के लिये सहयोग हेतु स्थायी समितियाँ भी हैं। 
  • जनरल सचिवालय:
    • जनरल सचिवालय OIC की प्रशासनिक शाखा है, जो इस्लामी शिखर सम्मेलन तथा CFM के निर्णयों को लागू करने के लिये ज़िम्मेदार है। यह सूचना आदान-प्रदान तथा समन्वय के केंद्र के रूप में भी कार्य करता है।
    • CFM द्वारा नियुक्त महासचिव, जनरल सचिवालय का प्रमुख होता है।

OIC के सहयोग के प्रमुख क्षेत्र क्या हैं?

कार्यान्वयन योजना 2016-2025 18 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के तहत लक्षित किये 

गए 107 लक्ष्यों को कार्यक्रमों तथा गतिविधियों के रूप में विस्तृत करती है। कुछ प्रमुख लक्ष्य हैं:-

  • फिलिस्तीन और अल कुद्स अल शरीफ:
    • इसका उद्देश्य वर्ष 1967 से फिलिस्तीनी क्षेत्र पर इज़रायल द्वारा किये गए कब्ज़े को समाप्त करने के लिये लगातार प्रयास करना है। इसमें पूर्वी यरुशलम तथा अन्य कब्ज़े वाले अरब क्षेत्र तथा सीरियाई गोलान हाइट्स आदि शामिल हैं।
    • फिलिस्तीनी नागरिकों को उनके अधिकारों का उपयोग करने के लिये समर्थन देना तथा सशक्त बनाना, जिसमें वापस लौटने का अधिकार एवं पूर्वी यरुशलम को अपनी राजधानी के रूप में वर्ष 1967 से पूर्व की सीमाओं पर स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य की स्थापना का अधिकार शामिल है।
  • आतंकवाद-रोध, उग्रवाद तथा इस्लामोफोबिया:
    • आतंकवाद के सभी पहलुओं से निपटने के लिये अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को सशक्त करने तथा राज्यों व अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय संगठनों के साथ सहयोग को मज़बूत करने की दृष्टि से आतंकवाद-रोधी साझेदारी स्थापित करना।
    • आतंकवाद की नई प्रवृत्तियों का मुकाबला करने के लिये उचित तंत्र स्थापित करने के लिये वर्ष 1999 में अपनाए गए आतंकवाद के विरुद्ध अभिसमय पर पुनः विचार करना।
    • संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 16/18 में धार्मिक भय (Religiophobia) के विरुद्ध सार्वभौमिक अभियान के रूप में निर्धारित सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए इस बात पर ज़ोर दिया गया कि धर्म अथवा विश्वास के आधार पर असहिष्णुता, नकारात्मक रूढ़िवादिता, पूर्वधारणा, भेदभाव तथा हिंसा सभी मनुष्यों के लिये दुष्प्रभावि हैं।
  • मितव्ययता, अंतर-सांस्कृतिक तथा अंतर-धार्मिक संवाद एवं सद्भाव:
    • पश्चिम में मुस्लिम समुदाय के नेताओं द्वारा सहिष्णुता, उदारता तथा गैर-इस्लामिक लोगों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर प्रशिक्षण शुरू करना।
    • सभ्यताओं के संयुक्त राष्ट्र गठबंधन (UN Alliance of Civilizations- UNAOC) के संदर्भ में अंतर-सांस्कृतिक तथा अंतर-सभ्यतागत संवाद के लिये परियोजनाओं का विकास एवं समर्थन करना।
    • सामाजिक सद्भाव तथा प्रगति को त्वरित करने की दिशा में उनके योगदान के तरीकों एवं साधनों की रणनीति तैयार करने के लिये OIC, नागरिक समाज संस्थानों तथा थिंक-टैंक के बीच सार्थक साझेदारी को बढ़ावा देने हेतु रूपरेखा विकसित करना।
  • शांति एवं सुरक्षा:
    • सदस्य राज्यों, पर्यवेक्षक राज्यों तथा मुस्लिम समुदायों एवं अल्पसंख्यकों का समर्थन करने के लिये इस्लामी एकजुटता के सिद्धांतों का पालन करना।
    • जम्मू-कश्मीर के लोगों की इच्छा के अनुरूप भारत के साथ परिणामोन्मुख वार्ता सहित सभी संभावित तरीकों से जम्मू-कश्मीर विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकालने के लिये पाकिस्तान सरकार के प्रयासों का समर्थन करना।
    • अर्मेनिया से अपनी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर अज़रबैजान की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने तथा अज़रबैजान के सभी कब्ज़े वाले क्षेत्रों से अपने सशस्त्र बलों को शीघ्र, पूर्णतया बिना शर्त वापस लेने का आग्रह करना।
  • पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और स्थिरता:
    • सदस्य राज्यों में जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिम में कमी को कम करने के लिये कार्यक्रमों एवं गतिविधियों के कार्यान्वयन में प्रगति की निगरानी हेतु एक मंच के रूप में प्रत्येक दो वर्ष में पर्यावरण मंत्रियों के इस्लामी सम्मेलन (Islamic Conference of Environment Ministers - ICEM) की बैठक बुलाना।
    • वर्ष 2012 में अपनाया गया OIC जल विज़न जल के सभी पहलुओं पर सदस्य राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने और ज्ञान साझा करने के अवसरों की पहचान करता है।
  • निर्धनता निर्मूलन:
    • सभी के लिये राष्ट्रीय स्तर पर उपयुक्त सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों और उपायों को लागू करना तथा वर्ष 2025 तक निर्धनों एवं कमज़ोर लोगों हेतु पर्याप्त कवरेज प्राप्त करना
  •  व्यापार, निवेश और वित्त:
    • OIC सदस्य देशों में मुक्त व्यापार और निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों को बढ़ावा देना तथा स्थापित करना एवं सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों द्वारा आवक FDI प्रवाह सहित इंट्रा-OIC (intra-OIC) निवेश की सुविधा प्रदान करना।
  • कृषि एवं खाद्य सुरक्षा:
    • OIC सदस्य राज्यों में स्थायी खाद्य और पोषण सुरक्षा प्राप्त करने के लिये कृषि उत्पादकता तथा कृषि प्रणालियों की लाभप्रदता बढ़ाना।
  • श्रम, रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा:
    • श्रम, रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा पर सहयोग के OIC ढाँचे के लिये कार्यकारी कार्यक्रम को लागू करना, विशेष रूप से OSH विकास से संबंधित सहयोग परियोजनाओं को लागू करना।
    • OIC एशियाई और अफ्रीकी क्षेत्रों में युवा रोज़गार योजना (YES) कार्यक्रम के विस्तार पर अध्ययन को अंतिम रूप देना।

