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क्या हो आदर्श परीक्षा प्रणाली ?

  • 14 Apr, 2021

नॉर्वे की संसद में एक बार प्रश्न उठा कि अमुक परीक्षा में आया एक प्रश्न उस कक्षा के लिये उपयुक्त नहीं था। मुझे इस पर अचंभा हुआ कि सांसदों के लिये किसी ख़ास कक्षा का एक प्रश्न भला क्यों महत्त्वपूर्ण है? किंतु युवाओं का भविष्य अगर उसी प्रश्न से तय होता हो, तो चिंता वाजिब है। आखिरकार विद्यार्थियों के भविष्य से ही तो देश का भविष्य तय होता है। जिस तरह सब्ज़ियों और तेल के दाम महत्त्वपूर्ण हैं, उसी तरह प्रश्नपत्र भी। ऐसा भारत में भी हुआ है जब किसी परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों को लेकर संसद में चर्चा हुई हो। लेकिन इस तरह की समस्याओं का हल क्या है? एक मानक परीक्षा कैसे बनाई जा सकती है? प्रश्नों को एकरूप कैसे किया जा सकता है?

वर्तमान में अधिकांश प्रश्नपत्र परीक्षकों की एक समिति बनाती है। यह एक कठिन कार्य है और भिन्न-भिन्न विशेषज्ञ अपनी गणना के अनुरूप आसान से कठिन प्रश्न बना कर भेजते हैं। अगर परीक्षाएँ उच्च स्तर की हैं तो कुछ मनोविश्लेषक भी इस प्रक्रिया में मौजूद होते हैं, जो प्रश्नों का विश्लेषण करते हैं। उसके बाद एक कंप्यूटर द्वारा इन प्रश्नों में से प्रश्नपत्र तैयार होता है, लेकिन इसकी जानकारी उन विशेषज्ञों को भी नहीं होती कि अंतत: कौन से प्रश्न चुने गए। यह किसी ख़ास परीक्षा के लिये नहीं कह रहा बल्कि एक मानक प्रक्रिया की बात कह रहा हूँ।

इसी प्रक्रिया में अब ‘साइकोमेट्री’ का प्रयोग भी होने लगा है, जिसके अनुसार परीक्षार्थी के अनुसार प्रश्न बदलते जाते हैं। यह कागज़-पेंसिल वाली परीक्षा में संभव नहीं लेकिन ‘कंप्यूटराइज्ड अडैप्टिव टेस्ट’ (CAT) से मुमकिन है। जैसे एक उदाहरण देता हूँ कि एक परीक्षा में एक तमिल छात्र और एक उत्तराखंड के छात्र सम्मिलित हुए और भू-स्खलन से संबंधित प्रश्न आया। ज़ाहिर है कि उत्तराखंड के विद्यार्थियों के लिये यह प्रश्न अपेक्षाकृत अधिक आसान होगा, क्योंकि उन्हें भू-स्खलन के अनुभव होंगे। वहीं अगर दक्षिण भारतीय मंदिरों के शिल्प पर प्रश्न हो तो मुमकिन है कि तमिल छात्र-छात्राएँ उसे अपने अनुभव से सुगमतापूर्वक लिख सकें। कुछ और भी अंतर दिख सकते हैं जैसे पुरुष क्रिकेट संबंधित प्रश्नों में पुरुषों को अधिक सहूलियत हो।

अगर कंप्यूटर विद्यार्थी के उत्तरों के हिसाब से प्रश्न बदलता जाए, तो सभी परीक्षार्थियों को एक ही स्तर के प्रश्न मिल सकते हैं। इस पद्धति का सबसे आसान रूप ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसे खेल में देखा जा सकता है। आप जैसे-जैसे सही उत्तर देते हैं, प्रश्न कठिन होते जाते हैं। मानक परीक्षा में एक कड़ी यह जोड़ी जाती है कि अगर आप ग़लत उत्तर देते हैं, तो अगला प्रश्न आसान मिलता है। वह सही करने पर आप पुन: कठिन सवालों की ओर बढ़ते हैं। ऐसे में एक औसत विद्यार्थी जिसने पचास प्रश्नों में दस ग़लतियाँ कीं, वह सबसे कठिन प्रश्न तक कभी पहुँच ही नहीं सकता। वहाँ वही पहुँच सकता है, जिसने पचास में उनचास सही किये हों।

