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डेली न्यूज़

  • 06 May, 2020
  • 49 min read
भारतीय राजनीति

राष्ट्रपति चुनाव और जम्मू-कश्मीर

प्रीलिम्स के लिये

निर्वाचक मंडल, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019

मेन्स के लिये

राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय चुनाव आयोग (Election Commission of India- ECI) से एक RTI के माध्यम से पूछा गया कि क्या नवगठित जम्मू और कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के लिये निर्वाचक मंडल (Electoral College) का हिस्सा होगा अथवा नहीं।

प्रमुख बिंदु

  • एक छात्र द्वारा दी गई इस RTI में राज्य और केंद्रशासित विधान सभाओं की सूची मांगी गई थी जो राष्ट्रपति के चुनाव के लिये निर्वाचक मंडल का हिस्सा हैं।
  • RTI में चुनाव आयोग से यह भी स्पष्ट करने के लिये भी कहा गया था कि क्या नवगठित केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर निर्वाचक मंडल का हिस्सा है।
  • मात्र एक पंक्ति में इस RTI का जवाब देते हुए चुनाव आयोग ने कहा कि इस संदर्भ में जानकारी के लिये आवेदक को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 54 को देखने के लिये कहा गया है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 54

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 54 के तहत राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) द्वारा किया जाता है, जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य और सभी राज्यों तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली एवं केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।

जम्मू-कश्मीर पर अस्पष्टता 

  • इस प्रकार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 54 में केवल दिल्ली और पुदुचेरी का उल्लेख किया गया है, जो राष्ट्रपति के चुनाव में निर्वाचक मंडल का हिस्सा होंगे।
  • इस प्रकार अनुच्छेद 54 में नवगठित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संदर्भ में कुछ भी उल्लेख नहीं किया गया है।
  • वहीं अगस्त 2019 से अस्तित्त्व में आया जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम भी इस संदर्भ में कुछ निर्दिष्ट नहीं करता है कि जम्मू-कश्मीर की विधायिका राष्ट्रपति के चुनाव में मतदान कर पाएगी अथवा नहीं।
  • जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम की धारा 13 में उल्लेख किया गया है कि जम्मू और कश्मीर विधानमंडल के पास अपने पुडुचेरी विधानमंडल के समान ही शक्तियाँ होंगी।

संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता

  • संविधान के अनुच्छेद 54 में उल्लेखित निर्वाचक मंडल (Electoral College) में नए सदस्यों को शामिल करने के लिये संसद में दो-तिहाई बहुमत और 50 प्रतिशत से अधिक राज्यों द्वारा अनुसमर्थन (Ratification) के माध्यम से एक संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी।
    • ध्यातव्य है कि वर्ष 1992 में 7 वें संविधान संशोधन के माध्यम से दिल्ली और पुदुचेरी को अनुच्छेद 54 के तहत निर्वाचक मंडल के सदस्यों के रूप में शामिल किया गया था।
  • वर्ष 1992 से पूर्व संविधान के अनुच्छेद 54 में केवल संसद के निर्वाचित सदस्यों और राज्यों की विधानसभाएं ही शामिल थीं।
  • आवश्यक है कि चुनाव आयोग नवगठित जम्मू-कश्मीर के संबंध में स्थिति को और अधिक स्पष्ट करे अर्थात जम्मू-कश्मीर को राष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचन मंडल में शामिल किया जाएगा या नहीं और यदि शामिल किया जाएगा तो किस प्रकार।

राष्ट्रपति का चुनाव

  • राष्ट्रपति का चुनाव संविधान के अनुच्छेद 54 में वर्णित एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। इस प्रकार जनता अपने राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष तौर पर नहीं करती है , बल्कि उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है। चूँकि जनता राष्ट्रपति का चयन सीधे नहीं करती है, इसलिये इसे परोक्ष निर्वाचन कहा जाता है।
  • भारत में राष्ट्रपति के चुनाव में एक विशेष प्रकार से मतदान होता है। इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम (Single Transferable Vote System) कहते हैं। सिंगल वोट यानी मतदाता एक ही वोट देता है, किंतु वह कई उम्मीदवारों को अपनी प्राथमिकता के आधार पर वोट देता है अर्थात् वह बैलेट पेपर पर यह बताता है कि उसकी पहली पसंद कौन है और दूसरी और तीसरी कौन। 
  • इस प्रकार यदि पहली पसंद वाले वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो पाता है, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है। इसलिये इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है।
  • उल्लेखनीय है कि वोट डालने वाले सांसदों और विधायकों के मतों की प्रमुखता भी अलग-अलग होती है। इसे ‘वेटेज़’ भी कहा जाता है। दो राज्यों के विधायकों के वोटों का ‘वेटेज़’ भी अलग-अलग होता है। यह ‘वेटेज़’ राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय किया जाता है और यह ‘वेटेज़’ जिस तरह तय किया जाता है, उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्त्व व्यवस्था कहते हैं।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

विनिर्माण क्रय प्रबंधक सूचकांक में गिरावट

प्रीलिम्स के लिये:

क्रय प्रबंधक सूचकांक

मेन्स के लिये:

विनिर्माण क्षेत्र से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

आईएचएस मार्किट इंडिया (IHS Markit India) द्वारा जारी मासिक सर्वेक्षण के अनुसार, अप्रैल 2020 में विनिर्माण क्षेत्र के ‘क्रय प्रबंधक सूचकांक’ (Purchasing Manager's Index- PMI) में गिरावट दर्ज की गई है।

