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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में धर्म समाज को जोड़ने में कितना कारगर?

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में धर्म समाज को जोड़ने में कितना कारगर?

"यतो ऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।"अर्थात धर्म वह अनुशासित जीवन क्रम है, जिसमें लौकिक उन्नति (अविद्या) तथा आध्यात्मिक परमगति (विद्या) दोनों की प्राप्ति होती है। भारतीय संदर्भ में यदि धर्म के अर्थ को गहनता से समझने का प्रयास करें तो इसका मायने है कि जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। हमारी पृथ्वी इस जीवतंत्र के समस्त प्राणियों को धारण किए हुए है, जैसे अमुक इंसान किसी नियम को, व्रत को धारण करता है इत्यादि।

धर्म द्वारा बनाए गए अनेक नियम सहजता के साथ सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा हो गए। यही नियम नैतिकता के भी पर्याय भी माने गए। मसलन सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, क्षमा आदि नैतिक गुण जहाँ समाज के अलग-अलग धर्मों का हिस्सा हैं वहीं ये समाज के सामाजिक तानेबाने को भी संपूर्णता के साथ गढ़ते हैं।

जैन धर्म के पंच महाव्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य मानव मात्र को जहाँ एक स्वस्थ जीवनशैली जीने की प्रेरणा देते हैं वहीं अस्तेय जैसे सिद्धांत सामान्य मानव को संसाधनों के कुशलतम और टिकाऊ उपयोग की प्रेरणा देते हैं। यदि इन सिद्धांतों पर मनुष्य कुशलता के साथ चलता तो न तो जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या सामने आती, न ही समाज के विभिन्न हिस्सों में गृहयुद्ध जैसी स्थिति सामने आती। जैन धर्म के अनेकांतवाद सिद्धांत के अनुसार एक ही तथ्य को भिन्न-भिन्न कोणों से देखने पर सत्य और वास्तविकता भी अलग-अलग समझ आती है। वर्तमान माहौल में यह सिद्धांत समाज में साम्प्रदायिक सौहार्द की स्थापना हेतु बेहद जरूरी है।

यदि बौद्ध दर्शन की बात करें तो बुद्ध के दर्शन का सबसे महत्त्वपूर्ण विचार ‘आत्म दीपो भवः’ अर्थात ‘अपने दीपक स्वयं बनो’। यानी व्यक्ति को अपने जीवन का उद्देश्य या नैतिक-अनैतिक प्रश्न का निर्णय स्वयं करना चाहिये। बौद्ध दर्शन का यह विचार इसलिए बेहद जरूरी है क्योंकि यूज ज्ञान और नैतिकता के क्षेत्र में एक छोटे से बुद्धिजीवी वर्ग के एकाधिकार को चुनौती देकर हर व्यक्ति को उसमें प्रविष्ट होने का मौका देता है। आज जब सम्पूर्ण विश्व अतिवाद की मार झेल रहा है और विश्व के अनेक हिस्सों में युद्ध की घटनाएं सामने आ रही है, ऐसे में बुद्ध का माध्यम मार्ग अति प्रासंगिक है। यह हमें सीख देता है कि सामान्य मनुष्य को किसी भी प्रकार के अतिवादी व्यवहार से बचना चाहिये।

गौतम बुद्ध के मध्यम मार्ग और इहलौकिता पर बल के विचारों की प्रासंगिकता वर्तमान समय में और ज्यादा बढ़ जाती है। उनका यह सिद्धांत रूढि़वादिता को सिरे से खारिज करते हुए तार्किकता पर जोर देता है। दरअसल आज दुनिया में तमाम तरह के झगड़े हैं जैसे- सांप्रदायिकता, आतंकवाद, नक्सलवाद, नस्लवाद तथा जातिवाद इत्यादि। इन सारे झगड़ों के मूल में बुनियादी दार्शनिक समस्या यही है कि कोई भी व्यक्ति देश या संस्था अपने दृष्टिकोण से पीछे हटने को तैयार नहीं है। इन सारे झगड़ों के मूल में बुनियादी दार्शनिक समस्या यही है कि कोई भी व्यक्ति देश या संस्था अपने दृष्टिकोण से पीछे हटने को तैयार नहीं है। यदि विश्व व्यवस्था बौद्ध दर्शन के इन तत्त्वों को अपनी करनी में उतारती है तो विश्व में इन समस्याओं में काफी हद तक निजात पाई जा सकती है।

इसके साथ ही महात्मा बुद्ध का यह विचार की दुःखों का मूल कारण इच्छाएँ हैं, आज के उपभोक्तावादी समाज के लिये प्रासंगिक प्रतीत होता है। इस दृष्टिकोण से बौद्ध दर्शन समाज की सततता के लिए अत्यंत प्रभावी है। बुद्ध का कर्मवादी सिद्धांत भी समकालीन वैश्विक समाज में अत्यंत प्रासंगिक है। दरअसल आज जिस तरह व्यक्ति भाग्यवाद तथा तरह-तरह के आडंबरों एवं कर्मकाण्ड में जकड़ता जा रहा है, ऐसे में कर्मवादी सिद्धांत उन्हे मानव कल्याण से जोड़कर समाज को तार्किक बनाने में कारगर साबित हो सकता है।

