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डेली न्यूज़

  • 18 Nov, 2021
  • 27 min read
अंतर्राष्ट्रीय संबंध

हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी

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प्रिलिम्स के लिये:

हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी, शुद्ध सुरक्षा प्रदाता

मेन्स के लिये:

हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी का भारत के लिये महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी (IONS) (प्रमुखों के सम्मेलन) के 7वें संस्करण की मेज़बानी फ्राँसीसी नौसेना द्वारा पेरिस में 15-16 नवंबर, 2021 से की जा रही है।

  • IONS का उद्घाटन संस्करण फरवरी 2008 में नई दिल्ली में आयोजित किया गया था, जिसमें भारतीय नौसेना दो वर्ष के लिये अध्यक्ष के रूप में चुनी गई थी। वर्तमान में IONS की अध्यक्षता फ्राँस के पास है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • ‘हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी’ (IONS) एक स्वैच्छिक और समावेशी पहल है, जो समुद्री सहयोग बढ़ाने व क्षेत्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिये हिंद महासागर क्षेत्र के तटीय राज्यों की नौसेनाओं को एक साथ लाती है।
    • यह प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध एक प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) सुनिश्चित करने का भी कार्य करती है।
    • ‘हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी’ (IONS) की अध्यक्षता भारत (2008-10), संयुक्त अरब अमीरात (2010-12), दक्षिण अफ्रीका (2012-14), ऑस्ट्रेलिया (2014-16), बांग्लादेश (2016-18) और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान (2018-21) द्वारा की गई है।
      • फ्राँस ने जून 2021 में दो वर्ष के कार्यकाल के लिये अध्यक्षता ग्रहण की।

सदस्य देश:

  • IONS में 24 सदस्य राष्ट्र शामिल हैं जो हिंद महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region- IOR) की सीमा पर मौजूद हैं तथा इसमें 8 पर्यवेक्षक देश शामिल हैं।
  • सदस्यों को भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर निम्नलिखित चार उप-क्षेत्रों में बाँटा गया है:
    • दक्षिण एशियाई समुद्र तट: बांग्लादेश, भारत, मालदीव, पाकिस्तान, सेशेल्स, श्रीलंका और यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र)।
    • पश्चिम एशियाई समुद्र तट: ईरान, ओमान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात।
    • पूर्वी अफ्रीकी समुद्र तट:  फ्रांँस (रीयूनियन), केन्या, मॉरीशस, मोज़ाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका और तंज़ानिया।
    • क्षिण-पूर्व एशियाई और ऑस्ट्रेलियाई समुद्र तट: ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्याँमार, सिंगापुर, थाईलैंड और  तिमोर-​लेस्ते।

भारत के लिये महत्त्व:

