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बाज़ारवाद बनाम कार्यशील महिलाएँ

  • 19 Feb, 2020

आवाज़ उठेगी तो मचेगा शोर

फिर नई उम्मीदों की होगी भोर। - (“मुलाकरम” नामक लघु कथा से उद्धृत)

दहलीज़ से बाहर कदम रखते ही एक महिला अचानक सामाजिक-आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है। तो क्या यह मसला केवल गैर-बराबरी की लकीर लाँघने का है या औपचारिक रूप से किसी संगठन से जुड़कर लाभार्ज़न करने का? बहरहाल इस मसले पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व सामाजिक न्याय के नेपथ्य में चलने वाले बाज़ारवाद को समझना होगा। बेशक, पहली नज़र में यह विमर्श औचित्यहीन या रूढ़िगत लगे किंतु इतना तो तय है कि बाज़ारवाद की नित नई शर्तों के साथ ताल मिलाती ये महिलाएँ मामूली तो नहीं कही जा सकतीं। साधारण शब्दों में कहूँ तो बाज़ारवाद के नित नए पैतरे हैं जिसका एकमात्र लक्ष्य अधिकाधिक लाभार्जन है। अब इस लाभार्जन में यदि सामाजिक न्याय का यश भी जुड़ जाए तो यह अपने उद्देश्य की पूर्णता के साथ-साथ सामाजिक स्वीकार्यता भी प्राप्त कर लेता है।

वर्तमान परिवेश में कार्यशील महिलाओं की तादाद बढ़ती जा रही है जिसका कारण सरकार की नवीन पहलों के साथ सामाजिक दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव को माना जा सकता है। हालाँकि महिलाओं को सर्वाधिक निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा नियोजित किया जा रहा हैं। निजी क्षेत्र की मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा महिलाओं के नियोजन के कारण किसी से छिपे नहीं है और इसको बीपीओ में नियोजित महिलाओं के रूप में देखा जा सकता है। यह बाज़ारवाद का पिछला दौर माना जा सकता है, जिसमें महिलाओं को उत्पाद के रूप में पेश किया जाता था। इससे भी आगे के चरण में यानी अब महिलाओं को सम्मान, आरक्षण एवं संरक्षण देकर अधिक श्रम गहन क्षेत्रों में नियोजित किया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि सामाजिक न्याय की चिरपरिचित विषय वस्तु यानी महिलाएँ अब बाज़ारवाद के नए पैंतरे की चपेट में हैं।

नियोजित एवं कार्यशील महिलाओं के प्रति बढ़ती सामाजिक स्वीकार्यता एक महिला को खास होने का अनुभव कराती है और इसे महिला सशक्तीकरण की सकारात्मक दिशा भी माना जा सकता है। हालाँकि निजी कंपनियों द्वारा महिलाओं को नियोजित किये जाने के नए आयाम को समझना भी ज़रूरी है। दरअसल, यह नया आयाम उन तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं लेखों पर आधारित है जिनकी विषय-वस्तु महिला की क्षमताओं को सशक्तीकरण से जोड़कर प्रस्तुत करना है। आजकल विभिन्न पत्र-पत्रिकाएँ या रिपोर्ट्स महिला वर्ग की क्षमताओं से निजी कंपनियों को रूबरू करा रही है। साथ ही निजी क्षेत्र की विभिन्न बिज़नेस लॉबीज़, गोष्ठियों एवं सेमिनारों में इस बात पर अत्यधिक ज़ोर दिया जा रहा है कि महिलाएँ विभिन्न गुणों जैसे-डिसीज़न मेकिंग, अच्छी सिटिंग पॉवर, नए रूल्स एवं रेगुलेशन के प्रति सहज ग्रहणशीलता, बातचीत की सॉफ्ट स्किल, कम वेतन एवं विकट परिस्थितियों में धैर्यशीलता के साथ निष्ठापूर्वक कार्य संचालन तथा कम सुख-सुविधाओं में अधिक उत्पादकता एवं न्यूनतम मांग इत्यादि से लैस होती हैं। अतः उन्हें नियोजित करना मुनाफे का सौदा है।

उपर्युक्त परिस्थितियाँ बेशक महिलाओं के सशक्तीकरण का माध्यम मानी जा सकती हैं किंतु विडंबना तो यह है कि महिलाएँ गैर-बराबरी की एक दहलीज़ को लाँघकर दूसरी चारदीवारी में कैद हो रही हैं। माना कि श्रमशील होना या पुनर्बल प्राप्त करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है किंतु इसके नेपथ्य के निहितार्थ पर चर्चा करना भी ज़रूरी है, क्योंकि प्राकृतिक रूप से प्रकृति के दोनों चर अर्थात् स्त्री और पुरुष समान रूप से काम करने के बाद थकते हैं। इसलिये महिलाओं को भी आराम, आवश्यक सुख-सुविधाओं और मानसिक तनाव से मुक्ति के लिये हल्की-फुल्की नोकझोंक का अधिकार अपने समकक्षों के समान ही होना चाहिये। बाज़ारवाद के नए कलेवर पर प्रश्नचिह्न इस बिंदु को लेकर भी है कि क्यों महत्त्वपूर्ण पदों जैसे- प्रमुख प्रबंधक, प्रोजेक्ट हेड, ऑफिस इंचार्ज आदि पर महिलाओं को नियोजित नहीं किया जाता और क्यों उनके समकक्षों द्वारा महत्त्वपूर्ण कार्यों का प्रत्यायोजन नहीं किया जाता? क्यों इन महिलाओं से जात (बाज़ारवाद) के दो बलशाली पाटों (पुरुष और कंपनी) के बीच हुनर से पिसने और पाऊडर की तरह विनम्र होने की अपेक्षाएँ की जाती हैं? बात केवल नारीवाद और स्त्री विमर्श तक सीमित नहीं है, न ही महिलाएँ अपनी क्षमता अथवा योग्यताएँ भूल चुकी हैं और उन्हें अब उद्बोधन की आवश्यकता हो, क्योंकि अपने घर-परिवार के कार्यों में संलग्न प्रत्येक महिला पहले से ही श्रमसाध्य होने के साथ प्रबंधकीय गुणों से लैस रही है। दरअसल, प्रश्न तो यह है कि हमें प्रकृति के दोनों चरों को ज़िम्मेदार और निष्ठावान बनाना है अथवा नहीं या हमें अपने समाज में कर्त्तव्य विमुक्त पुरुष चाहिये अथवा क्षमता से अधिक कार्य करने वाली महिलाएँ?

अब भाव बिल्कुल स्पष्ट है कि स्वास्थ्य, क्षमता और आवश्यक न्यूनतम संसाधनों की बराबरी की प्रबल दावेदार महिलाएँ भी हैं जिन्हें केवल प्रशंसा के दम पर अधिक समय तक नियोजित रखना संभव नहीं है। अब आप भी शुरुआती प्रश्न के गूढ़ रहस्यों से परिचित हो चुके होंगे, अतः लेखिका, उसके लेखन तथा लेख में निहित मुद्दे पर अब आप भी कुछ प्रश्न स्वतंत्र रूप से उठा सकतें हैं? मैंने तो इस लेख के माध्यम से एक बीज बोया है जिसके अंकुरण के लिये आपकी राय बहुत ज़रूरी है।

[पिंकी कुमारी]

(पिंकी कुमारी दृष्टि समूह में एक कंटेंट राइटर हैं और विभिन्न विधाओं में लेखन यानी कविता, संपादकीय लेख आदि में भी इनकी गहरी रुचि है।)

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