भारत के लिये ऐसी परीक्षा नई नहीं है और अमेरिकी विश्वविद्यालयों के लिये GRE/GMAT परीक्षा इसी मॉडल पर होती रही है। भारतीय प्रबंधन संस्थान की परीक्षा कंप्यूटर पर होती रही है। इसमें साइकोमेट्री का उपयोग होना शेष है, लेकिन भविष्य की वस्तुनिष्ठ परीक्षाएँ इस पद्धति से हो सकती हैं। इसमें हर विद्यार्थी को उसकी क्षमता के अनुसार अवसर मिलता है और यह निर्णय कंप्यूटर ही लेता है कि उसके लिये कौन से प्रश्न उपयुक्त हैं। जैसे अगर ऊपर के उदाहरण में विद्यार्थी भू-स्खलन पर उत्तर सहजता से देता है तो उसके अगले कठिन प्रश्नों में दक्षिण के मंदिरों पर प्रश्न मिल सकते हैं जिसके अंक भी अधिक मिलेंगे। यह मात्र सरलीकरण के लिये कह रहा हूँ। ‘मशीन लर्निंग’ के उपयोग से यह पद्धति अधिक पैनी होती जाती है। मैंने ऐसी परीक्षा दी है। निजी अनुभव से यह कह सकता हूँ कि परीक्षा देते वक्त जब प्रश्न आसान होते जाते हैं, तो खुशी नहीं होती; इसके विपरीत यही आभास होता है कि सभी उत्तर ग़लत हो रहे हैं। वहीं, जब अगला प्रश्न कठिन होता जाता है तो यह आत्मविश्वास आता है कि चुन लिया जाऊँगा।

एक दूसरा तरीका है ‘मल्टी-स्टेज टेस्टिंग’, जिसमें हर प्रश्न पर आकलन की बजाय दस प्रश्नों के एक सेट के बाद आकलन होता है। जैसे हम सीढ़ियों की बजाय एक लिफ़्ट में हैं, जिसमें हमारे साथ प्रश्न हैं। अगर हम अधिकांश प्रश्नों के उत्तर सही करते हैं तो हम ऊपर की मंज़िल के प्रश्नों तक पहुँचते हैं। कुछ परीक्षाओं मसलन सिविल सेवा परीक्षा में भी यह भी देखा गया है कि कुछ विशेष पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों को अतिरिक्त लाभ मिल जाता है। इस ‘विशिष्ट लाभ’ को तटस्थ करने के लिये एक अन्य पद्धति का प्रयोग होता है, जिसे ‘आइटम रिस्पॉन्स थ्योरी’ कहते हैं। इसमें विद्यार्थियों की पृष्ठभूमि के अनुसार प्रश्न बदलता है। यह एक कठिन आकलन है, लेकिन अमेरिकी परीक्षाओं में इसका उपयोग अब किया जाने लगा है। हालाँकि भारत में अभी तक इसका प्रयोग शुरू नहीं हुआ है, सिविल सेवा परीक्षा में भी इस पद्धति का उपयोग नहीं होता है।

एक आदर्श परिस्थिति में कंप्यूटर व्यक्तिगत ही नहीं, बल्कि एक बड़े सैम्पल के हिसाब से प्रश्न बदलता है। जैसे अगर कोई प्रश्न एक साथ परीक्षा दे रहे नब्बे प्रतिशत विद्यार्थियों ने ग़लत किया, तो उस प्रश्न को कठिन श्रेणी में मान लिया जाता है। इस तरह मशीन परीक्षा के दौरान भी सामूहिक आकलन कर रही होती है।

ऐसा देखा गया है कि परीक्षार्थियों की मानसिक स्थिति के लिये ऐसे लचीले प्रश्न-पत्र सहायक सिद्ध होते हैं। अगर एक कठिन प्रश्न के कारण विद्यार्थी अटक गए, तो अगला प्रश्न आसान आने से पुन: ऊर्जा आ जाती है। वहीं, ऐसी परीक्षाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें वापस लौट कर ठीक करने की अनुमति नहीं होती। दूसरी समस्या यह है कि निबंध या दीर्घ-उत्तरीय प्रश्नों का आकलन कंप्यूटर नहीं कर सकता। एक और समस्या जो देखने को मिलती है कि प्रश्नपत्र अलग-अलग होने के कारण विद्यार्थी परीक्षा के बाद विमर्श नहीं कर पाते। कंप्यूटर द्वारा आकलन के बावजूद यह शिकायत हो सकती है कि सभी को एक तरह के प्रश्नपत्र क्यों नहीं मिले। कुल मिलकर कहने का भाव यह है कि यद्यपि परीक्षा कि यह पद्धति भी पूर्णतः आदर्श कि श्रेणी में नहीं है किंतु इसमें काफी हद तक विविधता को समायोजित किया जा सकता है।

[प्रवीण झा]

(प्रवीण झा नॉर्वे में डॉक्टर हैं तथा लोकप्रिय पुस्तक ‘कुली लाइंस’ के लेखक हैं।)

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