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भारत में एक साथ चुनाव कराने हेतु रोडमैप

  • 30 Mar 2026
  • 180 min read

यह एडिटोरियल 22/03/2026 को द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित “The impact of simultaneous elections” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ ढाँचे का समग्र एवं बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें इसके ऐतिहासिक आधार, वित्तीय लाभों तथा कार्यान्वयन से संबंधित जटिल संवैधानिक चुनौतियों का क्रमबद्ध परीक्षण किया गया है। यह भारत की संघीय संरचना पर इसके प्रभाव का मूल्यांकन करते हुए लोकतांत्रिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये व्यावहारिक प्रशासनिक उपायों का प्रस्ताव करता है।

प्रिलिम्स के लिये: 129वाँ संविधान संशोधन विधेयक, आदर्श आचार संहिता, मूल संरचना सिद्धांत। 

मुख्य परीक्षा के लिये: वन नेशन, वन इलेक्शन (ONOE) क्या है, ONOE का इतिहास, ONOE के पक्ष में तर्क, ONOE से संबंधित मुद्दे तथा आवश्यक उपाय

विश्व की सबसे बड़ी चुनावी प्रणालियों में से एक होने के कारण, भारत की चुनावी व्यवस्था में बार-बार लाखों कर्मियों की तैनाती आवश्यक होती है, जिससे शासन चक्र बाधित होता है। हालिया अनुमानों के अनुसार, एक साथ चुनाव कराए जाने पर मतदान कर्मियों की तैनाती में लगभग 28% तक कमी संभव है, जिससे एक करोड़ से अधिक कार्यदिवसों की बचत हो सकती है। यह स्थिति खंडित चुनावी चक्रों से उत्पन्न प्रशासनिक अक्षमताओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है। इस परिप्रेक्ष्य में, ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव की अवधारणा शासन दक्षता एवं संस्थागत निरंतरता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक महत्त्वपूर्ण सुधारात्मक पहल के रूप में उभरती है।

एक साथ चुनाव (Simultaneous Elections) क्या हैं?

