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भारत में सुलभ और समतामूलक स्वास्थ्य सेवा हेतु रोडमैप

  • 12 Mar 2026
  • 224 min read

यह एडिटोरियल 06/03/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित ‘Building a safety net to protect people’s health’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय भारत के बदलते स्वास्थ्य सेवा परिदृश्य का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें संरचनात्मक सुधारों के लिये एक रोडमैप प्रस्तावित किया गया है ताकि वर्ष 2047 तक प्रत्येक नागरिक के लिये सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का सपना साकार हो सके।

प्रिलिम्स के लिये: PM-JAY, ABDM, eSanjeevani, PM-ABHIM, U-WIN पोर्टल, जनऔषधि केंद्र, राष्ट्रीय स्वास्थ्य खाता 

मेन्स के लिये: भारत में स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच में विकास, भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने में प्रमुख मुद्दे, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच प्राप्त करने के लिये आवश्यक उपाय।

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का परिदृश्य सीमित पहुँच से व्यापक पहुँच और वहनीयता की ओर अग्रसर है। प्रगति के बावजूद, स्वास्थ्य पर होने वाला भारी खर्च, जो कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 39% है, उपचार तक समान पहुँच में एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना और प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना जैसी पहल लाखों लोगों के लिये वित्तीय सुरक्षा एवं वहनीय दवाओं की उपलब्धता का विस्तार कर रही हैं। ये सभी प्रयास मिलकर विकसित भारत की परिकल्पना के अंतर्गत सार्वभौमिक, वहनीय और जन-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं की ओर भारत के संक्रमण का संकेत देते हैं।

भारत अपनी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में पहुँच और समानता को किस प्रकार मज़बूत कर रहा है? 