OIC की प्रमुख परियोजनाएँ क्या हैं?

  • आर्थिक और वाणिज्यिक सहयोग के लिये स्थायी समिति (COMCEC):
    • सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाता है।
    • COMCEC निर्धनता में कमी और सतत् विकास पर ध्यान देने के साथ व्यापार, निवेश तथा आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिये पहल करता है।
  • विकास के लिए इस्लामी एकजुटता कोष (ISFD):
    • सदस्य देशों में आर्थिक और सामाजिक विकास चुनौतियों का समाधान करता है।
    • ISFD निर्धनता को कम करने तथा जीवन स्तर में सुधार लाने के उद्देश्य से स्वास्थ्य, शिक्षा तथा बुनियादी ढाँचे जैसे क्षेत्रों में परियोजनाओं का समर्थन करने के लिये वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करता है।
  • इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक (IDB) परियोजनाएँ:
    • OIC का सहयोगी IDB, सदस्य देशों में विभिन्न विकास परियोजनाओं को वित्तपोषित करता है।
    • IDB सदस्य देशों के आर्थिक विकास में योगदान करते हुए बुनियादी ढाँचे, ऊर्जा, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में परियोजनाओं का समर्थन करता है।
  • विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार (STI) क्षमता निर्माण कार्यक्रम:
    • यह कार्यक्रम वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी उन्नति को बढ़ावा देता है।
    • यह कार्यक्रम विज्ञान और प्रौद्योगिकी में क्षमता निर्माण, नवाचार को बढ़ावा देने तथा सदस्य देशों की वैज्ञानिक क्षमताओं को बढ़ाने के लिये अनुसंधान पहल का समर्थन करने पर केंद्रित है।
  • इस्लामी शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (ISESCO) की पहल:
    • यह इस्लामी विश्व के भीतर शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति को बढ़ावा देता है।
    • SESCO शिक्षा सुधार, वैज्ञानिक अनुसंधान, सांस्कृतिक संरक्षण और सदस्य राज्यों के बीच शैक्षिक संसाधनों के आदान-प्रदान से संबंधित परियोजनाएँ चलाता है।
  • OIC युवा रणनीति:
    • सामाजिक-आर्थिक विकास के लिये युवाओं को सशक्त बनाना और संलग्न करना।
    • OIC युवा रणनीति सदस्य देशों में युवा लोगों की क्षमता का दोहन करने के लिये शिक्षा, रोज़गार, उद्यमिता और सामाजिक समावेशन पर केंद्रित है।
  • OIC मानवीय कार्य योजना:
    • मानवीय संकटों को संबोधित करना और प्रभावित आबादी को सहायता प्रदान करना।
    • OIC मानवीय कार्य योजना में प्राकृतिक आपदाओं, संघर्षों और आपात स्थितियों का जवाब देने, प्रभावित समुदायों को राहत तथा सहायता प्रदान करने के समन्वित प्रयास शामिल हैं।
  • OIC कल्चरल कैपिटल प्रोग्राम:
    • सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना और इस्लामी विरासत को संरक्षित करना।
    • कार्यक्रम प्रतिवर्ष एक शहर को "OIC कल्चरल कैपिटल" के रूप में नामित करता है, जो इस्लामी संस्कृतियों की आपसी समझ और प्रशंसा को बढ़ाने के लिये सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों एवं पहल को बढ़ावा देता है।

