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डेली न्यूज़

  • 12 Apr, 2022
  • 54 min read
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

दवा वितरण हेतु ‘माइक्रोस्विमर’

प्रीलिम्स के लिये:

माइक्रोस्विमर्स, फोटोकैटलिटिक, PHI कार्बन नाइट्राइड।

मेन्स के लिये:

ड्रग डिलीवरी, रोबोटिक्स।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में शोध से पता चला है कि मानव शरीर में बेहतर दवा-वितरण हेतु माइक्रोबॉट्स को स्थानांतरित करने के लिये ईंधन के रूप में प्रकाश का उपयोग करना संभव है। गौरतलब है कि यह दवा-वितरण प्रक्रिया कैंसर कोशिकाओं के प्रति चुनिंदा रूप से संवेदनशील होती है।

  • इन माइक्रोबॉट्स को माइक्रोस्विमर्स कहा जाता है।
  • अनुसंधान का नेतृत्व मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर इंटेलिजेंट सिस्टम्स (MPI-IS) और मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर सॉलिड स्टेट रिसर्च (MPI-FKF), स्टटगार्ट, जर्मनी द्वारा किया गया।

Micro-Swimmers

शोध के प्रमुख बिंदु:

  • परिचय: 
  • ये माइक्रोबॉट्स द्वि-आयामी यौगिक पॉली (हेप्टाज़िन इमाइड) कार्बन नाइट्राइड (यानी PHI कार्बन नाइट्राइड) से बने हैं।
    • ये माइक्रोबॉट्स छोटे इंसानों की तरह ही हैं।
    • वे आकार में 1-10 माइक्रोमीटर (एक माइक्रोमीटर एक मीटर का दस लाखवाँ हिस्सा) तक होते हैं और चमकदार रोशनी के कारण सक्रिय होने पर स्वयं को आगे बढ़ा सकते हैं।
  • माइक्रोबॉट्स कैसे तैरते हैं?
  •  PHI कार्बन नाइट्राइड माइक्रोपार्टिकल्स फोटोकैटलिटिक होते हैं।
    • ये कण लगभग गोलाकार होते हैं और प्रायः प्रकाश के कारण गोले का आधा हिस्सा रोशन हो जाता है, जबकि दूसरे हिस्से में अंधेरा रहता है।
    • चूँकि फोटोकैटलिटिक प्रकाश-चालित होता है, यह केवल प्रकाश वाले हिस्से में ही होता है।
    • जैसे ही आयन (Ions) प्रकाश वाले पक्ष से अंधेरे पक्ष की ओर बढ़ते हैं, माइक्रोस्विमर्स प्रकाश स्रोत की दिशा की ओर बढ़ते हैं।
  • कण के विद्युत क्षेत्र के साथ संयुक्त यह प्रतिक्रिया माइक्रोबॉट्स यानी माइक्रोस्विमर्स को आगे बढ़ने अथवा तैरने में मदद करती है।
  • बाधाएँ: शरीर के तरल पदार्थ और रक्त में घुले हुए लवण।
    • लवण की उपस्थिति के कारण नमक आयन प्रतिक्रिया आयन को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने से रोकते हैं, क्योंकि वे उन्हें बाँध देते हैं और उनके आगे बढ़ने का क्रम रुक जाता है।
    • इसलिये सभी तैराक लवण/नमक युक्त घोल में तैर नहीं सकते।
    • उदाहरण के लिये पानी में घुलने पर साधारण नमक (NaCl) सोडियम (Na +) और क्लोराइड (Cl -) आयन में टूट जाते हैं।
    • ये आयन फोटोकैटलिटिक (Photocatalytic) प्रतिक्रिया द्वारा निर्मित आयन्स को बेअसर कर देंगे, जिससे उनके स्वयं का संचालन बाधित हो जाएगा।
  • अनुसंधान का योगदान: शोधकर्त्ताओं ने पाया कि नमक युक्त घोल में आयन PHI कार्बन नाइट्राइड के छिद्रों से होकर गुज़रते हैं। इस प्रकार नमक आयन्स से बहुत कम या कोई प्रतिरोध नहीं होती।
    • तरल पदार्थ से नमक आयन्स के अलग होने के अलावा माइक्रोपार्टिकल्स पर रिक्तियाँ और छिद्र कार्गो बे (Cargo Bays) के रूप में कार्य करते थे तथा बड़ी मात्रा में दवा को अवशोषित कर सकते थे।
    • अतीत में शुरू की गई दवा वितरण के लिये सूक्ष्म तैराक (माइक्रोस्विमर्स) 'कृत्रिम कैप्सूल' पर निर्भर रहते थे, जिन्हें दवाओं से भर दिया जाता था तथा शरीर के विशिष्ट भागों में पहुँचाया जाता था।
      • हालाँकि इन कैप्सूल्स को बनाना जटिल और महँगा हो सकता है। इसके विपरीत शोधकर्त्ताओं द्वारा उपयोग किये जाने वाले कण सस्ते, कार्बनिक और स्पंजी होते हैं, जो सीधे दवाओं या अन्य पदार्थों से जुड़े होते हैं।
      • इसका मतलब है कि उन्हें बड़े पैमाने पर लागू करना आसान हो सकता है। उल्लेखनीय रूप से उन्हें अतीत में उपयोग की जाने वाली अन्य सामग्रियों की तुलना में अधिक दवाओं (यानी अपने स्वयं के द्रव्यमान का 185%) से भी भरा जा सकता है।
  • महत्त्व: माइक्रोस्विमर्स डॉक्टरों को मानव शरीर के अंदर लक्षित क्षेत्रों में दवाएँ पहुँचाने की अनुमति दे सकते हैं।
    • माइक्रोस्विमर्स झीलों या समुद्र में विशिष्ट पदार्थों को पेश करने में भी मदद कर सकते हैं।
    • उदाहरण के लिये माइक्रोस्विमर को विशिष्ट जानवरों की प्रजातियों को ठीक करने या हानिकारक जीवों को खत्म करने हेतु लुप्तप्राय प्राकृतिक वातावरण में तैनात किया जा सकता है।