  • परस्पर संचालित डिजिटल स्वास्थ्य पहचान: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) ने ‘अव्यवस्थित कागज़ी फाइलों’ से एक ‘सुसंगत, परस्पर संचालित डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र’ में परिवर्तन करके रोगी रिकॉर्ड प्रबंधन को संरचनात्मक रूप से बदल दिया है। 
    • इस तरह की डिजिटल सुबाह्यता निदान की पुनरावृत्ति को काफी हद तक कम करती है तथा प्रवासी और ग्रामीण आबादी के लिये देखभाल की निरंतरता को बढ़ाती है। 
    • अगस्त 2025 तक, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) ने देश भर में 79.91 करोड़ से अधिक आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाते (ABHA) बनाकर एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा (PM-JAY विस्तार): आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) विश्व की सबसे बड़ी सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजना के रूप में कार्य करती है, जो कमज़ोर जनसमूहों को चिकित्सा संबंधी भारी खर्चों से बचाती है। 
    • द्वितीयक एवं तृतीयक देखभाल के लिये कागज़ रहित और नकदी रहित अस्पताल में भर्ती सुनिश्चित करके, यह पहल प्रभावी रूप से उच्च मूल्य के जीवन रक्षक उपचारों तक पहुँच को लोकतांत्रिक बनाती है। 
    • हालिया नीतिगत विस्तारों ने लाभार्थियों के दायरे को व्यवस्थित रूप से व्यापक बनाया है, जिससे सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज सभी सामाजिक-आर्थिक विभाजनों में एक अधिक ठोस वास्तविकता बन गई है। 
    • यह योजना 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के 6 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों को कवर करती है, जो 45 करोड़ परिवारों से संबंधित हैं, चाहे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।
    • कुल मिलाकर, वर्ष 2026 की शुरुआत तक 43 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी किये जा चुके हैं। साथ ही इस योजना के तहत निजी अस्पतालों के लिये 1.15 लाख करोड़ रुपये की लागत से 5.77 करोड़ अस्पताल प्रवेश स्वीकृत किये गए हैं।
  • राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन नेटवर्क का विकास: दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टर-मरीज अनुपात की गंभीर असमानता को दूर करने के लिये, भारत ने अपनी राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन सेवा, ई-संजीवनी का सक्रिय रूप से विस्तार किया है, जिससे स्मार्टफोन के माध्यम से विशेषज्ञ परामर्श सुलभ हो गए हैं।
    • हब-एंड-स्पोक मॉडल पर आधारित यह डिजिटल व्यवस्था परिधीय स्वास्थ्य केंद्रों को शहरी तृतीयक चिकित्सा केंद्रों के विशेषज्ञ चिकित्सकों से जोड़ती है।
    • इससे चिकित्सा संबंधी यात्राओं का लॉजिस्टिक्स और वित्तीय बोझ कम होता है, साथ ही वंचित समुदायों को समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है। 
    • डिजिटल स्वास्थ्य समानता का व्यापक प्रदर्शन करते हुए, ई-संजीवनी प्लेटफॉर्म ने वर्ष 2025 के अंत तक 43 करोड़ से अधिक टेली-कंसल्टेशन की एक अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल कर ली। 
  • किफायती दवाइयाँ (जन औषधि केंद्र): दवाइयों की महंगाई से सक्रिय रूप से मुकाबला करने के लिये प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) के तहत उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएँ काफी कम लागत पर उपलब्ध कराई जाती है।
    • कंपनियों के अत्यधिक मूल्य के ब्रांडिंग और मार्केटिंग मार्जिन को समाप्त करके, राज्य समर्थित ये औषधि केंद्र निम्न आय वाले परिवारों के लिये दीर्घकालिक रोगों के प्रबंधन को आर्थिक रूप से वहनीय बनाती हैं। 
    • मार्च 2026 तक यह नेटवर्क भारत के सभी ज़िलों में 18,000 से अधिक कार्यरत जन औषधि केंद्रों तक विस्तारित हो चुका है, जो 50% से 80% कम कीमतों पर दवाएँ उपलब्ध करा रहे हैं। 
    • सरकार वर्तमान में मार्च 2027 तक 25,000 केंद्र स्थापित करने के अपने लक्ष्य को सक्रिय रूप से पूरा करने के लिये फ्रेंचाइजी-आधारित मॉडल का उपयोग कर रही है।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का उन्नयन: भारत मौजूदा उप-स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को व्यापक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (AAM) में परिवर्तित करके प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का मौलिक रूप से विकेंद्रीकरण कर रहा है। 
    • ये केंद्र प्रणालीगत ध्यान को रोगों के प्रतिक्रियात्मक उपचार से आगे बढ़ा कर सक्रिय स्वास्थ्य, मातृ देखभाल और गैर-संक्रामक रोग (NCD) स्क्रीनिंग पर केंद्रित करते हैं। 
    • आधुनिक IT प्रणालियों, आवश्यक निदान सुविधाओं और अतिरिक्त मानव संसाधनों से सुसज्जित, ये केंद्र ग्रामीण नागरिकों के लिये चिकित्सा संपर्क के महत्त्वपूर्ण प्राथमिक बिंदु के रूप में कार्य करते हैं। 
    • PM-ABHIM ढाँचे के तहत, सरकार ने इन ज़मीनी स्तर की स्वास्थ्य सुविधाओं को मज़बूत करने के लिये वर्ष 2021 और 2026 के दौरान ₹64,180 करोड़ आवंटित किये हैं। 
    • इसके अलावा, केंद्रीय बजट (2026-27) में PM-ABHIM परियोजना को इस गति को बनाए रखने के लिये ₹4,770 करोड़ का आवंटन किया गया है, जिसमें विशेष प्रयोगशालाओं और गहन चिकित्सा कक्षों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
  • चिकित्सा शिक्षा और कार्यबल विस्तार: योग्य स्वास्थ्य पेशेवरों की दीर्घकालिक कमी को दूर करने के लिये सरकार ने नए मेडिकल कॉलेजों और तृतीयक संस्थानों की स्थापना के लिये एक व्यापक अवसंरचनात्मक प्रयास किया है।
    • स्थापना संबंधी मानकों को व्यवस्थित रूप से शिथिल कर तथा ज़िला अस्पतालों को चिकित्सा महाविद्यालयों से जोड़कर देश में चिकित्सकों एवं नर्सिंग कर्मियों के घरेलू उत्पादन को तीव्र गति से बढ़ाया जा रहा है।
