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एडिटोरियल

  • 04 May, 2021
  • 9 min read
जीव विज्ञान और पर्यावरण

प्राकृतिक गैस : ऊर्जा संक्रमण का एक बेहतर विकल्प

यह एडिटोरियल दिनांक 02/05/2021 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख “India’s road to clean energy goes via natural gas” पर आधारित है। इसमें ऊर्जा संक्रमण के बेहतर विकल्प के रूप में प्राकृतिक गैस का उपयोग किये जाने के संबंध में चर्चा की गई है।

वर्तमान भारत के विभिन्न थिंक टैंक, जलवायु वार्ताकार, कॉरपोरेट और पर्यावरण संबंधी NGOs "शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन" की अवधारणा और इसे प्राप्त करने के उपयुक्त लक्ष्य वर्ष पर विचार कर रहे हैं।

इस लक्ष्य की प्राप्ति के संदर्भ में वैश्विक सर्वसम्मति प्राप्त करने हेतु किये जा रहे प्रयासों के क्रम में भारत को सबसे पहले अपने जीवाश्म ईंधन बास्केट को "हरित ईंधन बास्केट" के रूप में परिवर्तित करना होगा। ऊर्जा उपयोग में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को बढ़ाकर यह कार्य किया जा सकता है।

यद्यपि प्राकृतिक गैस अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक गैस मूल्य शृंखला के सभी क्षेत्रों- उत्पादन (घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय) से बाज़ारों (वर्तमान एवं उभरते हुए) तक परिवहन (पाइपलाइन एवं एलएनजी) और वाणिज्यिक (मूल्य निर्धारण, कराधान) तथा विनियामक मुद्दों के संदर्भ में नीतिगत सुधार किये जाने की आवश्यकता है।

प्राकृतिक गैस: एक बेहतर विकल्प के रूप में

  • वैविध्यपूर्ण और प्रचुरता: प्राकृतिक गैस के कई उपयोग हैं और यह सभी जीवाश्म ईंधनों में  "सबसे नया " है। इसके अलावा, यह भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। 
  • सरल संक्रमण ऊर्जा विकल्प: प्राकृतिक गैस का उपयोग एक व्यवहार्य संभावना है क्योंकि यह कोयला खदानों को बंद करने पर विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं होने देगी।
    • इसके अलावा, उद्योगों को अपनी प्रणाली के पुनः स्थापन में भारी निवेश करने की आवश्यकता नहीं होगी।
    • इसके अलावा, यह सरकार द्वारा पर्यावरण को प्रदूषित किये बिना सभी को सुरक्षित और सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराने के उद्देश्य को पूरा करने में मदद करेगी।
  • जीवाश्म ईंधन का अतिरिक्त उपयोग: ऊर्जा बास्केट में जीवाश्म ईंधन की औसत वैश्विक हिस्सेदारी 84% है जो भारत के लिये और भी अधिक है।
    • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है।
    • कोयले और तेल पर निर्भरता को कम किये जाने की आवश्यकता है तथा इसके लिये कोयले और तेल के स्थान पर प्राकृतिक गैस को अधिक-से-अधिक उपयोग में लाना होगा।

