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इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया

  • 06 Nov 2020
  • 24 min read

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (The Institute of Chartered Accountants of India- ICAI) भारत का राष्ट्रीय लेखांकन निकाय है। इसकी स्थापना अकाउंटेंसी पेशे को विनियमित करने के लिये की गई थी। यह भारत में वित्तीय लेखा-परीक्षा एवं अकाउंटेंसी पेशे के लाइसेंस को विनियमित करने वाला निकाय है। यह भारत में लेखांकन मानकों पर राष्ट्रीय सलाहकार समिति (National Advisory Committee on Accounting Standards-NACAS) के माध्यम से  कंपनियों के लेखांकन मानकों की अनुशंसा करता है।

ICAI का इतिहास

  • भारत की स्वतंत्रता से पहले  पंजीकृत कंपनियों को प्रबंधित करने के लिये कंपनी अधिनियम 1913 पारित किया गया था।
  • इस अधिनियम द्वारा रिकार्डों को ऑडिट करने के लिये औपचारिक लेखा-परीक्षक की नियुक्ति हेतु योग्यता निर्धारित की गई थी। लेखा-परीक्षक के तौर पर कार्य करने के लिये एक व्यक्ति को स्थानीय सरकार से एक प्रबंधित प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता था।
  • वर्ष 1932 में एक लेखा बोर्ड की स्थापना की गई थी जिसे भारतीय लेखा बोर्ड के नाम से जाना जाता था। यह बोर्ड भारतीय परिषद में गवर्नर जनरल को लेखाविधि परीक्षको के योग्यता मानक के साथ-साथ आवश्यक आचरण संबंधी बिंदुओं पर सलाह देता था।
  • वर्ष 1947 में विशेषज्ञ समिति की नियुक्ति हुई, उसने सिफारिश की कि पेशे को विनियमित करने के लिये लेखाकारों के एक अलग स्वायत्त संघ का गठन किया जाना चाहिये। इसके पश्चात् भारत सरकार ने इन सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और वर्ष 1949 में चार्टर्ड अकाउंटेंट्स अधिनियम पारित किया। उक्त अधिनियम की धारा 3 के तहत इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICAI) की स्थापना एक सांविधिक निकाय के रूप में की गई।
  • यह भारत सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत कार्य करता है। ICAI के मुद्दों को चार्टर्ड अकाउंटेंट्स अधिनियम 1949 एवं चार्टर्ड अकाउंटेंट्स विनियमन 1988 के प्रावधानों के तहत प्रबंधित किया जाता है।
  • ICAI अंतर्राष्ट्रीय लेखाकार महासंघ (International Federation of Accountants- IFAC,1977), दक्षिण एशियाई लेखाकार महासंघ (South Asian Federation of Accountants- SAFA, 1984) और एशियाई एवं प्रशांत लेखाकारो के परिसंघ (Confederation of Asian and Pacific Accountants- CAPA, 1957)  के संस्थापक सदस्यों में से एक है।