  • परिचय: समवर्ती चुनाव, जिन्हें प्रायः वन नेशन, वन इलेक्शन कहा जाता है, एक ऐसी अवधारणा है जिसके अंतर्गत भारत के चुनावी चक्र को इस प्रकार व्यवस्थित करने का प्रस्ताव है कि लोकसभा (संसद का निम्न सदन) तथा सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही समय पर कराए जाएँ।
    • वर्तमान में, भारत एक प्रकार के ‘निरंतर चुनावी चक्र’ से गुजर रहा है, जहाँ विभिन्न राज्यों में वर्ष भर अलग-अलग समय पर चुनाव आयोजित होते रहते हैं।
    • इस प्रस्ताव का उद्देश्य इन चुनावी चक्रों को समकालिक (synchronize) करना है, ताकि एक मतदाता एक ही दिन अथवा एक निर्धारित संयुक्त समयावधि में अपने सांसद (MP) तथा विधायक (MLA) दोनों के लिये मतदान कर सके।
  • भारत में एक साथ चुनावों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: भारत में एक साथ चुनावों की अवधारणा प्रारंभिक प्रशासनिक समन्वय से लेकर राजनीतिक विखंडन और तत्पश्चात संवैधानिक पुनर्स्थापन के समकालीन प्रयासों तक की एक सतत् प्रक्रिया को दर्शाती है।
    • यह कोई नवीन विचार नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक रूप से स्थापित प्रथा है, जिसे वर्तमान में पुनः संस्थागत रूप प्रदान करने का प्रयास किया जा रहा है।
  • प्राकृतिक समकालिकता का चरण (1951–1967): एक साथ चुनाव की व्यवस्था भारत में प्रारंभिक दशकों में सफलतापूर्वक लागू रही। संविधान के अंगीकरण के पश्चात् 1951 से 1967 के मध्य लोकसभा एवं सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित किये गए।
    • 1951-52 के प्रथम आम चुनावों ने इस परंपरा की आधारशिला रखी, जो क्रमशः 1957, 1962 तथा 1967 के चुनावों में निरंतर बनी रही।
    • हालाँकि, 1968-69 के दौरान अनेक राज्य विधानसभाओं के समयपूर्व विघटन के कारण यह समन्वित चुनावी चक्र बाधित हो गया।
    • इसके पश्चात् चौथी लोकसभा को भी वर्ष 1970 में समय से पूर्व भंग कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप 1971 में पुनः आम चुनाव आयोजित करने पड़े।
  • न्यायिक एवं सुधारवादी पुनर्मूल्यांकन (1980–1990): जैसे-जैसे बार-बार होने वाले चुनावों का लॉजिस्टिक एवं वित्तीय बोझ बढ़ता गया, विभिन्न संस्थागत निकायों ने पुनः एक साथ चुनावों की सिफारिश करना प्रारंभ किया।
    • 1983 का चुनाव आयोग प्रतिवेदन: निर्वाचन आयोग (ECI) ने अपनी प्रथम वार्षिक रिपोर्ट में सुझाव दिया कि एक साथ चुनाव अत्यधिक व्यय तथा प्रशासनिक असुविधाओं को कम कर सकते हैं।
    • 1999 का विधि आयोग (170वीं रिपोर्ट): भारत के विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट ‘चुनावी कानूनों में सुधार’ (1999) में, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी ने की, लोकसभा एवं सभी राज्य विधानसभाओं के लिये एक साथ चुनावों के क्रियान्वयन की सिफारिश की।
