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पश्चिमी हिमालय में कम हिमपात

  • 20 Jan 2026
  • 100 min read

प्रिलिम्स के लिये: हिमालय, पश्चिमी जेट स्ट्रीम, पश्चिमी विक्षोभ, भूमध्य सागर, नेशनल मिशन ऑन सस्टेनिंग हिमालयन ईकोसिस्टम

मेन्स के लिये: पश्चिमी विक्षोभ और भारतीय शीतकालीन जलवायु, हिमालयी क्रायोस्फीयर पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, भारत में हिमपात की परिवर्तनशीलता और जल सुरक्षा

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों? 

इस वर्ष पश्चिमी हिमालय के व्यापक क्षेत्र असामान्य रूप से शुष्क तथा हिमरहित शीत ऋतु का सामना कर रहे हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर में दिसंबर–जनवरी अवधि के दौरान वर्षा में गंभीर कमी दर्ज की गई है, जिससे जलवायु परिवर्तनशीलता, जल सुरक्षा, कृषि तथा वनाग्नि से संबंधित गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हो रही हैं।

सारांश 

  • यह कमज़ोर और आर्द्रता की कमी वाले पश्चिमी विक्षोभों, परिवर्तित जेट स्ट्रीम पैटर्न और बढ़ते शीतकालीन तापमान के कारण होता है, इससे हिम के टिके रहने की अवधि घटती है हालाँकि कई बार वर्षण हिमपात के बजाय वर्षा के रूप में देखने को मिलती है।
  • यह जल सुरक्षा, रबी फसल, ग्लेशियर स्वास्थ्य, वन स्थिरता और हिमालयी आजीविकाओं के लिये खतरा उत्पन्न करता है, जो जलवायु-अनुकूल नीतियों और क्षेत्र-विशिष्ट हस्तक्षेपों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

पश्चिमी हिमालय में हिमपात की कमी के कारण क्या हैं?

  • कमज़ोर और आर्द्रता की कमी वाले पश्चिमी विक्षोभ (WD): पश्चिमी हिमालय में शीतकाल के हिमपात का प्राथमिक स्रोत पश्चिमी विक्षोभ हैं। 
    • हाल की सर्दियों में, वर्ष 2025–26 भी इसमें शामिल है, अधिकांश विक्षोभ कमज़ोर रहे हैं, जिनमें सीमित आर्द्रता देखने को मिली। उथले निम्न दाब तंत्रों के कारण इन विक्षोभों का ऊर्ध्वाधर उत्थान कम हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप अल्पकालिक वर्षण परिघटनाएँ और खराब हिमसंचय हुआ है।
    • पश्चिमी विक्षोभों में कमज़ोर परिसंचरण ने विक्षोभ के ठहरने के समय को कम कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप मेघ निर्माण और संघनन सीमित हो गया और इस प्रकार पश्चिमी हिमालय पर हिमपात और वर्षा कम हुई।
  • पश्चिमी विक्षोभों के प्रक्षेपवक्र में परिवर्तन: विभिन्न पश्चिमी विक्षोभ उच्च अक्षांशों पर उत्तर की ओर बढ़े हैं। 
    • इस विचलन के परिणामस्वरूप कश्मीर के कुछ भागों में सीमित हिमपात हुआ, जबकि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड काफी हद तक शुष्क रहे, जिससे शीतकालीन वर्षा का समग्र प्रसार कम हो गया।
  • आर्द्रतायुक्त पवनों के साथ कमज़ोर अंतःक्रिया: सामान्य रूप से पश्चिमी विक्षोभ बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली आर्द्रतायुक्त पवनों के साथ अंतःक्रिया करते हैं। 
    • हाल के वर्षों में पवनों का यह सम्मिलन कमज़ोर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप हिमालयी क्षेत्र में मेघ निर्माण कम होने के साथ हिमपात में उल्लेखनीय कमी देखी गई है।
  • उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम में परिवर्तन: उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम पश्चिमी विक्षोभों को भारतीय उपमहाद्वीप की ओर निर्देशित करती है। 
    • हाल ही में इसके कमज़ोर होने और स्थिति में परिवर्तन के कारण मौसमी तंत्र भारत से पृथक् हो गए या स्थल पर पहुँचने से पूर्व उनकी तीव्रता कमज़ोर हुई, जिससे हिमपात में विलंब और कमी देखने को मिली।
  • दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तनशीलता: वैश्विक तापन के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में शीतकालीन तापमान में वृद्धि हुई है, जिससे हिमसीमा की तुंगता में भी वृद्धि देखने को मिली है। 
    • परिणामस्वरूप, वह वर्षा जो पहले हिम के रूप में गिरती थी, अब विशेष रूप से निम्न और मध्य ऊँचाई वाले क्षेत्रों में वर्षा के रूप में होने लगी है।
    • पिछले एक दशक में बार-बार शुष्क शीत का होना एक व्यापक जलवायु परिवर्तन का संकेत है। अध्ययनों से पता चलता है कि उत्तर भारत के कुछ भागों में शीतकालीन वर्षा में सीमांत लेकिन निरंतर कमी आ रही है, जो एक बार की विसंगति के बजाय बढ़ती जलवायु परिवर्तनशीलता को दर्शाता है।