कार्य 

  • ICAI परिषद: संस्थान के कार्यों का कार्यान्वयन चार्टर्ड अकाउंटेंट्स अधिनियम 1949 के तहत गठित एक परिषद द्वारा किया जाता है।
    • परिषद में 32 निर्वाचित सदस्य होते हैं जिसमें से 8 सदस्यों को भारत सरकार द्वारा नामित किया जाता है।
    • परिषद के सदस्यों का निर्वाचन, संस्थान के सदस्यों द्वारा एकल हस्तांतरणीय मतदान प्रणाली द्वारा किया जाता है।
    • परिषद अपने 4 स्थायी समितियों एवं 37 अस्थायी समितियों के माध्यम से कार्य करती है।
  • सदस्यता: संस्थान के सदस्यों को चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के रूप में जाना जाता है। चार्टर्ड अकाउंटेंट्स अर्थात् संस्थान का सदस्य बनने के लिये निर्धारित परीक्षाओं, तीन साल की  प्रेक्टिकल ट्रेंनिग और इस अधिनियम एवं विनियमों के तहत अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने की ज़रूरत होती है।
  • चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के निम्नलिखित कार्य  हैं:
    • चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को कंपनी अधिनियम 2013 एवं आयकर अधिनियम 1961 के तहत वित्तीय विवरण के ऑडिट हेतु सांविधिक एकाधिकार प्राप्त है।
    • विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में वित्तीय रिपोर्टिंग, लेखा परीक्षा, कॉर्पोरेट फाइनेंस, इन्वेस्टमेंट बैंकिंग, फाइनेंस मॉडलिंग, इक्विटी रिसर्च, कोष प्रबंधन, क्रेडिट विश्लेषण, पूंजी बाज़ार, मध्यस्थता, जोखिम प्रबंधन, अर्थव्यवस्था, रणनीतिक/प्रबंधन परामर्श, प्रबंधन अकाउंटिंग, इंफॉर्मेशन सिस्टम ऑडिट, निगम कानून, प्रत्यक्ष कर,अप्रत्यक्ष कर एवं व्यापार का मूल्यांकन आदि शामिल हैं।
  • लेखा अनुसंधान फाउंडेशन (ARF): ICAI लेखा अनुसंधान फाउंडेशन ने विभिन्न बुनियादी एवं प्रायोगिक अनुसंधान परियोजनाओं को पूरा किया है। यह अनुसंधानकर्त्ताओं/शोध-छात्रों को उक्त क्षेत्रों में समकालीन राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की बुनियादी अनुसंधान परियोजनाओं को पूरा करने के लिये वित्तीय सहयोग प्रदान करता है।
  • ICAI आर्थिक प्रासंगिकता के मामलों पर एवं उसी प्रकार के विभिन्न मंत्रालयों जैसे- कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय, वाणिज्य एवं औद्योगिक मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, रेलवे मंत्रालय आदि को  तकनीकी सलाह एवं आवश्यक जानकारी प्रदान करता है।
  • ICAI विभिन्न निकायों जैसे- भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय रिज़र्व बैंक, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड, जीएसटी परिषद, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण आदि को तकनीकी सलाह भी प्रदान करता है।
  • इसने जीएसटी क्रियान्वयन के प्रत्येक स्तर पर चाहे वह संविधान संशोधन विधेयक हो, आदर्श जीएसटी कानून, जीएसटी नियम प्रारूप या जीएसटी का क्रियान्वयन, सभी के संबंध में विस्तृत सुझाव दिये हैं।
  • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल ऑफ आईसीएआई (Indian Institute of Insolvency Professionals of ICAI-IIIPI) संपूर्ण रुप से ICAI के स्वामित्व वाली एक सहायक कंपनी है। इसकी स्थापना इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड 2016 के अनुसार, सदस्यों के रूप में इंसॉल्वेंसी पेशेवरों को नामाँकित एवं विनियमित करने के साथ ही विनियमों एवं नियमों के आकस्मिक उपायों को समझने के लिये की गई थी।
  • गुणवत्ता पुनरीक्षा मंडल (Quality Review Board): चार्टर्ड अकाउंटेंट्स अधिनियम 1949 की धारा 28A केंद्र सरकार को एक अध्यक्ष एवं 10 अन्य सदस्यों की एक गुणवत्ता पुनरीक्षा बोर्ड के गठन का अधिकार देती है क्योंकि इस बोर्ड के गठन की प्रक्रिया को चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (संशोधन) अधिनियम 2006 द्वारा सम्मिलित किया गया था।
    • गुणवत्ता पुनरीक्षा बोर्ड, सेवा की गुणवत्ता के संबंध में ICAI परिषद को सिफारिश करने के साथ ही समीक्षा का अधिकार देता है जिसे संस्थान के सदस्य एवं ऑडिट सर्विसेज़ ने मिलकर तैयार कराया है।
  • अनुशासनात्मक तंत्र: अनुशासनात्मक निदेशालय, अनुशासन बोर्ड एवं अनुशासनात्मक समिति तीनों मिलकर ICAI की अनुशासनात्मक प्रक्रिया के फाउंडेशन का  निर्माण करते हैं। ये संस्थाएँ अर्द्ध-न्यायिक हैं एवं इन संस्थाओं के पास दीवानी न्यायालय के समान समन जारी करने तथा शपथ पत्र पर दस्तावेज़ों के सत्यापन जैसी पर्याप्त शक्तियाँ हैं। 

राष्ट्रीय वित्तीय विनियामक प्राधिकरण (NFRA)

