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आंतरिक सुरक्षा

भारत के रक्षा क्षेत्र की पुनर्कल्पना

  • 11 Apr 2026
  • 148 min read

यह लेख 07/04/2026 को द बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित "Defence outperformance: Exports grow, but a more broadbased strategy needed” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय भारत के रक्षा विकास की दोहरी वास्तविकता का विश्लेषण करता है, घरेलू उत्पादन में हुई अभूतपूर्व वृद्धि को उजागर करता है, साथ ही मौजूदा महत्त्वपूर्ण तकनीकी और बजटीय बाधाओं की भी बारीकी से पड़ताल करता है।

प्रिलिम्स के लिये: iDEX, सृजन पोर्टल, रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020, रक्षा औद्योगिक गलियारे

मुख्य परीक्षा के लिये: रक्षा क्षेत्र में भारत की प्रगति, प्रमुख चुनौतियाँ और आवश्यक उपाय। 

भारत का रक्षा क्षेत्र अब रणनीतिक एवं आर्थिक शक्ति के एक सुदृढ़ स्तंभ के रूप में उभर रहा है, जहाँ वर्ष 2025-26 में रक्षा निर्यात में 60% से अधिक की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (DPSU) की प्रमुख भूमिका रही है। वर्तमान में भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरणों का निर्यात कर रहा है, जो वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में उसके बढ़ते एकीकरण को दर्शाता है। वैश्विक स्तर पर रक्षा व्यय में वृद्धि और आपूर्ति शृंखला व्यवधानों की पृष्ठभूमि में, भारत स्वयं को सुलभ एवं विश्वसनीय सैन्य प्लेटफॉर्म प्रदाता के रूप में स्थापित कर रहा है। हालाँकि, इस गति को बनाए रखने के लिये भू-राजनीतिक लाभों से परे निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले, नवाचार-संचालित विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र की ओर बदलाव की आवश्यकता है।

भारत के रक्षा क्षेत्र में परिवर्तन को प्रेरित करने वाले कारक क्या हैं?

  • निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार: एक पूर्ण आयातक से वैश्विक आपूर्तिकर्त्ता बनने की दिशा में आगे बढ़ते हुए, भारत ने अपनी रक्षा कूटनीति का व्यापक पुनर्गठन किया है। 
    • पारंपरिक पश्चिमी हथियार प्रणालियों के सुलभ एवं उन्नत तकनीकी विकल्प प्रस्तुत कर भारत ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में अपनी प्रतिस्पर्द्धात्मक स्थिति को सुदृढ़ किया है।
    • वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ के ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 62.66% की तीव्र वृद्धि को दर्शाता है। 
    • ब्रह्मोस और पिनाका प्रणालियों सहित भारतीय रक्षा उपकरणों का अब सक्रिय रूप से वैश्विक बाज़ारों में निर्यात किया जा रहा है।
  • पूंजीगत बजट का स्वदेशीकरण: घरेलू पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देने की नीति ने आयात-निर्भरता को कम करते हुए स्थानीय रक्षा उद्योगों में निवेश और तरलता को बढ़ावा दिया है। 
    • यह बजटीय रणनीति स्वदेशी निर्माताओं को दीर्घकालिक वित्तीय आश्वासन प्रदान करती है तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों के प्रभाव को न्यूनतम करती है।
    • भारत का रक्षा बजट 2013-14 के ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़कर 2026-27 में ₹7.85 लाख करोड़ तक पहुँच गया है, जिसमें से ₹1.39 लाख करोड़ विशेष रूप से घरेलू खरीद हेतु निर्धारित किये गए हैं। 
      • उल्लेखनीय रूप से, यह आवंटन कुल पूंजी अधिग्रहण बजट का लगभग 75% है, जो पूर्णतः स्वदेशी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिये आरक्षित है।
  • विनिर्माण आधार का विस्तार: भारत का रक्षा औद्योगिक आधार काफी परिपक्व हो चुका है, जिससे राज्य-संचालित एकाधिकारों से हटकर एक अत्यधिक सहयोगात्मक सार्वजनिक-निजी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र पर ध्यान केंद्रित हो रहा है। 
    • यह समन्वय प्रतिस्पर्द्धी स्तर की अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण करता है, घरेलू उत्पादन क्षमताओं को गति देता है और साथ ही विशेषीकृत लघु एवं मध्यम उद्यमों को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत करता है। 
    • वित्त वर्ष 2024-25 में स्वदेशी रक्षा उत्पादन बढ़कर ₹1.51 लाख करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया।
    • हालाँकि रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSU) ने इस उत्पादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन निजी क्षेत्र का योगदान तेज़ी से बढ़कर कुल हिस्सेदारी का 23% हो गया।
    • पाँचवीं सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची में 346 रणनीतिक वस्तुओं को सम्मिलित किया गया है, जिनमें उन्नत रडार एवं सोनार प्रणालियों हेतु जटिल लाइन रिप्लेसमेंट यूनिट्स (LRU) भी शामिल हैं, जो तकनीकी आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करती हैं।
  • स्टार्टअप नवाचार को प्रोत्साहन: पारंपरिक नौकरशाही से ग्रस्त रक्षा तंत्रों को दरकिनार करते हुए, भारत अब तेज़, नवाचार-आधारित स्टार्टअप्स का सक्रिय रूप से उपयोग कर रहा है, ताकि अत्याधुनिक एवं अगली पीढ़ी की सैन्य एवं युद्धक प्रौद्योगिकियों का तीव्र विकास सुनिश्चित किया जा सके।
    • यह विकेंद्रीकृत अनुसंधान एवं विकास मॉडल त्वरित प्रोटोटाइपिंग को प्रोत्साहित करता है तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मानवरहित प्रणालियों जैसे उभरते क्षेत्रों में रणनीतिक बढ़त सुनिश्चित करता है।
    • इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX) के अंतर्गत 619 से अधिक स्टार्टअप एवं MSME जुड़ चुके हैं, जिनके साथ फरवरी 2025 तक 430 से अधिक अनुबंध संपन्न किये गए हैं।
    • परिणामस्वरूप, सरकार ने इन नवप्रवर्तकों से लगभग ₹2,400 करोड़ मूल्य की 43 उन्नत रक्षा प्रणालियों की प्रत्यक्ष खरीद की है।
  • निजी क्षेत्र का एयरोस्पेस एकीकरण: सैन्य विमानन क्षेत्र में लंबे समय से स्थापित राज्य-केंद्रित एकाधिकार को समाप्त करना एक मज़बूत एवं वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी घरेलू एयरोस्पेस उद्योग के निर्माण के लिये अत्यंत आवश्यक है। 
    • निजी क्षेत्र को जटिल प्लेटफॉर्म एकीकरण में अग्रणी भूमिका प्रदान करने से स्थानीय स्तर पर उच्च-कौशल युक्त टियर-1 एवं टियर-2 आपूर्तिकर्त्ता नेटवर्क का तीव्र विकास संभव होता है।
    • उदाहरण के लिये, भारत का C295 कार्यक्रम निजी क्षेत्र में पहली बड़ी मेक इन इंडिया एयरोस्पेस पहल है, जिसमें टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स विमान के निर्माण, अंतिम असेंबली, परीक्षण और दीर्घकालिक समर्थन का नेतृत्व कर रही है।
    • 56 विमानों की इस परियोजना में भारत के सबसे बड़े ग्राहक होने के नाते 85% से अधिक स्वदेशीकरण का लक्ष्य रखा गया है, जो हज़ारों पुर्जों एवं विस्तृत घरेलू आपूर्ति नेटवर्क के विकास के माध्यम से भारत की एयरोस्पेस क्षमताओं को नई ऊँचाईयाँ प्रदान करेगा।
  • अनुसंधान एवं विकास का लोकतंत्रीकरण: रक्षा अनुसंधान को केवल राज्य एजेंसियों तक सीमित न रखते हुए उसका विस्तार करने से स्वदेशी, उन्नत एवं भविष्य उन्मुख हथियार प्रणालियों का तीव्र विकास सुनिश्चित होता है।
    • शैक्षणिक संस्थानों तथा निजी उद्योगों को अनुसंधान एवं विकास प्रक्रिया में एकीकृत करते हुए भारत लाइसेंस-आधारित असेंबली मॉडल से आगे बढ़कर वास्तविक प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता की सुदृढ़ आधारशिला स्थापित कर रहा है।
    • वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के लिये वित्तीय आवंटन को बढ़ाकर ₹29,100.25 करोड़ कर दिया गया है।
    • महत्त्वपूर्ण रूप से, कुल रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25% अब संरचनात्मक रूप से सीधे निजी उद्योग, स्टार्टअप्स तथा शैक्षणिक संस्थानों के लिये खोला गया है।