एक संगठन के रूप में OIC के साथ भारत के संबंधों की स्थिति क्या है?

  • दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मुस्लिम समुदाय वाले देश के रूप में भारत को वर्ष 1969 में रबात में संस्थापक सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था, लेकिन पाकिस्तान के आदेश पर उसे बाहर कर दिया गया था।
  • इसके अलावा भारत कई कारणों से दूर रहा:
    • यह धर्म पर स्थापित किसी भी संगठन में शामिल नहीं होना चाहता था।
    • यह जोखिम था कि अलग-अलग सदस्य देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों में सुधार करने से एक समूह में विशेष रूप से कश्मीर जैसे मुद्दों पर दबाव आएगा।
  • वर्ष 2018 में विदेश मंत्रियों के शिखर सम्मेलन के 45वें सत्र में मेज़बान बांग्लादेश ने सुझाव दिया कि भारत, जहाँ दुनिया के 10% से अधिक मुसलमान रहते हैं, को पर्यवेक्षक का दर्जा दिया जाना चाहिये, लेकिन पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।
    • भारत ने विभिन्न अवसरों पर OIC के भीतर अधिक समावेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता व्यक्त की है।
  • संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे शक्तिशाली सदस्यों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने के बाद, भारत समूह के किसी भी बयान पर भरोसा करने को लेकर आश्वस्त है।
    • OIC ने कई बार चिंता व्यक्त की है और कश्मीरी लोगों की इच्छाओं के अनुरूप समाधान का आह्वान किया है।
    • वर्ष 2018 में OIC जनरल सचिवालय ने "भारत के कब्ज़े वाले कश्मीर में भारतीय बलों द्वारा निर्दोष कश्मीरियों की हत्या की कड़ी निंदा व्यक्त की थी"।
      • भारत ने लगातार इस बात को रेखांकित किया है कि जम्मू-कश्मीर "भारत का अभिन्न अंग है और यह पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला है" तथा इस मुद्दे पर OIC का कोई अधिकार नहीं है।
  • वर्ष 2019 में भारत ने OIC विदेश मंत्रियों की बैठक में "सम्मानित अतिथि" के रूप में अपनी पहली उपस्थिति दर्ज कराई। वर्ष 2019 OIC की 50वीं वर्षगाँठ है। 
    • पहली बार इस निमंत्रण को भारत के लिये एक कूटनीतिक जीत के रूप में देखा गया, विशेषकर पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के साथ बढ़े तनाव के समय।
  • वर्ष 2022 में OIC ने कर्नाटक के स्कूलों में मुस्लिम छात्राओं को हिज़ाब न पहनने के लिये कहे जाने के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् से "आवश्यक उपाय" करने का आह्वान किया।
    • OIC ने भारत से "मुस्लिम समुदाय की जीवनशैली की रक्षा करते हुए उनकी रक्षा, सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने" का भी आग्रह किया।
  • OIC ने हाल के दिनों में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 और सर्वोच्च न्यायालय के बाबरी मस्जिद निर्णय पर भारत सरकार की आलोचना की है।

OIC बैठक के हालिया 47वें सत्र का क्या महत्त्व है?