  • राष्ट्रीय वित्तीय विनियामक प्राधिकरण (NFRA) एक भारतीय संस्थान है जिसका प्रावधान कंपनी अधिनियम 2013 में लेखा-परीक्षक के कार्यों की निगरानी, लेखांकन एवं लेखा-परीक्षा मानकों की स्थापना तथा प्रवर्तन के लिये किया गया है।
  • कंपनी अधिनियम 2013 के अनुसार, राष्ट्रीय वित्तीय विनियामक प्राधिकरण (NFRA) को लेखांकन एवं लेखा-परीक्षा मानकों की सिफारिश करने, उनका अनुपालन सुनिश्चित करने और लेखा-परीक्षा व्यवसाय एवं लेखांकन की सेवा गुणवत्ता की जाँच करने का कार्य सौंपा गया है।
  • इसे चार्टर्ड अकाउंटेंट्स या CA फर्मों द्वारा व्यवसाय संबंधी मामलों में दुर्व्यवहार करने पर जाँच का अधिकार भी दिया गया है और साथ ही जुर्माना लगाने एवं चार्टर्ड अकाउंटेंट्स या कंपनियों पर 10 वर्षों का निषेध लगाने का भी अधिकार दिया गया है।

NFRA का विकास

  • दुनिया भर में 50 से अधिक देशों द्वारा स्व-नियामक लेखाकार व्यवसाय निकाय (Self-regulatory Professional Accountant Bodies), ICAI जैसे संस्थानों की बजाय स्वतंत्र लेखा-परीक्षा नियामक (Independent Audit Regulators) जैसे-NFRA का निर्माण किया है। 
    • भारत में संसदीय पैनल के माध्यम से लेखांकन एवं लेखा-परीक्षा व्यवसाय के लिये एक नया निरीक्षण निकाय स्थापित करने की स्वीकृति प्रदान की गई थी। वर्ष 2009 में सत्यम घोटाले के बाद  वित्त पर स्थायी समिति ने पहली बार राष्ट्रीय विधि रिपोर्टिंग प्राधिकरण (National Financial Reporting Authority-NFRA) की अवधारणा को प्रतिस्थापित करने पर विचार किया।
    • भारतीय संसद ने कंपनी अधिनियम 2013 के साथ ही NFRA के गठन का प्रस्ताव पारित किया।
    • इसके अंतर्गत  "कोई भी अन्य संस्थान या निकाय दुर्व्यवहार के ऐसे मामलों में कोई भी कार्यवाही शुरू नहीं करेगा जहाँ NFRA ने जाँच शुरू की हो।"
  • ICAI एक स्व-नियामक निकाय है। इसके पास चार्टर्ड अकाउंटेंट्स का परीक्षण और योग्यता प्रदान करने, अभ्यास के लिये उन्हें लाइसेंस देने और लेखा-परीक्षा की गुणवत्ता की जाँच सहित उन्हें विनियमित करने का एकाधिकार था। इसी परिप्रेक्ष्य में ICAI द्वारा इसका विरोध किया गया।

कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 132 के अनुसार NFRA का गठन:

  • इस अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा लेखांकन और लेखा-परीक्षा मानकों से संबंधित मामलों को उपलब्ध कराने के लिये एक राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (NFRA) का गठन अधिसूचना के माध्यम से  किया जा सकता है। 
    • कंपनी या उसके ऑडिटर समूहों द्वारा अभिग्रहण के लिये लेखांकन एवं लेखा-परीक्षा नीतियों व मानकों के सूत्रीकरण और निर्धारण पर केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की जा सकती है।
    • इसके द्वारा निर्धारित लेखांकन मानकों एवं लेखा-परीक्षा मानकों के अनुपालन की  निगरानी एवं प्रवर्तन किया जाता है।
    • इसके अतिरिक्त व्यवसाय की सेवा गुणवत्ता का निर्धारण करना और इससे जुड़े ऐसे मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करना तथा सेवा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिये आवश्यक मानदंडों हेतु सुझाव देना भी इसके प्रमुख कार्यों में शामिल हैं। 
  • लेखाशास्त्र, लेखा-परीक्षा, वित्त या विधि के क्षेत्र में विशेषज्ञता वाला व्यक्ति इसका अध्यक्ष होगा। अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है और स्थायी एवं अस्थायी सदस्यों की संख्या 15 से अधिक नहीं हो सकती है।
  • इनके पास जाँच करने की शक्ति सरकार द्वारा प्रदान की जाती है। जब कोई अन्य सरकारी संस्थान किसी सेवा के दुर्व्यवहार के मामले में कोई कार्यवाही प्रारंभ नहीं कर सकता, तो वहाँ पर NFRA द्वारा जाँच की जाती है।
  • सिविल प्रक्रिया कोड 1908 के तहत जो शक्तियाँ दीवानी न्यायालय में निहित हैं, वहीं अधिकार इसमें भी निहित होंगे, जबकि निम्न मामलों में मुकदमा चलाया जा सकता है-
    • बही-खाता एवं अन्य दस्तावेज़ों की जाँच।
    • व्यक्तियों की उपस्थिति से संबंधित प्रावधान लागू करना और सम्मन जारी करना।
  • NFRA के किसी आदेश से असंतुष्ट होने पर कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 132 (6) के तहत अपीलीय प्राधिकरण के गठन से पहले अपील की जा सकती है।
  • NFRA के आदेश के बाद की गई अपील की सुनवाई करने के लिये केंद्र सरकार द्वारा अपीलीय प्राधिकरण का गठन, अधिसूचना के माध्यम से किया जा सकता है। इसमें एक अध्यक्ष एवं दो से अधिक सदस्य नहीं हो सकते हैं। 
  • संसद द्वारा अध्यक्ष एवं अपीलीय प्राधिकरण के सदस्य के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति के लिये योग्यता, चयन का तरीका, उनकी सेवाओं के नियम और शर्तें तथा सहायक कर्मचारियों की आवश्यकता एवं अपीलीय प्राधिकरण द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रिया का निर्धारिण किया जा सकता है।
  • NFRA अपनी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करता है जिसमें वित्तीय वर्ष के दौरान की गतिविधियों की पूरी जानकारी होती है। इसकी एक प्रति केंद्रीय सरकार को भेजी जाती है जिसको केंद्र सरकार द्वारा संसद के प्रत्येक सदन में प्रस्तुत किया जाता है।

