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अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS)

  • 05 Nov 2021
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा, विधि आयोग, संघ लोक सेवा आयोग, सर्वोच्च न्यायालय

मेन्स के लिये:

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा : लाभ एवं चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार केंद्रीय सिविल सेवाओं की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) को नए सिरे से स्थापित करने की तैयारी कर रही है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • AIJS सभी राज्यों के लिये अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीशों और ज़िला न्यायाधीशों के स्तर पर न्यायाधीशों की भर्ती को केंद्रीकृत करने हेतु एक सुधार है।
    • जिस प्रकार संघ लोक सेवा आयोग केंद्रीय भर्ती प्रक्रिया आयोजित करता है और सफल उम्मीदवारों के संवर्गों का आवंटन करता है, उसी प्रकार से निचली न्यायपालिका के न्यायाधीशों को केंद्रीय रूप से भर्ती करने और राज्यों का आवंटन करने का प्रस्ताव रखता है।
  • विगत प्रस्ताव:
    • AIJS को पहली बार वर्ष 1958 में विधि आयोग की 14वीं रिपोर्ट द्वारा प्रस्तावित किया गया था।
      • न्यायाधीशों की भर्ती और प्रशिक्षण के लिये एक मानक, केंद्रीकृत परीक्षा आयोजित करने के लिये यूपीएससी जैसे वैधानिक या संवैधानिक निकाय पर चर्चा की गई।
    • विधि आयोग की 1978 की रिपोर्ट में इस विचार को फिर से प्रस्तावित किया गया था, जिसमें निचली अदालतों में मामलों की देरी और एरियर पर चर्चा की गई थी।
    • वर्ष 2006 में कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 15वीं रिपोर्ट में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के विचार का समर्थन किया और एक मसौदा विधेयक भी तैयार किया।
  • सर्वोच्च न्यायालय का रुख:
    • वर्ष 1992 में ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन बनाम द यूनियन ऑफ इंडिया में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को AIJS स्थापित करने का निर्देश दिया।
    • वर्ष 1993 में फैसले की समीक्षा की गई, हालाँकि अदालत ने इस मुद्दे पर पहल करने के लिये केंद्र को स्वतंत्र छोड़ दिया
    • वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिया और एक केंद्रीय चयन तंत्र का प्रस्ताव रखा।
      • वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार, जिन्हें अदालत द्वारा न्याय मित्र (अदालत का मित्र) नियुक्त किया गया था, ने सभी राज्यों के लिये एक अवधारणा नोट परिचालित किया जिसमें उन्होंने अलग राज्य परीक्षा के बजाय एक सामान्य परीक्षा आयोजित करने की सिफारिश की।
      • योग्यता सूची के आधार पर उच्च न्यायालय साक्षात्कार के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति करेंगे। दातार ने कहा कि यह संवैधानिक ढाँचे को न तो परिवर्तित करेगा और न ही राज्यों या उच्च न्यायालयों की शक्तियों को प्रभावित करेगा।
  • AIJS के लाभ:
    • कुशल न्यायपालिका: यह राज्यों में अलग-अलग वेतन और पारिश्रमिक जैसे संरचनात्मक मुद्दों का समाधान करने, रिक्तियों को तेज़ी से भरने और राज्यों में मानक प्रशिक्षण सुनिश्चित करने हेतु एक कुशल अधीनस्थ न्यायपालिका सुनिश्चित करेगी।
    • ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस: सरकार ने भारत की ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग में सुधार के अपने प्रयास में निचली न्यायपालिका में सुधार का लक्ष्य रखा है, क्योंकि कुशल विवाद समाधान रैंक निर्धारित करने में प्रमुख सूचकांकों में से एक है।
    • जनसंख्या अनुपात में न्यायाधीशों को नियुक्त करना: एक विधि आयोग की रिपोर्ट (1987) ने सिफारिश की है कि भारत में 10.50 न्यायाधीशों (तत्कालीन) की तुलना में प्रति मिलियन जनसंख्या पर 50 न्यायाधीश होने चाहिये।
      • अब स्वीकृत संख्या के मामले में यह आँकड़ा 20 न्यायाधीशों को पार कर गया है, लेकिन यह अमेरिका या यूके की तुलना में क्रमशः 107 और 51 न्यायाधीश प्रति मिलियन लोगों की तुलना में कुछ भी नहीं है।
    • समाज के सीमांत वर्गों का उच्च प्रतिनिधित्व: सरकार के अनुसार, AIJS समाज में हाशिये पर जीवन यापन कर रहे लोगों और वंचित वर्गों के समान प्रतिनिधित्व के लिये एक आदर्श समाधान है।
    • प्रतिभाशाली समूह को आकर्षित करना: सरकार का मानना है कि अगर ऐसी कोई सेवा स्थापित होती है, तो इससे प्रतिभाशाली लोगों का एक समूह बनाने में मदद मिलेगी जो बाद में उच्च न्यायपालिका का हिस्सा बन सकते हैं।
    • बॉटम-अप अप्रोच: भर्ती में बॉटम-अप अप्रोच निचली न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद जैसे मुद्दों का भी समाधान करेगा।
  • आलोचना:
    • राज्यों की शक्ति का अतिक्रमण: केंद्रीकृत भर्ती प्रक्रिया को संघवाद की भावना के विरुद्ध और संविधान द्वारा प्रदत्त राज्यों की शक्तियों के अतिक्रमण के रूप में देखा जाता है।
    • यह ‘राज्य-विशिष्ट’ को संबोधित नहीं करेगा: कई राज्यों का तर्क है कि केंद्रीय भर्ती प्रक्रिया उन राज्य-विशिष्ट चिंताओं को दूर करने में सक्षम नहीं होगी जो अलग-अलग राज्यों में मौजूद हैं।
      • उदाहरण के लिये भाषा और प्रतिनिधित्व इस संबंध में प्रमुख चिंताएँ हैं।
      • न्यायिक कार्य क्षेत्रीय भाषाओं में संचालित होते हैं, जो केंद्रीय भर्ती से प्रभावित हो सकते हैं।
    • ‘स्थानीय आरक्षण’ के लिये प्रतिकूल: इसके अलावा यह व्यवस्था जाति के आधार पर आरक्षण और राज्य में ग्रामीण उम्मीदवारों या भाषायी अल्पसंख्यकों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
    • ‘शक्तियों के पृथक्करण’ के सिद्धांत के विरुद्ध: ‘शक्तियों के पृथक्करण’ की संवैधानिक अवधारणा के आधार पर भी इसका विरोध किया जा रहा है। एक केंद्रीय परीक्षण, ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका को शक्ति प्रदान करेगा और इस प्रक्रिया में उच्च न्यायालयों का पक्ष कमज़ोर हो सकता है।
    • संरचनात्मक मुद्दों को संबोधित नहीं करेगी: अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) के निर्माण से निचली न्यायपालिका के समक्ष मौजूद संरचनात्मक मुद्दों का समाधान नहीं होगा।
      • वर्ष 1993 के अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ के मामले में राज्यों में एकरूपता लाकर विभिन्न वेतनमानों और पारिश्रमिक के मुद्दे को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संबोधित किया गया है।
      • विशेषज्ञों का तर्क है कि सभी स्तरों पर वेतन बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का एक अंश निचली न्यायपालिका से चुना जाए, गुणवत्तापूर्ण प्रतिभा को आकर्षित करने के लिये केंद्रीय परीक्षा से बेहतर विकल्प हो सकता है।

