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लोक सेवा आयोग: संघ और राज्य

  • 16 Jun 2021
  • 14 min read

परिचय 

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 312 (Article 312) के अनुसार, संसद को संघ और राज्यों के लिये  एक या एक से अधिक अखिल भारतीय सेवाएंँ (एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा सहित) बनाने का अधिकार प्राप्त है। 
    • इन सभी  अखिल भारतीय सेवाओं में भर्ती संघ लोक सेवा आयोग ( Union Public Service Commission- UPSC) द्वारा की जाती है।
    • राज्य स्तर पर प्रशासनिक सेवाओं हेतु राज्य लोक सेवा आयोग (State Public Service Commission- SPSC) द्वारा भर्ती की जाती है। 
  • संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) भारत में केंद्रीय भर्ती एजेंसी है।
    • भारतीय संविधान के भाग XIV में अनुच्छेद 315 से अनुच्छेद 323 के तहत संघ लोक सेवा आयोग की संरचना, उसके सदस्यों की नियुक्ति और निष्कासन तथा संघ लोक सेवा आयोग की शक्तियों और कार्यों से संबंधित प्रावधान किये  गए हैं। 
    • यह एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है। 
  • केंद्र में UPSC के समानांतर राज्य में राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) कार्यरत्त है। 
    • संविधान के भाग XIV में अनुच्छेद 315 से अनुच्छेद 323 के तहत SPSC की संरचना, उसके सदस्यों की नियुक्ति और निष्कासन तथा SPSC की शक्तियों और कार्यों के बारे में प्रावधान किये गए हैं। 

संवैधानिक प्रावधान:

  • अनुच्छेद 315: संघ और भारत के राज्यों हेतु लोक सेवा आयोगों (Public Service Commissions- PSC) का गठन।
  • अनुच्छेद 316: UPSC के साथ-साथ SPSC के सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल।
  • अनुच्छेद 317: UPSC या SPSC दोनों के सदस्य को हटाना और निलंबित करना।
  • अनुच्छेद 318: आयोग के सदस्यों और कर्मचारियों की सेवा की शर्तों हेतु नियम बनाने की शक्ति। 
  • अनुच्छेद 319: आयोग के सदस्यों द्वारा सदस्य न रहने पर पद धारण करने का प्रतिषेध।
  • अनुच्छेद 320: लोक सेवा आयोगों के कार्यों का वर्णन।
  • अनुच्छेद 322: लोक सेवा आयोगों के व्यय।
  • अनुच्छेद 323: लोक सेवा आयोगों की रिपोर्ट। 

संघ लोक सेवा आयोग 

  • सदस्यों की नियुक्ति: UPSC के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • कार्यालय: UPSC का कोई भी सदस्य छह साल की अवधि के लिये या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद पर रहेगा।
  • पुनर्नियुक्ति: कोई भी व्यक्ति जो एक बार लोक सेवा आयोग के सदस्य के रूप में पद धारण कर चुका है अपने कार्यालय में पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा। 
  • त्यागपत्र: संघ लोक सेवा आयोग का कोई सदस्य भारत के राष्ट्रपति को लिखित त्यागपत्र देकर अपने पद से इस्तीफा दे सकता है। 
  • सदस्यों का निष्कासन/निलंबन: संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को भारत के राष्ट्रपति के आदेश से ही उसके पद से हटाया जाएगा। 
    • राष्ट्रपति अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को उसके कार्यालय पूर्ण होने से पूर्व भी निलंबित कर सकता है, जिसके संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का संदर्भ दिया गया है। 
  • पदच्युत: UPSC के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को हटाया जा सकता है यदि वह: 
    • दिवालिया घोषित किया गया है।
    • अपने कार्यकाल के दौरान कार्यालय के कर्तव्यों के बाहर किसी भी भुगतान वाले रोजगार में संलग्न होता है।
    • राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शरीर की दुर्बलता के कारण पद पर बने रहने के लिये अयोग्य है। 
  • सेवा की शर्तों को विनियमित करना: UPSC के मामले में भारत के राष्ट्रपति की शक्ति: 
    • आयोग के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तें निर्धारित करता है।
    • आयोग के कर्मचारियों की संख्या और उनकी सेवा शर्तों के संबंध में प्रावधान करता है।
  • शक्तियों पर प्रतिबंध: UPSC के सदस्यों की सेवा शर्तों में नियुक्ति के बाद किसी भी प्रकार का संशोधन नहीं किया जाएगा। 
  • खर्च: आयोग के सदस्यों या कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और पेंशन सहित UPSC का खर्च भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से लिया जाता है। 
  • रिपोर्ट प्रस्तुत करना: UPSC भारत के राष्ट्रपति को आयोग द्वारा किये गए कार्यों की एक वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करता है। 
    • जिन मामलों में आयोग की सलाह  स्वीकार नहीं की गई हो उन मामलों के संदर्भ में  राष्ट्रपति को ज्ञापन प्रस्तुत करना होता है।
      • अस्वीकृति के  कारणों को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करने से पूर्व संसद के प्रत्येक सदन (Parliament) के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। 