वित्त पर स्थायी समिति (2014-15)

  • NFRA के नियम संबंधी विधानों का निर्माण कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 132 के तहत वित्त पर स्थायी समिति की अनुशंसाओं के परिणामस्वरूप किया गया है।
  • समिति के अनुसार मंत्रालय NFRA के गठन की प्रक्रिया सुनिश्चित की जा सकती है, यह दो समानांतर न्यायालयों की स्थापना नहीं करती है। अतः यह कार्यों के अतिव्यापी होने पर ICAI का पक्ष लेती है।

ICAI के NFRA की स्थापना के विरुद्ध तर्क:

  • NFRA की स्थापना के परिणामस्वरूप कई नियामक निकाय होंगे।
  • ICAI  एक विश्व स्तरीय नियामक है।
  • NFRA का गठन एवं संचालन एक महंगा कार्य होगा।
  • पर्याप्त सक्षम कर्मियों की अनुपलब्धता।

कारपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) द्वारा NFRA का समर्थन:

  • बाहरी लेखा-परीक्षक मात्र गेटकीपर के रूप कार्यों का निष्पादन करते हैं।
  • दुनिया भर में स्वतंत्र लेखा-परीक्षा नियामक की संख्या वर्ष 2006 में 18 थी जो वर्ष 2018 में बढ़कर 51 हो गई है।
  • नीति आयोग ने एक अलग मामले में ऐसे व्यावसायिक निकायों की स्व-नियामक संरचना की आलोचना की है।
  • सेबी द्वारा नियुक्त एक अंतर्राष्ट्रीय सलाहकार ने कहा कि ICAI की निगरानी प्रकृति में निष्क्रिय और  सक्रिय जाँच का दायरा सीमित है।
  • ICAI के अनुशासनात्मक बोर्ड द्वारा 1972 मामलों में से केवल उन मामलों को लिया गया है, जो सत्यम कंप्यूटर्स से संबंधित हैं और जिनके सदस्यों को स्थायी रूप से हटा दिया गया है। इन मामलों में से केवल 14 मामलों में एक वर्ष या इससे अधिक के जुर्माने को उनके सदस्यों पर आरोपित किया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (एस. सुकुमार बनाम भारतीय चार्टर्ड अकाउंट संस्थान सचिव), 2018

