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संसदीय समितियाँ

  • 30 Mar 2021
  • 8 min read

यह एडिटोरियल 26/03/2021 को ‘द हिंदुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित लेख “Restoring the broken oversight mechanisms of Parliament” पर आधारित है। इसमें संसदीय समितियों के महत्त्व पर चर्चा की गई है।

भारतीय संसद द्वारा हाल ही में दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक, 2021 पारित किया गया, जो नई दिल्ली सरकार की कार्यप्रणाली में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करता है। उल्लेखनीय है कि व्यापक रूप से परिवर्तनकारी विधेयक होने के बावजूद इसे विचार हेतु किसी संसदीय समिति को नहीं भेजा गया था।

  • एक संसदीय लोकतंत्र में इस तरह के महत्त्वपूर्ण विधेयकों को जाँच हेतु संसदीय समितियों को भेजा जाता  है। यद्यपि वर्ष 2009 से 2014 के बीच प्रस्तुत विधेयकों में से 71% को जाँच हेतु संसदीय समितियों को भेजा गया लेकिन वर्ष 2014 से 2019 के बीच यह आँकड़ा केवल 25% रहा।
  • संसदीय समितियों को दरकिनार किया जाना भारत में तेज़ी से एक प्रतिमान बनता जा  रहा है लेकिन लोकतंत्र में संसदीय समिति प्रणाली के महत्त्व को देखते हुए इसे अप्रचलित किये जाने के बजाय मज़बूती प्रदान करने की आवश्यकता है।

संसदीय समितियों का महत्त्व:

  • विधायी विशेषज्ञता प्रदान करना: अधिकांश सांसद उन विषयों के विशेषज्ञ नहीं होते जिन पर चर्चा की जा रही होती है बल्कि वे सामानज्ञ होते हैं जो लोगों के मनोभावों को तो समझते हैं लेकिन कोई भी निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञों और हितधारकों की सलाह पर भरोसा करते हैं।
    • संसदीय समितियाँ सांसदों को विशेषज्ञता हासिल करने और संबंधित मुद्दों पर विस्तार से विचार करने का समय देती हैं।
  • एक मिनी-संसद के रूप में कार्य करना: ये समितियाँ एक मिनी-संसद के रूप में कार्य करती हैं, क्योंकि इनके सदस्य अलग-अलग दलों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद होते हैं जिनका चयन एकल हस्तांतरणीय मतदान प्रणाली के माध्यम से (साधारणतया संसद में उनकी संख्या के अनुपात में) होता है। 
  • विस्तृत जाँच का साधन: जब विधेयक इन समितियों को संदर्भित किये जाते हैं अथवा इनके पास भेजे जाते हैं तो उनकी बारीकी से जाँच की जाती है और इस संबंध में आमजन सहित विभिन्न बाह्य हितधारकों के विचार आमंत्रित किये जाते हैं।
  • सरकार पर नियंत्रण: यद्यपि समिति की सिफारिशें सरकार के लिये बाध्यकारी नहीं होती हैं, लेकिन इनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट उन परामर्शों का एक सार्वजनिक अभिलेख (रिकॉर्ड) तैयार करती है, जो सरकार पर दबाव डालती है कि वह चर्चा योग्य प्रावधानों के संदर्भ में अपने रुख पर पुनर्विचार करे।
    • समिति की बैठकें बंद-दरवाज़ों के भीतर और जनता की नज़र से दूर होने के कारण इनमें होने वाला विचार-विमर्श भी अधिक सहयोगपूर्ण होता है क्योंकि इसमें सांसद मीडिया दीर्घाओं का दबाव कम महसूस करते हैं।

संसदीय समितियों को कम महत्त्व दिये जाने से संबद्ध मुद्दे

  • सरकार की संसदीय प्रणाली का कमज़ोर होना: एक संसदीय लोकतंत्र संसद और कार्यपालिका के बीच शक्तियों को समेकित करने के सिद्धांत पर काम करता है, लेकिन संसद से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह सरकार की ज़िम्मेदारी को बनाए रखने के साथ ही इसकी शक्तियों पर भी नियंत्रण बनाए रखे।
    • इस प्रकार महत्त्वपूर्ण विधानों को पारित करते समय संसदीय समितियों को महत्त्व न दिये जाने या उन्हें दरकिनार करने से लोकतंत्र के कमज़ोर होने का जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
  • ब्रूट मेजोरिटी को लागू करना: भारतीय प्रणाली में यह अनिवार्य नहीं है कि विधेयक समितियों को भेजे जाएँ। यह अध्यक्ष (लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति) के विवेक पर छोड़ दिया गया है।
    • अध्यक्ष को विवेकाधीन शक्ति प्रदान कर इस प्रणाली को विशेष तौर पर लोकसभा में जहाँ बहुमत सत्तारूढ़ दल के पास होता है, को कमज़ोर रूप में प्रस्तुत किया गया है।

आगे की राह

  • चर्चा को अनिवार्य करना: स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों में सभी विधेयक समितियों के पास भेजे जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में विपक्ष के सदस्यों को शामिल करते हुए विधेयक के चयन हेतु एक समिति का गठन किया जाता है, इस समिति को ऐसे विधेयकों को चिह्नित करने का काम सौंपा जाता है जिन्हें समितियों को भेजा जाना चाहिये। 
    • संभवतः भारत के लिये भी ऐसा समय आ गया है कि समिति प्रणाली, जिसे अभी तक बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया गया, का लाभ उठाने के लिये इस प्रकार का आदेश दिया जाए।
    • इसके लिये लोकसभा और राज्यसभा दोनों के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियमों में संशोधन करना होगा।
  • समय-समय पर समीक्षा: राष्ट्रीय संविधान कार्यकरण समीक्षा आयोग (National Commission to Review the Working of the Constitution- NCRWC) के अनुसार, विभागीय स्थायी समितियों (DRSC) की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिये ताकि ऐसी समितियों के स्थान पर नई समितियाँ बनाई जा सकें जिन्होंने अपनी उपयोगिता अथवा सार्थकता से अधिक समय तक काम किया है। उदाहरण के लिये:
    • सलाहकार विशेषज्ञता, डेटा संग्रहण और अनुसंधान सुविधाओं हेतु उपायों के साथ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का विश्लेषण प्रदान करने के लिये राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर स्थायी समिति।
    • संसद में प्रस्तुत किये जाने से पहले संवैधानिक संशोधन विधेयकों की जाँच हेतु स्थायी संसद समिति का गठन।

निष्कर्ष

  • महत्त्वपूर्ण विधेयकों के लिये जाँच को अनिवार्य बनाना विधायी प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न किये बगैर कानून की गुणवत्ता और इसके विस्तार द्वारा शासन की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिये आवश्यक है। इस प्रकार कानून निर्माण की प्रक्रिया में संसद की शुचिता सुनिश्चित करने के लिये एक मज़बूत संसदीय समिति प्रणाली की आवश्यकता है।

प्रश्न- संसदीय समितियों को कम महत्त्व दिये जाने से विधि निर्मात्री संस्था के रूप में संसद की शुचिता नष्ट होती है। विवेचना कीजिये।

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