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चुनावी बाॅण्ड एवं संबंधित मुद्दे

  • 27 Mar 2021
  • 8 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में चुनावी बाॅण्ड एवं संबंधित मुद्दों पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ:

चुनावी बाॅण्ड अपनी शुरुआत के तीन वर्षों के भीतर ही राजनीतिक चंदे का सबसे लोकप्रिय साधन बन गया है, इसमें दानदाताओं का नाम गुप्त रखा जाता है। हालाँकि कई राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना ​​है कि चुनावी बाॅण्ड के डिज़ाइन और संचालन के कारण राजनीतिक दलों को असीम तथा अज्ञात कॉर्पोरेट दान प्राप्त करने की संभावना होती है। यह प्रक्रिया नागरिकों और मतदाताओं के ’जानने का अधिकार’ (Right To Know) के संवैधानिक मूलाधिकारों के साथ ही भारत के लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करती है।

इसके कारण आगामी राज्य चुनावों के मद्देनज़र चुनावी बाॅण्ड को बनाए रखने के संदर्भ में एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (Association of Democratic Reforms- ADR) ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बाॅण्ड योजना को बरकरार रखने या न रखने के प्रश्न पर निर्णय अभी सुरक्षित रखा है।

चुनावी बाॅण्ड से संबद्ध चुनौतियाँ

  • लोकतंत्र पर आघात: केंद्र सरकार ने वित्त अधिनियम 2017 में एक संशोधन द्वारा राजनीतिक दलों को चुनावी बाॅण्ड के माध्यम से प्राप्त चंदे का खुलासा न करने के संबंध में छूट दी है।
    • इसका तात्पर्य है कि मतदाता यह नहीं जान पाएंगे कि किस व्यक्ति, कंपनी या संगठन ने किस पार्टी को और कितनी मात्रा में चंदा दिया है।
    • हालाँकि एक प्रतिनिधि लोकतंत्र में नागरिकों को यह अधिकार है कि वह चुने जाने वाले अपने प्रतिनिधियों से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकें।
  • "जानने का अधिकार" से समझौता: दीर्घकाल से ही सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष रूप से चुनाव के संदर्भ में माना है कि "जानने का अधिकार", भारतीय संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का एक अभिन्न अंग है।
    • इस प्रकार चुनावी बाॅण्ड नागरिकों और मतदाताओं के "जानने का अधिकार" के साथ ही लोकतंत्र के मौलिक सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के खिलाफ: नागरिक, चुनावी बाॅण्ड से संबंधित कोई भी विवरण नहीं प्राप्त कर सकते हैं, इसके अतिरिक्त सरकार भारतीय स्टेट बैंक से डेटा की मांग कर दाता के विवरण तक पहुँच सकती है।
    • तात्पर्य यह है कि सत्तासीन सरकार इस जानकारी का लाभ उठा सकती है और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनावों को बाधित कर सकती है।
  • भारत के चुनाव आयोग द्वारा विरोध: चुनाव आयोग ने मई 2017 में जनप्रतिनिधि अधिनियम (Representation of the People Act- RPA) में संशोधनों पर आपत्ति जताई, क्योंकि यह राजनीतिक दलों को चुनावी बाॅण्ड के माध्यम से प्राप्त दान का खुलासा न करने की छूट देता है।
    • चुनाव आयोग ने इसको "प्रतिगामी कदम" बताया।
  • संस्थागत भ्रष्टाचार: चुनावी बाॅण्ड योजना राजनीतिक चंदे की सभी पूर्व-मौजूदा सीमाओं को हटा देती है जिसके परिणामस्वरूप निगमों को चुनावों में प्रभावी चंदा देने की अनुमति प्रदान की जाती है, इसके कारण क्रोनी पूंजीवाद का मार्ग प्रशस्त होता है।
    • इसके अलावा चुनावी बाॅण्ड योजना के माध्यम से राजनीतिक दलों (इस प्रकार के चंदे को अक्सर शेल कंपनियों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है) को भी विदेशी चंदा मिल सकता है। चुनावी बाॅण्ड योजना के साथ संस्थागत भ्रष्टाचार बढ़ने की संभावनाएँ कम होने के बजाय बढ़ जाती हैं।

आगे का रास्ता

  • चुनावी वित्तीयन में पारदर्शिता: कई विकसित देशों में चुनावों का वित्तपोषण सार्वजनिक रूप से किया जाता है। यह समानता के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच संसाधन अंतराल को समाप्त करता है।
    • दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग, दिनेश गोस्वामी समिति और कई अन्य लोगों ने भी चुनावों के राज्य वित्तपोषण की सिफारिश की है।
    • इसके अलावा जब तक चुनावों का वित्तपोषण सार्वजनिक रूप से नहीं किया जाता है, तब तक राजनीतिक दलों के वित्तीय योगदान पर कैप या सीमाएँ आरोपित की जा सकती हैं।
  • निर्णायक के रूप में न्यायपालिका का कार्य: किसी कार्यशील लोकतंत्र में स्वतंत्र न्यायपालिका को रेफरी के रूप में कार्य करते हुए अपने महत्त्वपूर्ण कार्यों में से एक, लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों को बनाए रखना आवश्यक है।
    • चुनावी बाॅण्ड ने सरकार की चुनावी वैधता पर सवाल उठाया है और इस तरह पूरी चुनावी प्रक्रिया को संदिग्ध बना दिया है।
    • इस संदर्भ में न्यायालय को एक निर्णायक के रूप में कार्य करना चाहिये और लोकतंत्र के मूलभूत नियमों को लागू करना चाहिये।
  • नागरिक संस्कृति के प्रति संक्रमण: भारत में लगभग 75 वर्षों से लोकतंत्र अच्छा काम कर रहा है। अब सरकार को अधिक जवाबदेह बनाने के लिये मतदाताओं को स्वयं जागरूक होना चाहिये और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन करने वाले उम्मीदवारों एवं पार्टियों को अस्वीकार करना चाहिये।

निष्कर्ष

यह ज़रूरी है कि अगर लोकतंत्र का विकास करना है, तो राजनीति को प्रभावित करने के एक हिस्से के रूप में धन की भूमिका सीमित होनी चाहिये। इस प्रकार यह अनिवार्य है कि चुनावी बाॅण्ड की योजना को संशोधित किया जाए।

प्रश्न: चुनावी बाॅण्ड नागरिकों और मतदाताओं को उनके “जानने का अधिकार” से दूर रखते हुए भारत के लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। टिप्पणी कीजिये।

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