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स्टेट ऑफ क्लाइमेट सर्विसेज़ रिपोर्ट- 2021: WMO

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  • 08 Oct 2021
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये: 

विश्व मौसम विज्ञान संगठन, जल दिवस, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष’ (यूनिसेफ)

मेन्स के लिये:

जल दुर्लभता से संबंधित चुनौतियाँ और इससे निपटने के उपाय

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ (WMO) ने ‘स्टेट ऑफ क्लाइमेट सर्विसेज़ रिपोर्ट-2021’ जारी की है। यह स्थलीय जल संग्रहण पर केंद्रित है।

  • इससे पूर्व ‘जल दिवस’ (22 मार्च) के अवसर पर ‘संयुक्त राष्ट्र बाल कोष’ (यूनिसेफ) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि दुनिया भर में पाँच में से एक बच्चा उच्च या अत्यधिक जल भेद्यता वाले क्षेत्रों में रहता है।

प्रमुख बिंदु

  • स्थलीय जल संग्रहण (TWS):
    • ‘स्थलीय जल संग्रहण’ (TWS) का आशय भूमि की सतह और उप-सतह पर मौजूद जल से है, जिसमें सतही जल, मिट्टी की नमी, बर्फ और भूजल शामिल है।
      • जल मानव विकास के लिये एक महत्त्वपूर्ण कारक है लेकिन पृथ्वी पर मौजूद केवल 0.5% जल ही उपयोग योग्य है।
    • दुनिया भर में जल संसाधन मानव और प्राकृतिक रूप से प्रेरित तनावों के कारण अत्यधिक दबाव में हैं।
      • इनमें जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और पीने योग्य जल की घटती उपलब्धता शामिल है।
    • चरम मौसम की घटनाएँ भी संसाधनों पर दबाव हेतु उत्तरदायी हैं।
  • वैश्विक परिदृश्य
    • ‘स्थलीय जल संग्रहण’ में बीते 20 वर्षों (2002-2021) में प्रतिवर्ष 1 सेमी. की दर से गिरावट आ रही है।
    • सबसे अधिक नुकसान अंटार्कटिक और ग्रीनलैंड में हुआ है। लेकिन कई अत्यधिक आबादी वाले देशों में भी ‘स्थलीय जल संग्रहण’ में गिरावट दर्ज की गई है।
  • भारतीय परिदृश्य:
    • परिचय:
      • भारत में ‘स्थलीय जल संग्रहण’ में प्रतिवर्ष कम-से-कम 3 सेमी. की दर से गिरावट आ रही है। कुछ क्षेत्रों में गिरावट की दर प्रतिवर्ष 4 सेमी. से भी अधिक है।
      • यदि अंटार्कटिक और ग्रीनलैंड में जल भंडारण के नुकसान को छोड़ दिया जाए, तो भारत ने स्थलीय जल भंडारण में सबसे अधिक नुकसान दर्ज किया है।
      • भारत 'स्थलीय जल संग्रहण नुकसान के मामले में सबसे बड़ा हॉटस्पॉट' है। भारत के उत्तरी हिस्से में देश के भीतर सबसे अधिक नुकसान हुआ है।
    • प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता:
      • भारत में जनसंख्या में वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घट रही है।
      • औसत वार्षिक प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता वर्ष 2011 में घटकर 1,545 क्यूबिक मीटर हो गई थी, जो वर्ष 2001 में 1,816 क्यूबिक मीटर थी।
      • केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2031 तक यह घटकर 1,367 क्यूबिक मीटर तक पहुँच जाएगा।
    • नदी घाटियाँ:
      • ‘फाल्कनमार्क वाटर स्ट्रेस इंडिकेटर’ के अनुसार, भारत में 21 नदी घाटियों में से पाँच 'पूर्णतः जल की दुर्लभता' (500 क्यूबिक मीटर से कम प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता) की स्थिति से जूझ रही हैं।
      • पाँच 'जल की दुर्लभता’ (1,000 क्यूबिक मीटर से कम प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता) और तीन 'जल तनाव’ (प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1,700 क्यूबिक मीटर से कम) की स्थिति में हैं।
      • 'स्टेट ऑफ इंडियाज़ एन्वायरनमेंट-2020’ रिपोर्ट की मानें तो वर्ष 2050 तक छह नदी घाटियाँ 'पूर्णतः जल की दुर्लभता' की स्थिति में होंगी, वहीं छह में ‘जल की दुर्लभता’ और चार में ‘जल तनाव’ की स्थिति होगी।
        • जल दुर्लभता की स्थित का आकलन करने हेतु ‘फाल्कनमार्क संकेतक’ सबसे व्यापक रूप से उपयोग किये जाने वाले संकेतकों में से एक है। यह एक देश में पीने योग्य जल के कुल संसाधनों को कुल आबादी से जोड़ता है और उस दबाव को प्रदर्शित करता है, जिसे जनसंख्या प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र की आवश्यकताओं समेत जल संसाधनों पर डालती है।
  • सिफारिशें:
    • निवेश की आवश्यकता:
      • विशेष रूप से छोटे विकासशील द्वीपीय देश (Small Island Developing States-SIDS) और कम विकसित देशों (Least Developed Countries- LDC) में जल क्षेत्र में तनाव को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने के समाधान के रूप में एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (Integrated Resources Water Management- IWRM)।
      • अफ्रीका में सूखा और एशिया में बाढ़ की चेतावनी सहित जोखिम वाले LDC में एंड-टू-एंड सूखा एवं बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली।
    • क्षमता अंतराल को भरना:
      • बुनियादी जलविज्ञान चरों के लिये डेटा एकत्र करने में उस क्षमता अंतराल को भरना जो जलवायु सेवाओं और पूर्व चेतावनी प्रणालियों को रेखांकित करते हैं।
      • जल क्षेत्र में विशेष रूप से SIDS के मामले में यह जलवायु सेवाओं हेतु क्षमता अंतराल को भरने में सहायक होगा।
    • बातचीत में सुधार:
      • जल क्षेत्र में अनुकूलन का बेहतर समर्थन करने के लिये सूचना उपयोगकर्त्ताओं के साथ जलवायु सेवाओं के सह-विकास और संचालन हेतु राष्ट्रीय स्तर के हितधारकों के बीच बातचीत में सुधार करना।
      • सामाजिक-आर्थिक लाभों की बेहतर निगरानी और मूल्यांकन की भी अत्यधिक आवश्यकता है, जो सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रदर्शित करने में मदद करेगा।
    • जल और जलवायु गठबंधन में शामिल:
      • जल और जलवायु गठबंधन अपने सदस्यों के लिये संयुक्त गतिविधियों में भागीदारी करने और डेटा व सूचना पर ध्यान देने के साथ जल एवं जलवायु चुनौतियों के अंतराल को संबोधित करने वाले समाधानों को लागू करने का एक मंच है।

संबंधित सरकारी पहलें:

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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