Biomedical-Applications

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पिछले वर्ष के प्रश्न:

प्रश्न. स्वास्थ्य क्षेत्र में नैनो तकनीक के प्रयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं? (2015)

  1. नैनो तकनीक द्वारा लक्षित दवा वितरण को संभव बनाया गया है।
  2. नैनो तकनीक काफी हद तक जीन थेरेपी में योगदान कर सकती है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 
(b)  केवल 2
(c) 1 और  2 दोनों 
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)

  • नैनो तकनीक में 1 एनएम (यानी, नैनोमीटर) और 100 एनएम आकार के बीच की संरचनाओं का अध्ययन और उपयोग किया जाता है।
  • स्वास्थ्य क्षेत्र में नैनो तकनीक का उपयोग लक्षित दवा वितरण हेतु किया जा सकता है और साथ ही यह जीन थेरेपी में भी मदद कर सकती है।
  • जीन थेरेपी में किसी बीमारी के इलाज या रोकथाम हेतु जीन का उपयोग किया जाता है। यह डॉक्टरों को दवाओं या सर्जरी का उपयोग करने के बजाय रोगी की कोशिकाओं में जीन को प्रविष्ट कर विकार का इलाज करने की अनुमति देती है।

स्रोत: द हिंदू  


जैव विविधता और पर्यावरण

राज्य ऊर्जा और जलवायु सूचकांक

प्रिलिम्स के लिये:

वैश्विक जलवायु सूचकांक और भारत की रैंकिंग, राज्य ऊर्जा और जलवायु सूचकांक, नीति आयोग।

मेन्स के लिये:

नेट ज़ीरो कार्बन एमिशन की दिशा में भारत का योगदान, CoP-26 में जलवायु परिवर्तन के लिये पंचामृत की वकालत, संरक्षण।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नीति आयोग ने राज्य ऊर्जा और जलवायु सूचकांक (State Energy and Climate Index- SECI) लॉन्च किया। यह पहला सूचकांक है जिसका उद्देश्य जलवायु और ऊर्जा क्षेत्र में राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा किये गए प्रयासों को ट्रैक करना है।

  • सूचकांक के मापदंडों को जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिये भारत के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।

SECI के प्रमुख बिंदु:

  • उद्देश्य: सूचकांक के प्रमुख उद्देश्य:
    • ऊर्जा पहुँच, ऊर्जा खपत, ऊर्जा दक्षता और पर्यावरण की सुरक्षा में सुधार के प्रयासों के आधार पर राज्यों की रैंकिंग।
    • राज्य स्तर पर सस्ती, सुलभ, कुशल और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के एजेंडे को चलाने में मदद करना।
    • ऊर्जा और जलवायु के विभिन्न आयामों पर राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित करना।
  • मुख्य घटक: स्टेट एनर्जी एंड क्लाइमेट इंडेक्स (SECI) राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को छह मापदंडों पर रैंक प्रदान करता है:
    • डिस्कॉम' (विद्युत वितरण कंपनियाँ) प्रदर्शन।
    • सामर्थ्य पहुँच और ऊर्जा की विश्वसनीयता।
    • स्वच्छ ऊर्जा पहल।
    • ऊर्जा दक्षता।
    • पर्यावरणीय स्थिरता।
    • नई पहल।
  • वर्गीकरण: SECI स्कोर के परिणाम के आधार पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन समूहों में वर्गीकृत किया गया है- फ्रंट रनर, अचीवर्स और एस्पिरेंट्स।
    • शीर्ष प्रदर्शनकर्त्ता: गुजरात, केरल और पंजाब को नीति आयोग के SECI में शीर्ष प्रदर्शन करने वाले तीन राज्यों के रूप में चुना गया है।
      • छोटे राज्यों में शीर्ष प्रदर्शन करने वाले तीन राज्य हैं: गोवा, त्रिपुरा और मणिपुर
    • असंतोषजनक प्रदर्शन: छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और झारखंड राज्यों को सबसे नीचे रखा गया।

SECI-Score

  • आवश्यकता: भारत एक संसाधन संपन्न और विविधतापूर्ण देश है। इसके कई राज्य क्षेत्रफल, जनसंख्या और संसाधनों की विविधता के मामले में यूरोपीय संघ के देशों से तुलनीय हैं।
    • इस प्रकार एक ही आकार के सभी दृष्टिकोण (One-Size-Fits-All approach) सभी राज्यों के लिये उपयुक्त नहीं है क्योंकि प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश (UT) संस्कृति, भूगोल और ऊर्जा संसाधनों के उपयोग के संदर्भ में भिन्न है।
    • प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के पास अपनी क्षमता और क्षमता का दोहन करने के लिये अपनी स्वयं की नीति होना अनिवार्य है।

जलवायु परिवर्तन से संबंधित भारत की प्रतिबद्धताएंँ:

  • प्रधानमंत्री ने CoP26 शिखर सम्मेलन में जलवायु कार्रवाई के लिये भारत की ओर से पाँच प्रतिबद्धताएँ प्रस्तुत कीं, इनमें शामिल हैं:
    • वर्ष 2030 तक भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट (GW) तक बढ़ाना।
    • वर्ष 2030 तक भारत की 50% ऊर्जा आवश्यकताओं को अक्षय ऊर्जा के माध्यम से पूरा करना।
    • वर्ष 2030 तक भारत की अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता में 45% से अधिक की कमी करना।
    • अब से वर्ष 2030 तक इसके शुद्ध अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 बिलियन टन की कटौती करना।
    • वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करना।

Summarised-list-of-Global-indices

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न:

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2016)

  1. वर्ष 2015 में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन को संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में शुरू किया गया था।
  2. गठबंधन में संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश शामिल हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल1 
(b) केवल 2 
(c) 1 और 2 दोनों 
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a)