भारत के रक्षा क्षेत्र की प्रगति को सीमित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?

  • महत्त्वपूर्ण घटकों के आयात पर निर्भरता: महत्त्वपूर्ण घटक आयात निर्भरता: व्यापक स्वदेशीकरण प्रयासों के बावजूद, भारत अभी भी उच्च-स्तरीय महत्त्वपूर्ण उप-प्रणालियों के लिये विदेशी OEM पर संरचनात्मक रूप से निर्भर बना हुआ है, जिससे वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता सीमित होती है।
    • आपूर्ति शृंखला में व्याप्त यह असुरक्षा प्रमुख स्वदेशी प्लेटफार्मों को अचानक भू-राजनीतिक झटकों और विदेशी निर्यात नियंत्रणों के प्रति संवेदनशील बनाती है। 
    • वर्ष 2026 की शुरुआत तक, LCA तेजस जैसे उन्नत प्लेटफॉर्म अभी भी पूरी तरह से अमेरिका में निर्मित GE-F404/414 इंजनों पर निर्भर हैं।
    • हालाँकि कुल घरेलू उत्पादन 70-75% तक पहुँच जाता है, लेकिन टियर-1 उन्नत एवियोनिक्स और स्टील्थ कंपोजिट में वास्तविक आत्मनिर्भरता अभी भी अत्यंत कम है।
  • R&D वित्तपोषण में कमी: रक्षा अनुसंधान एवं विकास के लिये अपर्याप्त वित्तीय आवंटन से स्वदेशी बौद्धिक संपदा के निर्माण में गंभीर बाधा उत्पन्न होती है, जिसके चलते भारत को आविष्कार करने के बजाय सामग्री एकत्र (assembly) करने के लिये मज़बूर होना पड़ता है। 
    • यह निरंतर अल्प-वित्तपोषण घरेलू उद्योग को कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा निर्देशित ऊर्जा जैसे भविष्य उन्मुख युद्ध क्षेत्रों में वैश्विक अग्रणी देशों से एक पीढ़ी पीछे बनाए रखता है।
    • आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत का अनुसंधान एवं विकास पर सकल व्यय GDP के 0.64% पर स्थिर बना हुआ है, जो अमेरिका और इज़रायल जैसी नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्थाओं के 2.5%-6% के स्तर से अत्यंत कम है।
  • राजस्व व्यय की ओर झुका हुआ बजट: अत्यधिक राजस्व व्यय से प्रभावित रक्षा बजट, व्यापक सैन्य आधुनिकीकरण तथा बड़े पैमाने पर अधिग्रहण के लिये आवश्यक रणनीतिक पूंजी को सीमित कर देता है।
    • एक विशाल स्थायी सेना को बनाए रखने का भारी वित्तीय बोझ उच्च-प्रौद्योगिकी स्वदेशी अधिग्रहण के लिये आवश्यक तरलता को बाधित करता है।
    • कई वर्षों से पेंशन व्यय कुल रक्षा बजट का 20% या उससे अधिक रहा है।
    • परिणामस्वरूप, पूंजीगत अधिग्रहण बजट लगभग 24% (₹1.85 लाख करोड़) तक सीमित रह जाता है, जिससे अरबों डॉलर के विशाल प्लेटफॉर्म नवीनीकरण में बाधा उत्पन्न होती है।
  • लंबी खरीद प्रक्रिया: सुधारात्मक प्रयासों के बावजूद, लालफीताशाही एवं जटिल अधिग्रहण प्रक्रियाएँ प्रारंभिक परीक्षण से लेकर वास्तविक सैन्य तैनाती तक अत्यधिक समय-व्यय उत्पन्न करती हैं।
    • इन विस्तारित समय-सीमाओं के परिणामस्वरूप लागत में वृद्धि होती है तथा अनेक मामलों में सैनिकों तक पहुँचते-पहुँचते उपकरण तकनीकी रूप से अप्रचलित हो जाते हैं।