  • IONS इस क्षेत्र में भारत की तीन महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करता है:
    • हिंद महासागर के तटवर्ती राज्यों के साथ संबंधों को मज़बूत और गहरा करना।
    • शुद्ध सुरक्षा प्रदाता (Net Security Provider) होने की अपनी नेतृत्व क्षमता और आकांक्षाओं को पूरा करना।
    • IOR में नियम-आधारित और स्थिर समुद्री व्यवस्था के भारत के दृष्टिकोण को पूरा करना।
    •  यह भारत को मलक्का जलडमरूमध्य (Straits of Malacca) से होर्मुज़ (Hormuz) तक अपने प्रभाव क्षेत्र को मज़बूत करने में मदद करेगा।
    • IONS का उपयोग इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति को प्रतिसंतुलित करने के लिये किया जा सकता है।
  • IOR से जुड़े अन्य महत्त्वपूर्ण समूह/पहल:
    • हिंद महासागर रिम एसोसिएशन: हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) की स्थापना वर्ष 1997 में हुई थी।
      • इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र के भीतर क्षेत्रीय सहयोग और सतत् विकास को मज़बूत करना है।
    • हिंद महासागर आयोग: हाल ही में हिंद महासागर आयोग के पर्यवेक्षक के रूप में भारत का अनुमोदन किया गया है, यह एक अंतर-सरकारी संगठन है जो दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में बेहतर सागरीय-अभिशासन (Maritime Governance) की दिशा में कार्य करता है।
    • 'SAGAR' (हिंद महासागरीय क्षेत्र में सभी के लिये सुरक्षा एवं संवृद्धि): इसे वर्ष 2015 में लॉन्च किया गया था।
      • सागर (Security and Growth for All in the Region- SAGAR) के माध्यम से भारत अपने समुद्री पड़ोसियों के साथ आर्थिक एवं सुरक्षा सहयोग को मज़बूत करना चाहता है और उनकी समुद्री सुरक्षा क्षमताओं के निर्माण में सहायता करना चाहता है।
    • 'हिंद महासागर क्षेत्र के लिये सूचना संलयन केंद्र' (IFC-IOR): इसे भारत द्वारा वर्ष 2018 में समुद्री डेटा के क्षेत्रीय भंडार के रूप में स्थापित किया गया था।
    • एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा: वर्ष 2016 में भारत और जापान द्वारा जारी संयुक्त घोषणा में एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा (Asia Africa Growth Corridor- AAGC) का विचार उभरा था।
      • AAGC को विकास और सहयोग परियोजनाओं, गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढाँचे तथा संस्थागत कनेक्टिविटी, क्षमता व कौशल बढ़ाने जैसे लोगों की भागीदारी के चार स्तंभों पर स्थापित किया गया है।
    • बिम्सटेक (बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिये बंगाल की खाड़ी पहल): यह उप-क्षेत्रीय संगठन वर्ष 1997 में बैंकॉक घोषणा के माध्यम से अस्तित्व में आया। 
      • इसका मुख्य उद्देश्य तीव्र आर्थिक विकास के लिये अनुकूल वातावरण तैयार करना; सामाजिक प्रगति में तेज़ी लाना और IOR में साझा हित के मामलों पर सहयोग को बढ़ावा देना है।

स्रोत: पीआईबी


शासन व्यवस्था

डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम

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प्रिलिम्स के लिये:

DILRMP, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ, सार्वजनिक-निजी भागीदारी

मेन्स के लिये:

DILRMP का संक्षिप्त परिचय, DILRMP के घटक एवं लाभ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 'भूमि संवाद' - डिजिटल इंडिया भूमि रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) पर राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया।

  • मंत्रालय ने राष्ट्रीय सामान्य दस्तावेज़ पंजीकरण प्रणाली (NGDRS) पोर्टल और डैशबोर्ड भी लॉन्च किया।