  • भारतीय प्रधानमंत्री और फ्रांँसीसी राष्ट्रपति द्वारा नवंबर 2015 में पेरिस में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का शुभारंभ किया गया था। अत: कथन 1 सही है।
  • प्रारंभिक चरण में आईएसए को कर्क रेखा और मकर रेखा (उष्ण क्षेत्र) के बीच पूर्ण या आंशिक रूप से स्थित देशों की सदस्यता के लिये खोल गया था। वर्ष 2018 में ISA की सदस्यता संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों के लिये खोली गई थी। हालाँकि संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश इसके सदस्य नहीं हैं। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • अत:  विकल्प (A) सही उत्तर है।

प्रश्न. वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC की बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं? (2016)

  1. इस समझौते पर UN के सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किये थे और यह वर्ष 2017 में लागू हुआ। 
  2. समझौते का लक्ष्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सीमित करना है, ताकि इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस या 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न हो। 
  3. विकसित देशों ने ग्लोबल वार्मिंग में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकार किया और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये विकासशील देशों की मदद करने हेतु वर्ष 2020 से प्रतिवर्ष 1000 बिलियन डॉलर का दान करने के लिये प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 3 
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3 
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

  • पेरिस समझौते को दिसंबर 2015 में पेरिस, फ्राँस में COP21 में पार्टियों के सम्मेलन (COP) द्वारा संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के माध्यम से अपनाया गया था। यह 4 नवंबर, 2016 को लागू हुआ। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • समझौते का उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सीमित करना है, ताकि इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस या 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न हो। अत: कथन 2 सही है।
  • वर्ष 2010 में कानकुन समझौतों के माध्यम से विकसित देशों ने विकासशील देशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये वर्ष 2020 तक प्रतिवर्ष संयुक्त रूप से 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाने के लक्ष्य के लिये प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है।
  • इसके अलावा वे इस बात पर भी सहमत हुए कि वर्ष 2025 से पहले पेरिस समझौते के तहत प्रतिवर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर का एक नया सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य निर्धारित किया जाएगा। अत: कथन 3 सही नहीं है।
  • अतः विकल्प (b) सही है।

स्रोत: द हिंदू


जैव विविधता और पर्यावरण

तटीय क्षरण

प्रिलिम्स के लिये:

तटीय क्षरण, भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र, तटीय सुभेद्यता सूचकांक।

मेन्स के लिये:

तटीय क्षरण के कारक और इसका प्रभाव, संरक्षण।

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा लोकसभा को सूचित किया गया कि मुख्य भूमि की 6,907.18 किमी. लंबी भारतीय तटरेखा में से एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र तटीय कटाव/क्षरण (Coastal Erosion) की स्थिति के अंतर्गत है।

  • लगभग 34% क्षेत्र कटाव की अलग-अलग स्थिति में है, जबकि 26% समुद्र तट एक अभिवृद्धि प्रकृति (Accreting Nature) को दर्शाता है तथा शेष 40% समुद्र तट स्थिर अवस्था में है।
  • वर्ष 1990 से वर्ष 2018 की अवधि के दौरान पश्चिम बंगाल में लगभग 60.5% तट (323.07 किमी.) का कटाव हुआ। इसके बाद क्रमशः केरल (46.4%) और तमिलनाडु (42.7%) का स्थान है।
  • इससे पूर्व इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओशन इंफॉर्मेशन सर्विसेज़ (Indian National Centre for Ocean Information Services- INCOIS) द्वारा भारत के संपूर्ण समुद्र तट के लिये तटीय सुभेद्यता सूचकांक (Coastal Vulnerability Index- CVI) मानचित्रों का एक एटलस तैयार कर उसका प्रकाशन किया  गया था।

तटीय अपरदन/क्षरण:

  • तटीय क्षरण के बारे में:
    • तटीय क्षरण वह प्रक्रिया है जिसमें मज़बूत लहरों के कारण तटीय क्षेत्र में आई बाढ़ अपने साथ चट्टानों, मिट्टी और/या रेत को नीचे (समुद्र में) की और ले जाती है जिसके कारण  स्थानीय समुद्र का जल स्तर बढ़ता है। 
      • अपरदन और अभिवृद्धि: क्षरण और अभिवृद्धि एक-दूसरे के पूरक हैं। रेत एवं तलछट एक तरफ से बहकर कहीं और तट पर जाकर जमा हो जाते हैं।
      • मृदा अपरदन के कारण भूमि और मानव आवासों का ह्रास होता है क्योंकि समुद्र का पानी समुद्र तट के साथ मृदा क्षेत्र को भी अपने साथ बहा कर ले जाता है।
      • दूसरी ओर, मृदा अभिवृद्धि से भूमि क्षेत्र में वृद्धि होती है।
  • प्रभाव: मनोरंजक गतिविधियाँ (सूर्य स्नान, पिकनिक, तैराकी, सर्फिंग, मछली पकड़ना, नौका विहार, गोताखोरी आदि) प्रभावित हो सकती हैं यदि मौजूदा समुद्र तटों की चौड़ाई कम हो जाए या वे पूरी तरह से गायब हो जाएँ। साथ ही तटीय समुदायों की आजीविका पर भी असर पड़ सकता है।
  • उपाय: मैंग्रोव, कोरल रीफ और लैगून समुद्री तूफानों एवं कटाव के खिलाफ सबसे अच्छे बचाव साधन माने जाते हैं, क्योंकि वे समुद्री तूफानों की अधिकांश ऊर्जा को विक्षेपित और अवशोषित कर लेते हैं,  इसलिये तट सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के लिये इन प्राकृतिक आवासों को बनाए रखना आवश्यक है।

Coastal-erosion-cause

तटीय क्षरण का कारण:

प्राकृतिक

कृत्रिम

a) ‘वेव ब्रेकिंग’ की क्रिया

a) अनियोजित संरचना का निर्माण

b) गंभीर चक्रवाती तूफान का प्रभाव

b) नदी के बाँध के कारण तलछट की आपूर्ति में कमी

c) समुद्र स्तर में वृद्धि

c) समुद्र तटों से रेत हटाना

d) अपस्फीति

d) इनलेट चैनल का निकर्षण

e) ज्वारीय धारा

e) अनियोजित सुधार

  • प्राकृतिक घटनाएँ:
    • तरंग ऊर्जा को तटीय क्षरण का प्राथमिक कारण माना जाता है।
    • जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप महाद्वीपीय हिमनदों और बर्फ की चादरों के पिघलने के कारण चक्रवात, समुद्री जल का थर्मल विस्तार, तूफान, सुनामी जैसे प्राकृतिक खतरे क्षरण को तेज़ करते हैं।
  • तटीय बहाव:
    • तटवर्ती रेत के बहाव को भी तटीय कटाव के प्रमुख कारणों में से एक माना जा सकता है।
      • तटीय बहाव का अर्थ है प्रचलित हवाओं के कारण उत्पन्न लहरों द्वारा समुद्र या झील के किनारे से लगी तलछट की प्राकृतिक गति।
  • मानवजनित गतिविधियाँ:
    • रेत खनन और प्रवाल खनन ने तटीय क्षरण में योगदान दिया है जिससे तलछट में  कमी देखी गई है।
      • नदी के मुहाने से तलछट के प्रवाह को कम करने वाली नदियों और बंदरगाहों के जलग्रहण क्षेत्र में बनाए गए मछली पकड़ने के बंदरगाहों तथा बाँधों ने तटीय क्षरण को बढ़ावा दिया है।

तटीय प्रबंधन के लिये भारतीय पहलें:

  • राष्ट्रीय सतत् तटीय प्रबंधन केंद्र:
    • इसका उद्देश्य पारंपरिक तटीय और द्वीप समुदायों के लिये लाभ सुनिश्चित करने हेतु भारत में तटीय एवं समुद्री क्षेत्रों के एकीकृत व सतत् प्रबंधन को बढ़ावा देना है।
  • एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन योजना:
    • यह स्थिरता प्राप्त करने हेतु भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं सहित तटीय क्षेत्र के सभी पहलुओं के संबंध में एक एकीकृत दृष्टिकोण का उपयोग कर तटीय प्रबंधन संबंधी एक प्रक्रिया है।
  • तटीय विनियमन क्षेत्र:
    • भारत के तटीय क्षेत्रों में गतिविधियों को विनियमित करने के लिये पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) संबंधी अधिसूचना वर्ष 1991 में जारी की गई थी।

तटीय सुरक्षा के तरीके:

  • कृत्रिम समुद्र तट पोषण।
  • सुरक्षात्मक संरचनाएँ सीवॉल्स, रिवेटमेंट्स।
  • तलछट के बहाव को रोकने हेतु संरचनाएँ।
  • कृत्रिम समुद्र तट पोषण और इन संरचनाओं का संयोजन।
  • समुद्र तट भूजल तालिका या समुद्र तट जल निकासी प्रणाली का नियंत्रण।
  • वनस्पति रोपण।
  • जियो-सिंथेटिक ट्यूब/बैग का उपयोग।

आगे की राह

  • पंद्रहवें वित्त आयोग ने सुझाव दिया था कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और/या गृह मंत्रालय कटाव को रोकने तथा शमन उपायों हेतु उपयुक्त मानदंड विकसित कर सकते हैं एवं केंद्र व राज्य सरकारें तटीय और नदी कटाव के कारण लोगों के व्यापक विस्थापन से निपटने के लिये एक नीति विकसित कर सकती हैं।
  • आयोग ने NDMF (राष्ट्रीय आपदा शमन कोष) के तहत 'कटाव को रोकने के उपाय' और NDRF (राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष) के तहत 'कटाव से प्रभावित विस्थापित लोगों के पुनर्वास' के लिये विशिष्ट सिफारिशें भी की हैं।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs):

भारत में मृदा अपक्षय समस्या निम्नलिखित में से किससे/किनसे संबंधित है/हैं? (2014)

1- वेदिका कृषि
2- वनोन्मूलन
3- उष्णकटिबंधीय जलवायु

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

  • मृदा अपरदन भू-आकृति प्रक्रियाओं जैसे- बहते पानी, हवाओं, तटीय लहरों और ग्लेशियरों से जुड़ी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • यह वन भूमि, शुष्क और अर्द्ध-शुष्क भूमि, कृषि भूमि, निर्माण स्थलों, सड़क मार्गों, अशांत भूमि, सतही खानों, हिमाच्छादित तथा तटीय क्षेत्रों व उन क्षेत्रों में होता है जहाँ प्राकृतिक या भूगर्भिक गड़बड़ी होती है। चरम मामलों में यह मिट्टी के नुकसान तथा आधारशिला के ज़ोखिम का कारण हो सकता है।
  • भारत में मृदा अपरदन की समस्या सबसे अधिक वनों की कटाई से संबंधित है। अत: कथन 2 सही है।
  • पूरी तरह से की गई वेदिका कृषि/टेरेस कल्टीवेशन (Terrace Cultivation) पानी को रोककर रखती है। इसका उपयोग कटाव को रोकने के उद्देश्य से किया जाता है, हालाँकि अत्यधिक भारी वर्षा अंततः वेदिका/टेरेस को नष्ट कर देगी। टेरेस के बिना कटाव को रोकने के लिये ढलान पूरी तरह से जमीन के कवर पर निर्भर करता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वनों की कटाई की तुलना में वेदिका कृषि मिट्टी के कटाव का एक दूरस्थ और द्वितीयक कारण है। अतः कथन  1 सही नहीं है।
  • उष्ण कटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों में वर्षा से संबंधित मृदा अपरदन सबसे अधिक होता है। जबकि वर्षा पौधों की वृद्धि के लिये महत्त्वपूर्ण नमी प्रदान करती है, यह मिट्टी के क्षरण के प्रमुख कारणों में से एक है, जिसे वर्षा क्षरण कहा जाता है, जिससे भोजन व पानी की स्थिरता को खतरा होता है। हालाँकि उष्णकटिबंधीय जलवायु भारत में मिट्टी के क्षरण का कारण नहीं है क्योंकि मिट्टी के कटाव के तहत अधिकतम क्षेत्र उष्णकटिबंधीय जलवायु के बजाय उपोष्णकटिबंधीय, समशीतोष्ण और अल्पाइन जलवायु के अंतर्गत आता है। अत: कथन 3 सही नहीं है।
  • अतः विकल्प (b) सही है।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय इतिहास