पश्चिमी विक्षोभ (WD) 

  • पश्चिमी विक्षोभ (WD) बड़े पैमाने पर पूर्व की ओर बढ़ने वाली वर्षा-वाहक पवन प्रणालियाँ अथवा अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय मौसम प्रणालियाँ हैं, जिनका उद्गम भूमध्य सागर, काला सागर और कैस्पियन सागर के क्षेत्र में होता है।
  • ये पश्चिमी जेट स्ट्रीम में अंतर्निहित निम्न-दाब प्रणालियाँ होती हैं। शीतऋतु के दौरान जेट स्ट्रीम इन्हें पूर्व दिशा में भारतीय उपमहाद्वीप की ओर निर्देशित करती है। पश्चिम एशिया, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होकर गुज़रते समय ये प्रणालियाँ नमी का संचय करती हैं।
    • अंततः जब ये हिमालयी अवरोध से टकराती हैं, तो वायु ऊर्ध्वगामी होने के लिये बाध्य होती है, शीतलन एवं संघनन की प्रक्रिया से गुज़रती है, जिसके परिणामस्वरूप मैदानी क्षेत्रों में वर्षा तथा ऊँचे क्षेत्रों में हिमपात होता है।
    • इस पश्चिम से पूर्व दिशा में होने वाली गति के कारण सामान्यतः सबसे पहले कश्मीर में हिमपात होता है, इसके बाद हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में तथा कभी-कभी नेपाल व  पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भी इसका प्रभाव देखा जाता है।

हिमालयी क्षेत्रों में विलंबित या हिमरहित शीतऋतु के निहितार्थ क्या हैं?

  • जल संरक्षण हेतु जोखिम: हिमालय में होने वाला हिमपात एक प्राकृतिक जल भंडार के रूप में कार्य करता है, जो हिमगलन (Snowmelt) के माध्यम से धीरे-धीरे जल का निर्वहन करता है; हिमपात में कमी या विलंब से दीर्घकालिक जल उपलब्धता और नदी प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
    • हिमनद के निवर्तन (ग्लेशियल रिट्रीट) से हिमनदों का द्रव्यमान संतुलन प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है तथा हिमनदों के तीव्र पिघलाव को बढ़ावा मिलता है। इससे गंगा, यमुना और सिंधु जैसी हिमालयी नदियों की दीर्घकालिक स्थिरता को जोखिम उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप ग्रीष्मऋतु के दौरान जल उपलब्धता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। इसका दुष्प्रभाव न केवल पर्वतीय क्षेत्रों पर, बल्कि निचले मैदानी इलाकों पर भी पड़ता है।
  • कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव: शीतकालीन वर्षा और प्रारंभिक हिमपात गेहूँ एवं सरसों जैसी रबी फसलों के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं।
    • प्रारंभिक हिमपात से नमी धीरे-धीरे मृदा में समाहित होती है, जिससे फसलों की वृद्धि को समर्थन मिलता है। 
    • विलंबित हिमपात उच्च दिनकालीन तापमान के कारण शीघ्र पिघल जाता है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि को सीमित लाभ ही प्राप्त होता है।
  • वनाग्नि के जोखिम में वृद्धि: हिमपात की अनुपस्थिति से वन भूमि में नमी कम हो जाती है, जिससे वन आग के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
    • शुष्क शीतऋतु ने हिमालय में वनाग्नि के प्रति संवेदनशीलता बढ़ा दी है, जो पहले से ही वैली ऑफ फ्लावर्स रेंज और नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान जैसे क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई दे रही है; इसके परिणामस्वरूप पारिस्थितिक क्षति होती है और आपदा प्रबंधन प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
  • पारिस्थितिक और जैव विविधता पर तनाव: हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र पौधों की निष्क्रिय अवस्था और वन्यजीवों के जीवन के लिये पूर्वानुमानित हिमपात चक्रों पर निर्भर करता है।
    • हिमरहित शीतऋतु इन चक्रों को बाधित करती है, जिससे अल्पाइन जैव विविधता को जोखिम होता है और संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र अस्थिर हो जाते हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक परिणाम: हिमपात की कमी हिमालयी राज्यों में शीतकालीन पर्यटन, बागवानी और स्थानीय आजीविका को प्रभावित करती है।
    • हिमनद और बर्फ की कमी से सेब की खेती और पर्यटन आधारित आय प्रभावित होती है, जिससे स्थानीय समुदायों के लिये आर्थिक अनिश्चितता बढ़ जाती है।