प्रमुख बिंदु

  • शुरुआत:
    • डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) को कैबिनेट ने 21 अगस्त, 2008 को मंज़ूरी दी थी।
    • देश में भूमि अभिलेख प्रणाली के आधुनिकीकरण के लिये एक संशोधित कार्यक्रम अर्थात् राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (NLRMP) तैयार किया गया है जिसे अब डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) के नाम से जाना जाता है। 
    • भूमि अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण (CLR) और राजस्व प्रशासन के सुदृढ़ीकरण तथा भूमि अभिलेखों के अद्यतन (SRA&ULR) की दो केंद्र प्रायोजित योजनाओं को मिला दिया गया।
  • परिचय:
    • यह एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है जिसे अपने मूल लक्ष्यों को पूरा करने के साथ-साथ कई नई योजनाओं के साथ अपने दायरे का विस्तार करने के लिये 2023-24 तक बढ़ा दिया गया है।
    • यह देश भर में एक उपयुक्त एकीकृत भूमि सूचना प्रबंधन प्रणाली (ILIMS) विकसित करने के लिये विभिन्न राज्यों में भूमि अभिलेखों के क्षेत्र में मौजूद समानता पर आधारित होगी, जिसमें अलग-अलग राज्य अपनी विशिष्ट ज़रूरतों के अनुसार प्रासंगिक और उचित चीज़ो को जोड़ सकेंगे।
      • ILIMS: इस प्रणाली में पार्सल स्वामित्व, भूमि उपयोग, कराधान, स्थलों की सीमाएँ, भूमि मूल्य, ऋणभार और कई अन्य जानकारियाँ शामिल हैं।
    • इसे भूमि संसाधन विभाग (ग्रामीण विकास मंत्रालय) द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है।
  • उदेश्य:
    • अद्यतन भूमि अभिलेखों, संचालित और स्वचालित उत्परिवर्तन, पाठ्य और स्थानिक अभिलेखों के बीच एकीकरण, राजस्व एवं पंजीकरण के बीच अंतर-संयोजन, वर्तमान विलेख पंजीकरण तथा प्रकल्पित शीर्षक प्रणाली को शीर्षक गारंटी के साथ निर्णायक शीर्षक के साथ बदलने के लिये एक प्रणाली की शुरुआत करना।
  • घटक:
    • भूमि अभिलेखों का कंप्यूटरीकरण।
    • सर्वेक्षण/पुनः सर्वेक्षण।
    • पंजीकरण का कंप्यूटरीकरण।
    • तहसील/तालुका/सर्कल/ब्लॉक स्तर पर आधुनिक रिकॉर्ड रूम/भूमि अभिलेख प्रबंधन केंद्र।
    • प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण।
  • लाभ
    • इससे नागरिक को रियल-टाइम भूमि स्वामित्व रिकॉर्ड उपलब्ध होंगे।
    • रिकॉर्ड तक मुफ्त पहुँच नागरिक और सरकारी अधिकारियों के बीच इंटरफेस को कम करेगी, जिससे भ्रष्टाचार और उत्पीड़न में कमी आएगी।
      • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) बेहतर तरीके से सेवा वितरण सुनिश्चित करते हुए यह सरकारी तंत्र के साथ नागरिक इंटरफेस को और कम करेगा।
    • सिंगल-विंडो सेवा या वेब-सक्षम ‘एनीटाइम-एनीवेयर’ सुविधा नागरिक को RoRs (रिकॉर्ड ऑफ राइट्स) आदि को समय पर प्राप्त करने में सक्षम बनाएगा।
    • स्वचालित होने के कारण इससे धोखाधड़ी वाले संपत्ति सौदों के दायरे में काफी कमी आएगी।
    • निर्णायक भूमि स्वामित्व से मुकदमेबाज़ी में भी काफी कमी आएगी।
    • कंप्यूटर के माध्यम से नागरिक को भूमि डेटा (जैसे- अधिवास, जाति, आय आदि) के आधार पर प्रमाण पत्र उपलब्ध होंगे।
    • यह पद्धति क्रेडिट सुविधाओं के लिये ई-लिंकेज की अनुमति देगी।
    • सरकारी कार्यक्रमों के लिये पात्रता की जानकारी आँकड़ों के आधार पर उपलब्ध होगी।
  • अन्य संबंधित पहलें
    • राष्ट्रीय सामान्य दस्तावेज़ पंजीकरण प्रणाली:
      • यह मौजूदा मैनुअल पंजीकरण प्रणाली से बिक्री-खरीद और भूमि के हस्तांतरण में सभी लेन-देन के ऑनलाइन पंजीकरण की ओर एक बड़ा बदलाव है।
      • यह राष्ट्रीय एकता की दिशा में एक बड़ा कदम है और 'वन नेशन वन सॉफ्टवेयर' को भी बढ़ावा देगा।
    • विशिष्ट भूखंड पहचान संख्या
      • ULPIN को ‘भूमि की आधार संख्या’ के रूप में वर्णित किया जाता है। यह एक ऐसी संख्या है जो भूमि के उस प्रत्येक खंड की पहचान करेगी जिसका सर्वेक्षण हो चुका है,  विशेष रूप से ग्रामीण भारत में, जहाँ सामान्यतः भूमि-अभिलेख काफी पुराने एवं  विवादित होते हैं। इससे भूमि संबंधी धोखाधड़ी पर रोक लगेगी।

स्रोत: पीआईबी


सामाजिक न्याय

सीखने की प्रक्रिया पर कोविड-19 का प्रभाव: ASER 2021

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प्रिलिम्स के लिये:

प्रौद्योगिकी के लिये राष्ट्रीय शैक्षिक गठबंधन, राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क, प्रज्ञाता दिशा-निर्देश, प्रौद्योगिकी वर्द्धन शिक्षा पर राष्ट्रीय कार्यक्रम

मेन्स के लिये:

शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट के महत्त्वपूर्ण बिंदु 

चर्चा में क्यों?   