    • चिकित्सा शिक्षा का यह स्थानीयकरण ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित राज्यों में विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के भौगोलिक वितरण में स्वाभाविक रूप से सुधार करता है। 
    • पिछले दशक में चिकित्सा महाविद्यालयों की कुल संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो 387 से बढ़कर 800 से अधिक हो गई है।
    • इसके अतिरिक्त 20 से अधिक नये अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों के संचालन से उच्च स्तरीय तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं का महानगरों से बाहर विकेंद्रीकरण संभव हुआ है।   
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा संचालित स्वास्थ्य-तकनीक नवाचार: सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी और निदान ढाँचे में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एकीकरण निदान संबंधी परिणामों के लिये लगने वाले समय को काफी कम कर रहा है और नैदानिक ​​सटीकता में सुधार कर रहा है। 
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) और ICMR ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये तैयार किये गए  AI-आधारित डिजिटल सार्वजनिक उत्पादों को विकसित करने के लिये फेडरेटेड इंटेलिजेंस हैकाथॉन का नेतृत्व किया।
      • साथ ही ई-संजीवनी प्लेटफॉर्म के भीतर क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (CDSS) की राष्ट्रव्यापी तैनाती डॉक्टरों को साक्ष्य-आधारित नैदानिक ​​निर्णय लेने में सक्रिय रूप से सहायता कर रही है।
    • इसके अलावा, भारत अब स्वास्थ्य सेवाओं में प्रतिक्रियात्मक हस्तक्षेपों के बजाय सक्रिय हस्तक्षेपों के लिये डेटा का उपयोग करने हेतु SAHI (स्वास्थ्य सेवा में AI के लिये रणनीति) एवं BODH प्लेटफॉर्मों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
  • डिजिटल टीकाकरण रजिस्ट्री (U-WIN पोर्टल): कोविन प्लेटफॉर्म की अभूतपूर्व सफलता को दोहराते हुए, भारत ने U-WIN पोर्टल के माध्यम से अपने नियमित टीकाकरण कार्यक्रम को पूरी तरह से डिजिटाइज्ड इकोसिस्टम में बदल दिया है। 
    • यह डिजिटल रजिस्ट्री प्रत्येक गर्भवती महिला और नवजात शिशु पर बारीकी से नज़र रखती है, जिससे महत्त्वपूर्ण टीकों का समय पर प्रशासन सुनिश्चित होता है तथा ड्रॉपआउट दर को कम करने के लिये ऑटोमेटेड रिमाइंडर भेजे जाते हैं।
    • इस तरह के रियल टाइम डाटा की उपलब्धता स्वास्थ्य प्रशासकों को वैक्सीन आपूर्ति शृंखलाओं की सूक्ष्म स्तर पर योजना बनाने तथा टीकाकरण कवरेज में भौगोलिक कमियों की पहचान करने में सहायता करती है। 
    • फरवरी 2026 तक, U-WIN प्रणाली पूरे भारत में सालाना 3.7 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं और 11.12 करोड़ शिशुओं के रिकॉर्ड को डिजिटाइज़ करती है। 
    • मैनुअल रजिस्टरों को प्रतिस्थापित करके, यह सत्यापन योग्य डिजिटल टीकाकरण प्रमाण पत्र जारी करता है और प्रवासी परिवारों के लिये वैक्सीनेशन हिस्ट्री के गुम होने के जोखिम को पूरी तरह से समाप्त कर देता है।
  • मातृ एवं शिशु पोषण स्वास्थ्य: यह मानते हुए कि समान स्वास्थ्य सेवा की शुरुआत कुपोषण के व्यापक उन्मूलन से होती है, भारत ने पोषण अभियान के अंतर्गत कई मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पहलों को एकीकृत किया है। 
    • आँगनवाड़ी सेवाओं को पीएम मातृ वंदना योजना जैसी नकद अंतरण योजनाओं के साथ एकीकृत करके, राज्य संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करता है तथा उचित मातृ पोषण सुनिश्चित करता है। 
    • जीवनचक्र के इस बहुआयामी दृष्टिकोण से आर्थिक रूप से वंचित क्षेत्रों में नवजात मृत्यु दर, शिशु-वृद्धिरोधन और मातृ एनीमिया में काफी हद तक कमी आती है। 
    • पीएम मातृ वंदना योजना के तहत जुलाई 2025 तक, 4.05 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को उनके बैंक/डाकघर खातों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से मातृत्व लाभ (कम से कम एक किस्त) का भुगतान किया जा चुका है।
    • डिजिटल पोषण ट्रैकर एप्लीकेशन के साथ एकीकरण के माध्यम से सरकार अब देशभर में 10 करोड़ से अधिक लाभार्थियों की दैनिक पोषण स्थिति की सक्रिय रूप से निगरानी करती है।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी और ड्रोन लॉजिस्टिक्स: द्वितीय एवं तृतीय स्तर के शहरों में अधोसंरचना की गंभीर कमियों को दूर करने के लिये, सरकार सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और मेडिकल ड्रोन जैसी उन्नत लॉजिस्टिकल तकनीकों का सक्रिय रूप से उपयोग कर रही है। 
    • वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) निजी स्वास्थ्य सेवा कंपनियों को कम विकसित ग्रामीण क्षेत्रों में मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल बनाने के लिये प्रोत्साहित करती है, जिससे PM-JAY प्रदाता नेटवर्क का प्रभावी रूप से विस्तार होता है। 
    • इस बीच ड्रोन आधारित चिकित्सा सेवाएँ दुर्गम भौगोलिक इलाकों को पार करते हुए दूरस्थ चौकियों तक टीकों, रुधिर एवं आपातकालीन दवाओं की त्वरित आपूर्ति सुनिश्चित करती हैं। 
    • ICMR की आई-ड्रोन पहल के माध्यम से हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में अब ड्रोन लॉजिस्टिक्स का नियमित उपयोग आवश्यक चिकित्सकीय सामग्रियों की आपूर्ति के लिये किया जा रहा है, जिससे पारंपरिक परिवहन समय की तुलना में अत्यधिक कमी आती है।
    • इसके अतिरिक्त, PM-JAY योजना के तहत वर्तमान में 15,733 से अधिक निजी अस्पताल सूचीबद्ध हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा वितरण में निजी पूंजी के सफल एकीकरण को उजागर करता है।

भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को अवरुद्ध करने वाली प्रमुख स्थायी समस्याएँ क्या हैं?

  • जेब से होने वाला उच्च स्वास्थ्य व्यय (OOPE): सार्वजनिक बीमा योजनाओं के व्यापक विस्तार के बावजूद, जेब से होने वाला अत्यधिक खर्च भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच में एक बड़ी बाधा बना हुआ है।
    • परिणामस्वरूप, लाखों लोग बार-बार चिकित्सा संबंधी गरीबी के जाल में फँस जाते हैं क्योंकि मौजूदा बीमा व्यवस्थाएँ रोज़मर्रा के बाह्य रोगी खर्चों की तुलना में तृतीयक स्तर की अस्पताल में भर्ती देखभाल को असमान रूप से प्राथमिकता देती हैं। 
    • हालिया राष्ट्रीय स्वास्थ्य रिपोर्टों से पता चलता है कि OOPE अभी भी कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 39% हिस्सा है, जो निम्न-आय वर्ग के लोगों पर गंभीर बोझ डालता है। 
  • शहरी-ग्रामीण अवसंरचना का गंभीर असमान वितरण: स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना का स्पष्ट भौगोलिक असमान वितरण एक गहरी संरचनात्मक असमानता को जन्म देता है जो व्यवस्थित रूप से भारत की ग्रामीण बहुसंख्या को वंचित करता है।
    • जहाँ महानगरों में विश्व स्तरीय कॉर्पोरेट अस्पताल और उन्नत निदान केंद्र मौजूद हैं, वहीं परिधीय क्षेत्रों में प्राथमिक एवं माध्यमिक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं की हालत बेहद खराब है। 
    • अधोसंरचना में मौजूद इस गंभीर असमानता के कारण ग्रामीण मरीजों को बुनियादी जीवनरक्षक चिकित्सा उपचार के लिये भी शहरी केंद्रों तक कठिन, खर्चीली और थकान भरी यात्रा करनी पड़ती है।
    • मौजूदा वितरण आँकड़ों से पता चलता है कि भारत के व्यापक स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना का लगभग 70-75% हिस्सा शहरी क्षेत्रों में केंद्रित है, जो कुल जनसंख्या के केवल 30% लोगों को ही सेवा प्रदान करते हैं।
  • विशेषीकृत मानव संसाधनों की तीव्र कमी: ज़मीनी स्तर पर विशेषीकृत चिकित्सा पेशेवरों की दीर्घकालिक कमी ग्रामीण सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की परिचालन नैदानिक ​​​​प्रभावकारिता को मूल रूप से सीमित कर देती है।
    • दूरस्थ भौगोलिक क्षेत्रों में सेवा करने के लिये सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञों और बाल रोग विशेषज्ञों को प्रोत्साहित करने में व्यवस्थागत अक्षमता उपेक्षित समुदायों को उपलब्ध स्थानीय माध्यमिक देखभाल की गुणवत्ता को काफी हद तक कम कर देती है। 
    • प्रतिभा की यह निरंतर कमी उच्च जोखिम वाले रोगियों को पूरी तरह से अपर्याप्त सुविधाओं वाले स्थानीय केंद्रों को नजरअंदाज़ करने के लिये विवश करती है, जिससे तृतीयक शहरी अस्पताल अत्यधिक दबाव में आ जाते हैं तथा महत्त्वपूर्ण नैदानिक ​​हस्तक्षेपों में घातक विलंब होता है। 
    • ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी- 2023 की रिपोर्ट से पता चलता है कि देश भर के 6,064 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में आवश्यक सर्जनों और बाल रोग विशेषज्ञों की 80% से अधिक की कमी है।
  • स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी में निरंतर डिजिटल असमानता: हालाँकि डिजिटल स्वास्थ्य मिशन तेज़ी से डेटा रजिस्टरों का आधुनिकीकरण कर रहे हैं, लेकिन एक दुर्जेय डिजिटल असमानता मौलिक रूप से इन अत्यधिक प्रशंसित तकनीकी प्रगति तक समान सार्वजनिक पहुँच को प्रतिबंधित करती है। 
    • उदाहरण के लिये, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के व्यापक मॉड्यूलर सर्वेक्षण- 2025 से पता चलता है कि डिजिटल क्षेत्र में निरंतर लैंगिक असमानता बनी हुई है, जिसमें 51.6% ग्रामीण महिलाओं के पास व्यक्तिगत मोबाइल फोन नहीं है। 
    • स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी में तेज़ी से हो रहे नवाचार से अनजाने में तकनीकी अपवर्जन का एक नया स्तर बन रहा है, जिससे शहरी डिजिटल मूल निवासियों को असमान रूप से लाभ होता है, जबकि डिजिटल रूप से उपेक्षित आबादी और भी वंचित रह जाती है। 
  • दीर्घकालिक रूप से कम व्यापक आर्थिक स्वास्थ्य वित्तपोषण: व्यापक आर्थिक स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र के लिये प्रणालीगत रूप से अपर्याप्त वित्तपोषण, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की बढ़ती संरचनात्मक लागतों को वहन करने की राज्य की क्षमता को गंभीर रूप से बाधित करता है। 
    • बजटीय आवंटन प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क के उन्नयन को गंभीर रूप से सीमित करता है, आधुनिक निदान उपकरणों की खरीद को रोकता है और पर्याप्त चिकित्सा कर्मियों के नियोजन को बाधित करता है। 
    • भारतीय रिज़र्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार, सत्र 2020-21 में केंद्र सरकार का स्वास्थ्य व्यय GDP के 0.37% से घटकर सत्र 2025-26 में 0.29% हो गया है।
    • यह चिरस्थायी राजकोषीय रूढ़िवादिता सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य की कमज़ोरियों में परिणत हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप अंततः हताश नागरिकों को उच्च लागत वाले, अनियमित निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं पर निर्भर रहना पड़ता है। 
  • नियामकीय निगरानी की कमज़ोरी और उपचार गुणवत्ता की समस्या: चिकित्सीय प्रोटोकॉल तथा गुणवत्ता मानकीकरण के सशक्त नियामकीय प्रवर्तन के अभाव के कारण रोगियों की सुरक्षा गंभीर रूप से प्रभावित होती है, विशेषकर अव्यवस्थित निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में।