भारत में सर्वाधिक संख्या में हिन्दू धर्म के मानने वाले लोग हैं। हिंदू धर्म के चार नैतिक लक्ष्य हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म मानवीय जुनून, विलासिता और महत्त्वकांक्षाओं के तर्कसंगत नियंत्रण का प्रतीक है। हिन्दू धर्म में धर्म वह सही तरीका है जिसके माध्यम से मनुष्य को अपनी व्यक्तिगत, सामाजिक और नैतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करनी होती है। अर्थ कल्याण के लिये भौतिक साधनों से संबंधित है, क्योंकि मनुष्य को अपने परिवार को बनाए रखने और अपनी पूर्ण इच्छाओं को पूरा करने के लिये न्यूनतम धन की आवश्यकता होती है। अर्थ एक अधिग्रहणकारी समाज की जड़ में लालच का समर्थन नहीं है। महात्मा गांधी ने हिन्दू धर्म के इसी पक्ष पर सर्वाधिक बल दिया। उन्होंने लिखा कि प्रकृति मनुष्य की जरूरतें पूरी कर सकती है, लेकिन लालच नहीं।

यदि तीसरे नैतिक लक्ष्य काम की बात की जाए तो ज्यादातर काम को इच्छा के रूप में संदर्भित किया जाता है। लेकिन इसे इच्छाओं की संतुष्टि से उत्पन्न होने वाली खुशी के रूप में माना जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि अंतहीन इच्छाओं के पीछे भागना है, बल्कि काम ऐसा होना चहिये जो परिवार के भीतर रहने वाले मनुष्यों के लिये भी आम हो। यह नैतिक लक्ष्य भारतीय समाज को संपूर्णता के साथ एकीकृत करता है। मोक्ष का अर्थ है जीव का जन्म और मरण के बन्धन से छूट जाना। यह इंद्रियों की भौतिक दुनिया या अंतरिक्ष और समय के भौतिक ब्रह्मांड के बंधनों से मुक्ति है। इसके अनुसार, आत्मा अपने महत्त्वपूर्ण और बौद्धिक गुणों को खो देती है जो शरीर में निवास करते समय उसके पास थे। यह शाश्वत और अमर हो जाती है। यह चार नैतिक लक्ष्य हिंदू नैतिकता के लिये ज़िम्मेदार हैं। यह एक व्यक्ति के जीवन जीने के तरीके से संबंधित है, जिसमें उसे धर्म की सीमा के भीतर सांसारिक अस्तित्व का आनंद लेना चहिये और स्वयं को मोक्ष के लिये तैयार करना चहिये।

मनु ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं:-

"धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥"

अर्थात धृति (धैर्य) क्षमा (दूसरों के द्वारा किए गए अपराध को माफ कर देना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (आंतरिक और बहारी शुचिता), इन्द्रिय निग्रह(इन्द्रियों को वश में रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना); ये दस नैतिक कर्म ही धर्म के लक्षण हैं। विभिन्न धर्म मर्मज्ञ ये मानते है कि हिन्दू संप्रदाय में धर्म, जीवन को धारण करने, समझने और परिष्कृत करने की एक समग्र विधि है।

इसके साथ ही विभिन्न हिन्दू त्यौहार भी समाज को जोड़ते हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बाल गंगाधर तिलक ने छत्रपति शिवाजी और भगवान गणेश के माध्यम से लोगों को आपस मे जोड़ा। तिलक द्वारा आरम्भ किये गए गणेश उत्सव से गजानन राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गए। हालांकि कुछ इतिहासकार ये भी कहते है कि इन उत्सवों से आजादी के आंदोलन की लड़ाई का स्वरूप साम्प्रदायिक हो गया। किंतु ये भी सच्चाई है कि इन उत्सवों के माध्यम से ही समाज का एक बड़ा तबका आजादी की लड़ाई से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ गया। वर्तमान दौर में भी विभिन्न धार्मिक मतों के अनुयायियों द्वारा साझा तौर पर एक-दूसरे को त्यौहारों को मनाया जाता है जिसकी बानगी विभिन्न त्यौहारों जैसे होली, दीपावली आदि में देखी जा सकती है।

यूँ तो धर्म को परिभाषित करना बेहद कठिन है। दुनिया के तमाम विचारकों ने इस संबंध में अलग-अलग मत दिए है। उन सभी मतों का यदि लब्बोलुआब देखे तो धर्म से तात्पर्य है सृष्टि और स्वयं के हित और विकास में किए जाने वाले सभी कर्म ही धर्म है। जैसा कि ऋग्वेद में ऋषि लिखते हैं-

"सर्वेभवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: |

सर्वेभद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत् ||"

अर्थात समस्त प्राणि सुख-शान्ति से पूर्ण हों, सभी रोग, व्याधि से मुक्त रहें, किसी के भाग में कोई दुख न आए और सभी कल्याण मार्ग का दर्शन व अनुसरण करें।

  संकर्षण शुक्ला  

संकर्षण शुक्ला उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले से हैं। इन्होने स्नातक की पढ़ाई अपने गृह जनपद से ही की है। इसके बाद बीबीएयू लखनऊ से जनसंचार एवं पत्रकारिता में परास्नातक किया है। आजकल वे सिविल सर्विसेज की तैयारी करने के साथ ही विभिन्न वेबसाइटों के लिए ब्लॉग और पत्र-पत्रिकाओं में किताब की समीक्षा लिखते हैं।

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