हाल ही में शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (Annual Status of Education Report- ASER 2021) सर्वेक्षण का 16वांँ संस्करण जारी किया गया। सर्वेक्षण में सीखने की प्रक्रिया पर कोविड-19 के प्रभाव का विश्लेषण किया गया।

  • यह निजी ट्यूशनों पर निर्भरता में वृद्धि और स्मार्टफोन तक पहुंँच की अनुपस्थिति को दर्शाता है। 
  • विशेष रूप से छोटी कक्षाओं में सीखने के नुकसान की भरपाई में मदद करने के लिये विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट सर्वेक्षण:

  • प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन (Pratham Education Foundation) द्वारा संचालित एएसईआर सर्वेक्षण देश में अपनी तरह का सबसे पुराना सर्वेक्षण है।
  • यह प्रारंभिक स्तर पर आधारभूत शिक्षा के स्तरों पर प्रदान की जाने वाली अंतर्दृष्टि की श्रेणी हेतु सबसे बेहतर माना जाता है।
  • यह वर्ष 2011 की जनगणना को सैंपलिंग फ्रेम के रूप में उपयोग करता है और देश भर में बच्चों के मूलभूत कौशल के बारे में जानकारी का एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय स्रोत बना हुआ है।
  • ASER 2018 में 3 से 16 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों का सर्वेक्षण किया गया और भारत के लगभग सभी ग्रामीण ज़िलों को शामिल किया तथा 5 से 16 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों की मूलभूत पढ़ने और अंकगणितीय क्षमताओं का अनुमान लगाया गया।
  • ASER 2019 ने 26 ग्रामीण ज़िलों में 4 से 8 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों की प्री-स्कूल या स्कूली शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट प्रस्तुत की तथा सामग्री ज्ञान  के बजाए 'शुरुआती वर्षों' पर ध्यान केंद्रित किया और 'समस्या-समाधान संकायों के विकास व बच्चों की स्मृति के निर्माण'  पर ज़ोर दिया गया। 
  • ASER 2020 पहला फोन-आधारित सर्वेक्षण है जिसे स्कूल बंद होने के छठे महीने में सितंबर 2020 में आयोजित किया गया था।