राज्य लोक सेवा आयोग 

  • सदस्यों की नियुक्ति: SPSC के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है। 
  • कार्यकाल: SPSC के सदस्य छह साल की अवधि के लिये या 62 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद पर रहते हैं।
  • पुनर्नियुक्ति: कोई भी व्यक्ति जिसने एक बार लोक सेवा आयोग के सदस्य के रूप में पद धारण किया है, पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा।
  • त्यागपत्र: राज्य लोक सेवा आयोग का कोई सदस्य राज्य के राज्यपाल को लिखित में अपना इस्तीफा दे सकता है। 
  • सदस्यों का निष्कासन/निलंबन: SPSC के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को भारत के राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ही उनके कार्यालय से हटाया जाएगा। 
    • राज्य का राज्यपाल अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को उसके कार्यालय से निलंबित कर सकता है, जिसके संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देश दिया गया है। 
    • सदस्यों को हटाने की शर्तें UPSC के सदस्यों के हटाने के समान ही हैं। 
  • सेवा शर्तों का  विनियमन: SPSC के मामले में राज्यों के राज्यपाल वहीँ  कर्तव्यों का पालन करते हैं जो UPSC के मामले में भारत के राष्ट्रपति द्वारा किये जाते हैं। 
    • शक्ति पर प्रतिबंध: SPSC के  सदस्य की सेवा शर्तों में उसकी नियुक्ति के बाद किसी भी प्रकार का संशोधन नहीं किया जाएगा । 
  • खर्च: SPSC के सभी खर्च राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं।
  • रिपोर्ट: SPSC अपने कार्य की वार्षिक रिपोर्ट राज्य के राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत करता है। 
    • जिन मामलों में आयोग की सलाह मान्य नहीं होगी उन मामलों से संबंधित  ज्ञापन राज्यपाल को प्रस्तुत करना होगा।
      • अस्वीकृति के कारणों को पहले राज्य विधानमंडल (Legislature of the State) के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। 

सेवा अवधि समाप्त होने पर पुन: नियुक्तियाँ: 

  • अध्यक्ष (UPSC): UPSC का अध्यक्ष भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य पद पर रोज़गार हेतु अपात्र होगा। 
  • अध्यक्ष (SPSC): SPSC के अध्यक्ष UPSC के अध्यक्ष या  किसी अन्य सदस्य  या किसी अन्य SPSC के अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के पात्र होंगे, लेकिन भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य रोज़गार के लिये पात्र  नहीं होंगे। 
  • अन्य सदस्य (UPSC): UPSC का सदस्य (अध्यक्ष के अलावा) UPSC या SPSC के अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति का पात्र होगा। 
    • वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य रोज़गार हेतु पात्र नहीं है। 

 UPSC और SPSC के कार्य: 

  • परीक्षा आयोजित कराना: संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों का  कर्तव्य  है कि वे क्रमशः संघ की सेवाओं और राज्य की सेवाओं में नियुक्तियों हेतु परीक्षाओं का आयोजन करवाएँ।
  • SPSC को सहायता: यूपीएससी का यह कर्तव्य होता है कि वह राज्यों को उनके अनुरोध पर किसी भी सेवा हेतु संयुक्त भर्ती योजना तैयार करने और संचालन करने में मदद करे, जिसके लिये विशेष योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों की आवश्यकता होती है।
  • PSC के साथ परामर्श: UPSC और SPSC निम्नलिखित मामलों पर विचार विमर्श करती है: 
    • सिविल सेवाओं और सिविल पदों हेतु भर्ती के तरीकों से संबंधित सभी मामलों पर।
    • उम्मीदवारों की उपयुक्तता के आधार पर सिविल सेवाओं और पदों पर नियुक्ति करने तथा एक सेवा से दूसरी सेवा में पदोन्नति और स्थानांतरण में।
    • भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन सेवारत व्यक्ति को प्रभावित करने से संबंधित सभी अनुशासनात्मक मामलों पर।
    • लोक सेवा आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह भारत के राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल द्वारा उन्हें भेजे गए किसी भी मामले पर सलाह दे। 

संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग 

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 315 के अनुसार, दो या दो से अधिक राज्यों की आपसी सहमति से  राज्यों के उस समूह के लिये एक लोक सेवा आयोग का गठन किया जा सकता है। 
    • तभी संसद कानून द्वारा संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग (Joint State Public Service Commission- JSPSC) की नियुक्ति का प्रावधान कर सकती है। 
    • इस प्रकार के संकल्प को प्रत्येक राज्य के विधानमंडल के प्रत्येक सदन द्वारा पारित किया जाना आवश्यक होगा। 
  • अधिकारियों की नियुक्ति: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 316 में कहा गया है कि JSPSC के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
    • संयुक्त आयोग का  सदस्य छह वर्ष की अवधि  या 62 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद धारण करेगा। 
  • इस्तीफा: अनुच्छेद 317 के तहत JSPSC का कोई भी सदस्य भारत के राष्ट्रपति को लिखित में अपना इस्तीफा दे सकता है।
    •  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संदर्भ दिये जाने के बाद राष्ट्रपति को आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को उसके कार्यालय से निलंबित करने का अधिकार प्राप्त है। 
  • शक्तियाँ: अनुच्छेद 318 के अनुसार भारत के राष्ट्रपति को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं:
    • आयोग के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तें निर्धारित करने से संबंधित। 
    • सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा शर्तों के संबंध में प्रावधान करने से संबंधित।
  • रिपोर्ट: अनुच्छेद 323 के अनुसार, JSPSC का यह कर्तव्य होगा कि वह उन राज्यों के राज्यपालों के समक्ष वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करे, जिन्होंने मिलकर आयोग का गठन किया है। 
    • प्रत्येक राज्य का राज्यपाल उन मामलों की व्याख्या करते हुए एक ज्ञापन प्रदान करने हेतु  ज़िम्मेदार होता है, जिनमें आयोग की सलाह को स्वीकार नहीं किया गया हो।  
    • अस्वीकृति के कारण प्रत्येक राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखे जाते हैं। 
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