    • 21वीं सदी का पुनरुत्थान (2014-वर्तमान): पिछले दशक में यह विमर्श अकादमिक क्षेत्र से आगे बढ़कर राष्ट्रीय विधायी एजेंडे के केंद्र में स्थापित हो गया है।
      • संसदीय स्थायी समिति2015: इस समिति ने रेखांकित किया कि एक साथ चुनाव कराने से लागत कम हो सकती है, आदर्श आचार संहिता के कारण शासन में होने वाली बाधाएँ कम हो सकती हैं और प्रशासनिक बोझ कम हो सकता है।
      • इसमें दलबदल विरोधी कानून और अनुच्छेद 356 पर न्यायिक सुरक्षा उपायों के कारण राजनीतिक स्थिरता में सुधार और संघीय संतुलन को मज़बूत करने का उल्लेख किया गया।
      • समिति ने चरणबद्ध कार्यान्वयन, संवैधानिक/विधिक संशोधन तथा दो-तिहाई बहुमत या रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव जैसी शर्तों के माध्यम से समन्वित चुनावी चक्र स्थापित करने की अनुशंसा की।
      • नीति आयोग का चर्चा पत्र 2017: इसमें संवैधानिक व्यवधान को कम करने के लिये चुनावों के 'चरणबद्ध' समन्वय का प्रस्ताव रखा गया था।
      • विधि आयोग का मसौदा 2018: विधि आयोग ने माना कि एक साथ चुनाव कराने के लिये संवैधानिक और कानूनी संशोधनों की आवश्यकता है तथा इसने लागत में कमी एवं बेहतर शासन जैसे लाभों को रेखांकित करते हुए चरणबद्ध अथवा वैकल्पिक मॉडल प्रस्तावित किये।
        • इसमें स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव, निश्चित अवधि के समायोजन, दलबदल विरोधी उपायों को मज़बूत करने और त्रिशंकु विधानसभाओं से निपटने के तंत्र जैसे सुधारों की भी सिफारिश की गई।
  • कोविंद समिति (2023-2024): राम नाथ कोविंद समिति ने चरणबद्ध तरीके से एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव रखा, जिसके अंतर्गत पहले लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव कराए जाएँ तथा उसके पश्चात 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकायों के चुनाव संपन्न किये जाएँ।
    • इसने निश्चित कार्यकाल (समयपूर्व विघटन की स्थिति में भी), सामान्य मतदाता सूची, तथा निर्वाचन आयोग द्वारा अग्रिम रसद योजना सहित विधिक एवं संवैधानिक तंत्रों की स्थापना का सुझाव दिया, जिससे सुचारू क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सके।
      • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आधिकारिक तौर पर इन सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है और संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक चुनावी चक्र को पुनः 1951–1967 की स्थिति में लाने का प्रमुख आधार बन गया है।

संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक, 2024 - मुख्य प्रावधान

  • एक साथ होने वाले चुनावों की परिभाषा: लोकसभा एवं सभी राज्य विधानसभाओं के लिये एक साथ आयोजित सामान्य चुनाव।
  • समकालिक कार्यकाल (अनुच्छेद 82A): राष्ट्रपति लोकसभा की प्रथम बैठक की तिथि को ‘नियुक्त तिथि’ (appointed date) घोषित करेंगे।
    • इस तिथि के बाद चुनी गई सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल छोटा कर दिया जाएगा या इस तरह समायोजित किया जाएगा कि वह उस लोकसभा के पाँच वर्षीय कार्यकाल के साथ ही समाप्त हो जाए।
  • मध्यावधि विघटन का प्रबंधन (अनुच्छेद 83 एवं 172): यदि लोकसभा या विधानसभा समयपूर्व भंग होती है, तो नए चुनाव केवल शेष कार्यकाल (unexpired term) के लिये होंगे।
    • उदाहरणार्थ, यदि कोई सरकार तीन वर्ष के पश्चात गिर जाती है, तो नवगठित सरकार केवल शेष दो वर्षों तक ही कार्य करेगी, जिससे राष्ट्रीय चुनावी चक्र के साथ सामंजस्य बना रहे।
  • निर्वाचन आयोग का विवेकाधिकार: यदि किसी राज्य में लोकसभा के साथ चुनाव संभव न हो, तो निर्वाचन आयोग राष्ट्रपति को चुनाव स्थगित करने की सिफारिश कर सकता है।
    • हालाँकि, ऐसी स्थिति में भी संबंधित विधानसभा का कार्यकाल वर्तमान लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही समाप्त होगा, जिससे समकालिकता का सिद्धांत अक्षुण्ण बना रहे।
  • बहिष्कृत निकाय: प्रारंभिक चरण में, इस विधेयक के अंतर्गत नगरपालिका एवं स्थानीय निकाय चुनावों को सम्मिलित नहीं किया गया है, ताकि राज्य विधानसभाओं के आधे सदस्यों की तत्काल स्वीकृति जैसी जटिल संवैधानिक आवश्यकताओं से बचा जा सके।

केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 - मुख्य प्रावधान

यह एक ‘परिणामी (consequential) विधेयक’ है, जिसका उद्देश्य विधानसभाओं वाले केंद्रशासित प्रदेशों को भी समकालिक चुनावी चक्र में सम्मिलित करना है।

  • प्रयोज्यता: यह दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर के लिये प्रासंगिक कानूनों में संशोधन करता है।
  • संरेखण: यह सुनिश्चित करता है कि केंद्रशासित प्रदेश की विधानसभाओं का कार्यकाल भी लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही समाप्त हो और समय से पहले विघटन की स्थिति में 'अपूर्णीकृत कार्यकाल' के समान नियम लागू हों।

भारत में एक साथ चुनाव कराने के प्रमुख लाभ क्या हैं? 

