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कोरोना वेरिएंट का नामकरण और वर्गीकरण

  • 04 May 2021
  • 10 min read

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा बताया गया है कि देश के 18 विभिन्न राज्यों में कोरोना वायरस के कई अन्य स्ट्रेन या वेरिएंट ऑफ कंसर्न (Variants of Concern- VOCs) के अलावा एक नए डबल म्युटेंट वेरिएंट (Double Mutant Variant) का पता चला है।

प्रमुख बिंदु: 

वायरस वेरिएंट: 

  • वायरस के वेरिएंट में एक या एक से अधिक उत्परिवर्तन (Mutations) होते हैं जो इसे अन्य प्रचलित वेरिएंट से अलग करता है। अधिकांश उत्परिवर्तन वायरस के लिये हानिकारक साबित होते हैं तो कुछ उत्परिवर्तन वायरस के लिये फायदेमंद साबित होते हैं जो इसे जीवित रहने के लिये आसान बनाते हैं।
  • SARS-CoV-2 (कोरोना) वायरस तेज़ी से विकसित हो रहा है जिस कारण यह वैश्विक स्तर पर लोगों को संक्रमित कर रहा है। वायरस के परिसंचरण या प्रसार के उच्च स्तर का मतलब है कि वायरस में उत्परिवर्तन की आसान एवं तीव्र दर विद्यमान है जिस कारण इसमें अपनी संख्या को दुगना करने की क्षमता पाई जाती है।
  • मूल महामारी वायरस (फाउंडर वेरिएंट ) Wu.Hu.1 था जिसे वुहान वायरस कहा गया। कुछ महीनों में इसका D614G वेरिएंट सामने उभरकर आया और विश्व स्तर पर प्रसारित हो गया।

Mutating-coronavirus

वर्गीकरण:

    • रोग नियंत्रण और रोकथाम हेतु अमेरिकी केंद्र (CDC) द्वारा वेरिएंट को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
    • वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट (VOI):
      • यह एक विशिष्ट ‘जेनेटिक मार्करों’ (Genetic Markers) वाला वेरिएंट है जो ‘रिसेप्टर बाइंडिंग’ में परिवर्तन करने, पूर्व में हुए संक्रमण या टीकाकरण के दौरान उत्पन्न एंटीबॉडी द्वारा संक्रमण के प्रभाव को कम करने, नैदानिक प्रभाव तथा संभावित उपचार को कम करने या संक्रमण को प्रसारित करने या बीमारी की गंभीरता में वृद्धि करने से संबंधित है। 
      •  VOI  का एक उदाहरण वायरस का B.1.617 वेरिएंट है, जिसमें दो उत्परिवर्तन होते हैं, जिन्हें E484Q तथा L452R कहा जाता है। 
        • विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization- WHO) द्वारा इस वेरिएंट  को ‘वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट’ (VOI) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
      • कई कोरोना वायरस वेरिएंट में ये दोनो उत्परिवर्तन अलग-अलग पाए जाते हैं, लेकिन भारत में पहली बार इन दोनों को एक साथ देखा गया है।
    •  वेरिएंट ऑफ कंसर्न  (VOC):
      • वायरस के इस वेरिएंट के परिणामस्वरूप संक्रामकता में वृद्धि, अधिक गंभीर बीमारी (जैसे- अस्पताल में भर्ती या मृत्यु हो जाना), पिछले संक्रमण या टीकाकरण के दौरान उत्पन्न एंटीबॉडी में महत्त्वपूर्ण कमी, उपचार या टीके की प्रभावशीलता में कमी या नैदानिक उपचार की विफलता देखने को मिलती है।
      • B.1.1.7 (यूके वेरिएंट), B.1.351 (दक्षिण अफ्रीका वेरिएंट), P.1 (ब्राज़ील वेरिएंट), B.1.427 और अमेरिका में मिलने वाले B.1.429 वेरिएंट को VOC के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
    • अधिक गंभीर वेरिएंट:
      • अधिक गंभीर वेरिएंट से इस बात की पुष्टि होती हैं कि रोकथाम के उपाय या मेडिकल प्रतिउपायों ने पहले से प्रचलित वेरिएंट की सापेक्ष प्रभावशीलता को काफी कम कर दिया है।
      • अब तक,  CDC को अमेरिका में ‘अधिक गंभीर वेरिएंट’ के प्रसार के प्रमाण नहीं मिले हैं।

    वेरिएंट अंडर इन्वेस्टिगेशन (VUI):

    • पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड (Public Health England- PHE) का कहना है कि अगर SARS-CoV-2 के वेरिएंट में महामारी, प्रतिरक्षा या रोगजनक गुण पाए जाते हैं तो इसकी औपचारिक जाँच (Formal Investigation) की जा सकती है।
    • इस कार्य के लिये B.1.617 वेरिएंट को VUI के रूप में नामित किया गया है।