    • व्यापक चिकित्सीय कदाचार, शक्तिशाली प्रतिजैविकों के अत्यधिक अविवेकपूर्ण उपयोग तथा मानकीकृत उपचार दिशानिर्देशों के अभाव से निम्न स्तर की चिकित्सा सेवाएँ एवं कमज़ोर रोगियों का प्रणालीगत शोषण होता है।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर प्रत्येक छह जीवाणु संक्रमणों में से एक प्रतिजैविकों के प्रति प्रतिरोधी हो चुका है और भारत रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) के इस खतरनाक पैटर्न में सबसे बड़ा योगदान देने वाले देशों में से एक है।
    • इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2019 में भारत में AMR से सीधे तौर पर जुड़ी अनुमानित 297,000 मौतें हुईं और यदि उचित प्रबंधन लागू नहीं किया गया तो इस 'मूक महामारी' के और भी बदतर होने की आशंका है।
  • आपूर्ति शृंखला की अस्थिरता और आवश्यक दवाओं की कमी: सार्वजनिक स्वास्थ्य आपूर्ति शृंखला के भीतर गंभीर परिचालन अक्षमताएँ तथा खंडित लॉजिस्टिक्स लगातार आवश्यक नैदानिक ​​अभिकर्मकों एवं जीवन रक्षक दवाओं की गंभीर कमी का कारण बनती हैं। 
    • केंद्रीकृत खरीद प्रक्रियाओं में प्रशासनिक संबंधी अड़चनें और अंतिम स्तर पर शीत शृंखला प्रबंधन की अत्यंत अपर्याप्त व्यवस्था ग्रामीण सरकारी औषधालयों में आवश्यक औषधियों की निरंतर उपलब्धता को बाधित करती है।
    • आपूर्ति तंत्र की यह संरचनात्मक कमज़ोरी रोगियों को अनिवार्य औषधियाँ उच्च लागत पर निजी औषधि दुकानों से खरीदने के लिये बाध्य करती है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं द्वारा प्रदान की जाने वाली आर्थिक सुरक्षा कमज़ोर पड़ जाती है।
    • उदाहरण के लिये, केंद्र सरकार ने इस बात पर चिंता जताई कि कुछ राज्य स्तरीय अस्पतालों में आवश्यक वस्तुओं का 40% से भी कम स्टॉक है, जिससे खरीद व्यवस्था में सुधार के लिये राष्ट्रीय स्तर पर चेतावनी उत्पन्न हुई।
  • गैर-संक्रामक रोगों का बढ़ता बोझ: भारत वर्तमान में एक बड़े महामारी विज्ञान संबंधी संक्रमण से जूझ रहा है, जहाँ दीर्घकालिक गैर-संक्रामक बीमारियों (NCD) में तेज़ी से हो रही वृद्धि व्यवस्थित रूप से मूलभूत प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल अवसंरचना को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। 
    • चूँकि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से तीव्र संक्रामक रोगों और मातृ स्वास्थ्य प्रबंधन के लिये विकसित की गई थी, इसलिये यह जटिल एवं दीर्घकालिक गैर-संचारी रोगों के उपचार के लिये पर्याप्त रूप से तैयार नहीं है।
    • वर्ष 2025 के हालिया महामारी विज्ञान आँकड़े दर्शाते हैं कि गैर-संचारी रोग अब देश में कुल मृत्यु का लगभग 63–66% कारण बन चुके हैं, जिनमें हृदय संबंधी रोग और उन्नत अवस्था के कैंसर प्रमुख हैं।
    • विशेष रूप से, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद-भारत के मधुमेह सर्वेक्षण के अनुसार, 11.4% वयस्कों को मधुमेह है तथा 15.3% लोग मधुमेह-पूर्व अवस्था में हैं।
  • जनजातीय आबादी का संरचनात्मक रूप से उपेक्षित होना: गहरी जड़ें जमाए सामाजिक निर्धारक तथा गंभीर भौगोलिक अलगाव भारत की आदिवासी एवं जनजातीय आबादी को प्राथमिक और द्वितीयक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने से व्यवस्थित रूप से वंचित करते हैं।
    • भाषायी अवरोध, आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सकों के साथ सांस्कृतिक दूरी तथा वनाच्छादित या पर्वतीय क्षेत्रों की भौतिक दुर्गमता राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य पहुँच में गंभीर कमियाँ उत्पन्न करती है।
    • उदाहरण के लिये, NFHS-5 (2019-21) के अनुसार, अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 50 मौतें थी, जो राष्ट्रीय औसत 41.9 से काफी अधिक है, जो आदिवासी समुदायों के लिये स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच एवं परिणामों में लगातार असमानताओं को उजागर करती है।
  • लाभ-प्रेरित निजी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता: सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के ऐतिहासिक और दीर्घकालिक क्षरण ने अनजाने में देश को अत्यधिक विखंडित और लाभ-प्रेरित निजी स्वास्थ्य क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर बना दिया है।
    • चूँकि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र प्रायः सख्त राष्ट्रीय मूल्य सीमा के बिना ‘सेवा के बदले शुल्क’ मॉडल पर कार्य करता है और उस पर कठोर राष्ट्रीय मूल्य नियंत्रण नहीं होता, इसलिये वह स्वाभाविक रूप से रोगी कल्याण की अपेक्षा आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देता है।
    • यह संरचनात्मक अतिनिर्भरता हताश नागरिकों को आपातकालीन उपचार प्राप्त करने के लिये भारी आर्थिक संकट, ऋण और संपत्ति विक्रय जैसे उपाय अपनाने के लिये बाध्य करती है।
    • उदाहरण के लिये, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा किये गए एक अध्ययन के अनुसार, भारत में लगभग 70% बाह्य रोगी देखभाल और लगभग 60% अंतर्रोग्य उपचार निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान किये जाते हैं। 
    • यह अत्यधिक निर्भरता सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की सीमित क्षमता और पहुँच को उजागर करती है, विशेष रूप से किफायती देखभाल के मामले में।