ज्योतिराव फुले

प्रिलिम्स के लिये:

ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई।

मेन्स के लिये:

सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आंदोलन, महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में प्रधानमंत्री ने महान समाज सुधारक, दार्शनिक और लेखक महात्मा ज्योतिराव फुले की जयंती (11 अप्रैल) पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्हें ज्योतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है।

Jyotirao-Phule

ज्योतिराव फुले कौन थे?

  • संक्षिप्त परिचय:
    • जन्म: ज्योतिराव फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को वर्तमान महाराष्ट्र में हुआ था और वे सब्जियों की खेती करने वाली माली जाति से संबंधित थे। 
    • शिक्षा: वर्ष 1841 में फुले का दाखिला स्कॉटिश मिशनरी हाईस्कूल (पुणे) में हुआ, जहाँ उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की।
    • विचारधारा: उनकी विचारधारा स्वतंत्रता, समतावाद और समाजवाद पर आधारित थी|
      • फुले थॉमस पाइन की पुस्तक ‘द राइट्स ऑफ मैन’ से प्रभावित थे और उनका मानना ​​था कि सामाजिक बुराइयों का मुकाबला करने का एकमात्र तरीका महिलाओं  निम्न वर्ग के लोगों को शिक्षा प्रदान करना था।
    • प्रमुख प्रकाशन: तृतीया रत्न (1855); पोवाड़ा: छत्रपति शिवाजीराज भोंसले यंचा (1869); गुलामगिरि (1873), शक्तारायच आसुद (1881)।
    • संबंधित सगठन: फुले ने अपने अनुयायियों के साथ मिलकर वर्ष 1873 में सत्यशोधक समाज का गठन किया, जिसका अर्थ था सत्य के साधक ’ताकि महाराष्ट्र में निम्न वर्गों को समान सामाजिक और आर्थिक लाभ प्राप्त हो सकें। 
    • नगरपालिका परिषद सदस्य: वह पूना नगरपालिका के आयुक्त नियुक्त किये गए और वर्ष 1883 तक इस पद पर रहे।
    • महात्मा का शीर्षक: 11 मई, 1888 को महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्त्ता विट्ठलराव कृष्णजी वांडेकर द्वारा उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
  • समाज सुधारक:
    • वर्ष 1848 में उन्होंने अपनी पत्नी (सावित्रीबाई) को पढ़ना-लिखना सिखाया, जिसके बाद इस दंपति ने पुणे में लड़कियों के लिये पहला स्वदेशी रूप से संचालित स्कूल खोला, जहाँ वे दोनों शिक्षण का कार्य करते थे।
      • वह लैंगिक समानता में विश्वास रखते थे और अपनी सभी सामाजिक सुधार गतिविधियों में पत्नी को शामिल कर उन्होंने अपनी मान्यताओं का अनुकरण किया। 
    • वर्ष 1852 तक फुले ने तीन स्कूलों की स्थापना की, लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद धन की कमी के कारण वर्ष 1858 तक ये स्कूल बंद हो गए थे।
    • ज्योतिबा ने विधवाओं की दयनीय स्थिति को समझा तथा युवा विधवाओं के लिये एक आश्रम की स्थापना की और अंततः विधवा पुनर्विवाह के विचार के पैरोकार बन गए।
    • ज्योतिराव ने ब्राह्मणों और अन्य उच्च जातियों की रुढ़िवादी मान्यताओं का विरोध  किया तथा उन्हें "पाखंडी" करार दिया। 
    • वर्ष 1868 में ज्योतिराव ने अपने घर के बाहर एक सामूहिक स्नानागार का निर्माण करने का फैसला किया, जिससे उनकी सभी मनुष्यों के प्रति अपनत्व की भावना प्रदर्शित होती है, इसके साथ ही उन्होंने सभी जातियों के सदस्यों के साथ भोजन करने की शुरुआत की।
      • उन्होंने जन जागरूकता अभियान शुरू किया जिसने आगे चलकर डॉ. बी.आर. अंबेडकर और महात्मा गांधी की विचारधाराओं को प्रभावित किया, जिन्होंने बाद में जातिगत भेदभाव के खिलाफ बड़ी पहलें की।
    • कई लोगों द्वारा यह माना जाता है कि दलित जनता की स्थिति के चित्रण के लिये फुले ने ही पहली बार 'दलित' शब्द का इस्तेमाल किया था
    • उन्होंने महाराष्ट्र में अस्पृश्यता और जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिये काम किया।

मृत्यु: 28 नवंबर, 1890 को उनकी मृत्यु हो गई। उनका स्मारक फुलेवाडा, पुणे, महाराष्ट्र में बनाया गया है।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न:

प्रश्न. सत्य शोधक समाज का गठन सबंधित है: (2016)

(a) बिहार में आदिवासियों के उत्थान के लिये एक आंदोलन।
(b)  गुजरात में एक मंदिर-प्रवेश आंदोलन।
(c) महाराष्ट्र में एक जाति विरोधी आंदोलन।
(d) पंजाब में एक किसान आंदोलन।

उत्तर: (c)

स्रोत: पी.आई.बी. 


