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जैवविविधता और पर्यावरण

कठोर प्रवाल

  • 24 Apr 2021
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

एक हालिया अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि प्रवाल अपनी चट्टान जैसी कठोर संरचनाओं की प्रभावशाली प्रक्रिया के कारण जलवायु परिवर्तन का सामना कर सकती हैं।

प्रमुख बिंदु:

अध्ययन के प्रमुख बिंदु:

  • यह अध्ययन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक सामान्य चट्टानी प्रवाल ‘स्टाइलोफोरा पिस्टिलटा’ (Stylophora Pistillata) पर किया गया, जिसमें बताया गया है कि प्रवाल संरचनाओं में एक जैविक खनिज होता है जिसमें प्रोटीन का उच्च संगठित कार्बनिक मिश्रण होता है जो मानव हड्डियों से मिलता-जुलता है।
  • इससे यह सिद्ध हुआ है कि इस प्रक्रिया में कई प्रोटीनों को स्थानिक रूप से व्यवस्थित किया जाता है, यह प्रक्रिया चट्टान जैसे कठोर प्रवाल कंकाल बनाने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • अध्ययन के अनुसार, जैव-खनिजीकरण नामक प्रक्रिया से प्रवाल लाखों वर्षों में वैश्विक जलवायु परिवर्तन से बच गए हैं।
    • जैव-खनिजीकरण उन प्रक्रियाओं का अध्ययन है जो जीवित जीवों द्वारा उत्पन्न पदानुक्रमिक रूप से संरचित कार्बनिक-अकार्बनिक सामग्रियों का गठन करती हैं, जैसे- शैल, हड्डी और दाँत।

प्रवाल:

  • प्रवाल आनुवंशिक रूप से समान जीवों से बने होते हैं जिन्हें ‘पॉलीप्स’ कहा जाता है। इन पॉलीप्स में सूक्ष्म शैवाल होते हैं जिन्हें ज़ूजैन्थेले (Zooxanthellae) कहा जाता है जो उनके ऊतकों के भीतर रहते हैं।
    • प्रवाल और शैवाल में परस्पर संबंध होता है।
    • प्रवाल ज़ूजैन्थेले को प्रकाश संश्लेषण हेतु आवश्यक यौगिक प्रदान करता है। बदले में ज़ूजैन्थेले कार्बोहाइड्रेट की तरह प्रकाश संश्लेषण के जैविक उत्पादों की प्रवाल को आपूर्ति करता है, जो उनके कैल्शियम कार्बोनेट कंकाल के संश्लेषण हेतु प्रवाल पॉलीप्स द्वारा उपयोग किया जाता है।
    • यह प्रवाल को आवश्यक पोषक तत्त्वों को प्रदान करने के अलावा इसे अद्वितीय और सुंदर रंग प्रदान करता है।
  • उन्हें "समुद्र का वर्षावन" भी कहा जाता है।
  • प्रवाल दो प्रकार के होते हैं:
    • कठोर, उथले पानी के प्रवाल।
    • ‘सॉफ्ट’ प्रवाल और गहरे पानी के प्रवाल जो गहरे ठंडे पानी में रहते हैं।

प्रवालों से लाभ:

  • आवास: प्रवाल 1 मिलियन से अधिक विविध जलीय प्रजातियों का घर है, जिनमें हज़ारों मछलियों की प्रजातियाँ शामिल हैं।
  • आय: प्रवाल भित्ति और संबंधित पारिस्थितिकी प्रणालियों का वैश्विक अनुमानित मूल्य 2.7 ट्रिलियन डॉलर प्रतिवर्ष है, यह सभी वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र सेवा मूल्यों का 2.2% है, इसमें पर्यटन और भोजन शामिल हैं।
  • तटीय सुरक्षा: प्रवाल भित्ति तरंगों से ऊर्जा को अवशोषित करके तटरेखा क्षरण को कम करते हैं। वे तटीय आवास, कृषि भूमि और समुद्र तटों की रक्षा कर सकते हैं।
  • चिकित्सा: ये भित्तियाँ उन प्रजातियों का घर है, जिनमें दुनिया की कुछ सबसे प्रचलित और खतरनाक बीमारियों के इलाज की क्षमता है।

प्रवालों को हानि पहुँचाने वाले कारक:

  • अत्यधिक मत्स्ययन:
    • प्रवाल भित्तियों पर या आस-पास की कुछ प्रजातियों की अधिकता से इनका पारिस्थितिकी संतुलन और जैव विविधता प्रभावित हो सकती है। उदाहरण के लिये, शाकाहारी मछलियों के अधिक सेवन से उच्च स्तर की क्षारीय वृद्धि हो सकती है।
  • मछली पकड़ने का गलत तरीका:
    • डायनामाइट, साइनाइड, बॉटम ट्रॉलिंग और मूरो अमी (लाठी से भित्ति पर वार करना) के साथ मछली पकड़ना पूरी भित्ति को नुकसान पहुँचा सकता है।
  • मनोरंजक गतिविधियाँ:
    • अनियमित मनोरंजक गतिविधियाँ और पर्यटन, जिस पर उद्योग निर्भर करते हैं, पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं । प्रवाल भित्तियों को शारीरिक क्षति लापरवाह तैराकों, गोताखोरों के माध्यम से हो सकती है।
  • तटीय विकास:
    • उष्णकटिबंधीय देशों में तटीय क्षेत्रों में विकास दर सबसे तेज़ है। हवाई अड्डे और इमारतों को अक्सर समुद्र भूमि पर बनाया जाता है।
  • प्रदूषण:
    • शहरी और औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज, एग्रोकेमिकल्स और तेल प्रदूषण भित्तियों को विषाक्त कर रहे हैं। इन विषाक्त पदार्थों को सीधे समुद्र में फेंक दिया जाता है या नदी प्रणालियों द्वारा स्रोतों से ऊपर की ओर ले जाया जाता है। कुछ प्रदूषक जैसे कि कृषि सीवेज अपवाह समुद्री जल में नाइट्रोजन के स्तर को बढ़ाते हैं, जिससे शैवाल में अतिवृद्धि होती है, जो 'सूर्य की किरणों' को प्रवालों तक नहीं पहुँचने देते हैं।
  • जलवायु  परिवर्तन (Climate Change):
    • प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching):
      • जब तापमान, प्रकाश या पोषण में किसी भी परिवर्तन के कारण प्रवालों पर तनाव बढ़ता है तो वे अपने ऊतकों में निवास करने वाले सहजीवी शैवाल ज़ूजैन्थेले को निष्कासित कर देते हैं जिस कारण प्रवाल सफेद रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। इस घटना को कोरल ब्लीचिंग या प्रवाल विरंजन कहते हैं।
    • महासागर अम्लीकरण (Ocean Acidification):
      • महासागरीय अम्लीकरण को समुद्री जल की pH में होने वाली निरंतर कमी के रूप में परिभाषित किया जाता है। महासागरों में प्रवेश करने के बाद कार्बन डाइऑक्साइड (CO2 ) जल के साथ संयुक्त होकर कार्बोनिक अम्ल का निर्माण करती है जिससे महासागर की अम्लता बढ़ जाती है और समुद्र के जल का pH कम हो जाता है। 

प्रवालों के संरक्षण हेतु की गई पहलें:

  • प्रवाल विरंजन संबंधी मुद्दों से निपटने के लिये कई वैश्विक पहल की जा रही हैं, जैसे:
    • अंतर्राष्ट्रीय कोरल रीफ पहल
    • ग्लोबल कोरल रीफ मॉनीटरिंग नेटवर्क (GCRMN)
    • ग्लोबल कोरल रीफ अलायंस (GCRA)
    • ग्लोबल कोरल रीफ आर एंड डी एक्सेलेरेटर प्लेटफॉर्म
  • इसी तरह पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत ने तटीय क्षेत्र अध्ययन (CZS) के तहत प्रवाल भित्तियों पर अध्ययन को शामिल किया है।
    • भारत में ज़ूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI), गुजरात के वन विभाग की मदद से "बायोरॉक" या खनिज अभिवृद्धि तकनीक का उपयोग करके प्रवाल भित्तियों को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया का प्रयास कर रहा है।
    • देश में प्रवाल भित्तियों की सुरक्षा और रखरखाव के लिये राष्ट्रीय तटीय मिशन कार्यक्रम (National Coastal Mission Programme) चलाया जा रहा है।

स्रोत- द हिंदू

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