प्रमुख बिंदु:

  • गौरतलब है कि विनिर्माण क्रय प्रबंधक सूचकांक अप्रैल 2020 में 27.4 दर्ज किया गया है, जबकि मार्च 2020 में यह 51.8 अंक पर था। 
  • ध्यातव्य है कि पिछले 32 महीनों से विनिर्माण क्रय प्रबंधक सूचकांक में निरंतर बढ़ोतरी हो रही थी।
  • हालिया विनिर्माण सूचकांक इस क्षेत्र में 15 वर्ष पहले शुरू किये गए संग्रहण का अब तक का न्यूनतम स्तर है। 
  • ध्यातव्य है कि अर्थशास्त्रियों और वैश्विक रेटिंग फर्मों के अनुसार, आर्थिक विकास दर 1% के स्तर से भी नीचे जा सकती है।
  • क्रय प्रबंधक सूचकांक हेतु आवश्यक आँकड़ों को दुनिया भर के 40 से अधिक अर्थशास्त्रियों द्वारा संकलित किया जाता हैं।
  • आईएचएस मार्किट इंडिया दुनिया भर के प्रमुख उद्योगों और बाज़ारों के लिये सूचना तथा उनकी स्थिति का विश्लेषण करता है। 

क्रय प्रबंधक सूचकांक में गिरावट के कारण:

  • COVID-19 के मद्देनज़र देशभर में लॉकडाउन की वज़ह से अप्रैल 2020 में विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। 
  • आईएचएस मार्किट इंडिया द्वारा जारी की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत के निर्यात में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
  • मांग में कमी के कारण व्यापार में गिरावट को देखते हुए विभिन्न औद्योगिक संस्थानों को अपने कर्मचारियों की संख्या में भी कमी करनी पड़ी है।
  • देशभर में लॉकडाउन से फैक्ट्री को बाज़ार से प्राप्त होने वाले नए कॉन्ट्रैक्ट (उत्पाद निर्माण से संबंधित), फैक्ट्री में निर्मित कुल उत्पाद, इत्यादि की संख्या में भारी कमी आई है। 

क्रय प्रबंधक सूचकांक

(Purchasing Manager's Index- PMI):

  • PMI विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों का एक संकेतक है। यह एक सर्वेक्षण-आधारित प्रणाली है।
  • PMI की गणना विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों हेतु अलग-अलग की जाती है जिसके पश्चात् एक समग्र सूचकांक का तैयार किया जाता है। 
  • PMI को 0 से 100 तक के सूचकांक पर मापा जाता है।
  • 50 से ऊपर का आँकड़ा व्यावसायिक गतिविधि में विस्तार या विकास को दर्शाता है, जबकि 50 से नीचे का आँकड़ा संकुचन (गिरावट) को प्रदर्शित करता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

साइलेंट हाइपोक्सिया

प्रीलिम्स के लिये:

साइलेंट हाइपोक्सिया, हाइपोक्सिया

मेन्स के लिये:

साइलेंट हाइपोक्सिया से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

COVID-19 से संक्रमित लोगों के इलाज़ में प्रयासरत दुनिया भर के चिकित्सक एक अज़ीब स्थिति का सामना कर रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार, COVID-19 से संक्रमित कुछ लोगों के रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने के बावज़ूद श्वसन संबंधी समस्याएँ परिलक्षित नहीं हो रही हैं।  

प्रमुख बिंदु:

  • चिकित्सकों का मत है कि लोगों में श्वसन संबंधी समस्याओं का परिलक्षित न होना ‘साइलेंट/हैप्पी हाइपोक्सिया’ (Silent/Happy Hypoxia) को इंगित करता है।
  • चिकित्सक और अन्वेषक डॉ. रिचर्ड लेविटन (Dr Richard Levitan) के अनुसार, COVID-19 से संक्रमित मरीज़ों में ‘कोविड निमोनिया’ की स्थिति ‘साइलेंट/हैप्पी हाइपोक्सिया’ के कारण उत्पन्न हो रही है।
  • कई चिकित्सक अब ‘कोविड निमोनिया’ जैसी घातक स्थिति से बचने के साधन के रूप में इसकी शुरुआती पहचान की वकालत कर रहे हैं। 

साइलेंट हाइपोक्सिया (Silent Hypoxia):

  • ‘साइलेंट/हैप्पी हाइपोक्सिया’ रक्त में ऑक्सीजन की कमी का एक ऐसा स्वरूप है जिसकी पहचान नियमित हाइपोक्सिया की तुलना में कठिन है।
  • COVID-19 से संक्रमित लोगों के रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा 80% से कम होने के बावज़ूद भी उनको साँस लेने में कोई तकलीफ नहीं हो रही है। 
  • चिकित्सकों के अनुसार, आपातकालीन वार्डों में कई मरीज़ों के रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा 50% से भी कम है। ऑक्सीजन की मात्रा कम होने की स्थिति में लोग अत्यधिक बीमार दिखने चाहिये परंतु साइलेंट हाइपोक्सिया के मामलों में ऐसा तब तक नहीं होता जब तक कि तीव्र श्वसन संकट जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं हो जाती है। 

ऐसी स्थिति क्यों?