हिमालय में हिमपात की कमी को दूर करने हेतु भारत क्या कदम उठा सकता है?

  • हिम और मौसम निगरानी को सुदृढ़ करना: उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा उच्च-ऊँचाई वाले स्वचालित मौसम स्टेशनों का विस्तार करना।
    • उपग्रह आधारित बर्फ निगरानी (INSAT, Cartosat) को एकीकृत करना ताकि पश्चिमी विक्षोभ की भविष्यवाणी और बर्फबारी की भविष्यवाणी में सुधार हो सके।
  • कृत्रिम हिमनद और हिम संचयन: लद्दाख में वर्ष 2025 अंतर्राष्ट्रीय हिमनद संरक्षण वर्ष के तहत शुरू किये गए कृत्रिम हिमनद और आइस-स्टूपा परियोजनाओं का विस्तार करना, ताकि शीतकालीन जल को संगृहीत किया जा सके तथा वसंत ऋतु में इसका मुक्त प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके, जिससे प्राकृतिक हिमपात की कमी को संतुलित किया जा सके।
  • जलागम और झरना/कैचमेंट और स्प्रिंग पुनरुद्धार: हिमालयी राज्यों में NITI आयोग द्वारा समर्थित कार्यक्रमों के तहत स्प्रिंगशेड प्रबंधन को सुदृढ़ करना, ताकि भूजल को पुनःभरा जा सके, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ हिमगलन में कमी से पेयजल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं।
    • सिक्किम में सफलतापूर्वक लागू किये गए ‘धारा विकास’ मॉडल का प्रयोग उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में झरना पुनरुद्धार के लिये उदाहरण के तौर पर किया जा सकता है।
    • नेशनल मिशन ऑन सस्टेनिंग हिमालयन ईकोसिस्टम (NMSHE) के तहत हिमनदों की निगरानी को सुदृढ़ करना और इसके निष्कर्षों को गंगा और यमुना जैसी नदियों के बेसिन स्तर के नियोजन में समेकित करना।
  • जलवायु-सहिष्णु रबी कृषि: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के माध्यम से अल्पकालिक और सूखा-सहिष्णु गेहूँ एवं सरसों की किस्मों को बढ़ावा देना तथा सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार करना, ताकि अनिश्चित शीतकालीन वर्षा पर निर्भरता कम की जा सके।
  • वनाग्नि रोकथाम: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा-निर्देशों के तहत नंदा देवी बायोस्फीयर रिज़र्व जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पूर्व-चेतावनी प्रणाली, आग रोकने वाली लाइनें और सामुदायिक फायर ब्रिगेड को सुदृढ़ करना।
  • सतत शीतकालीन पर्यटन: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों को बर्फ-आधारित गतिविधियों से आगे बढ़कर पर्यटन का विविधीकरण करना चाहिये। इसके तहत शीतकालीन सांस्कृतिक पर्यटन, वेलनेस पर्यटन तथा नियंत्रित ईको-ट्रेक्स को बढ़ावा दिया जा सकता है, जिससे विलंबित हिमपात के कारण होने वाले आर्थिक झटकों को कम किया जा सके।
  • नीति में हिमपात परिवर्तनशीलता को मुख्यधारा में लाना: हिमालयी राज्यों की जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्ययोजनाओं (SAPCCs) और आपदा प्रबंधन योजनाओं में हिमपात में देरी तथा बर्फ के टिकाव में कमी जैसे कारकों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

