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B.1.617:भारतीय डबल म्यूटेंट स्ट्रेन

  • 12 Apr 2021
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

भारत में महामारी के प्रसार को प्रभावित करने वाले ‘डबल म्यूटेंट’ (Double Mutant) वायरस को औपचारिक रूप से B.1.617 के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

  • उत्परिवर्तन एक जीवित जीव या किसी वायरस के कोशिका के आनुवंशिक पदार्थ (जीनोम) में एक परिवर्तन है जो कम या अधिक रूप से स्थायी होता है और जिसे कोशिका या वायरस के प्रतिरूपों में प्रेषित किया जा सकता है।

प्रमुख बिंदु:

  • डबल म्यूटेंट (B.1.617):
    • इससे पहले ‘जीनोमिक्स पर भारतीय SARS-CoV-2 कंसोर्टियम (INSACOG)' द्वारा वायरस के नमूनों के एक खंड की जीनोम अनुक्रमण प्रक्रिया से दो उत्परिवर्तनों, E484Q और L452R की उपस्थिति का पता चला।
      • हालाँकि ये उत्परिवर्तन व्यक्तिगत रूप से कई देशों में पाए गए हैं, पहली बार भारत में इन दोनों उत्परिवर्तन की उपस्थिति कोरोनोवायरस जीनोम में पाई गई है।
    • भारत में इसके ‘डबल म्यूटेंट’ को वैज्ञानिक रूप से B.1.167 नाम दिया गया है। हालाँकि इसे अभी तक ‘वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न ’के रूप में वर्गीकृत किया जाना है।
    • अब तक केवल तीन वैश्विक ‘वेरिएंट ऑफ कंसर्न’ की पहचान की गई है: यू.के. (B.1.1.7), दक्षिण अफ्रीकी (B.1.351) और ब्राज़ील (P.1)।
    • INSACOG के अनुसार, भारत में कोरोनावायरस रोगियों से प्राप्त जीनोम के नमूने का अनुक्रमण करते हुए B.1.617 के संक्रमण को पहली बार दिसंबर, 2020 में भारत में देखा गया था।
    • वर्तमान में B.1.617 उत्परिवर्तन की विशेषता वाले लगभग 70% जीन अनुक्रम भारत से संबंधित हैं। 
    • इसके बाद यूनाइटेड किंगडम (23%), सिंगापुर (2%) और ऑस्ट्रेलिया (1%) हैं।

 ‘वेरिएंट ऑफ कंसर्न ’:

  • ये ऐसे वेरिएंट हैं, जिनके संबंध में संक्रामकता में वृद्धि तथा अधिक गंभीर बीमारी (अस्पतालों में भर्ती होने वाले मामलों में वृद्धि) पिछले संक्रमण या टीकाकरण के दौरान उत्पन्न एंटीबॉडी द्वारा न्यूनीकरण में कमी, उपचार या टीके की प्रभावशीलता में कमी या नैदानिक ​​पता लगाने में विफलता से संबंधित प्रमाण उपस्थित हैं।
  • म्यूटेंटस से जुड़े मुद्दे:
    • ‘म्यूटेंट वायरस’ कुछ देशों में कोविड-19 मामलों के बड़े स्पाइक्स से जुड़ा हुआ है।
    • यह वायरस को और अधिक संक्रामक होने के साथ-साथ एंटीबॉडी भी बनने में सक्षम बनाता है। 
    • एक अन्य मुद्दा टीके की प्रभावकारिता में कमी से भी जुड़ा है। अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों ने विशेष रूप से फाइज़र, मॉडर्ना और नोवावैक्स द्वारा कुछ वैरिएंट्स में टीकों की कम प्रभावकारिता को दिखाया है। 
      • हालाँकि इसके बावजूद टीके काफी सुरक्षात्मक बने हुए हैं।
  • अन्य उत्परिवर्तन
    • INSACOG के अनुसार, दो उत्परिवर्तन (E484Q और L452R) के अलावा एक तीसरा महत्त्वपूर्ण उत्परिवर्तन, P614R भी है।
    • सभी तीनों उत्परिवर्तन स्पाइक प्रोटीन पर हैं। स्पाइक प्रोटीन वायरस का वह हिस्सा है जिसका उपयोग वह मानव कोशिकाओं में घुसने के लिए करता है।
      • वायरस की स्पाइक प्रोटीन जोखिम को बढ़ा सकती है और वायरस को प्रतिरक्षा प्रणाली से बचने की अनुमति दे सकती है।
  • टी-कोशिका प्रतिरोधी
    • L452R कोरोनवायरस टी-कोशिकाओं के लिये प्रतिरोधी बन सकता है, यह वायरस संक्रमित कोशिकाओं को लक्षित करने और नष्ट करने के लिये आवश्यक कोशिकाओं का एक वर्ग है।
      • टी-कोशिकाएँ एंटीबॉडीज़ से भिन्न होती हैं जो कोरोनोवायरस कणों को अवरुद्ध करने और इसे फैलने से रोकने में उपयोगी होती हैं। 

टी-कोशिकाएँ

  • एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका जो प्रतिरक्षा प्रणाली के लिये महत्त्वपूर्ण है और अनुकूली प्रतिरक्षा के लिये अत्यंत आवश्यक है।
  • ये विशिष्ट रोगजनकों के लिये शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का निर्माण करती हैं। 
  • टी-कोशिकाएँ सैनिकों की तरह व्यवहार करती हैं जो लक्षित हमलावर को खोजकर नष्ट कर देती हैं।

जीनोमिक्स पर भारतीय SARS-CoV-2 कंसोर्टियम

  • INSACOG जीनोमिक विविधता की निगरानी के लिये एक बहु-प्रयोगशाला, बहु-एजेंसी और एक अखिल भारतीय नेटवर्क है।
  • यह समझने में मदद करता है कि वायरस कैसे फैलता और विकसित होता है।
  • जीनोमिक निगरानी,राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर रोगजनक संचरण और विकास पर नज़र रखने के लिये जानकारी का एक समृद्ध स्रोत उत्पन्न कर सकती है।

स्रोत- द हिंदू

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