  • नियामी (नाइजर) में आयोजित OIC के विदेश मंत्रियों की परिषद के 47वें सत्र में जम्मू-कश्मीर पर अपनी नीतियों को लेकर भारत का जिक्र किया गया था।
  • भारत का रुख:
    • भारत ने OIC पर कड़ा प्रहार करते हुए उस पर सत्र में समूह द्वारा अपनाए गए प्रस्तावों में जम्मू-कश्मीर का "तथ्यात्मक रूप से गलत और अनुचित" संदर्भ देने का आरोप लगाया।
    • भारत OIC के दोहरे मानदंड को तोड़ने में विश्वास रखता है, जहाँ वह मानवाधिकार के नाम पर पाकिस्तान के एजेंडे का समर्थन करता है।
    • भारत अब OIC के दोहरेपन को अनुचित मानता है, क्योंकि OIC के कई सदस्य देशों के साथ भारत के अच्छे द्विपक्षीय संबंध हैं और वे भारत को OIC के बयानों को नज़रअंदाज करने के लिये कहते हैं, लेकिन संयुक्त बयानों पर हस्ताक्षर करते हैं, जो बड़े पैमाने पर पाकिस्तान द्वारा तैयार किये जाते हैं।

OIC को किन आलोचनाओं का सामना करना पड़ा?

  • मानवाधिकार उल्लंघनों की जाँच में अक्षमता:
    • OIC को मानव अधिकारों के उल्लंघन की प्रभावी ढंग से जाँच करने या संधियों और घोषणाओं के माध्यम से लिये गए निर्णयों को लागू करने के लिये,आवश्यक शक्ति और संसाधनों की कमी के लिये आलोचना का सामना करना पड़ता है। 
    • अपने सदस्य देशों के भीतर उल्लंघनों पर स्वतंत्र रूप से जाँच करने और कार्रवाई करने में संगठन की असमर्थता एक मानवाधिकार समर्थक के रूप में इसकी विश्वसनीयता को कम करती है जैसे कि सऊदी अरब में कफाला प्रणाली आदि।
  • कुरानिक मूल्यों की केंद्रीयता:
    • OIC की भूमिका काफी हद तक उन विवादों में मध्यस्थता करने तक ही सीमित है जहाँ इसमें शामिल दोनों पक्ष मुस्लिम हैं, जो विवाद समाधान में योग्यता के आधार के रूप में कुरान के मूल्यों पर इसके ध्यान को दर्शाता है
    • संगठन का संकीर्ण फोकस उन संघर्षों में उसकी भागीदारी को सीमित करता है जो इस मानदंड का पालन नहीं करते हैं, संभावित रूप से वैश्विक संघर्ष समाधान पर इसके व्यापक प्रभाव में बाधा डालते हैं।
  • सहकारी उद्यम स्थापित करने में विफलता:
    • OIC को सदस्य देशों के बीच, विशेष रूप से आर्थिक सहयोग के संदर्भ में, सहकारी उद्यमों को बढ़ावा देने में असमर्थता के लिये आलोचना का सामना करना पड़ा है।
    • पूंजी-समृद्ध और श्रम-दुर्लभ देशों को जनशक्ति-संपन्न तथा पूंजी-दुर्लभ देशों के साथ प्रभावी ढंग से एक साथ लाने में संगठन की विफलता ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति एवं आर्थिक सहयोग दोनों में एक महत्त्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में इसके विकास को बाधित किया है।
  •  वैश्विक मुद्दों पर सीमित समन्वयन:.
    • सदस्य देशों के बीच विविध प्राथमिकताओं और क्षमताओं के कारण OIC को जलवायु परिवर्तन महामारी और साइबर सुरक्षा जैसी वैश्विक चुनौतियों के प्रति प्रतिक्रियाओं के समन्वय में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • आंतरिक संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता:
    • कई OIC सदस्य देश आंतरिक संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता का अनुभव कर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय शांति एवं सहयोग प्रभावित हो रहा है।
    • सीरिया, यमन और लीबिया जैसे देशों में चल रहे संघर्षों ने सदस्य देशों के बीच अलग-अलग स्थिति को देखते हुए, इन संकटों को सामूहिक रूप से संबोधित करने के OIC के प्रयासों को तनावपूर्ण बना दिया है।
  • संकल्पों को क्रियान्वित करने में चुनौतियाँ:
    • हालाँकि OIC प्रस्ताव पारित कर सकता है, लेकिन इन निर्णयों के वास्तविक कार्यान्वयन में  इसे अक्सर सदस्य देशों के विविध हितों और प्राथमिकताओं के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे इज़राइल रक्षा बलों द्वारा गाज़ा पट्टी पर हाल ही में की गई बमबारी के समय OIC सदस्यों के बीच आम सहमति की कमी।
      • संघर्ष समाधान या मानवीय सहायता से संबंधित प्रस्तावों को कार्यान्वयन में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है, विशेषकर जब सदस्य देशों के परस्पर विरोधी भू-राजनीतिक हित हों। उदाहरण के लिये, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा।

OIC को सुदृढ़ करने के लिये क्या कदम उठाए जाने चाहिये?

