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बाल संरक्षण मामलों में सज़ा का निलंबन
- 31 Dec 2025
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सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने वर्ष 2017 के उन्नाव बलात्कार मामले में उत्तर प्रदेश के उन्नाव से एक पूर्व विधायक को जमानत देते हुए आजीवन कारावास की सज़ा निलंबित करने संबंधी दिल्ली उच्च न्यायालय (HC) के आदेश पर रोक लगा दी। इस निर्णय ने सज़ा निलंबन और POCSO अधिनियम, 2012 की व्याख्या से जुड़े अहम प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
इस मामले से संबंधित मुख्य तथ्य क्या हैं?
- पृष्ठभूमि: इस मामले में विधायक को एक नाबालिग के साथ बलात्कार के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सज़ा दी गई। साथ ही पीड़िता के पिता की हिरासत में हुई मृत्यु के मामले में भी उसे दोषी ठहराया गया।
- सजा निलंबन का कानूनी ढाँचा: भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 430 के तहत कोई दोषसिद्ध व्यक्ति सज़ा के निलंबन की मांग कर सकता है। हालाँकि गंभीर अपराधों या आजीवन कारावास के मामलों में सज़ा का निलंबन सामान्य नियम नहीं, बल्कि एक अपवाद है।
- यह एक विवेकाधीन न्यायिक शक्ति है और यह सिर्फ़ सज़ा को निलंबित करती है, अपराध साबित होने के फैसले को नहीं।
- ज़मानत देने हेतु दिल्ली उच्च न्यायालय का तर्क: दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुख्य रूप से इस आधार पर सज़ा निलंबित की कि एक विधायक भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 21 के अंतर्गत “लोक सेवक” नहीं है, और इसलिये POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 5(c) के तहत गंभीर (एग्रेवेटेड) अपराध प्रथम दृष्टया सिद्ध नहीं होता।
- न्यायालय ने उसके 7 वर्ष से अधिक के कारावास को भी ध्यान में रखा। काश्मीरा सिंह बनाम पंजाब राज्य (1977) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि यदि बाद में दोषसिद्धि या सजा में संशोधन हो जाए, तो अत्यधिक लंबी कैद अन्याय का कारण बन सकती है।
- सज़ा निलंबन पर न्यायिक मिसालें:
- भगवान राम शिंदे गोसाई बनाम गुजरात राज्य (1999): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अपील के दौरान निश्चित अवधि की सज़ा का निलंबन उदारतापूर्वक (Liberally) किया जाना चाहिये।
- इसके विपरीत गंभीर अपराधों जैसे आजीवन कारावास के मामलों में, जैसा कि शिवानी त्यागी मामले (2024) में दोहराया गया, सज़ा का निलंबन दुर्लभ होता है और इसके लिये अपराध की प्रकृति, गंभीरता और उसे करने के तरीके का निष्पक्ष मूल्यांकन ज़रूरी होता है।
- छोटेलाल यादव बनाम झारखंड राज्य (2025): आजीवन कारावास के मामलों में सज़ा का निलंबन केवल तब ही न्यायसंगत माना जाएगा जब निचली अदालत के निर्णय में स्पष्ट या गंभीर त्रुटि हो, जो संभावित बरी होने की संभावना को दर्शाती हो।
- जामना लाल बनाम राजस्थान राज्य (2025): सर्वोच्च न्यायालय ने 20 वर्ष की POCSO सज़ा का निलंबन रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि निचली अदालत का यह निष्कर्ष कि पीड़िता नाबालिग थी, सज़ा निलंबन के दौरान हल्के में चुनौती नहीं दिया जा सकता और इसे पुनः जाँचा या पलटा नहीं जाना चाहिये।
- भगवान राम शिंदे गोसाई बनाम गुजरात राज्य (1999): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अपील के दौरान निश्चित अवधि की सज़ा का निलंबन उदारतापूर्वक (Liberally) किया जाना चाहिये।
- दिल्ली उच्च न्यायालय की विवादास्पद व्याख्या: दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक संकीर्ण व्याख्या अपनाई, जिसमें “लोक सेवक” की परिभाषा (IPC के अनुसार, जिसमें न्यायाधीश, सैन्य अधिकारी और मध्यस्थ शामिल हैं, लेकिन विधायक बाहर हैं) पर निर्भर किया गया।