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच और समानता में सुधार के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • संप्रभु स्वास्थ्य वित्तपोषण का संस्थानीकरण: सतत व्यापक आर्थिक स्वास्थ्य वित्तपोषण सुनिश्चित करने के लिये, भारत को प्रणालीगत आधुनिकीकरण के लिये पूर्वानुमानित राजकोषीय संभावना की गारंटी देने हेतु समर्पित संप्रभु स्वास्थ्य बॉण्ड और निर्धारित सार्वजनिक स्वास्थ्य उपकरों को संस्थागत रूप देने की आवश्यकता है।
    • इस लक्षित राजकोषीय विकेंद्रीकरण से राज्य सरकारों को अस्थिर केंद्रीय बजटीय आवंटन से स्वतंत्र रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को बढ़ाने का अधिकार मिलता है, जिससे ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल उन्नयन की दिशा में निर्बाध पूंजी प्रवाह सुनिश्चित होता है।
  • डीप-टेक क्लिनिकल डिसीज़न सपोर्ट को लागू करना: ज़मीनी स्तर की स्वास्थ्य सुविधाओं के भीतर अंतर-संचालनीय, डीप-टेक क्लिनिकल डिसीज़न सपोर्ट सिस्टम को एकीकृत करने से ग्रामीण चिकित्सा विशेषज्ञों की दीर्घकालिक कमी को संरचनात्मक रूप से कम किया जा सकता है। 
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में एकीकृत मशीन लर्निंग एल्गोरिदम को तैनात करने से अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्त्ताओं को नैदानिक ​​सटीकता को मानकीकृत करने में सहायता मिलती है, जिससे पूर्वानुमेय तथा सटीक चिकित्सा सेवाएँ तत्काल विशेषज्ञ की भौतिक उपस्थिति के बिना भी अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सकें।
  • एक स्वायत्त नियामक प्राधिकरण की स्थापना: वास्तविक समानता प्राप्त करने के लिये एक स्वतंत्र, विकेंद्रीकृत राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण की स्थापना आवश्यक है, जिसके पास खंडित निजी क्षेत्र में मानकीकृत नैदानिक ​​प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू करने के लिये वैधानिक शक्तियाँ हों। 
    • बाह्य-रोगी सेवाओं की अत्यधिक व्यक्तिगत व्यय दरों पर विधिक सीमा निर्धारित करने और स्वास्थ्य संस्थानों की गुणवत्ता का सख्ती से ऑडिट करने से यह शासन ढाँचा चिकित्सीय शोषण को सीमित करता है तथा भौगोलिक स्थिति की परवाह किये बिना रोगी सुरक्षा को सुनिश्चित करता है।
  • चिकित्सा शिक्षा और कार्मिक प्रतिधारण का पुनर्गठन: स्वास्थ्य सेवा कर्मियों के गंभीर असमान वितरण में सुधार करने के लिये चिकित्सा शिक्षा नीतियों को इस दिशा में परिवर्तित करना चाहिये कि विशेषज्ञता प्राप्त स्नातकोत्तर चिकित्सा डिग्रियों के लिये चरणबद्ध रूप से अनिवार्य ग्रामीण सेवा दायित्व निर्धारित किये जाएँ।
    • इन संरचनात्मक दायित्वों को प्रदर्शन-आधारित वित्तीय प्रोत्साहनों तथा दुर्गम भूभागों के लिये विशेष प्रतिपूरक भत्तों के साथ जोड़ने से ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित ज़िलों में आवश्यक मानव संसाधनों को आकर्षित कर उनका स्थायी प्रतिधारण सुनिश्चित करना संभव होगा।
  • विकेंद्रीकृत आपूर्ति शृंखलाओं का स्वचालन: कमज़ोर सार्वजनिक स्वास्थ्य लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का व्यापक पुनर्गठन करने के लिये ऐसी प्रौद्योगिकी आधारित ब्लॉकचेन-सक्षम व्यवस्था लागू करनी चाहिये, जो आपूर्ति शृंखला के आरंभ से अंत तक दृश्यता सुनिश्चित करे और प्रणालीगत अक्षमताओं एवं अपव्यय को समाप्त करे।
    • पूर्वानुमेय और स्वचालित विकेंद्रीकृत क्रय प्रणालियों की ओर संक्रमण से आवश्यक औषधियों की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित होती है तथा शीत कोल्ड-चेन की स्थिरता सुदृढ़ होती है, जिससे ग्रामीण औषधालयों में जीवनरक्षक दवाओं की कमी समाप्त की जा सकती है।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का सामाजिक कल्याण के साथ अभिसरण: प्रतिक्रियात्मक तृतीयक उपचारों से हटकर सक्रिय प्राथमिक रोकथाम पर ध्यान केंद्रित करने के लिये वर्तमान उप-स्वास्थ्य केंद्रों को समग्र एवं समुदाय-समन्वित स्वास्थ्य कल्याण केंद्रों में रूपांतरित करना आवश्यक है।
    • स्थानीय पोषण सुरक्षा उपायों के साथ असंक्रामक रोगों की सुदृढ़ जाँच प्रणालियों का एकीकरण करने से यह बहुआयामी सामाजिक कल्याण दृष्टिकोण मूल रूप से दीर्घकालिक जीवनशैली संबंधी रोगों की प्रणालीगत वृद्धि को अस्पताल में भर्ती होने से पहले ही नियंत्रित कर सकता है।
  • बाह्य रोगी-केंद्रित बीमा का पुनर्रचना: सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा संरचनाओं को इस प्रकार पुनर्गठित करना चाहिये कि वे नियमित बाह्य-रोगी परामर्श, निदान परीक्षणों और औषधि क्रय से संबंधित व्ययों को भी व्यापक रूप से समाहित करें।
    • केवल गंभीर आंतरिक उपचारों को कवर करने वाली वर्तमान बीमा व्यवस्था से हटकर बाह्य-रोगी व्ययों को शामिल करने से दैनिक व्यक्तिगत स्वास्थ्य व्यय के प्रमुख कारण समाप्त होंगे, जिससे कमज़ोर वर्गों को आकस्मिक चिकित्सा गरीबी के जाल से सक्रिय रूप से बचाया जा सकता है।
  • व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) मॉडल को प्रोत्साहन देना: अत्यंत अविकसित तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के क्षेत्रों में स्वास्थ्य अवसंरचना के विस्तार के लिये रणनीतिक रूप से समन्वित, परिणाम-आधारित सार्वजनिक-निजी साझेदारियों को रणनीतिक रूप से प्रोत्साहित करना आवश्यक है।
    • विशेषीकृत व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण संरचनाओं का उपयोग करने से कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवा समूहों को ग्रामीण इलाकों में उन्नत बहु-विशेषज्ञता सुविधाएँ स्थापित करने के लिये प्रोत्साहन मिलता है, जिससे राज्य की अवसंरचनात्मक सीमाओं को कम करते हुए उच्च गुणवत्ता वाली तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच व्यापक हो सकती है।
  • स्वास्थ्य प्रशासनिक स्वायत्तता का अंतरण: लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित पंचायती राज संस्थाओं को पर्याप्त वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान करके समुदाय-नेतृत्व वाली स्वास्थ्य सेवा शासन को संस्थागत रूप देना अति-स्थानीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करता है। 
    • यह विकेंद्रीकृत प्रशासनिक सशक्तीकरण उपेक्षित समुदायों को स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों को अनुकूलित करने में सहायता प्रदान करता है, जिससे सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध होती हैं तथा आदिवासी और स्वदेशी समुदायों के संरचनात्मक अपवर्जन का समाधान होता है।
  • 'वन हेल्थ' निगरानी प्रणाली का संस्थानीकरण: दीर्घकालिक राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये 'एकीकृत स्वास्थ्य' महामारी-निगरानी ढाँचे का संस्थागत क्रियान्वयन आवश्यक है, जो पर्यावरणीय, पशु-चिकित्सा और मानव स्वास्थ्य संबंधी आँकड़ों को निर्बाध रूप से एकीकृत कर सके।
    • यह बहुआयामी पूर्वानुमेय व्यवस्था सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासकों को पशु-जनित रोगों के संभावित संक्रमण प्रसार तथा स्थानीय प्रकोपों की अग्रिम पहचान करने में सक्षम बनाती है, जिससे प्रतिक्रियात्मक संकट प्रबंधन के स्थान पर सक्रिय नियंत्रण रणनीतियाँ अपनाई जा सकती हैं।