    • CAG की रिपोर्टें निरंतर इंगित करती हैं कि विशेषकर रक्षा एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में खरीद तंत्र गंभीर अवरोधों से ग्रस्त है, जहाँ दीर्घकालिक पूर्व-खरीद परीक्षण प्रक्रियाएँ प्रायः वर्षों तक चलती हैं और अंततः कई मामलों में अंतिम अनुबंध निष्पादन तक नहीं पहुँच पातीं।
  • प्रारंभिक निजी क्षेत्र का एकीकरण: प्रगतिशील नीतिगत सुधारों के बावजूद, राज्य के स्वामित्व वाले एकाधिकारों का संरचनात्मक प्रभुत्व बना हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप प्रमुख मेगा-प्लेटफॉर्म अनुबंधों में सक्षम निजी उद्यमों की भागीदारी सीमित हो रही है।
    • रक्षा विनिर्माण में प्रतिस्पर्द्धा का वातावरण स्वाभाविक रूप से असमान बना हुआ है, जो बड़े पैमाने पर निजी पूंजी निवेश और तकनीकी व्यवधान को बाधित करता है।
    •  हाल ही में दर्ज ₹1.54 लाख करोड़ के कुल स्वदेशी रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2025 में लगभग 23% तक सीमित रही।
    • इसके अतिरिक्त, भारत का अधिकांश रक्षा औद्योगिक ढाँचा अभी भी सरकारी स्वामित्व में है, जिससे प्रतिस्पर्द्धात्मक विस्तार बाधित होता है।
  • उन्नत एयरोस्पेस में कौशल कमी: उन्नत धातुकर्म, स्टेल्थ तकनीक तथा परमाणु प्रणोदन जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में कुशल मानव संसाधन की कमी घरेलू डिज़ाइन क्षमता पर संरचनात्मक सीमा लगाती है।
    • यह गंभीर मानव पूंजी अंतराल भारत को जटिल डिज़ाइन चरणों में विदेशी संयुक्त उपक्रमों पर निर्भर रहने के लिये विवश करता है।
    • भारत के रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र में वर्तमान में उच्च-थ्रस्ट जेट इंजनों के लिये आवश्यक सिंगल-क्रिस्टल ब्लेड विकसित करने की स्वदेशी धातुकर्म क्षमता का अभाव है।
    • परिणामस्वरूप, इस विशिष्ट तकनीकी कौशल अंतर को पाटने के लिये प्रमुख घरेलू निजी समूह एयरबस और डसॉल्ट जैसी विदेशी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम करने के लिये बाध्य हैं।
  • दीर्घकालिक रणनीतिक योजना में विसंगति: सशस्त्र बलों की दीर्घकालिक क्षमता विकास योजनाओं और वित्त मंत्रालय द्वारा किये जाने वाले क्रमिक, तदर्थ वित्तीय आवंटन के बीच लगातार विसंगति बनी हुई है। 
    • बजट को लेकर यह सख्त प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण दशकों पुरानी, उच्च पूंजी वाली स्वदेशी परियोजनाओं को बुरी तरह से बाधित करता है, जिन्हें गारंटीकृत और निरंतर वित्त पोषण की आवश्यकता होती है। 
    • भारत का कुल रक्षा व्यय वित्त वर्ष 2026-27 के लिये अनुमानित GDP के लगभग 2% पर रणनीतिक रूप से स्थिर बना हुआ है, जो विशेषज्ञों द्वारा अनुशंसित 3% की सीमा से कम है। 
    • इस संरचनात्मक कमी के कारण सेना को वार्षिक बाधाओं के अनुरूप अपनी 15 वर्षीय दीर्घकालिक एकीकृत परिप्रेक्ष्य योजना (LTIPP) को बार-बार कम करना पड़ता है।

