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बाल यौन शोषण

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  • 22 Oct 2021
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

बाल यौन शोषण : भारतीय परिदृश्य  

मेन्स के लिये:

बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार : कारण एवं विश्लेषण

चर्चा में क्यों?

हाल ही में वी प्रोटेक्ट ग्लोबल अलायंस द्वारा जारी रिपोर्ट ‘ग्लोबल थ्रेट असेसमेंट 2021’ से पता चलता है कि कोविड -19 ने बाल यौन शोषण और ऑनलाइन दुर्व्यवहार में महत्वपूर्ण वृद्धि में योगदान दिया था।

  • रिपोर्ट बाल यौन शोषण और ऑनलाइन दुर्व्यवहार के पैमाने और दायरे को रेखांकित करती है साथ ही इस मुद्दे पर वैश्विक प्रतिक्रिया का एक सिंहावलोकन भी करती है।
  • वी प्रोटेक्ट ग्लोबल अलायंस (WeProtect Global Alliance) 200 से अधिक सरकारों, निजी क्षेत्र की कंपनियों और नागरिक समाज संगठनों का एक वैश्विक मूवमेंट है, जो बाल यौन शोषण और ऑनलाइन दुर्व्यवहार के खिलाफ वैश्विक प्रतिक्रिया को बदलने के लिये एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

ऑनलाइन यौन शोषण से प्रभावित लोगों का प्रतिशत

प्रमुख बिंदु

  • रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ: 
    • विगत दो वर्षों में बाल यौन शोषण और ऑनलाइन दुर्व्यवहार की रिपोर्टिंग अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है।
      • कोविड-19 के चलते विश्व भर में ऐसी स्थितियाँ बनीं जिन्होंने बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार को और अधिक बढ़ाने का कार्य किया।
    • इंटरनेट वॉच फाउंडेशन के अनुसार, बच्चों द्वारा 'स्व-निर्मित' यौन सामग्री में वृद्धि एक और चिंताजनक प्रवृत्ति है।
    • ट्रांसजेंडर/गैर-बाइनरी, LGBQ+ और/या विकलांगों को बाल्यावस्था के दौरान ऑनलाइन यौन दुर्व्यहार का अनुभव होने की अधिक संभावना थी।
    • भारतीय परिदृश्य:
      • महामारी के दौरान, नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रेन (NCMEC) ने अपनी वैश्विक साइबर टिपलाइन में संदिग्ध बाल यौन शोषण की रिपोर्ट में 106 प्रतिशत की वृद्धि का संकेत दिया। 
      • इसके अलावा भारत में कोविड -19 लॉकडाउन के दौरान, बाल यौन शोषण सामग्री की सर्च में 95% की वृद्धि हुई थी।
  • बाल यौन शोषण से संबंधित समस्याएँ:
    • बहुस्तरीय समस्या: बाल यौन शोषण एक बहुस्तरीय समस्या है जो बच्चों की शारीरिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, कल्याण और व्यवहार संबंधी पहलुओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।
    • डिजिटल प्रौद्योगिकियों के कारण प्रवर्द्धन: मोबाइल और डिजिटल प्रौद्योगिकियों ने बाल शोषण तथा दुर्व्यवहार को और अधिक बढ़ा दिया है। साइबर बुलिंग, उत्पीड़न और चाइल्ड पोर्नोग्राफी जैसे बाल शोषण के नए रूप भी सामने आए हैं।
    • अप्रभावी विधान: हालाँकि भारत सरकार ने यौन अपराधों के खिलाफ बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012 (पॉक्सो अधिनियम) अधिनियमित किया है, लेकिन यह बच्चे को यौन शोषण से संरक्षित करने में विफल रही है। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:
      • दोषसिद्धि की निम्न दर: POCSO अधिनियम के तहत दोषसिद्धि की दर केवल 32% है जिसमे विगत 5 वर्षों के दौरान औसतन लंबित मामलों का प्रतिशत 90% है।
      • न्यायिक विलंब: कठुआ बलात्कार मामले में मुख्य आरोपी को दोषी ठहराए जाने में 16 महीने लग गए जबकि पॉक्सो अधिनियम में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि पूरी सुनवाई और दोषसिद्धि की प्रक्रिया एक वर्ष में पूरी की जानी चाहिये।
      • बच्चे के प्रति मित्रता का अभाव: बच्चे की आयु-निर्धारण से संबंधित चुनौतियाँ। विशेष रूप से ऐसे कानून जो वास्तविक उम्र पर ध्यान केंद्रित करते हैं न कि मानसिक उम्र पर।

आगे की राह

  • व्यापक ढाँचा: रिपोर्ट बच्चों के लिये सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण बनाने तथा बच्चों को सुरक्षित रखने की भूमिका हेतु एक साथ काम करने के अलावा, दुर्व्यवहार के खिलाफ रोकथाम गतिविधियों को प्राथमिकता देने का आह्वान करती है।
  • बहु हितधारक दृष्टिकोण: कानूनी ढाँचे, नीतियों, राष्ट्रीय रणनीतियों और मानकों के बेहतर कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये माता-पिता, स्कूलों, समुदायों, NGO भागीदारों तथा स्थानीय सरकारों के साथ-साथ पुलिस व वकीलों को शामिल करने हेतु एक व्यापक आउटरीच प्रणाली विकसित किये जाने की अभी आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू

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