  • ‘द गार्जियन’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, साइलेंट हाइपोक्सिया के पश्चात् लोगों में श्वसन संबंधी समस्याएँ ऑक्सीजन की कमी के कारण नहीं बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में वृद्धि के कारण हो रही हैं। यह समस्या उस समय होती हैं जब फेफड़े कार्बन डाइऑक्साइड गैस को निष्कासित करने में सक्षम नहीं होते हैं। 
  • डॉ. लेविटन के अनुसार, शुरुआती चरण में फेफड़े कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन तथा इसके निर्माण से बचाव में सक्षम प्रतीत होते हैं। इस प्रकार, रोगियों को श्वसन संबंधी समस्याएँ महसूस नहीं होती हैं।

हाइपोक्सिया (Hypoxia):

  • हाइपोक्सिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें रक्त और शरीर के ऊतकों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं होता है।
  • सामान्यतः हाइपोक्सिया पूरे शरीर या शरीर के कुछ हिस्से को प्रभावित कर सकता है।
  • अमेरिकी गैर-लाभकारी संगठन ‘मायो क्लिनीक’ के अनुसार, सामान्य तौर पर धमनियों में ऑक्सीजन की मात्रा 75-100 (mm Hg) तथा पल्स-ऑक्सीमीटर (Pulse-Oximeter) की माप 90-100% होता है। 
  • पल्स-ऑक्सीमीटर का 90% से कम होना चिंताजनक होता है। ऐसी स्थिति में पीड़ित व्यक्ति सुस्ती, भ्रम, मानसिक तौर पर अस्वस्थ महसूस करता है। पल्स-ऑक्सीमीटर की माप का स्तर 80% से कम होने से शरीर के महत्त्वपूर्ण अंग प्रभावित होते हैं।  

पल्स-ऑक्सीमीटर (Pulse-Oximeter): 

  • यह एक ऐसा यंत्र है जिसके माध्यम से मानव शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा का पता लगाया जाता है। 
  • इसे उँगलियों, नाक, कान अथवा पैरों की उँगलियों में क्लिप की तरह लगाया जाता है। इसमें लगे सेंसर रक्त में ऑक्सीजन के प्रवाह तथा रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा को पता लगाने में सक्षम होता है। 

Pulse-Oximeter

  • डॉ. रिचर्ड लेविटन के अनुसार, साइलेंट हाइपोक्सिया की प्रारंभिक जाँच हेतु पल्स-ऑक्सीमीटर मददगार साबित हो सकता है।

कोविड निमोनिया (Covid Pneumonia):

  • यह COVID-19 से संक्रमित लोगों के लिये एक ऐसी बीमारी है जो घातक साबित हो सकती है। कोविड निमोनिया के कारण फेफड़ों में ऑक्सीजन स्थानांतरित करने तथा सांस लेने की क्षमता प्रभावित होती है।
  • जब कोई व्यक्ति पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं ले पाता तथा पर्याप्त कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर नहीं निकाल पाता है, तो निमोनिया से मृत्यु भी हो सकती है।
  • क्योंकि यह वायरल है जो शरीर के छोटे अंगों के बजाय फेफड़ों को पूरी तरह से प्रभावित करता है।
  • कोविड निमोनिया के गंभीर मामलों में ऑक्सीजन का पर्याप्त संचालन सुनिश्चित करने हेतु वेंटिलेटर की भी आवश्यकता पड़ती है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय अर्थव्यवस्था

सरफेसी अधिनियम के तहत सहकारी बैंक

प्रीलिम्स के लिये

सरफेसी अधिनियम, सहकारी बैंक

मेन्स के लिये

सहकारी बैंकों की कार्यप्रणाली पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का प्रभाव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा है कि सरफेसी अधिनियम (Sarfaesi Act) अर्थात् ‘सिक्योरिटाइज़ेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनेंशियल एसेट्स एंड एनफोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट एक्ट’ (Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act), 2002 सहकारी बैंकों पर भी लागू होगा।

प्रमुख बिंदु

  • ध्यातव्य है कि इससे पूर्व वर्ष 2013 में गुजरात उच्च न्यायालय ने सहकारी संस्थाओं को वित्तीय संस्थानों के रूप में शामिल करने के लिये बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई करते हुए निर्णय दिया था कि सहकारी बैंक सरफेसी अधिनियम के तहत ऋण की वसूली नहीं कर सकते हैं।
    • गुजरात उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्त्ताओं के प्रस्तुतिकरण के साथ सहमति व्यक्त की थी जिन्होंने तर्क दिया था कि सरफेसी अधिनियम राज्य कानून के तहत गठित सहकारी बैंकों पर लागू नहीं होना चाहिये, क्योंकि वे गुजरात सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1961 (Gujarat Cooperative Societies Act, 1961) के तहत आते हैं, अतः वे इसी अधिनियम के तहत ऋण वसूली कर सकते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय की न्यायपीठ ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 2(1)(C) में दी गई ‘बैंक’ की परिभाषा के तहत सहकारी बैंक भी आते हैं। अतः अधिनियम की धारा (13) के तहत निर्धारित की गई वसूली प्रक्रिया सहकारी बैंकों पर भी लागू होती है।
  • इस निर्णय के माध्यम से राज्य और बहु-राज्य सहकारी बैंकिंग समितियाँ अब अपना बकाया वसूलने के लिये परिसंपत्तियों को ज़ब्त और बेच सकती हैं।
  • उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व सहकारी बैंकों को अपनी बकाया राशि की वसूली के लिये दीवानी न्यायालय (Civil Court) के पास जाना पड़ता था। अब सरफेसी अधिनियम में दिये गए प्रावधानों का प्रयोग कर सहकारी बैंकों द्वारा न्यायालय अथवा न्यायाधिकरण के हस्तक्षेप बिना वसूली की जा सकती है।