भारत के रक्षा क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • एकीकृत रक्षा औद्योगिक रणनीति: सरकार को निजी क्षेत्र के प्रतिभागियों को 15 वर्षों की मांग की स्पष्टता प्रदान करने हेतु दीर्घकालिक एकीकृत परिप्रेक्ष्य योजना (LTIPP) का एक समर्पित ‘रक्षा-औद्योगिक रोडमैप’ के साथ समुचित समन्वय स्थापित करना होगा।
    • यह रणनीतिक समन्वय घरेलू संस्थाओं के लिये उच्च मात्रा में खरीद आदेशों की सुनिश्चितता के माध्यम से निवेश जोखिमों को कम करेगा, जिससे वृहद् पूंजी निवेश तथा अवसंरचनात्मक विस्तार के लिये एक पूर्वानुमेय वातावरण का निर्माण संभव हो सकेगा।
  • अनुसंधान एवं विकास का लोकतंत्रीकरण: राज्य-केंद्रित अनुसंधान से आगे बढ़ते हुए, निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से उच्च-जोखिम, उच्च-लाभ वाली विघटनकारी प्रौद्योगिकियों के वित्तपोषण हेतु रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के समांतर एक ‘उन्नत रक्षा अनुसंधान परियोजना एजेंसी (ADRPA)’ की स्थापना की आवश्यकता है।
    • विभागीय प्रयोगशालाओं से नवाचार के दायित्व को प्रतिस्पर्द्धी एवं विकेंद्रीकृत स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्रों की ओर स्थानांतरित कर, भारत पुरानी प्रणालियों को अप्रासंगिक बनाते हुए छठी पीढ़ी की युद्ध क्षमताओं में अग्रणी भूमिका निभाने में सक्षम हो सकता है।
  • एकीकृत एयरोस्पेस एवं समुद्री इंजन मिशन: जटिल इंजन कोर प्रौद्योगिकियों तथा सिंगल-क्रिस्टल ब्लेड धातुकर्म (metallurgy) में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु राष्ट्रीय स्तर की ‘मिशन मोड’ परियोजनाओं को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिये, क्योंकि ये क्षेत्र अब भी प्रौद्योगिकीय निर्भरता की अंतिम सीमाएँ बने हुए हैं।
    • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से एक आत्मनिर्भर प्रणोदन पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण, उस ‘इंजन-थ्रॉटल’ बाधा को समाप्त कर सकता है जो वर्तमान में स्वदेशी वायुयान एवं नौसैनिक प्लेटफार्मों के प्रदर्शन को विदेशी निर्यात लाइसेंसों पर निर्भर बनाए हुए है।
  • रक्षा-निर्यात ऋण एजेंसी (DECA): रक्षा निर्यात को प्रोत्साहित करने हेतु विशेष रूप से ‘लाइन ऑफ क्रेडिट (LoC)’ तथा क्रेता ऋण उपलब्ध कराने के लिये एक विशेष वित्तीय संस्था की स्थापना भारत को उभरते बाज़ारों में वैश्विक हथियार निर्माताओं के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने में सक्षम बनाएगी।