  • प्रशासनिक दक्षता और कार्मिक अनुकूलन: अलग-अलग समय पर बार-बार होने वाले चुनावों के कारण राज्य तंत्र पर अत्यधिक लॉजिस्टिक बोझ पड़ता है, जिससे लाखों सरकारी कर्मचारी अपने मूल सार्वजनिक सेवा दायित्वों से विचलित हो जाते हैं।
    • चुनावी चक्र के समकालिक करने से इस व्यापक तैनाती को सुदृढ़ एवं अनुकूलित किया जा सकता है, जिससे प्रशासनिक गतिरोध में उल्लेखनीय कमी आती है तथा लोक सेवकों के उत्पादक कार्य-दिवसों की पुनर्स्थापना संभव होती है।
    • हाल ही में प्रकाशित 2026 EAC-PM कार्यपत्र के अनुसार, ONOE के क्रियान्वयन से मतदान कर्मियों की तैनाती में लगभग 28% की कमी आएगी, जिससे विशेष रूप से सरकारी शिक्षकों के लिये लगभग 1.04 करोड़ कार्मिक-दिवसों की बचत होगी।
  • शासन-नीति गतिरोध में कमी: आचार संहिता (MCC) के बार-बार लागू होने से पूंजीगत व्यय में अवरोध, सार्वजनिक खरीद में विलंब तथा विकासात्मक योजनाओं के क्रियान्वयन में ठहराव उत्पन्न होता है, जिससे शासन की निरंतरता बाधित होती है।
    • एकीकृत चुनावी समयावधि यह सुनिश्चित करती है कि कार्यपालिका को लोकलुभावन अल्पकालिक दबावों से मुक्त होकर दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन हेतु पर्याप्त अवसर प्राप्त हों।
    • इस प्रकार, ONOE द्वारा MCC-प्रेरित नीतिगत व्यवधान को सीमित अवधि तक नियंत्रित कर, राष्ट्रीय GDP वृद्धि एवं अवसंरचना परियोजनाओं की पूर्णता दर को संरक्षित किया जा सकता है।
  • राजकोषीय विवेक एवं व्यय युक्तिकरण: केंद्र एवं राज्यों द्वारा पृथक-पृथक चुनावों के आयोजन से लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा परिवहन तथा प्रशासनिक तैनाती में दोहराव के कारण राजकोषीय बोझ अत्यधिक बढ़ जाता है।
    • चुनावी चक्र के सुव्यवस्थित समन्वय से सार्वजनिक व्यय का युक्तिकरण संभव है, जिससे करदाताओं के हजारों करोड़ रुपये की बचत कर उसे पूंजीगत परिसंपत्तियों एवं सामाजिक अवसंरचना के विकास की ओर पुनर्निर्देशित किया जा सकता है।
  • आंतरिक सुरक्षा एवं CAPF का अनुकूलन: निरंतर चुनावी चक्र के कारण केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) को  बार-बार पूरे देश में तैनात करना पड़ता है, जिससे वे सीमावर्ती क्षेत्रों एवं आतंकवाद-रोधी अभियानों से हट जाते हैं।
    • समकालिक चुनावी ढाँचा इस तैनाती को एक एकीकृत एवं सुव्यवस्थित लॉजिस्टिक अभ्यास में परिवर्तित करता है, जिससे आंतरिक सुरक्षा तंत्र की परिचालन तत्परता एवं भौतिक सुरक्षा सुदृढ़ होती है।
    • वर्तमान में चरणबद्ध मतदान हेतु राज्यों में लाखों CAPF कर्मियों का आवागमन किया जाता है; ONOE इस प्रक्रिया को अनुकूलित कर वामपंथी उग्रवाद (LWE) प्रभावित क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले संभावित सुरक्षा शून्यता को रोकने में सहायक सिद्ध होगा।
  • लोकतांत्रिक सहभागिता में वृद्धि: भारत की खंडित चुनावी समयरेखा व्यापक मतदाता थकान का कारण बनती है, क्योंकि नागरिकों और प्रवासी श्रमिकों को कम समय अंतराल के भीतर सरकार के विभिन्न स्तरों के लिये बार-बार यात्रा करने और मतदान करने की आवश्यकता होती है।
    •  चुनावी चक्रों के समन्वयन से मतदान एक एकल, उच्च-प्रभाव वाली प्रक्रिया में परिवर्तित होता है, जिससे विभिन्न जनसांख्यिकीय समूहों में मतदान प्रतिशत अधिक सुसंगत और उच्च रहने की संभावना बढ़ती है। 
    • अनुभवजन्य साक्ष्य दर्शाते हैं कि ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में समकालिक चुनावों के दौरान अपेक्षाकृत अधिक मतदान दर्ज किया गया है।
  • राजनीतिक स्थिरता और लोकलुभावन प्रवृत्तियों में कमी: बार-बार होने वाले चुनाव सरकारों को अल्पकालिक लोकलुभावन नीतियों की ओर प्रेरित करते हैं, जिससे दीर्घकालिक सुधार बाधित होते हैं।
    • एकीकृत चुनावी ढाँचा इस निरंतर राजनीतिक दबाव को कम करता है और शासन को दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों पर केंद्रित रहने का अवसर प्रदान करता है। 
    • इससे नीतिगत स्थिरता को बढ़ावा मिलता है और शासन की गुणवत्ता में सुधार होता है, जैसा कि 1999 की विधि आयोग की रिपोर्ट (170वीं रिपोर्ट) में बताया गया है।
  • आर्थिक स्थिरता और निवेश वातावरण में सुधार: निरंतर चुनावी प्रक्रिया से उत्पन्न नीतिगत अनिश्चितता निवेश निर्णयों को प्रभावित करती है और व्यावसायिक विश्वास को कमज़ोर करती है। 
    • एक साथ चुनावों से एक पूर्वानुमेय नीतिगत परिवेश निर्मित होता है, जो निवेशकों के विश्वास को सुदृढ़ करता है तथा दीर्घकालिक आर्थिक नियोजन को प्रोत्साहित करता है।
    • नीति आयोग (2017) तथा विभिन्न उद्योग संगठनों की रिपोर्टों ने चुनावी स्थिरता एवं आर्थिक विकास के बीच इस संबंध को स्पष्ट किया है।