निष्कर्ष: 

भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने के लिये एक खंडित, प्रतिक्रियात्मक प्रणाली से आगे बढ़कर एक डिजिटल रूप से एकीकृत, निवारक मॉडल की ओर संक्रमण आवश्यक है, जो ‘अंतिम छोर’ तक स्वास्थ्य सेवा की सुगम्यता को प्राथमिकता देती हो। यद्यपि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना तथा आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसी पहलों ने एक सुदृढ़ आधार स्थापित किया है, परंतु वास्तविक सफलता तभी संभव है जब स्वयं के व्यय से होने वाले स्वास्थ्य खर्च को कम किया जाए तथा शहरी एवं ग्रामीण स्वास्थ्य अवसंरचना के बीच विद्यमान गहन अंतर को दूर किया जाए। अंततः सतत व्यापक आर्थिक वित्तपोषण से समर्थित ‘एक स्वास्थ्य’ दृष्टिकोण ही एक सुदृढ़ एवं समतामूलक विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिये आवश्यक है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में परिवर्तन का केंद्रबिंदु 'रोग-उपचार' से 'स्वास्थ्य-उपचार' की ओर परिवर्तन है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के विकेंद्रीकरण और गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ के प्रबंधन में आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. ABHA ID का प्राथमिक लक्ष्य क्या है? 
विभिन्न स्वास्थ्य-सेवा प्रदाताओं के बीच दीर्घकालिक चिकित्सीय अभिलेखों तक निर्बाध पहुँच सुनिश्चित करने के लिये एक अंतर-संचालनीय डिजिटल स्वास्थ्य पहचान का निर्माण करना।