प्रमुख बिंदु 

  •  सरकारी स्कूलों में नामांकन में वृद्धि:
    • सरकारी स्कूल के छात्रों के नामांकन में एक अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई, जबकि निजी स्कूलों में नामांकन दर का स्तर पिछले 10 वर्षों में सबसे कम रहा।
    • निजी स्कूलों के बजाए सरकारी स्कूलों में स्पष्ट वृद्धि/बदलाव देखा गया जो वर्ष 2018 में 64.3% वर्ष 2020 में 65.8% तथा वर्ष 2021 में 70.3% हो गया।
    • निजी स्कूलों में नामांकन में वर्ष 2020 में 28.8% से वर्ष 2021 में 24.4% की गिरावट दर्ज की गई है।
  • ट्यूशन पर निर्भरता:
    • निजी ट्यूशन कक्षाओं पर निर्भरता में वृद्धि देखी गई।
    • छात्र, विशेष रूप से गरीब परिवारों के छात्रों की निजी ट्यूशन पर पहले से कहीं अधिक निर्भरता बढ़ी है।
  • डिजिटल डिवाइड:
    • एक बड़ा डिजिटल विभाजन मौजूद है, जो प्राथमिक कक्षा के छात्रों की सीखने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
    • पहली और दूसरी कक्षा के लगभग एक-तिहाई बच्चों के पास घर पर स्मार्टफोन उपलब्ध नहीं था।
  • नए प्रवेशकों के साथ समस्याएँ:
    • प्री-प्राइमरी क्लास या आंगनवाड़ी का कोई अनुभव नहीं होने के कारण डिजिटल उपकरणों तक पहुँच की कमी तथा महामारी ने भारत की औपचारिक शिक्षा प्रणाली में सबसे कम उम्र के प्रवेशकों को विशेष रूप से कमज़ोर बना दिया है।
    • कक्षा I और II में 3 में से 1 बच्चे ने कभी भी व्यक्तिगत कक्षा में भाग नहीं लिया है।
    • महामारी के बाद स्कूल प्रणाली में प्रवेश करने वाले छात्रों को औपचारिक शिक्षा प्रणाली हेतु वातावरण तैयार करने के लिये समय की आवश्यकता होगी।
  • अधिगम अंतराल:
    • 65.4% शिक्षकों ने बच्चों के ‘समझने में असमर्थ’ होने की समस्या को अपनी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक के रूप में चिह्नित किया।
    • एक चेतावनी यह भी दी गई है कि उनके सीखने के परिणाम प्रभावित होंगे जब तक कि उनका तत्काल समाधान नहीं किया जाता है।
    • केंद्र सरकार के हालिया राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) के दौरान देश भर के शिक्षकों और क्षेत्र जाँचकर्त्ताओं ने बताया कि प्राथमिक कक्षा के बच्चों को बुनियादी समझ और संख्यात्मक कौशल का परीक्षण करने वाले प्रश्नों की प्रकृति को समझने हेतु संघर्ष करना पड़ा।
  • सकारात्मक दृष्टिकोण: रिपोर्ट में उन बच्चों के अनुपात में गिरावट दर्ज की गई है जो वर्तमान में 15-16 आयु वर्ग में नामांकित नहीं हैं। यह उन वर्गों में से एक है जो स्कूल छोड़ने वाले मुद्दों के उच्चतम जोखिम का सामना करता है।
    • वर्ष 2010 में 15-16 वर्ष के बच्चों का अनुपात 16.1% (स्कूल में नामांकन नहीं) था।
    • माध्यमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने के लिये सरकार के अथक प्रयास के बावजूद यह संख्या लगातार घट रही है और वर्ष 2018 में यह 12.1% थी। यह गिरावट वर्ष 2020 में 9.9% और 2021 में 6.6% हो गई।

ASER-2021

आगे की राह

  • एक बहु-आयामी दृष्टिकोण: छात्रों के एक बड़े वर्ग को शिक्षा तक पहुँच प्रदान करने के लिये स्कूलों, शिक्षकों और अभिभावकों के सहयोग से अकादमिक समय सारिणी का लचीला पुनर्निर्धारण और विकल्प तलाशना।
    • कम सुविधा वाले उन छात्रों को प्राथमिकता देना जिनकी ई-लर्निंग तक पहुँच नहीं है।
  • ऑनलाइन शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाना: लंबे समय तक निरूद्देश्य बैठने और एकतरफा संचार के बजाय छोटी लेकिन गुणवत्तापूर्ण चर्चाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
    • शिक्षक की भूमिका केवल कक्षा पर नियंत्रण से आगे बढ़कर ज्ञान के हस्तांतरण के लिये एक सूत्रधार होने की है।
  • ज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर अधिक ध्यान देना: शिक्षा योग्यता के बारे में नहीं बल्कि प्रेरणा के बारे में अधिक महत्त्वपूर्ण है। छात्रों को केवल पाठ्यक्रम को कवर करने के उद्देश्य न पढ़ाकर बल्कि उस विषय की समझ विकसित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 


शासन व्यवस्था

रिश्वत जोखिम मैट्रिक्स-2021

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प्रिलिम्स के लिये:

केंद्रीय सतर्कता आयोग, सरकारी ई-मार्केटप्लेस, रिश्वत जोखिम मैट्रिक्स

मेन्स के लिये:

रिश्वत जोखिम मैट्रिक्स संबंधी मुख्य निष्कर्ष

चर्चा में क्यों?