भारत में एक साथ चुनाव कराने के संभावित दुष्प्रभाव क्या हैं?

  • संघवाद का क्षय तथा क्षेत्रीय उपेक्षा: एक समन्वित चुनावी चक्र भारत के असममित संघवाद के लिये खतरा उत्पन्न करता है, क्योंकि यह संरचनात्मक रूप से स्थानीय एवं राज्य-विशिष्ट मुद्दों को प्रमुख राष्ट्रीय विमर्श के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये बाध्य करता है।
    • यह राजनीतिक विमर्श का मानकीकरण (homogenization) करता है, जिससे वे क्षेत्रीय दल कमज़ोर होते हैं जिनके पास अखिल-भारतीय, राष्ट्रपति-शैली के मीडिया अभियानों का सामना करने हेतु पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं।
    • हालिया अध्ययनों से यह भी संकेत मिलता है कि जब चुनाव एक साथ कराए जाते हैं, तो मतदाताओं द्वारा राज्य एवं केंद्र दोनों में एक ही राजनीतिक दल को चुनने की संभावना बढ़ जाती है।
  • संवैधानिक जटिलताएँ और मध्यावधि अस्थिरता: चुनावी समकालिकता को बनाए रखने के लिये विधायी कार्यकाल का कृत्रिम समायोजन संसदीय लोकतंत्र के मूल संवैधानिक तंत्र के साथ टकराव उत्पन्न करता है। 
    • विशेषकर त्रिशंकु विधानसभाओं या अविश्वास प्रस्तावों की स्थिति में, नवगठित सरकारों को केवल शेष कार्यकाल तक सीमित रखना दीर्घकालिक नीति-निर्माण को बाधित करता है तथा शासन को स्वभावतः अस्थिर बनाता है।
  • लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का संभावित क्षरण: बार-बार होने वाले चरणबद्ध चुनाव एक सतत लोकतांत्रिक प्रत्युत्तर तंत्र (feedback loop) के रूप में कार्य करते हैं, जिससे सत्तारूढ़ कार्यपालिका को जनता की तात्कालिक सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के प्रति उत्तरदायी बने रहना पड़ता है।
    • इस सतत मूल्यांकन तंत्र के समाप्त होने से राजनीतिक कार्यपालिका को लगभग निर्बाध पाँच वर्षीय जनादेश प्राप्त हो जाता है, जिससे उनकी तात्कालिक संवेदनशीलता में कमी आ सकती है।
    • वर्ष 2021 में विवादास्पद कृषि कानूनों की वापसी को आलोचकों ने आसन्न चरणबद्ध विधानसभा चुनावों के दबाव के प्रति कार्यपालिका की त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में विश्लेषित किया।
  • प्रारंभिक अवसंरचना पर उच्च पूंजीगत दबाव: यद्यपि दीर्घकाल में संचालन लागत में कमी संभावित है, तथापि एक साथ चुनावों के क्रियान्वयन हेतु भारत की चुनावी अवसंरचना में व्यापक उन्नयन के लिये अत्यधिक अग्रिम पूंजी निवेश आवश्यक होगा। 
    • निर्वाचन तंत्र को प्रत्येक मतदान केंद्र पर एक साथ दोहरी मशीन मतदान प्रणाली को लागू करने के लिये अपनी विनिर्माण, सुरक्षा और भंडारण क्षमताओं का व्यापक रूप से विस्तार करना होगा। 
    • अनुमानों के अनुसार, इस व्यवस्था के लिये 30 लाख से अधिक नई ईवीएम की आवश्यकता होगी, जो प्रारंभिक व्यय को अत्यधिक बढ़ा देता है।
  • स्थानीय निकायों के समन्वय में संस्थागत जटिलताएँ: लोकसभा एवं राज्य विधानसभा चुनावों के पश्चात सीमित समय-सीमा में पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव कराने का प्रस्ताव विकेंद्रीकृत शासन ढांचे पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। 
    • मतदाता सूचियों का अद्यतन, परिसीमन संबंधी विवादों का समाधान तथा लगभग दस लाख वार्डों में चुनावी प्रबंधन, प्रशासनिक क्षमता की सीमाओं को चुनौती देता है और इससे प्रणालीगत अक्षमताएँ उत्पन्न होने की आशंका रहती है।
  • चुनावी वित्त का संभावित एकाधिकार: एकीकृत राष्ट्रीय चुनावी चक्र स्वाभाविक रूप से चुनावी वित्तपोषण को केंद्रीकृत कर देता है, जिससे वित्तीय रूप से सशक्त राष्ट्रीय दलों को लाभ मिलता है तथा क्षेत्रीय दलों को स्थानीय दाताओं के समर्थन से वंचित होना पड़ता है।
    • यह वित्तीय असमानता प्रमुख राष्ट्रीय दलों को डिजिटल विज्ञापन, बिग डेटा विश्लेषण तथा मीडिया प्रसारण पर प्रभुत्व स्थापित करने में सक्षम बनाती है, जिससे जमीनी स्तर के राजनीतिक आंदोलनों के लिये प्रवेश बाधा अत्यधिक बढ़ जाती है।
    • हालिया चुनावी बॉण्ड एवं चुनावी व्यय संबंधी आँकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय दलों को कॉर्पोरेट वित्तपोषण का अधिकांश हिस्सा प्राप्त होता है और एकीकृत चुनावी अभियान इस लाभ को और अधिक बढ़ा सकता है।