नियुक्ति की वर्तमान विधि

  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 233 और 234 ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित हैं तथा इस विषय को राज्यों के अधिकार क्षेत्र में रखते हैं।
  • चयन प्रक्रिया राज्य लोक सेवा आयोगों और संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा संचालित की जाती है, क्योंकि उच्च न्यायालय राज्य में अधीनस्थ न्यायपालिका पर अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हैं।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के पैनल परीक्षा के बाद उम्मीदवारों का साक्षात्कार करते हैं और नियुक्ति के लिये उनका चयन करते हैं।
  • निचली न्यायपालिका के ज़िला न्यायाधीश स्तर तक के सभी न्यायाधीशों का चयन प्रांतीय सिविल सेवा (न्यायिक) परीक्षा के माध्यम से किया जाता है।

परिवर्तन लाने संबंधी संवैधानिक प्रावधान

  • वर्ष 1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन ने अनुच्छेद 312 (1) में संशोधन करके संसद को एक या एक से अधिक अखिल भारतीय सेवाओं के निर्माण के लिये कानून बनाने का अधिकार दिया, जिसमें ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ भी शामिल है, जो संघ और राज्यों के लिये समान है।
  • अनुच्छेद 312 के तहत राज्यसभा को अपने उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित एक प्रस्ताव पारित करना आवश्यक है। इसके बाद संसद को अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के निर्माण हेतु एक कानून बनाना होगा।
  • इसका अर्थ है कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना के लिये किसी संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं होगी।

आगे की राह

  • लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए एक ऐसी भर्ती प्रणाली की स्थापना करना आवश्यक है, जो मामलों के त्वरित निपटान हेतु बड़ी संख्या में कुशल न्यायाधीशों की भर्ती करने में सक्षम हो।
  • हालाँकि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा को कानूनी रूप देने से पूर्व सर्वसम्मति बनाने और इस दिशा में एक निर्णायक कदम उठाने की आवश्यकता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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