    नामकरण:

    • फायलोजेनेटिक असाइनमेंट ऑफ ग्लोबल आउटब्रेक लीनिएजेज़ (PANGOLIN):
      • इसे SARS-CoV-2 लीनिएजेज़ की वंशावली के नामकरण को लागू करने हेतु  विकसित किया गया था, जिसे ‘पेंगो’ नामकरण (Pango Nomenclature) के  रूप में जाना जाता है।
      • इसमें जीनोमिक निगरानी के एक अमूल्य उपकरण के रूप में आनुवंशिकता के आधार पर पदानुक्रमित प्रणाली का उपयोग किया जाता है। 
      • इसमें अक्षर (ABCP) का उपयोग किया जाता है जो  1 नंबर से शुरू होते हैं। महामारी के ‘वेरिएंट लीनिएजेज़’ (Variant lineages) भिन्न भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पाए जाते हैं। लीनिएजेज़ ‘बी’ सबसे अधिक वृद्धि करने वाला   लीनिएज है।

    विभिन्न वेरिएंटस से संबंधित चिंताएँ: 

    • प्रसार  में वृद्धि: 
      • भारत सहित कई देशों ने वेरिएंट के प्रसार के कारण महामारी संचरण की नई लहरों को और अधिक तीव्र कर दिया है।
    • बढ़ता खतरा: 
      • घातकता या गंभीरता (गंभीर/जानलेवा बीमारी पैदा करने की प्रवृत्ति) के संदर्भ में इसका यूके वेरिएंट अधिक खतरनाक है। दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील के वेरिएंट्स अधिक घातक नहीं हैं।
    • प्रतिरक्षा में कमी: 
      • वेरिएंटस से संबंधित तीसरी चिंता टीकाकरण में प्रयोग होने वाले D614G वेरिएंट से बने एंटीजन के उपयोग को लेकर है जिसका उपयोग वर्तमान में उपयोग होने वाले अधिकांश टीकों पर लागू होता है।
      • टीकों के प्रभाव का निम्न स्तर दक्षिण अफ्रीकी और उससे कम ब्राज़ील वेरिएंट में देखने को मिला है। इसलिये पूर्व में हुए D614G टीकाकरण के बावजूद पुन: संक्रमण होने का खतरा बना हुआ है।
      • वर्तमान में टीके की प्रभावकारिता तीन चरणों के परीक्षणों में निर्धारित की गई इनकी क्षमता से कम हो सकती है क्योंकि VOC प्रसार तब व्यापक रूप से नहीं था।
        • परंतु mRNA टीकों में विभिन्न कारणों से व्यापक प्रतिरक्षा विद्यमान है, और वे इन दो वेरिएंट के खिलाफ बेहतर सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम हैं।

    संभावित समाधान:

    • स्वीडन स्थिति कारोलिंस्का संस्थान द्वारा एक नए वैरिएंट ‘रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन’ (RBD) पेप्टाइड का उपयोग करके एक एंटीजन विकसित किया गया है,।
      • एक RBD वायरस का छोटा इम्यूनोजेनिक अंश या टुकड़ा (Immunogenic Fragment) होता है जो मेजबान कोशिकाओं (Host Cells) में प्रवेश पाने हेतु  एक विशिष्ट अंतर्जात ‘रिसेप्टर अनुक्रम’ (Endogenous Receptor Sequence) से बंधा होता है।
      • सहायक पदार्थ वह है जो एक एंटीजन की उपस्थिति हेतु प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया को तीव्र कर देता है।
    • इसके परिणामस्वरूप न केवल ‘बूस्टर रिस्पांस’ तीव्र होता है बल्कि यह व्यापक भी होता है, इसमें नए वेरिएंट भी शामिल होते हैं। अलग-अलग वैक्सीन के कारण इसे 'हेटेरो बूस्टिंग' (Hetero Boosting) दृष्टिकोण कहा गया है। 

    आगे की राह: 

    • जीवित रहने तथा आर्थिक विकास को बनाए रखने हेतु महामारी ने जैव चिकित्सा अनुसंधान और क्षमता निर्माण के महत्त्व पर लोगों का ध्यान केंद्रित किया है।
    • हमें विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों और जैव प्रौद्योगिकी कंपनियों में व्यापक स्तर पर अनुसंधान को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, जिनमें सभी को समय पर वित्त पोषित, प्रोत्साहित और प्रतिभा को पुरस्कृत किया जाना चाहिये।
    • हालांँकि इस दिशा में कुछ प्रयास शुरू किये गए हैं, उन्हें बड़े पैमाने पर लागू करना होगा, साथ ही भारत को बायोसाइंसेज़ के क्षेत्र में भी भारी निवेश करना चाहिये। 

    स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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