उद्देश्य

  • सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, सहकारी बैंकों को सरफेसी अधिनियम के तहत लाने का उद्देश्य दीवानी अदालत अथवा न्यायाधिकरण में मामले के निपटान में होने वाली देरी को कम करना है।

पृष्ठभूमि 

  • न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली न्यायपीठ का यह फैसला ऐसे मामले के संदर्भ में आया है जिसमें सरफेसी अधिनियम की धारा 2(C) में संशोधन और सहकारी बैंकों को ऐसे संस्थानों में शामिल किया गया था जो ऋण वसूली के लिये इस अधिनियम के तहत दी गई शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं।

सहकारी बैंक

  • सहकारी बैंक का आशय उन छोटे वित्तीय संस्थानों से है जो शहरी और गैर-शहरी दोनों क्षेत्रों में छोटे व्यवसायों को ऋण की सुविधा प्रदान करते हैं।
  • सहकारी बैंक आमतौर पर अपने सदस्यों को कई प्रकार की बैंकिंग और वित्तीय सेवाएँ जैसे- ऋण देना, पैसे जमा करना और बैंक खाता आदि प्रदान करते हैं।
  • उल्लेखनीय है कि सहकारी बैंक का प्राथमिक लक्ष्य अधिक-से-अधिक लाभ कमाना नहीं होता, बल्कि अपने सदस्यों को सर्वोत्तम उत्पाद और सेवाएँ उपलब्ध कराना होता है।
  • सहकारी बैंकों का स्वामित्त्व और नियंत्रण सदस्यों द्वारा ही किया जाता है, जो लोकतांत्रिक रूप से निदेशक मंडल का चुनाव करते हैं।
  • ये भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा विनियमित किये जाते हैं एवं बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के साथ-साथ बैंकिंग कानून अधिनियम, 1965 के तहत आते हैं।

सरफेसी अधिनियम, 2002 

(Sarfaesi Act, 2002)

  • सरफेसी अधिनियम (Sarfaesi Act) अर्थात् ‘सिक्योरिटाइज़ेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनेंशियल एसेट्स एंड एनफोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट एक्ट’ (Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act), 2002 वित्तीय संस्थानों को भिन्न-भिन्न तरीकों से संपत्ति की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में मदद करता है।
    • अर्थात हम यह कह सकते हैं कि इस अधिनियम को अलग-अलग प्रक्रियाओं और तंत्रों के माध्यम से गैर-निष्पादनकारी संपत्ति (NPA) या खराब संपत्ति की समस्या को हल करने के लिये तैयार किया गया है।
  • इस अधिनियम के प्रावधान विभिन्न संस्थानों को अपनी खराब संपत्ति की समस्या के प्रबंधन हेतु निर्देश और शक्तियाँ प्रदान करते हैं।
  • सरकार ने ऋण वसूली न्यायाधिकरण (Debt Recovery Tribunals-DRTs) को पुनः जीवंत करने और नए दिवालियापन कानून (Bankruptcy Law) के तहत परिसंपत्ति पुनर्निर्माण की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिये ‘एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों’ (Asset Reconstruction Companies-ARCs) को सशक्त बनाने हेतु अगस्त 2016 में सरफेसी अधिनियम में संशोधन भी किया है।

स्रोत: इंडियन एक्स्प्रेस


भारतीय अर्थव्यवस्था

COVID- 19 महामारी और बीमा दावा

प्रीलिम्स के लिये:

बीमा पॉलिसी, फोर्स मेजर, सामान्य बीमा परिषद, बीमा के संबंध में FDI नीति, भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण

मेन्स के लिये:

भारत में बीमा संबंधी नियम 

चर्चा में क्यों?

जिन कंपनियों को COVID- 19 महामारी के तहत लगाए गए लॉकडाउन के कारण व्यावसायिक नुकसान का सामना करना पड़ा है, उन कंपनियों द्वारा किये गए बीमा अनुबंधों के कुछ प्रावधानों/क्लॉज़ को लेकर विवाद होने की संभावना है।

मुख्य बिंदु:

  • अनेक कंपनियों द्वारा अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण होने वाली हानि को कवर करने के लिये बीमा पॉलिसियाँ ली गई थीं, किंतु इस बात को लेकर विवाद हो रहा है कि क्या COVID-19 महामारी को भी इन बीमा पॉलिसियों के अंतर्गत कवर किया गया है।
  • परिणामस्वरूप कॉर्पोरेट इकाइयों को ‘स्टैंडर्ड फायर एंड स्पेशल पेरिल्स पॉलिसी’ (Standard Fire and Special Perils Policy), जिसे सामान्यत: ‘प्रॉपर्टी पॉलिसी’ (Property Policy) के नाम से जाना जाता है, के तहत कोई बीमा क्लेम (I nsurance Claim) नहीं मिलेगा। 

कॉर्पोरेट इकाइयों की बीमा पॉलिसी:

  • सामान्यत: किसी कॉर्पोरेट इकाई द्वारा दो प्रकार की बीमा पॉलिसी ली जाती है:
    • संपत्ति क्षति पॉलिसी (Material Damage Policy): 
      • यह पॉलिसी आग, बाढ़ या मशीन त्रुटि के कारण संपत्ति का नुकसान को कवर करती है।
    • व्यवसाय व्यवधान पॉलिसी (Business interruption policy):
      • जब व्यवसाय में हानि ‘संपत्ति क्षति नीति’ (Property Damage Policy) के तहत उल्लिखित क्लॉज़ के कारण हुई हो।

प्रॉपर्टी पॉलिसी संबंधी प्रावधान:

  • बीमा कंपनियों की नीतियों में लॉकडाउन के कारण कॉर्पोरेट को होने वाले नुकसान संबंधी कोई प्रावधान नहीं है।
  • ‘प्रॉपर्टी पॉलिसी’ के तहत यदि किसी क्षति या आग के कारण बीमित संयंत्र या कार्यालय बंद हो जाता है, तो कंपनी नुकसान की भरपाई का दावा करने की पात्र होगी।
  • यदि कोई इकाई लगातार 30 दिनों तक बंद रहती है तो पॉलिसी कवर लैप्स (Lapse) हो जाएगा। 

पॉलिसी लैप्स में राहत:

  • राहत के रूप में वर्तमान 30 दिनों की अवधि में राहत दी गई है तथा बीमा कंपनियों द्वारा उन कॉर्पोरेट्स को भी मुआवज़ा दिया जाएगा जो एक महीने से अधिक समय से बंद है।
  • इसका मतलब है कि कॉर्पोरेट इकाईयाँ बीमा मुआवज़े का दावा कर सकती हैं यदि आग या किसी अन्य नुकसान के कारण संपत्ति क्षतिग्रस्त हो जाती है, भले ही 3 मई की अवधि के दौरान कारखाना या इकाई चालू न हो।

फोर्स मेजर (Force Majeure):

  • फोर्स मेजर या 'एक्ट ऑफ गॉड' (Act of God) से आशय ऐसी असाधारण घटनाओं और परिस्थितियों से है, जो मानव नियंत्रण से परे हों। ज़्यादातर बीमाकर्त्ता फोर्स मेजर क्लॉज उपयोग अपनी बीमा पॉलिसियों में करती है।
  • ‘फोर्स मेजर क्लॉज़’ बीमा पॉलिसी में शामिल दोनों पक्षों को अनुबंध के दायित्त्व या बाध्यताओं से मुक्त करता है। 'फोर्स मेजर’ से संबंधित नियम ‘भारतीय संविदा अधिनियम, 1872’ (Indian Contract Act, 1872) के तहत निर्धारित किये गए हैं।

भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण

(Insurance Regulatory and Development Authority of India- IRDAI): 

  • भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण एक स्वायत्त सांविधिक एजेंसी है जिसका कार्य भारत में बीमा और पुनः बीमा करने वाले उद्योगों का नियमन करना और उन्हें बढ़ावा देना है। 
  • इसे बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम,1999 के तहत भारत सरकार द्वारा गठित किया गया था।

‘सामान्य बीमा परिषद’

(General Insurance Council):

  • ‘भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण’ द्वारा वर्ष 2001 में बीमा अधिनियम, 1938 (Insurance Act, 1938) की धारा 64C के तहत ‘सामान्य बीमा परिषद’ (General Insurance Council) का गठन किया गया है।
  • यह IRDAI और गैर-जीवन बीमा उद्योग के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी का कार्य करता है। यह सरकार तथा उद्योग के बीच के मुद्दों में समन्वय स्थापित करने का भी कार्य करता है।

बीमा के संबंध में FDI नीति:

  • उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (Department for Promotion of Industry and Internal Trade- DPIIT) ने बीमा बिचौलियों को 100% FDI की अनुमति देने के लिये प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment-FDI) नीति में संशोधन किया है। 
  • जिसमें बीमा ब्रोकिंग, बीमा कंपनियाँ, थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर, सर्वेयर और लॉस असेसमेंट शामिल हैं। 
    • उल्लेखनीय है कि बीमा बिचौलिये वे एजेंट होते हैं जो बीमा कंपनियों और ग्राहकों के मध्य संबंध स्थापित करते हैं। 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय अर्थव्यवस्था

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों पर लॉकडाउन का प्रभाव

प्रीलिम्स के लिये

‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम’, COVID-19

मेन्स के लिये

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों पर COVID-19 का प्रभाव, COVID-19 से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने हेतु सरकार के प्रयास 

चर्चा में क्यों?