हाल ही में रिश्वत-रोधी मानक निर्धारण संगठन- ‘TRACE’ द्वारा ‘रिश्वत जोखिम मैट्रिक्स-2021’ जारी किया गया।

प्रमुख बिंदु

  • मैट्रिक्स के विषय में:
    • यह 194 देशों, क्षेत्रों और स्वायत्त एवं अर्द्ध-स्वायत्त क्षेत्रों में रिश्वतखोरी जोखिम को मापता है।
    • यह मूलतः वर्ष 2014 में दुनिया भर में वाणिज्यिक रिश्वतखोरी के जोखिमों के बारे में अधिक विश्वसनीय और सूक्ष्म जानकारी संबंधी व्यावसायिक समुदाय की आवश्यकता को पूरा करने के लिये प्रकाशित किया गया था।
    • यह संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय में ‘वी-डेम’ संस्थान और विश्व आर्थिक मंच सहित प्रमुख सार्वजनिक हित एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से प्राप्त प्रासंगिक डेटा एकत्र करता है।
  • गणना की विधि: स्कोर की गणना चार कारकों के आधार पर की जाती है:
    • प्रवर्तन और रिश्वत विरोधी निरोध।
    • सरकार के साथ व्यापार वार्ता।
    • सरकार और सिविल सेवा में पारदर्शिता।
    • नागरिक समाज की निगरानी की क्षमता जिसमें मीडिया की भूमिका भी शामिल है।
  • विभिन्न देशों का प्रदर्शन:
    • भारत:
      • भारत वर्ष 2021 में 82वें स्थान पर खिसक गया है, जो पिछले साल के 77वें स्थान से पाँच स्थान नीचे है।
        • वर्ष 2020 में भारत 45 के स्कोर के साथ 77वें स्थान पर था, जबकि इस वर्ष भारत 44 के स्कोर के साथ 82वें स्थान पर रहा।
      • भारत ने अपने पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बांग्लादेश से बेहतर प्रदर्शन किया। हालाँकि भूटान ने 62वीं रैंक हासिल की है।
    • विश्व:
      • उत्तर कोरिया, तुर्कमेनिस्तान, वेनेज़ुएला और इरिट्रिया में सबसे अधिक व्यावसायिक रिश्वतखोरी का जोखिम मौजूद है, जबकि डेनमार्क, नॉर्वे, फिनलैंड, स्वीडन और न्यूजीलैंड में सबसे कम जोखिम है।
      • पिछले पाँच वर्षों में वैश्विक रुझानों की तुलना में संयुक्त राज्य अमेरिका में रिश्वतखोरी जोखिम का माहौल काफी खराब हो गया है।
      • वर्ष 2020 से वर्ष 2021 तक खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सभी देशों ने वाणिज्यिक रिश्वतखोरी के जोखिम में वृद्धि देखी है।
  • भारत द्वारा उठाए गए संबंधित कदम: भारत ने "भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस" की अपनी प्रतिबद्धता के अनुसरण में भ्रष्टाचार से निपटने के लिये कई उपाय किये हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
    • पारदर्शी नागरिक अनुकूल सेवाएँ प्रदान करने और भ्रष्टाचार को कम करने के लिये प्रणालीगत सुधार। इनमें अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित शामिल हैं:
      • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण पहल के माध्यम से पारदर्शी तरीके से सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत नागरिकों को सीधे कल्याणकारी लाभ का वितरण।
      • सार्वजनिक खरीद में ई-टेंडरिंग का कार्यान्वयन।
      • ई-गवर्नेंस की शुरुआत और प्रणालियों का सरलीकरण।
      • सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के माध्यम से सरकारी खरीद की शुरुआत।
    • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988:
      • यह स्पष्ट रूप से रिश्वत देने के कृत्य का अपराधीकरण करता है और वाणिज्यिक संगठनों के वरिष्ठ प्रबंधन के बड़े भ्रष्टाचार को रोकने में मदद करेगा।
    • केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) ने विभिन्न आदेशों और परिपत्रों के माध्यम से प्रमुख खरीद गतिविधियों में सभी संगठनों के लिये सत्यनिष्ठा समझौते को अपनाने तथा जहाँ भी कोई अनियमितता/कदाचार देखा जाता है, वहाँ प्रभावी और त्वरित जाँच सुनिश्चित करने की सिफारिश की है।
    • लोकपाल संस्था का संचालन अध्यक्ष और नियुक्त सदस्यों द्वारा किया जाता है।
      • लोकपाल को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत लोक सेवकों के खिलाफ कथित अपराधों के संबंध में शिकायतों को सीधे प्राप्त करने और जाँच करने का  वैधानिक अधिकार है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


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