भारत को एक साथ चुनावों की व्यवस्था लागू करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?

  • रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव का संस्थानीकरण: समन्वित चुनावी चक्रों के असमय विघटन को रोकने हेतु ‘रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव’ की अवधारणा को अपनाना आवश्यक है। 
    • इस संवैधानिक तंत्र के अंतर्गत, वर्तमान सरकार को हटाने का प्रस्ताव तभी वैध माना जाएगा जब सदन समानांतर रूप से पूर्ण बहुमत के साथ उत्तराधिकारी सरकार का निर्वाचन भी सुनिश्चित करे। 
    • विश्वास मत के 'नकारात्मक' मत से 'सकारात्मक' मत में परिवर्तन करके, विधायिका संस्थागत निरंतरता सुनिश्चित करती है और 'शासनिक शून्यता' या बार-बार होने वाले मध्यावधि विघटन को रोकती है, जिसने ऐतिहासिक रूप से 1968 और 1970 के बीच समन्वित चुनावी लय को बाधित किया था।
  • शेष कार्यकाल शासन का कानूनी संहिताकरण: प्रस्तावित अनुच्छेद 82A और अनुच्छेद 83 और 172 में संशोधन को 'मध्य-अवधि' विधानसभाओं के जनादेश को परिभाषित करने वाले एक स्पष्ट वैधानिक तंत्र द्वारा पूरक किया जाना चाहिये।
    • यदि किसी सदन का पूर्व विघटन होता है, तो नव-निर्वाचित सदन को केवल मूल चक्र की शेष अवधि तक ही कार्य करना चाहिये। 
    • यह ‘शेष कार्यकाल’ तंत्र राजनीतिक अवसरवाद और दल-बदल की प्रवृत्तियों को सीमित करता है, क्योंकि संक्षिप्त कार्यकाल अल्पकालिक सत्ता-लाभ के प्रोत्साहनों को कम कर देता है और चुनावी चक्र को स्थिर बनाए रखता है।
  • एकीकृत एवं स्थायी चुनावी अवसंरचना का निर्माण: मात्र उपकरणों की खरीद से आगे बढ़ते हुए, भारत को एक समेकित, उच्च-प्रौद्योगिकी चुनावी अवसंरचना विकसित करनी होगी, जिसमें ईवीएम–वीवीपैट प्रबंधन, सामान्य मतदाता सूची तथा उन्नत भंडारण एवं लॉजिस्टिक नेटवर्क शामिल हों। 
    • इसके लिये भारत का निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोगों के आँकड़ों का संपूर्ण समन्वय आवश्यक है। क्षेत्रीय लॉजिस्टिक केंद्रों की स्थापना से संसाधनों के बार-बार परिवहन की आवश्यकता कम होगी और चुनावी प्रबंधन को एक अस्थायी ‘अभियान-आधारित’ प्रक्रिया से बदलकर एक सुव्यवस्थित, संस्थागत और सतत प्रणाली में रूपांतरित किया जा सकेगा।
  • चरणबद्ध संक्रमण के माध्यम से समन्वय का क्रियान्वयन: एक साथ चुनावों को अचानक लागू करने के स्थान पर, सरकार को एक द्वि-चरणीय संक्रमणकालीन रणनीति अपनानी चाहिये, जिसमें लोकसभा चुनावों के निकट कार्यकाल समाप्त करने वाले राज्यों को स्वैच्छिक आधार पर पहले शामिल किया जाए। 
    • सीमित अवधि के लिये कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल का विस्तार तथा अन्य का कम करते हुए यह ‘टेलीस्कोपिंग’ दृष्टिकोण प्रशासनिक तंत्र का क्रमिक परीक्षण करता है। 
    • यह प्रक्रिया वर्तमान जनादेश का सम्मान करते हुए सभी राज्यों को धीरे-धीरे एक एकीकृत ‘निर्धारित तिथि’ की ओर अभिसारित करती है।
  • संघीय बहुलवाद की रक्षा हेतु ‘विभाजित मतपत्र’ जागरूकता: राष्ट्रीय मुद्दों के प्रभुत्व से क्षेत्रीय विमर्श के क्षरण को रोकने के लिये निर्वाचन तंत्र को ‘विभाजित मतपत्र’ की अवधारणा पर केंद्रित व्यापक संवैधानिक साक्षरता अभियान संचालित करना चाहिये। 
    • इसके अंतर्गत रंग-कोडित ईवीएम, पृथक मतदान कक्ष तथा राज्य एवं केंद्र के लिये अलग मतदान प्रक्रियाएँ अपनाई जा सकती हैं, जिससे मतदाता स्थानीय एवं राष्ट्रीय मुद्दों के बीच स्पष्ट संज्ञानात्मक भेद स्थापित कर सकें। इस प्रकार प्रशासनिक समन्वय, राजनीतिक विविधता के क्षरण में परिवर्तित नहीं होता।
  • ‘राज्यों की परिषद’ परामर्श तंत्र का संस्थानीकरण: संघीय संरचना पर संभावित प्रभावों को ध्यान में रखते हुए, एक स्थायी अंतरराज्यीय चुनाव परिषद (ISEC) की स्थापना आवश्यक है। 
    • यह मंच क्षेत्रीय दलों को चुनावी वित्त, मीडिया प्रतिनिधित्व तथा संरचनात्मक असमानताओं से संबंधित चिंताओं को अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करेगा। 
    • इस प्रकार, चुनावी समन्वय की प्रक्रिया कार्यपालिका-प्रधान निर्णय न रहकर सहकारी संघवाद पर आधारित, परामर्शात्मक और समावेशी ढाँचे में विकसित हो सकेगी।