  • मानवाधिकारों पर अधिक ध्यान: सदस्य देशों के भीतर मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिये OIC के तंत्र को मज़बूत करने की आश्यकता है। यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय जैसे क्षेत्रीय निकायों द्वारा निभाई गई भूमिका के समान, उल्लंघनों की जाँच और समाधान के लिये OIC के भीतर एक स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग का विकास किया जाना चाहिये।
  • संघर्ष समाधान का दायरा बढ़ाना: मुस्लिम पक्षों से जुड़े विवादों से परे संघर्ष समाधान में शामिल होने के लिये OIC के जनादेश का विस्तार करने की आश्यकता है। उन क्षेत्रों में संघर्षों की मध्यस्थता में OIC को सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिये जहाँ मुस्लिम और गैर-मुस्लिम समुदाय शामिल हैं, जो चीन में शिनजियांग प्रांत जैसे वैश्विक शांति निर्माण क्षेत्रों में व्यापक भूमिका के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करता है।
  • आर्थिक सहयोग और विकास: OIC के भीतर अंतर को कम करने के लिये आर्थिक सहयोग पहल को सुदृढ़ करने की आश्यकता है। सहयोग को बढ़ावा देने वाली आर्थिक परियोजनाओं का विकास और कार्यान्वयन किया जाना चाहिये, जैसे संयुक्त निवेश कोष, बुनियादी ढाँचा विकास कार्यक्रम एवं प्रौद्योगिकी-साझाकरण पहल
  • क्षमता निर्माण और संसाधन आवंटन: पर्याप्त संसाधन आवंटित करके और संस्थागत क्षमताओं का निर्माण करके वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने के लिये OIC की क्षमता को बढ़ाया जाना चाहिये। साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और महामारी जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिये OIC के भीतर विशेष इकाइयों या कार्यबलों की स्थापना किया जाना चाहिये, जो समकालीन चुनौतियों से निपटने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
  • शैक्षिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना: आपसी समझ को बढ़ाने के लिये सदस्य देशों के बीच शैक्षिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों को मज़बूत करने की आवश्यकता है। यूनेस्को या क्षेत्रीय संगठनों द्वारा कार्यान्वित उन पहलों का समान विस्तार किया जाए जो सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने, अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देने और लोगों के बीच संबंधों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करती हैं।
  • आंतरिक संघर्षों को समाप्त करना: सदस्य देशों के भीतर आंतरिक संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता को समाप्त करने के लिये सक्रिय उपाय विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिये एक संघर्ष रोकथाम और समाधान तंत्र स्थापित किया जाए जिसमें अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में सफल संघर्ष समाधान मॉडल से सबक लेते हुए, संघर्ष-वृद्धि को नियंत्रित के लिये शीघ्र हस्तक्षेप और राजनयिक प्रयास शामिल हों। उदाहरण के लिये - अरब स्प्रिंग और ISIS का उदय।
  • साझेदारी का विविधीकरण: अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य क्षेत्रीय संस्थाओं के साथ सहयोग को शामिल करने के लिये OIC सदस्य देशों से परे साझेदारी में विविधता लाने की आवश्यकता है। आम चुनौतियों से निपटने में संसाधनों, विशेषज्ञता और नेटवर्क का लाभ उठाने के लिये संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और क्षेत्रीय निकायों जैसे संगठनों के साथ साझेदारी बनाई जानी चाहिये।

निष्कर्ष:

  • यदि कुछ बाधाओं के बावजूद, लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने और विधि के शासन को कायम रखते हुए सदस्य देशों के आंतरिक एवं बाह्य मुद्दों का प्रभावी ढंग से हल किया जाता है, तो OIC में वैश्विक परिदृश्य को बदलने और शांति, समृद्धि एवं सुरक्षा के युग की शुरुआत करने की महत्त्वपूर्ण क्षमता है।

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