COVID-19 की महामारी से उत्पन्न हुई चुनौतियों के कारण देश के ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम’ (Micro- Small and Medium Enterprises- MSMEs) सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। देश में अधिकांश MSME पहले से ही तरलता की कमी से जूझ रहे थे परंतु लॉकडाउन के कारण व्यापार प्रभावित होने से इनकी समस्या और अधिक बढ़ गई है। 

मुख्य बिंदु: 

  • MSME क्षेत्र के लगभग 99.5% उद्यम ‘सूक्ष्म’ (Micro) श्रेणी में आते हैं। 
  • वर्तमान में भारत के विभिन्न भागों में स्थित अनेक MSME लगभग 11 करोड़ लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराते हैं।
  • सरकार के विभिन्न प्रयासों के बावज़ूद भी MSMEs का प्रत्यक्ष बैंकिंग क्षेत्र की पहुँच से दूर रहना इस क्षेत्र के संकट का एक बड़ा कारण है।  

MSMEs का निर्धारण: 

  • MSMEs का विनियमन ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम (Micro, Small and Medium Enterprises Development Act), 2006 के तहत किया जाता है। 
  • MSMEs का निर्धारण उद्यम शुरू करने और मशीनरी में लगे आर्थिक निवेश के आधार पर किया जाता है, हालाँकि इस प्रक्रिया में निवेश के संबंध में विश्वसनीय और सटीक आँकड़े न मिल पाने के कारण इसकी आलोचना भी होती रही है।
  • फरवरी 2018 में केंद्र सरकार द्वारा MSME के श्रेणी निर्धारण हेतु मानक को ‘निवेश’ से बदलकर ‘वार्षिक कारोबार' करने का निर्णय लिया गया था, हालाँकि इस परिवर्तन को अभी प्रत्यक्ष रूप से लागू नहीं किया गया है।
  • सरकार द्वारा प्रस्तावित नई परिभाषा के अनुसार, 5 करोड़ रुपए से कम वार्षिक कारोबार वाले MSME को ‘सूक्ष्म’ उद्यम की श्रेणी में, 5-75 करोड़ रुपए के वार्षिक कारोबार वाले MSME को ‘लघु’ उद्यम की श्रेणी में और 75-250 करोड़ रुपए के वार्षिक कारोबार वाले MSME को ‘मध्यम’ उद्यम की श्रेणी में रखा गया है।

भारत में MSMEs की स्थिति:

  • वित्तीय वर्ष 2018-19 के आँकड़ों के अनुसार, MSME के तहत भारत में लगभग 6.34 उद्यम सक्रिय हैं, इनमें से अधिकांश (लगभग 51%) देश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं।
  • वर्तमान में MSMEs लगभग 11 करोड़ लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराते हैं हालाँकि इनमें से अधिकांश (लगभग 55%) रोज़गार शहरी क्षेत्रों में स्थित MSME द्वारा उपलब्ध कराया जाता है।  
  • वर्तमान में MSMEs के तहत लगभग 99.5% उद्यम ‘सूक्ष्म’ श्रेणी के हैं, सूक्षम उद्यमों से आशय सामान्यतः उन छोटे उद्यमों से है जिनका संचालन एक व्यक्ति (महिला अथवा पुरुष) द्वारा अपने घर से किया जाता है। 
  • देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में ‘सूक्ष्म उद्यमों’ की संख्या समान है परंतु ‘लघु और मध्यम’ श्रेणी (कुल MSMEs का लगभग 0.5%) के अधिकांश उद्यम शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं, जो लगभग 5 करोड़ कामगारों के लिये रोज़गार उपलब्ध कराते हैं। 

समाज के विभिन्न वर्गों तक MSMEs की पहुँच: 

  • वर्तमान में देश में MSME क्षेत्र के 66% उद्यम समाज के निचले वर्ग से जुड़े लोगों द्वारा संचालित किये जाते हैं। 
  • इनमें से 12.5% अनुसूचित जाति, 4.1% अनुसूचित जनजाति और 49.7% अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं। 
  • सभी श्रेणियों के MSMEs के कर्मचारियों में लगभग 80% पुरुष और मात्र 20% ही महिलाएँ हैं। 
  • भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो देश के केवल 7 राज्यों में ही लगभग 50% MSMEs स्थित हैं।
  • इनमें उत्तर प्रदेश (14%), पश्चिम बंगाल (14%), तमिलनाडु (8%), महाराष्ट्र (8%), कर्नाटक (6%), बिहार (5%) और आंध्र प्रदेश (5%) हैं।

MSMEs की मुख्य चुनौतियाँ:

  • आँकड़ों का अभाव: 
    • देश में सक्रिय MSMEs सामान्यतः बहुत ही छोटे स्तर पर कार्य करते हैं, जिसके कारण इनमें से अधिकांश का किसी प्रकार का पंजीकरण नहीं कराया गया है।
    • अधिकांश MSMEs, वस्तु और सेवा कर (GST) की पहुँच से बाहर है और वे किसी प्रकार का खाता बनाने, कर देने या अन्य नियमों का पालन करने आदि में भी अधिक सक्रिय नहीं हैं। 
    • इस प्रक्रिया में उनकी कुछ बचत तो होती है परंतु संकट की स्थिति में किसी ठोस आँकड़े के अभाव में ऐसे उद्यमों को सहायता पहुँचा पाना सरकार के लिये भी एक चुनौती बन जाती है।
      • उदाहरण के लिये वर्तमान आर्थिक संकट के बीच कुछ विकसित देशों में सरकारों ने छोटे उद्यमों में मज़दूरी सब्सिडी और अतिरिक्त ऋण उपलब्ध कराया है, परंतु यह इसलिये संभव हो सका क्योंकि वहाँ छोटे उद्यमों के बारे में भी विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध थे।
  • आर्थिक चुनौतियाँ:  
    • MSME क्षेत्र में वित्तपोषण की कमी इस क्षेत्र के लिये सबसे सबसे बड़ी चुनौती है, वर्ष 2018 में जारी ‘अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम’ (International Finance Corporation- IFC) की एक रिपोर्ट के अनुसार, MSME क्षेत्र को औपचारिक बैंकिग प्रणाली द्वारा MSMEs की कुल आवश्यकता का एक-तिहाई (लगभग 11 लाख करोड़ रुपए) से कम ही ऋण उपलब्ध कराया जाता है।
    • अर्थात् MSMEs को अधिकांश ऋण अनौपचारिक स्रोतों से प्राप्त होता है, यही कारण है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India-RBI) द्वारा MSME क्षेत्र में तरलता बढ़ाने के प्रयासों के परिणाम बहुत ही सीमित होते हैं।
    • भुगतान में बिलंब होना MSMEs के लिये दूसरी बड़ी चुनौती है चाहे वह खरीदारों से हो (जिसमें सरकारी संस्थान भी शामिल हैं) या GST रिफंड आदि के तहत मिलने वाली राशि।