    • यह वित्तीय संरचना घरेलू निर्माताओं को ग्लोबल साउथ देशों के लिये आकर्षक एवं दीर्घकालिक वित्तपोषण पैकेज उपलब्ध कराने में सक्षम बनाएगी, जिससे रक्षा बिक्री को एक सशक्त भू-रणनीतिक कूटनीतिक उपकरण के रूप में प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सकेगा।
  • प्रतिभा आपूर्ति शृंखला और सैन्य-औद्योगिक समेकन: रक्षा मंत्रालय में निजी क्षेत्र के उच्च स्तरीय इंजीनियरों और कार्यक्रम प्रबंधकों के लिये ‘लेटरल एंट्री’ ढाँचे को औपचारिक रूप दिया जाना चाहिये, जिससे सामरिक आवश्यकताओं और औद्योगिक क्रियान्वयन के बीच का अंतर कम हो सके।
    • सैन्य कर्मियों को औद्योगिक डिज़ाइन चरणों में तथा औद्योगिक विशेषज्ञों को सैन्य प्रक्रियाओं में सम्मिलित करने से यह सुनिश्चित होगा कि निर्मित उपकरण न केवल तकनीकी रूप से उन्नत हों, बल्कि विविध युद्धक्षेत्र परिस्थितियों के लिये संचालनात्मक रूप से भी अनुकूलित हों।
  • महत्त्वपूर्ण खनिज एवं कच्चे माल का संरक्षण: भारत को उन्नत रक्षा निर्माण हेतु आवश्यक दुर्लभ मृदा तत्त्वों तथा टाइटेनियम मिश्र धातुओं के लिये विदेशी खदानों का अधिग्रहण कर तथा घरेलू प्रसंस्करण केंद्र स्थापित कर अपनी संसाधन संप्रभुता सुनिश्चित करनी चाहिये।
    • इन महत्त्वपूर्ण खनिजों का रणनीतिक भंडार तैयार करने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला के शस्त्रीकरण तथा मूल्य अस्थिरता के दौरान घरेलू रक्षा उत्पादन सुरक्षित रहेगा।
  • दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकी वाणिज्यीकरण केंद्र: नीतिगत ढाँचों को इस प्रकार उदार बनाया जाना चाहिये कि रक्षा निर्माताओं को ‘दोहरे उपयोग’ वाली प्रौद्योगिकियों का नागरिक बाज़ारों हेतु विकास करने की अनुमति प्राप्त हो सके, जिससे उच्च-स्तरीय अनुसंधान एवं विकास (R&D) निवेश की व्यावसायिक व्यवहार्यता सुनिश्चित हो।
    • रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन समूह (Drone Swarms) तथा उपग्रह संचार प्रणालियों को वाणिज्यिक लॉजिस्टिक्स एवं कृषि क्षेत्र में पुनर्प्रयोजन की अनुमति प्रदान कर यह क्षेत्र सरकारी खरीद चक्रों से स्वतंत्र एक स्वायत्त राजस्व स्रोत विकसित कर सकता है।
  • परीक्षण एवं प्रमाणन का विकेंद्रीकरण: ‘टेस्टिंग ऐज़ अ सर्विस (TaaS)’ मॉडल का विस्तार निजी उद्यमों को सरकारी फायरिंग रेंज, विंड टनल्स तथा समुद्री परीक्षण सुविधाओं तक व्यापक पहुँच प्रदान करेगा।
    • प्रमाणीकरण एवं मानकीकरण पर राज्य के एकाधिकार में कमी से प्रोटोटाइप से समावेशन (Induction) तक की समय-सीमा में उल्लेखनीय कमी आएगी, जिससे घरेलू नवाचारों का वैश्विक सैन्य मानकों के विरुद्ध तीव्र एवं प्रतिस्पर्द्धी परीक्षण संभव हो सकेगा।