- यह दृष्टिकोण निचली अदालत की व्यापक व्याख्या से अलग था, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत “लोक सेवक” को किसी भी ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है जो सार्वजनिक कर्तव्य निभाता हो। यह अंतर महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसे अपराधों पर बढ़ी हुई सज़ा लगती है।
- केवल भारतीय दंड संहिता (IPC) ही “लोक सेवक” की परिभाषा देती है। POCSO अधिनियम, 2012 में “लोक सेवक” की कोई परिभाषा नहीं है।
- सर्वोच्च न्यायालय का POCSO अधिनियम, 2012 की व्याख्या पर रुख: एटॉर्नी जनरल फॉर इंडिया बनाम सतीश (2021) जैसे फैसलों (जिसमें केवल “स्किन-टू-स्किन” संपर्क न होने पर इसे “शारीरिक संपर्क” नहीं माना जाएगा जैसी संकीर्ण व्याख्या को खारिज किया गया) और स्वतंत्र विचार बनाम भारत संघ (2017) (नाबालिग पत्नी के बलात्कार के लिये वैवाहिक अपवाद को सीमित कर पढ़ा गया) से स्पष्ट होता है कि बाल संरक्षण कानूनों की व्याख्या संकीर्ण या शाब्दिक नहीं बल्कि उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिये।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय का स्थगन/स्टे यह रेखांकित करता है कि जघन्य अपराधों के लिये आजीवन कारावास का निलंबन दुर्लभ होना चाहिये, इसके लिये स्पष्ट त्रुटि का उच्च मानक आवश्यक है, और POCSO जैसे बाल संरक्षण कानूनों की व्याख्या उनके विधान उद्देश्य को पूरा करने हेतु शाब्दिक नहीं बल्कि उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिये।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. सज़ा निलंबित करने में न्यायिक विवेक को दोषी के अधिकारों और अपराध की गंभीरता तथा सामाजिक हित के बीच संतुलन बनाना चाहिये। टिप्पणी कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. अपील के दौरान सज़ा को निलंबित करने की अनुमति कौन-सा कानूनी प्रावधान देता है?
BNS, 2023 की धारा 430 (पहले CrPC की धारा 389) के तहत, अपीलीय अदालत के पास सज़ा के क्रियान्वयन को निलंबित करने और अपील लंबित रहने तक ज़मानत देने का विवेकाधीन अधिकार है।
2. POCSO अधिनियम, 2012 की व्याख्या करने में SC का क्या नज़रिया है?
सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों की सुरक्षा के लिये एक उद्देश्यपूर्ण व्याख्या को आवश्यक बताया है, जिसमें संकीर्ण या शाब्दिक व्याख्या से बचा जाता है, जैसा कि अटॉर्नी जनरल बनाम सतीश (2021) और स्वतंत्र विचार (2017) मामलों में देखा गया है।
3. भारत में सज़ा निलंबित करने में किन मार्गदर्शक का सहारा लिया जाता है?
मुख्य न्यायिक मिसालों में भगवान राम शिंदे गोसाई (1999), शिवानी त्यागी (2024), छोटेलाल यादव (2025) और जामना लाल (2025) शामिल हैं, जिन्होंने अपीलीय विवेकाधिकार तथा तथ्यात्मक निष्कर्षों की सुरक्षा के लिये शर्तें निर्धारित की हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत के संविधान में शोषण के विरुद्ध अधिकार द्वारा निम्नलिखित में से कौन-से परिकल्पित हैं? (2017)
- मानव देह व्यापार और बंधुआ मज़दूरी (बेगारी) का निषेध
- अस्पृश्यता का उन्मूलन
- अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा
- कारखानों और खदानों में बच्चों के नियोजन का निषेध
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1, 2 और 4
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 1 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. राष्ट्रीय बाल नीति के मुख्य प्रावधानों का परीक्षण कीजिये तथा इसके कार्यान्वयन की स्थिति पर प्रकाश डालिये। (2016)