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

जीएसएलवी-एफ10

प्रिलिम्स के लिये:

जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट GSLV-F10/EOS-03 मिशन, जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV), प्रक्षेपण यान के प्रकार।

मेन्स के लिये:

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, प्रक्षेपण यान के प्रकार और संबंधित मुद्दे।

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2021 में विफल भू-समकालिक उपग्रह GSLV-F10/पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (EOS)-03 मिशन की जाँच के लिये एक उच्च-स्तरीय पैनल की स्थापना की गई तथा क्रायोजेनिक अपर स्टेज (CUS) को और अधिक मज़बूत बनाने के लिये उपायों की सिफारिश की गई है।

  • भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान/जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV) के अपने CUS में सुधार के साथ इस वर्ष की दूसरी छमाही में तैयार होने की उम्मीद है।

जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV):

  • भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV) एक अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान है जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा डिज़ाइन, विकसित और संचालित किया जाता है ताकि उपग्रहों व अन्य अंतरिक्ष वस्तुओं को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में लॉन्च किया जा सके।
    • GSLV को संचार उपग्रहों को लॉन्च करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • भू-समकालिक उपग्रहों को उसी दिशा में कक्षा में प्रक्षेपित किया जाता है जिस दिशा में पृथ्वी घूम रही है तथा उनका झुकाव किसी भी ओर हो सकता है।
    • भू-समकालिक कक्षाओं में उपग्रह आकाश में एक ही स्थिति में स्थायी रूप से स्थिर प्रतीत होते हैं।
  • GSLV में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) की तुलना में कक्षा में भारी पेलोड ले जाने की क्षमता है।
  • यह स्ट्रैप-ऑन मोटर्स के साथ तीन चरणों वाला लॉन्चर है।

क्रायोजेनिक अपर स्टेज (CUS):

  • GSLV के पहले चरण में ठोस ईंधन तथा इसके बाद दूसरे चरण में तरल ईंधन चरण का प्रयोग होता है। दूसरे चरण के बाद तीसरा चरण होता है जिसे CUS कहा जाता है।
  • यह रॉकेट का महत्त्वपूर्ण तीसरा चरण है, जो प्रज्वलित होने में विफल रहा और GSLV-F10 की विफलता का कारण बना।
  • क्रायोजेनिक चरण तकनीकी रूप से बहुत कम तापमान पर प्रणोदक के उपयोग और संबंधित थर्मल तथा संरचनात्मक समस्याओं के कारण ठोस या पृथ्वी-भंडारण योग्य तरल प्रणोदक चरणों की तुलना में एक बहुत ही जटिल प्रणाली है।

Cryogenic-Upper-Stage

पृथ्वी अवलोकन उपग्रह:

  • पृथ्वी अवलोकन उपग्रह, रिमोट सेंसिंग तकनीक से लैस उपग्रह होते हैं, जो कि पृथ्वी की भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रणालियों के बारे में जानकारी संग्रह करते हैं।
    • पृथ्वी अवलोकन उपग्रह पृथ्वी की भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रणालियों के बारे में जानकारी संग्रह करता है।
  • कई पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों को ‘सन-सिंक्रोनस’ ऑर्बिट में तैनात किया जाता है।
  • इसरो द्वारा लॉन्च किये गए अन्य पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों में रिसोर्ससैट-2, 2A, कार्टोसैट-1, 2, 2A, 2B, रिसैट-1 और 2, ओशनसैट-2, मेघा-ट्रॉपिक्स, सरल एवं स्कैटसैट-1, इन्सैट-3DR, 3D शामिल हैं।

इसरो द्वारा उपयोग किये जाने वाले प्रक्षेपण यान:

  • सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV):
    • इसरो द्वारा विकसित पहले रॉकेट को केवल SLV या सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल कहा जाता था।
    • इसके बाद संवर्द्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (ASLV) आया। 
  • संवर्द्धित सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (ASLV):
    • SLV और ASLV दोनों ही छोटे उपग्रहों, जिनका वज़न 150 किलोग्राम तक होता है, को पृथ्वी की निचली कक्षाओं में ले जाया जा सकता है।
    • ASLV का परिचालन पीएसएलवी आने से पहले 1990 के दशक की शुरुआत तक किया जाता था।
  • ध्रुवीय सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV):
    • PSLV का उपयोग भारत के दो सबसे महत्त्वपूर्ण मिशनों (वर्ष 2008 के चंद्रयान-I और वर्ष 2013 के मार्स ऑर्बिटर स्पेसक्राफ्ट) के लिये भी किया गया था। 
      • पीएसएलवी पहला लॉन्च वाहन है जो तरल चरण (Liquid Stages) से सुसज्जित है।
    •  PSLV इसरो द्वारा उपयोग किया जाने वाला अब तक का सबसे विश्वसनीय रॉकेट है, जिसकी 54 में से 52 उड़ानें सफल रही हैं।
      • इसरो वर्तमान में दो लॉन्च वाहनों- PSLV और GSLV (जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) का उपयोग करता है, इनमें भी कई प्रकार के संस्करण होते हैं।
      • PSLV का पहला सफल प्रक्षेपण अक्तूबर 1994 में किया गया था।

जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV):

  • जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV) एक अधिक शक्तिशाली रॉकेट है, जो भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में अधिक ऊँचाई तक ले जाने में सक्षम है। जीएसएलवी रॉकेटों ने अब तक 18 मिशनों को अंजाम दिया है, जिनमें से चार विफल रहे हैं।
  • यह 10,000 किलोग्राम के उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा तक ले जा सकता है।
    • स्वदेश में विकसित क्रायोजेनिक अपर स्टेज (CUS)- ‘GSLV Mk-II’ के तीसरे चरण का निर्माण करता है।
    • Mk-III संस्करणों ने भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो को अपने उपग्रहों को लॉन्च करने हेतु पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना दिया है।
      • इससे पहले भारत अपने भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने के लिये ‘यूरोपीय एरियन प्रक्षेपण यान’ पर निर्भर था।
      • जीएसएलवी-एमके III (GSLV-Mk III) एक चौथी पीढ़ी का तथा तीन चरण का प्रक्षेपण यान है जिसमें चार तरल स्ट्रैप-ऑन हैं। स्वदेशी रूप से विकसित सीयूएस, जो उड़ने में सक्षम है, जीएसएलवी एमके III के तीसरे चरण का निर्माण करता है।
      • रॉकेट में दो ठोस मोटर स्ट्रैप-ऑन (S200) के साथ  एक तरल प्रणोदक कोर चरण (L110) और एक क्रायोजेनिक चरण (C-25) के साथ तीन चरण शामिल हैं।
  • स्माॅल सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV):
    • SSLV का लक्ष्य छोटे एवं सूक्ष्म उपग्रहों को लॉन्च करना है, गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर इस प्रकार के उपग्रहों के प्रक्षेपण की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। 
    • एसएसएलवी 500 किलोग्राम तक के उपग्रहों के लिये लागत प्रभावी प्रक्षेपण सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम है।
    • जल्द ही एक स्वदेशी पृथ्वी अवलोकन उपग्रह EOS-03 को इसके द्वारा अंतरिक्ष में ले जाए जाने की उम्मीद है।
  • पुन: प्रयोज्य रॉकेट:
    • भविष्य में निर्मित रॉकेट प्रायः पुन: प्रयोज्य होंगे। इस प्रकार के मिशन के दौरान रॉकेट का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही नष्ट होगा।
    • वहीं इसका अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में फिर से प्रवेश करेगा और एक हवाई जहाज़ की तरह सतह पर लैंड करेगा तथा भविष्य के मिशनों में इसका उपयोग किया जा सकेगा।
    • पुन: प्रयोज्य रॉकेट निर्माण की लागत एवं ऊर्जा में कटौती करेंगे और अंतरिक्ष मलबे को भी कम करने में मददगार होंगे, जो कि मौजूदा समय में एक गंभीर समस्या बनी हुई है।
    • यद्यपि पूरी तरह से पुन: प्रयोज्य रॉकेट अभी भी विकसित नहीं किये गए हैं, लेकिन आंशिक रूप से पुन: प्रयोज्य लॉन्च वाहन पहले से ही उपयोग में हैं।
    • इसरो ने भी एक आंशिक पुन: प्रयोज्य रॉकेट विकसित किया है, जिसे RLV-TD (पुन: प्रयोज्य लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर) कहा जाता है, इसने वर्ष 2016 में एक सफल परीक्षण उड़ान भरी थी।

विगत वर्षों के प्रश्न:

प्रश्न. भारत के उपग्रह प्रक्षेपण यान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. PSLVs पृथ्वी संसाधनों की निगरानी के लिये उपयोगी उपग्रहों को लॉन्च करते हैं, जबकि GSLVs को मुख्य रूप से संचार उपग्रहों को लॉन्च करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  2. PSLVs द्वारा प्रक्षेपित उपग्रह पृथ्वी पर किसी विशेष स्थान से देखने पर आकाश में उसी स्थिति में स्थायी रूप से स्थिर प्रतीत होते हैं।
  3. GSLV Mk-III एक चार चरणों वाला प्रक्षेपण यान है जिसमें पहले और तीसरे चरण में ठोस रॉकेट मोटर्स का उपयोग किया गया है; दूसरे व चौथे चरण में तरल रॉकेट इंजन का उपयोग किया जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल  2 और 3
(c) केवल 1 और 2
(d) केवल 3

उत्तर: (a)

स्रोत: द हिंदू


सामाजिक न्याय

भारत में दत्तक ग्रहण

प्रिलिम्स के लिये:

दत्तक ग्रहण (प्रथम संशोधन) विनियम, 2021

मेन्स के लिये:

भारत में बाल दत्तक ग्रहण एवं संबंधित मुद्दे, बच्चों से संबंधित मुद्दे।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत में बच्चों को गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के लिये सहमति व्यक्त की है।

  • वर्ष 2021 में सरकार द्वारा दत्तक ग्रहण (प्रथम संशोधन) विनियम, 2021 को अधिसूचित किया गया था, जिसने विदेशों में भारतीय राजनयिक मिशनों को गोद लिये गए ऐसे बच्चों की सुरक्षा के प्रभारी होने की अनुमति दी थी, जिनके माता-पिता गोद लेने के दो वर्ष के भीतर बच्चे के साथ विदेश चले जाते हैं।

In-Country-adoption

भारत में बच्चे को गोद लेने से संबंधित मुद्दे:

  • घटती सांख्यिकी और संस्थागत उदासीनता:
    • गोद लेने वाले बच्चों की संख्या एवं भावी माता-पिता की संख्या के बीच एक व्यापक अंतर मौजूद है, जो गोद लेने की प्रक्रिया को काफी लंबा कर सकता है।
    • आँकड़ों से पता चलता है कि जहाँ 29,000 से अधिक संभावित माता-पिता गोद लेने के इच्छुक हैं, वहीं गोद लेने के लिये केवल केवल 2,317 बच्चे उपलब्ध हैं।
  • गोद लेने के बाद बच्चा लौटना:
    • केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017-19 के बीच दत्तक ग्रहण करने के बाद बच्चों को वापस करने वाले दत्तक माता-पिता में एक असामान्य उछाल दर्ज की गई।
      • ‘केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण’ (CARA), महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का एक वैधानिक निकाय है। यह भारतीय बच्चों को गोद लेने के लिये नोडल निकाय के रूप में कार्य करता है और देश में गोद लेने की प्रकिया की निगरानी व विनियमन के लिये उत्तरदायी है।
    • आँकड़ों के अनुसार, लौटाए गए सभी बच्चों में 60% लड़कियाँ थीं, 24% दिव्यांग बच्चे थे और कई बच्चे छह से अधिक वर्ष के थे।
      • इसका प्राथमिक कारण यह है कि विकलांग बच्चों एवं बड़े बच्चों को अपने दत्तक परिवारों के साथ तालमेल बिठाने में अधिक समय लगता है।
      • यह मुख्य रूप से इसलिये है, क्योंकि बड़े बच्चों को नए वातावरण में समायोजित करना चुनौतीपूर्ण लगता है, क्योंकि संस्थान बच्चों को नए परिवार के साथ रहने के लिये तैयार नहीं करता है।
  • विकलांगता और दत्तक ग्रहण:
    • वर्ष 2018 और 2019 के बीच केवल 40 विकलांग बच्चों को गोद लिया गया था, जो वर्ष में गोद लिये गए बच्चों की कुल संख्या का लगभग 1% है।
    • वार्षिक प्रवृत्तियों से पता चलता है कि हर गुज़रते वर्ष के साथ विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के घरेलू दत्तक ग्रहण की संख्या में कमी आ रही है।
  • अवैध गोद और बाल तस्करी:
    • वर्ष 2018 में रांची की मदर टेरेसा की मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी अपने "बेबी-सेलिंग रैकेट" के लिये विवादों में घिर गई, जब आश्रय की एक नन ने चार बच्चों को बेचने की बात कबूल की।
      • इसी तरह के उदाहरण तेज़ी से सामान्य होते जा रहे हैं क्योंकि गोद लेने के लिये उपलब्ध बच्चों का पूल कम हो रहा है तथा प्रतीक्षा सूची में शामिल माता-पिता बेचैन हो रहे हैं।
      • साथ ही कोविड-19 के दौरान बाल तस्करी और अवैध गोद लेने के रैकेट के खतरे के मामले सामने आए।
      • ये रैकेट आमतौर पर गरीब या हाशिये के परिवारों के बच्चों को शिकार बनाते हैं तथा अविवाहित महिलाओं को अपने बच्चों को तस्करी करने वाले संगठनों में भेजने के लिये राजी या गुमराह किया जाता है।
  • LGBTQ+ पितृत्व और प्रजनन स्वायत्तता:
    • एक परिवार की परिभाषा के निरंतर विकास के बावजूद 'आदर्श' भारतीय परिवार के केंद्र में अभी भी एक पति, एक पत्नी और बेटी (बेटियाँ) व पुत्र (पुत्रों) शामिल होते हैं।
      • फरवरी 2021 में LGBTQI+ विवाहों की कानूनी मान्यता की मांग वाली याचिकाओं को संबोधित करते हुए सरकार ने कहा कि LGBTQI+ संबंधों की तुलना पति, पत्नी और बच्चों की “भारतीय परिवार इकाई अवधारणा” से नहीं की जा सकती।
    • LGBTQI+ विवाहों की अमान्यता और कानून की नज़र में संबंध LGBTQI+ व्यक्तियों को माता-पिता बनने से रोकते हैं क्योंकि एक जोड़े के लिये बच्चा गोद लेने की न्यूनतम योग्यता उनकी शादी का प्रमाण है।
    • इन प्रतिकूल वैधताओं पर बातचीत करने के लिये समुदायों के बीच अवैध रूप से गोद लेना आम होता जा रहा है।

भारत में बच्चे को गोद लेने से संबंधित कानून:

  • भारत में दत्तक ग्रहण, हिंदू दत्तक ग्रहण एवं रखरखाव अधिनियम, 1956 (HAMA) तथा किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत होता है।
    • हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम, 1956 कानून एवं न्याय मंत्रालय के क्षेत्र में आता है तथा किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act), 2015 महिला और बाल विकास मंत्रालय से संबंधित है।
    • सरकारी नियमों के अनुसार, हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख को बच्चा  गोद लेने का  वैध अधिकार हैं। 
  • किशोर न्याय अधिनियम, गैर-हिंदू व्यक्तियों के लिये उनके समुदाय के बच्चों के अभिभावक बनने हेतु अभिभावक और वार्ड अधिनियम (जीडब्ल्यूए), 1980 एकमात्र साधन था।
    • हालांँकि जीडब्ल्यूए व्यक्तियों को कानूनी अभिभावक के रूप में नियुक्त करता है, न कि प्राकृतिक माता-पिता के रूप में नाबालिक के 21 वर्ष के हो जाने और व्यक्तिगत पहचान ग्रहण करने के बाद उसकी संरक्षकता समाप्त कर दी जाती है।

आगे की राह 

  • बाल कल्याण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता:
    • बच्चे को गोद लेने का प्राथमिक उद्देश्य उसका कल्याण और परिवार के उसके अधिकार को बहाल करना है।
    • ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) और मंत्रालय को संस्थानों में पीड़ित बच्चों के कमज़ोर और अदृश्य समुदाय पर ध्यान देना चाहिये।
  • संस्थागत जनादेश को मज़बूत करने की आवश्यकता:
    • गोद लेने वाले पारिस्थितिकी तंत्र को माता-पिता-केंद्रित दृष्टिकोण से बाल-केंद्रित दृष्टिकोण में बदलने की आवश्यकता है।
  •  समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता:
    • एक समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है जो स्वीकृति, विकास और कल्याण का वातावरण निर्मित कर बच्चे की ज़रूरतों पर ध्यान केंद्रित करता हो तथा इस प्रकार गोद लेने की प्रक्रिया में बच्चों को समान हितधारकों के रूप में मान्यता देता हो।
  • दत्तक ग्रहण प्रक्रिया को सरल बनाने की आवश्यकता:
    • गोद लेने की प्रक्रिया को निर्देशित करने वाले विभिन्न विनियमों पर बारीकी से विचार कर गोद लेने की प्रक्रिया को सरल बनाने की आवश्यकता है।
    • मंत्रालय इस क्षेत्र में कार्य करने वाले संबंधित विशेषज्ञों के साथ काम कर सकता है ताकि संभावित माता-पिता के सामने आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों पर प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सके।

स्रोत: द हिंदू 


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