  • फरवरी 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार को भारत में लेखा-परीक्षा के परिप्रेक्ष्य में ध्यान रखने एवं विचार-विमर्श करने के लिये एक समिति के गठन का आदेश दिया था।
  • अप्रैल 2018 में कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा समिति का गठन किया गया और बाद में इसने अपनी रिपोर्ट अक्तूबर 2018 में प्रस्तुत की।
  • रिपोर्ट प्रस्तुत करने के 2 सप्ताह के भीतर ही कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने 13 नवंबर 2018 को राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण नियम 2018 को अधिसूचित किया। इसके माध्यम से  NFRA के कर्तव्यों, शक्तियों, भूमिका एवं क्षेत्राधिकार को स्थापित किया गया है।
  • लेखा-परीक्षा की कमियों को नियंत्रित करने और भारत में मज़बूत लेखा-परीक्षा फ्रेमवर्क के लिये विनियामक के रूप में NFRA का समिति की अनुशंसाओं के साथ विश्लेषण किया गया।
  • विवाद की स्थिति से बचने के लिये ICAI ने लेखा-परीक्षा के सत्यापन की गुणवत्ता को परिष्कृत करने हेतु चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम 1949 के तहत एक स्वतंत्र गुणवत्ता समीक्षा बोर्ड की स्थापना की अनुशंसा की।
  • कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 132 के तहत राष्ट्रीय वित्तीय सूचना प्राधिकरण (NFRA) को लेखांकन और अंकेक्षण संबंधी मानकों की सिफारिश करने, लेखांकन और अंकेक्षण संबंधी मानकों का प्रवर्तन सुनिश्चित करने, चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा किये गए दुर्व्यवहार की जाँच करने आदि को लेकर अन्य सभी मौजूदा कानूनों के ऊपर प्रभुत्व स्थापित करने का अधिकार देता है। साथ ही राष्ट्रीय वित्तीय सूचना प्राधिकरण (NFRA) को दीवानी न्यायालय के समान मुकदमा दायर करने, जुर्माना लगाने की शक्ति प्रदान की गई है। राष्ट्रीय वित्तीय सूचना प्राधिकरण (NFRA) को दी गई शक्तियाँ स्पष्ट तौर पर यह इंगित करती हैं कि इस प्राधिकरण के माध्यम से लेखांकन और अंकेक्षण संबंधी मौजूदा व्यवस्था को बदलने की कोशिश की गई है।
  • राष्ट्रीय वित्तीय सूचना प्राधिकरण (NFRA) को भी उच्च मौद्रिक दंड अधिरोपित करने एवं निषेध करने का अधिकार है।
  • नियमों में दायित्व की अनुपस्थिति: समिति ने भारत में एक अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क के रूप में लेखा-परीक्षा फर्म संचालन या लेखा-परीक्षक की अवधारणा को माना है, गौरतलब है कि उसी के मद्देनज़र दो सिफारिशें की गई हैं जैसा कि नीचे दिया गया है, हालाँकि ये सिफारिशें नियमों में कहीं भी मौजूद नहीं हैं।
    • अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क/संस्था पर मौद्रिक दंड (Monetary Penalties on International Network/Entity): समिति द्वारा अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क/संस्था पर मौद्रिक  दंड के रूप में सिविल दायित्व के अधिरोपण की सिफारिश की गई है इसी आधार पर भारत को इसकी सदस्यता प्रदान की गई, यदि कोई लेखा-परीक्षा असफल या फ्रॉड पाई जाती है तो उसका कारण उस विशेष नेटवर्क द्वारा अनुसरण किये गए किसी दोषपूर्ण कार्यप्रणाली से होता है।
    • NFRA का क्षेत्राधिकार: सर्वप्रथम राष्ट्रीय वित्तीय सूचना प्राधिकरण (NFRA) के क्षेत्राधिकार में सार्वजनिक कंपनियाँ (कुछ निर्धारित सीमाओं के साथ) एवं सूचीबद्ध कंपनियाँ शामिल हैं। NFRA का अधिकार क्षेत्र बहुत व्यापक प्रतीत होता है एवं इसका उद्देश्य भारत के साथ-साथ बाहरी संस्थाओं को भी नियंत्रित करना है। इन नियमों में सार्वजनिक हित में NFRA के लिये किसी इकाई को संदर्भित करने का अधिकार केंद्र सरकार को दे दिया गया है।
  • वित्तीय विवरणों का स्वत: संज्ञान लेना: NFRA को निगरानी और लेखांकन मानकों के अनुपालन को सही ढंग से लागू करने के लिये अपने क्षेत्राधिकार में आने वाली कंपनियों या निगमित निकायों के वित्तीय विवरणों की समीक्षा करने का अधिकार है।

निष्कर्ष

एक स्वतंत्र लेखा-परीक्षा नियामक के संबंध में यह उम्मीद की जाएगी कि NFRA निवेशकों के विश्वास को बढ़ाएगा एवं ऑडिटिंग पेशे में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करेगा। जैसा कि हम 

देखते हैं कि इसकी संरचना बहुत अधिक जटिल और बहुस्तरीय है जो निजी शासन में वृद्धि करेगा, यह  देखना दिलचस्प होगा कि NFRA सार्वजनिक हित एवं निवेशकों के हित,जमाकर्त्ता और कंपनियों या निकायों जो कॉरपोरेट के दायरे में आते है, के साथ जुड़े हुए अन्य पक्षों की सुरक्षा के लिये प्रहरी के रूप में किस प्रकार से कार्य करेगा।

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