पश्चिमी हिमालय में हिमपात की कमी क्षेत्रीय जलवायु व्यवहार में संरचनात्मक बदलावों को दर्शाती है, विशेष रूप से पश्चिमी विक्षोभों (WDs) की प्रभावशीलता में कमी को। इसके प्रभाव जल सुरक्षा, कृषि, आपदा जोखिम और पारिस्थितिक स्थिरता तक फैले हुए हैं, जिससे यह भारत के लिये एक प्रभावी शासन तथा जलवायु अनुकूलन चुनौती बन जाता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  पश्चिमी हिमालय में हिमपात की कमी अब केवल एक अल्पकालिक असामान्यता नहीं रही, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन का एक स्पष्ट संकेत बन चुकी है। विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. पश्चिमी विक्षोभ क्या हैं और वे भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर क्षेत्र से उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय मौसम तंत्र हैं, जो उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत को महत्त्वपूर्ण शीतकालीन वर्षा तथा हिमपात प्रदान करते हैं।

2. पश्चिमी हिमालय में बर्फबारी की कमी क्यों बढ़ रही है?
कमज़ोर और नमी में कमी वाले पश्चिमी विक्षोभ, जेट स्ट्रीम के पैटर्न में बदलाव, बढ़ता हुआ तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमपात का कम समय तक बने रहना इसके मुख्य कारण हैं।

3. कम बर्फबारी भारत की जल सुरक्षा को कैसे प्रभावित करती है?
कम हिमपात हिमनदों के पुनर्भरण और हिम पिघलने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है, जिससे गंगा, यमुना तथा सिंधु जैसी नदियों के दीर्घकालिक प्रवाह को खतरा उत्पन्न होता है।

4. हिमालय में बर्फबारी की कमी का संबंध वनाग्नि से क्यों है?
हिमपात में कमी से वन तल की नमी कम हो जाती है, जिससे वनाग्नि की संवेदनशीलता बढ़ती है, जैसा कि वैली ऑफ फ्लावर्स और नंदा देवी नेशनल पार्क जैसे क्षेत्रों में देखा गया है।


UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2020)

                    शिखर                            पर्वत

  1. नामचा बरवा   -     गढ़वाल हिमालय
  2.   नंदा देवी      -       कुमाऊँ हिमालय
  3.   नोकरेक       -       सिक्किम हिमालय

उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) केवल 3

उत्तर: (B)


प्रश्न 2. यदि आप हिमालय से होकर यात्रा करते हैं, तो आपको वहाँ निम्नलिखित में से किस पादप/किन पादपों को प्राकृतिक रूप में उगते हुए दिखने की संभावना है? (2014)

  1. ओक  
  2. रोडोडेंड्रोन  
  3. चंदन

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)


प्रश्न 3. जब आप हिमालय की यात्रा करेंगे, तो आप निम्नलिखित को देखेंगे: (2012)

  1. गहरे खड्ड
  2.  U धुमाव वाले नदी-मार्ग
  3.  समानांतर पर्वत श्रेणियाँ
  4.  भूस्खलन के लिये उत्तरदायी तीव्र ढाल प्रवणता

उपर्युक्त में से कौन-से हिमालय के तरुण वलित पर्वत (नवीन मोड़दार पर्वत) के साक्ष्य कहे जा सकते हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 4
(c) केवल 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (d)


मेन्स

प्रश्न 1. हिमालयी क्षेत्र तथा पश्चिमी घाटों में भूस्खलन के विभिन्न कारणों का अंतर स्पष्ट कीजिये। (2021)

प्रश्न 2. हिमालय के हिमनदों के पिघलने का भारत के जल-संसाधनों पर किस प्रकार दूरगामी प्रभाव होगा? (2020)

प्रश्न 3. “हिमालय भूस्खलनों के प्रति अत्यधिक प्रवण है।” कारणों की विवेचना कीजिये तथा अल्पीकरण के उपयुक्त उपाय सुझाइये। (2016)

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