निष्कर्ष: 

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की प्रगति अब केवल एक संकल्प तक सीमित न रहकर एक सिद्ध परिचालनात्मक वास्तविकता के रूप में स्थापित हो चुकी है, जिसका प्रमाण रिकॉर्ड स्तर के निर्यात तथा घरेलू विनिर्माण में हुई अभूतपूर्व वृद्धि है। यद्यपि iDEX जैसे नवाचार संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देते हैं, फिर भी एयरो-इंजन एवं उच्च स्तरीय धातुकर्म जैसी अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों में दक्षता प्राप्त किये बिना यह रूपांतरण अधूरा रहेगा। अंततः, एक ‘असेंबली-हब’ से ‘वैश्विक नवाचार-केंद्र’ में रूपांतरण हेतु निरंतर पूंजी प्रवाह, अनुसंधान एवं विकास (R&D) का लोकतंत्रीकरण तथा निजी क्षेत्र-नेतृत्व वाले सैन्य-औद्योगिक परिसर की दिशा में निर्णायक परिवर्तन अनिवार्य है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

यद्यपि भारत ने रक्षा निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है, फिर भी गंभीर संरचनात्मक चुनौतियाँ अब भी वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता की प्राप्ति में बाधा बनी हुई हैं। भारत के वर्तमान रक्षा विनिर्माण तंत्र के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1.  वित्त वर्ष 2026 में भारत के रिकॉर्ड रक्षा निर्यात का प्रमुख प्रेरक क्या है?
यह परिवर्तन लागत-प्रभावी स्वदेशी प्लेटफॉर्म जैसे ब्रह्मोस और पिनाका, सक्रिय रक्षा कूटनीति तथा निजी क्षेत्र एकीकरण के संयोजन द्वारा प्रेरित है।

2.  भारत अभी भी तेजस जैसे स्वदेशी विमानों के लिये विदेशी इंजनों पर क्यों निर्भर है?
यह एक स्थायी ‘धातुकर्म अंतराल’ तथा घरेलू उच्च-थ्रस्ट एयरो-इंजन प्रौद्योगिकी की कमी के कारण है, जिसके लिये दीर्घकालिक ‘मिशन मोड’ परियोजनाएँ आवश्यक हैं।

3. पाँचवीं सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची का क्या महत्त्व है?
यह 5,500 से अधिक वस्तुओं पर ‘आयात निषेध’ को संस्थागत बनाती है, जिससे घरेलू उद्योगों को नवाचार हेतु बाध्य किया जाता है तथा उन्हें एक स्थिर आंतरिक बाज़ार की गारंटी मिलती है।

4. अग्निपथ योजना रक्षा बजट को किस प्रकार प्रभावित करती है? 
इसका उद्देश्य दीर्घकालिक पेंशन और वेतन व्यय को कम करना है, जो वर्तमान में बजट का 70% से अधिक उपभोग करता है, ताकि पूंजीगत आधुनिकीकरण हेतु संसाधन उपलब्ध कराए जा सकें।

5. "टेस्टिंग एज़ अ सर्विस" (TaaS) मॉडल क्या है?
यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत निजी कंपनियों को राज्य-स्वामित्व वाली फायरिंग रेंज तथा प्रयोगशालाओं तक पहुँच प्रदान की जाती है, जिससे प्रोटोटाइप से सैन्य तैनाती तक का समय अत्यंत कम हो जाता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानीय आबादी के उत्थान के लिये उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने हेतु सेना द्वारा चलाए जाने वाले अभियानों को कहा जाता है: (2024)

(a) ऑपरेशन संकल्प

(b) ऑपरेशन मैत्री

(c) ऑपरेशन सद्भावना

(d) ऑपरेशन मदद

उत्तर:C


मेन्स

प्रश्न 1: “भारत में सीमा पार से बढ़ते आतंकवादी हमले और पाकिस्तान द्वारा कई सदस्य देशों के आंतरिक मामलों में बढ़ता हस्तक्षेप SAARC (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) के भविष्य के लिये अनुकूल नहीं है।” उपयुक्त उदाहरणों के साथ समझाएँ। (2016)

प्रश्न 2: आतंकवादी हमलों के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई के संबंध में अक्सर 'हॉट परस्यूट' और 'सर्जिकल स्ट्राइक' शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसी कार्रवाइयों के रणनीतिक प्रभाव पर चर्चा करें। (2016)

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