प्राकृतिक गैस क्षेत्र से जुड़ी चुनौतियाँ

  • मूल्य निर्धारण संबंधी विकृतियाँ: प्राकृतिक गैस के मूल्य का निर्धारण कई अलग-अलग सूत्रों पर आधारित होता है।
    • सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और निजी कंपनियों द्वारा घरेलू क्षेत्रों से उत्पादित गैस के मूल्यों में अंतर पाया जाता है।
    • इसी तरह, गहरे पानी के अपतटीय क्षेत्रों तथा उच्च तापमान वाले क्षेत्रों के तहत में किये गए उत्पादन के आधार पर भी मूल्यों में अंतर पाया जाता है।
    • यह प्रतिस्पर्द्धी मूल्य निर्धारण में समस्याएँ पैदा करता है।
  • प्रतिगामी कराधान प्रणाली: यह एक व्यापक संरचना है जिसके चलते गैस के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवाहित होने पर कर की दरों में वृद्धि होती है।
    • इसका तात्पर्य यह है कि गैस के स्रोत से दूर स्थित ग्राहक, स्रोत के निकट वाले ग्राहक की तुलना में अधिक कीमत चुकाते हैं। परिणामस्वरूप माँग में कमी होती है।
    • इसके अलावा, गैस क्षेत्र GST के दायरे में भी नहीं आता है।
  • हितों के टकराव की स्थिति: वर्तमान में गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (GAIL) गैस के उत्पादन, परिवहन और विपणन में संलग्न है।
    • इसके परिणामस्वरूप GAIL अपने प्रतिद्वंद्वियों को बाज़ार तक पहुँच से वंचित करने के लिये गैस पाइपलाइनों के संदर्भ में अपने स्वामित्व का लाभ उठा सकता है।
    • अधिकांश देशों ने परिवहन से अपस्ट्रीम (उत्पादन/आयात) और डाउनस्ट्रीम (विपणन) हितों को अलग कर इस संघर्ष की स्थिति का निपटान कर लिया है।
  • केंद्र और राज्यों का मुद्दा: भूमि अधिग्रहण, पाइपलाइन मार्ग तथा रॉयल्टी भुगतान जैसे मुद्दों पर केंद्र और राज्यों के बीच विवादों के कारण राष्ट्रीय पाइपलाइन ग्रिड का निर्माण प्रभावित हो रहा है।
    • केंद्र तथा राज्यों के बीच व्याप्त मतभेदों के कारण आयात सुविधाओं के निर्माण तथा गैस बाज़ारों के सृजन में भी देरी हुई है। 

आगे की राह 

  • मूल्य निर्धारण के विनियमन में ढील: घरेलू स्तर पर उत्पादित गैस के लिये मूल्य निर्धारण के विनियमन में ढील, गैस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के संदर्भ में बाज़ार सुधारों को सुनिश्चित करने का एक प्रमुख पहलू हो सकती है।
    • यह कदम घरेलू गैस की कीमतों के निर्धारण तथा विपणन में स्वतंत्रता प्रदान करेगा, जिससे घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा तथा निवेशकों के लिये निवेश करना अधिक व्यवहार्य हो जाएगा।
    • इसके अलावा, बाज़ार-आधारित और किफायती मूल्य निर्धारण से औद्योगिक विकास एवंआर्थिक प्रतिस्पर्द्धा को भी बढ़ावा मिलेगा।
  • अवसंरचना विकास: इन बाज़ारों को बुनियादी ढाँचे तक खुली पहुँच, सिस्टम ऑपरेटर, विच्छिन्न विपणन और परिवहन कार्य, बाज़ार-अनुकूल परिवहन तक पहुँच तथा टैरिफ़ के अलावा मज़बूत पाइपलाइन अवसंरचना जैसे कारकों से बहुत लाभ हुआ है।
    • साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय हेतु संस्थागत तंत्र स्थापित किया जाना चाहिये।
  • मुक्त गैस बाज़ार: प्राकृतिक गैस हेतु मूल्य बेंचमार्क सुनिश्चित करने से यह मूल्य शृंखला में प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देगा और डाउनस्ट्रीम बुनियादी ढाँचे के साथ इसके अन्वेषण एवं उत्पादन में निवेश को प्रोत्साहित करेगा।
    • इसके अलावा इसे GST ढाँचे के अंतर्गत शामिल करना और अति महत्त्वपूर्ण विनियामक ढाँचे का विकास जैसे कारक भी समग्र गैस बाज़ार वृद्धि एवं विकास में प्रमुख भूमिका निभाएँगे।

निष्कर्ष

यदि भारत वृद्धिशील रूप से आगे बढ़ता है तो इसके पास स्वच्छ ऊर्जा प्रणाली के गंतव्य तक पहुँचने का एक बेहतर अवसर है। इसके लिये भारत को अपनी ऊर्जा यात्रा में प्राकृतिक गैस को "अगला पड़ाव" बनाने की आवश्यकता है।

अभ्यास प्रश्न: "शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन" का लक्ष्य प्राप्त करने के संदर्भ में वैश्विक सर्वसम्मति प्राप्त करने हेतु किये जा रहे प्रयासों के क्रम में भारत को सबसे पहले अपने जीवाश्म ईंधन बास्केट को "हरित ईंधन बास्केट" के रूप में परिवर्तित करना होगा। विवेचना कीजिये।


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