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छात्रों के लिये अन्नपूर्णा दूध योजना शिक्षकों की एक नई ज़िम्मेदारी

  • 04 Jul 2018
  • 4 min read

चर्चा में क्यों?

छात्रों को पोषण प्रदान करने वाली राजस्थान सरकार की अन्नपूर्णा दूध योजना शिक्षकों के लिये अतिरिक्त बोझ का कारण बन गई है। राज्य संचालित स्कूलों में पढ़ रहे 62 लाख बच्चों को एक सप्ताह में तीन बार दूध की आपूर्ति के लिये यह फ्लैगशिप योजना शिक्षकों पर अतिरिक्त भार डालेगी|

राज्य की मुख्यमंत्री बसुंधरा राजे ने 2 जुलाई को दहमीकलाँ के राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय में जयपुर के विभिन्न स्कूलों से आए बच्चों को अपने हाथों से गर्म दूध पिलाकर इस योजना की पूरे प्रदेश में शुरुआत की। यह योजना सरकार द्वारा शुरू की गई सबसे बड़ी योजनाओं में से एक मानी जा रही है।

योजना का उद्देश्य

  • अन्नपूर्णा दूध योजना का उद्देश्य राज्य की खुशहाली और स्वस्थ भविष्य की आधारशिला तैयार करना है| 
  • योजना के तहत सरकारी स्कूलों में प्रत्येक बच्चे को सप्ताह में तीन दिन ताजा, शुद्ध और पौष्टिक गर्म दूध दिया जाएगा। यह बच्चों के बीच पोषण स्तर में सुधार लाएगा और स्कूलों में नामांकन बढ़ाने में मदद करेगा| 

महिला सहकारी समितियाँ

  • महिला दूध उत्पादकों की सहकारी समितियों को स्कूलों में दूध की आपूर्ति की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है|
  • इससे दूध की अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित हो सकेगी क्योंकि माँ अपने बच्चों के लिये दूध की गुणवत्ता पर समझौता नहीं कर सकती|

62 लाख छात्रों को लाभ

  • इस योजना को  218 करोड़ रुपए के बजट आवंटन के साथ लागू किया जाएगा जिसके अंतर्गत  66,506 सरकारी स्कूलों में लगभग 62 लाख छात्रों को मध्याह्न भोजन योजना के एक हिस्से के रूप में गर्म दूध प्रदान किया जाएगा।
  • कक्षा V तक के छात्र प्रति सप्ताह तीन बार 150 मिलीलीटर गर्म दूध प्राप्त करेंगे, जबकि VI से VIII तक की कक्षाओं  में पढ़ रहे छात्रों को 200 मिलीलीटर दूध प्राप्त होगा।
  • सरकारी स्कूलों के शिक्षक सहकारी समितियों से दूध की खरीदारी करेंगे और छात्रों को वितरित करेंगे।
  • दूध चीनी के बिना दिया जाएगा क्योंकि इसके लिये कोई अतिरिक्त बजट आवंटित नहीं किया गया है। शिक्षकों को दूध का भंडारण और उबालने का अतिरिक्त काम सौंपा जाएगा। यह शिक्षा के मानकों को प्रभावित करेगा और छात्रों के स्कूल छोड़ने का कारण बन सकता है|

जल्दी खराब होने वाली वस्तु 

  • चूँकि दूध जल्द ख़राब होने वाली वस्तु है और स्कूलों में पर्याप्त बुनियादी ढाँचे का अभाव है  इसलिये शिक्षक इस अतिरिक्त ज़िम्मेदारी को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं होंगे।
  • ऐसा माना जा रहा है कि यह योजना वास्तव में शिक्षा के निजीकरण को प्रोत्साहित करेगी|
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