निष्कर्ष: 

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की दिशा में संक्रमण भारत की चुनावी व्यवस्था में एक गहन संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देता है, जिसका उद्देश्य निरंतर चुनावी चक्र से उत्पन्न व्यवधानों को समाप्त कर स्थिर, शासन-केंद्रित नीति ढाँचा स्थापित करना है। यद्यपि यह पहल राजकोषीय बचत और नीतिगत गतिरोध में कमी की संभावनाएँ प्रस्तुत करती है, फिर भी इसकी सफलता संघीय स्वायत्तता और संवैधानिक कठोरता के संवेदनशील संतुलन को बनाए रखने पर निर्भर करती है। अतः समन्वित चुनावी कैलेंडर को केवल एक प्रशासनिक या रसद-आधारित सुधार के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की दीर्घकालिक संस्थागत सुदृढ़ता और स्थायित्व को सुनिश्चित करने वाले व्यापक परिवर्तन के रूप में परिकल्पित किया जाना चाहिये।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

भारत में एक साथ चुनावों की अवधारणा नवीन नहीं, बल्कि पूर्व प्रचलित लोकतांत्रिक व्यवस्था का पुनर्स्थापन है। इस संदर्भ में, चुनावी चक्रों के पृथक्करण के ऐतिहासिक कारणों तथा उनके पुनः समन्वयन के समकालीन औचित्य का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. ONOE में 'नियुक्त तिथि' क्या है?
यह आम चुनाव के बाद निर्धारित एक तारीख होती है जिसका उपयोग सभी राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को कानूनी रूप से पुनर्स्थापित और संरेखित करने के लिये किया जाता है।

2. क्या ONOE को संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता है?
हाँ, विशेष रूप से अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करना, जिसके लिये संभवतः संसद में दो-तिहाई बहुमत और राज्य की पुष्टि की आवश्यकता होगी।

3. यदि किसी राज्य सरकार का कार्यकाल मध्य में ही समाप्त हो जाए तो क्या होगा?
राज्य को राष्ट्रीय चक्र के साथ तालमेल बनाए रखने के लिये नए चुनाव केवल 'शेष कार्यकाल' के लिये ही आयोजित किए जाएंगे।

4. ONOE आदर्श आचार संहिता (MCC) को किस प्रकार प्रभावित करता है?
यह MCC अवधि को प्रत्येक पाँच वर्ष में एक ही समय सीमा में समेकित करता है, जिससे विकास परियोजनाओं में बार-बार होने वाले अवरोधों को रोका जा सके।

5. कोविंद समिति की मुख्य सिफारिश क्या थी?
दो चरणों में कार्यान्वयन: पहले लोकसभा और विधानसभाओं का समन्वय, उसके बाद 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये- (2020) 

  1. भारत के संविधान के अनुसार, कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो मतदान के लिये योग्य है, किसी राज्य में छह माह के लिये मंत्री बनाया जा सकता है तब भी, जब कि वह उस राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है। 
  2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो दांडिक अपराध के अंतर्गत दोषी पाया गया है और जिसे पाँच वर्ष के लिये कारावास का दंड दिया गया है, चुनाव लड़ने के लिये स्थायी तौर पर निरर्हत हो जाता है, भले ही वह कारावास से मुक्त हो चुका हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर : (a)


प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017) 

  1. भारत का निर्वाचन आयोग पाँच-सदस्यीय निकाय है।
  2. संघ का गृह मंत्रालय, आम चुनाव और उप-चुनावों दोनों के लिए चुनाव कार्यक्रम तय करता है।
  3. निर्वाचन आयोग मान्यता-प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवाद निपटाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 2 और 3

(d) केवल 3

उत्तर: (d) 


मेन्स

प्रश्न 1. “लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के एक ही समय में चुनाव, चुनाव प्रचार की अवधि और व्यय को तो सीमित कर देंगे, परंतु ऐसा करने से लोगों के प्रति सरकार की जवाबदेही कम हो जाएगी।” चर्चा कीजिये। (2017)

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