MSMEs पर COVID-19 का प्रभाव:  

  • विशेषज्ञों के अनुसार, COVID-19 महामारी के पहले से ही MSMEs की आय में गिरावट और अन्य कई समस्याओं से जूझ रहे थे, परंतु लॉकडाउन के बाद कई उद्यमों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह उठने लगे हैं।
  • हाल ही में जारी एक सर्वे में ‘लघु और मध्यम’ श्रेणी के केवल 7% उद्यमों ने माना कि वे वर्तमान में उपलब्ध पूंजी के माध्यम से तीन महीने से अधिक तक कारोबार बंद होने की स्थिति में भी उद्यम को बचाए रखने में सक्षम होंगे।
  • साथ ही अधिकांश श्रमिकों के पलायन के कारण इन उद्यमों को पुनः शुरू कर पाना एक बड़ी चुनौती होगी।

आगे की राह:  

  • RBI द्वारा MSME क्षेत्र में तरलता की कमी को दूर करने के कई प्रयास किये गए हैं, परंतु संरचनात्मक जटिलताओं (प्रत्यक्ष बैंकिंग प्रणाली से न जुड़ा होना, आँकड़ों का आभाव) के कारण इसके सीमित प्रभाव दिखाई दिये हैं।
  • सरकार कर में कटौती, रिफंड प्रक्रिया में तेज़ी के साथ विभिन्न योजनाओं (जैसे- पीएम किसान, जन धन योजना आदि) के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में तरलता और MSME उत्पादों की मांग में वृद्धि कर MSMEs को सहायता पहुँचा सकती है।
  • MSMEs को दिया गया अधिकांश ऋण संपत्ति (Property) के मूल्य पर आधारित होता है परंतु वर्तमान में COVID-19 महामारी के कारण संपत्तियों के मूल्यों में भारी गिरावट हुई है, जो नए ऋण जारी होने में एक बाधा बन गया है।
  • ऐसे में यदि सरकार की तरफ से MSME ऋण के लिये एक ‘क्रेडिट गारंटी’ (Credit Guarantee) जारी की जाती है तो यह MSMEs के लिये काफी मददगार साबित हो सकती है।

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 06 मई, 2020

‘निगाह’ कार्यक्रम 

हिमाचल प्रदेश सरकार ‘निगाह’ (Nigah) नामक एक नया कार्यक्रम शुरू करने पर विचार कर रही है, जिसमें उन लोगों के परिवार के सदस्यों को जागरुक किया जाएगा, जो देश के अन्य हिस्सों से राज्य में आ रहे हैं, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग (Social Distancing) जैसे मानकों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। इस संदर्भ में सूचना देते हुए मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने कहा कि चूँकि हिमाचल प्रदेश के हज़ारों लोग देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे हुए हैं, इसलिये यह आवश्यक हो गया है कि घर पहुँचने वाले किसी भी व्यक्ति की पूर्णतः जाँच की जाए और उससे संबंधित सूचना को रिकॉर्ड किया जाए। ‘निगाह’ कार्यक्रम के तहत सामाजिक दूरी बनाए रखने के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिये आशा, आंगनवाड़ी और स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं को नियुक्त किया जाएगा। इस कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता राज्य के बाहर से आने वाले व्यक्ति के परिवार के सदस्यों को COVID-19 से संबंधित विभिन्न उपायों का पालन करने हेतु संवेदनशील और जागरूक बनाया जाएगा। ध्यातव्य है कि भारत सरकार ने हाल ही में विभिन्न राज्यों में फंसे प्रवासियों को उनके घर तक पहुँचने में मदद करने के लिये ट्रेन व बस सुविधा शुरू की थी। हालाँकि इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग जैसे विभिन्न उपायों का पालन किया जा रहा है, किंतु इसके बावजूद यात्रा के दौरान संक्रमण का खतरा काफी अधिक बढ़ गया है, क्योंकि ऐसे लोगों का COVID-19 परीक्षण नहीं किया जा रहा है, ऐसे में ‘निगाह' जैसे विशेष कार्यक्रमों का महत्त्व भी काफी अधिक बढ़ गया है।