प्रश्न 2. PM-JAY वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा किस प्रकार करता है?
‘आयुष्मान वय वंदना कार्ड’ 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी नागरिकों को, उनकी आय की परवाह किये बिना, नगदरहित (कैशलेस) अस्पताल उपचार का कवरेज प्रदान करता है।

प्रश्न 3. ई-संजीवनी में 'हब एंड स्पोक' मॉडल क्या है?
यह मॉडल दूरस्थ स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों (स्पोक्स/परिधि) को बड़े तृतीयक अस्पतालों (हब्स) के विशेषज्ञ चिकित्सकों (केंद्र) से दूरसंचार आधारित परामर्श (टेलीकंसल्टेशन) के माध्यम से जोड़ता है।

प्रश्न 4. स्वयं के व्यय से स्वास्थ्य खर्च (OOPE) एक प्रमुख चिंता का विषय क्यों है?
क्योंकि इससे परिवारों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिये अपनी बचत से भुगतान करना पड़ता है, जिसके कारण बाह्य-रोगी सेवाओं हेतु आवश्यक पर्याप्त कवरेज के अभाव में प्रायः ऋणग्रस्तता या गरीबी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 5. U-WIN पोर्टल का कार्य क्या है?
यह सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के लिये एक स्थायी डिजिटल रजिस्ट्री है, जो प्रत्येक गर्भवती महिला और बच्चे के टीकाकरण का रिकॉर्ड रखती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन-से 'राष्ट्रीय पोषण मिशन (नेशनल न्यूट्रिशन मिशन)' के उद्देश्य हैं? (2017) 

  1. गर्भवती महिलाओं तथा स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण से संबंधी जागरूकता उत्पन्न करना।
  2. छोटे बच्चों, किशोरियों तथा महिलाओं में रक्ताल्पता की घटना को कम करना।
  3. बाजरा, मोटा अनाज तथा अपरिष्कृत चावल के उपभोग को बढ़ाना।
  4. मुर्गी के अंडों के उपभोग को बढ़ाना।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 1, 2 और 3

(c) केवल 1, 2 और 4

(d) केवल 3 और 4

उत्तर: (a) 


मेन्स

प्रश्न 1. "एक कल्याणकारी राज्य की नैतिक अनिवार्यता के अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना धारणीय विकास की एक आवश्यक पूर्व शर्त है।" विश्लेषण कीजिये। (2021)

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