कार्ल मार्क्स

05 मई, 2020 को जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, राजनीतिक सिद्धांतकार, समाजशास्त्री, पत्रकार और वैज्ञानिक समाजवाद के जनक कार्ल मार्क्स की 201वीं जयंती मनाई गई। कार्ल मार्क्स का जन्म 05 मई, 1818 को जर्मनी में हुआ था और उनका नाम कार्ल हेनरिख मार्क्स था। मात्र 17 वर्ष की उम्र में कार्ल मार्क्स ने विधि (Law) का अध्ययन करने के लिये बॉन विश्वविद्यालय (University of Bonn), जर्मनी में प्रवेश लिया। तत्पश्चात्‌ उन्होंने बर्लिन और जेना विश्वविद्यालयों में साहित्य, इतिहास तथा दर्शन का अध्ययन किया। इसी काल में वह हीगल के दर्शन से काफी अधिक प्रभावित हुए। कार्ल मार्क्स ने 19वीं शताब्दी में काफी कुछ लिखा, किंतु उनकी दो कृतियां 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' (Communist Manifesto) और 'दास कैपिटल' (Das Kapital) काफी प्रसिद्ध हैं और इन पुस्तकों ने एक समय दुनिया के कई देशों और करोड़ों लोगों पर राजनीतिक और आर्थिक रूप से काफी प्रभाव डाला। 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' और अपने अन्य लेखों में कार्ल मार्क्स ने पूंजीवादी समाज में 'वर्ग संघर्ष' की बात की और स्पष्ट किया कि किस प्रकार अंततः संघर्ष में सर्वहारा वर्ग पूरी दुनिया में बुर्जुआ वर्ग को हटाकर सत्ता प्राप्त कर लेगा। कार्ल मार्क्स उस समय बच्चों को स्कूल भेजने की वकालत कर रहे थे, जब लगभग पूरी दुनिया में बालश्रम अपनी चरम पर था। कार्ल मार्क्स बच्चों को स्कूल भेजना चाहते थे, न कि काम पर। कार्ल मार्क्स का मत था कि यदि समाज में कोई व्यक्ति गलत है अथवा अगर आप महसूस कर रहे हैं कि किसी के साथ अन्याय या भेदभाव हो रहा है, तो हमें अन्याय करने वाले व्यक्ति का विरोध करना चाहिये। दरअसल मार्क्स की सफलता उस पूरे विचार को बदलने की है जो शोषण को दुनिया का समय नियम मानता है। हालाँकि विचारकों और चिंतकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो मार्क्स के विचारों का घोर विरोध करता है और उन्हें अप्रासंगिक करार देता है। आलोचक मानते हैं कि मार्क्स के अनुयायी उनके विचारों के गुण-दोष को मापे बिना उनका अंधानुकरण करते हैं, आलोचकों का मत है कि मार्क्स के विचारों में पर्यावरण को बिल्कुल भी महत्त्व नहीं दिया गया है। वर्ष 1864 में लंदन में अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर संघ' की स्थापना में मार्क्स ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और 14 मार्च, 1883 को उनका निधन हो गया।

‘गरुड़’ पोर्टल

नागरिक उड्डयन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) के तहत कार्यरत नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (Directorate General of Civil Aviation-DGCA) ने ‘गरुड़’ (GARUD) नामक एक पोर्टल लॉन्च किया है। ‘गरुड़’ (GARUD) का पूर्ण स्वरुप ‘गवर्मेंट ऑथोराईज़ेशन फॉर रिलीफ यूज़िंग ड्रोन्स’ (Government Authorisation for Relief Using Drones) है। ‘गरुड़’ पोर्टल COVID-19 महामारी से मुकाबले के लिये ड्रोन संचालित करने हेतु केंद्र सरकार से छूट प्राप्त करने के लिये राज्य संस्थाओं की सहायता करेगा। ध्यातव्य है कि कई राज्य संस्थाएँ सार्वजनिक स्थानों को कीटाणुरहित करने के लिये ड्रोन का प्रयोग कर रही हैं, ऐसे में यह पोर्टल काफी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA) नागरिक उड्डयन (Civil Aviation) के क्षेत्र में एक नियामक संस्था है, जो हवाई सुरक्षा, दुर्घटना आदि मामलों की जाँच करती है। यह भारत के लिये/से/भारत के भीतर, विमान परिवहन सेवाओं के विनियमन और सिविल विमान विनियमन, विमान सुरक्षा तथा अन्य योग्यता मानकों के प्रवर्तन के लिये भी उत्तरदायी है।

ज्ञानी जैल सिंह 

05 मई, 2020 को भारत के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की 104वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। ज्ञानी जैल सिंह का जन्म 5 मई, 1916 को पंजाब के फरीदकोट ज़िले के एक छोटे से गांव में हुआ था। ध्यातव्य है कि ज्ञानी जैल सिंह भारतीय राष्ट्रपति के पद पर पहुँचने वाले पहले सिख राजनेता थे। स्वतंत्रता से पूर्व ज्ञानी जैल सिंह विभिन्न आंदोलनों का हिस्सा बने रहे थे। स्वतंत्रता से पूर्व ही वे कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् वे 1956 से लेकर वर्ष 1962 तक राज्यसभा के भी सदस्य रहे। वर्ष 1972 में वे पंजाब के मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। 25 जुलाई, 1982 को उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिये शपथ ली और इसी के साथ वे इस पद तक पहुँचने वाले पहले सिख बन गए। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने 'ब्लूस्टार आपरेशन' एवं इंदिरा गांधी की हत्या जैसी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियाँ देखीं। 25 जुलाई, 1987 को ज्ञानी जैल सिंह का राष्ट्रपति कार्यकाल समाप्त हो गया, जिसके पश्चात् 25 दिसंबर, 1994 को एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।


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