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दृष्टि आईएएस ब्लॉग

पारिस्थितिकी संतुलन में आर्द्रभूमि (Wetlands) का महत्त्व

दक्षिणी दिल्ली में नीला हौज नामक एक आर्द्र भूमि क्षेत्र है जो 4 हेक्टेयर में फैला है। यह पहले ताजे पानी की झील हुआ करती थी, जिस से दक्षिणी दिल्ली में पेयजल की आपूर्ति भी की जाती थी। कालांतर में यह तीव्र नगरीकरण और नगरीय अपशिष्ट के कारण डंपिंग ग्राउंड में बदल चुकी थी जिसे सर्वोच्च न्यायालय के लगातार दबाव बनाने के कारण 2015 में पुनर्जीवित करने के प्रयास आरंभ किये गये। 2016 में इसी नीला हौज व आस-पास के करीब 10 एकड़ क्षेत्र में "नीला हौज बायोडाइवर्सिटी पार्क" की स्थापना की गयी। वर्तमान में यह एक कृत्रिम आर्द्र भूमि है जो जैविक उपचार विधि से सीवेज जल को शुद्ध करके इसे आगे झील में भेजती है जो और भी आगे संजय वन क्षेत्र तक जाता है। कृत्रिम सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की तुलना में न केवल यह अधिक विश्वसनीय और सक्षम है बल्कि अधिक सस्ता है भी है। यह शून्य ऊर्जा व्यय करते हुये लगभग 10 लाख लीटर सीवेज जल का प्रतिदिन शुद्धिकरण करता है, जिसके फलस्वरुप निरसित जल में बी.ओ.डी. (Biological Oxygen Demand) की मात्रा 4 मिलीग्राम प्रति लीटर तक होती है। इस प्रकार यदि वनों को हम 'पृथ्वी के फेफड़े' कहते है तो आर्द्र भूमियों को 'पृथ्वी की किडनी' कहना सर्वथा उचित है।

आर्द्र भूमि की परिभाषा कई प्रकार से दी जाती है। 1971 के प्रसिद्ध रामसर कन्वेंशन के अनुसार "जलीय व स्थलीय पारिस्थितिकीय प्रणालियों के बीच का संक्रमण क्षेत्र जो दीर्घावधि में प्राकृतिक या कृत्रिम रूप से, खारे या ताजे जल से भरा हुआ अथवा जल से संतृप्त हो, आर्द्र भूमि कहा जाता है जिसमें समुद्रतटीय भाग भी शामिल है जहाँ लघु ज्वार की स्थिति में जल की गहराई 6 मीटर से अधिक नहीं हो।"
हर वर्ष 2 फरवरी को 'विश्व आर्द्र भूमि दिवस' मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन 1971 में ईरान के रामसर में अंतराष्ट्रीय आर्द्र भूमि कन्वेंशन को अपनाया गया था। इसी कन्वेंशन में 'रामसर स्थल' को भी चिन्हित करने की परिकल्पना की गयी थी जहाँ विश्व में परिस्थितिकीय रूप से अति महत्वपूर्ण आर्द्र भूमियों की पहचान कर उनके संरक्षण हेतु विशेष प्रयास करने पर बल दिया गया था।

आर्द्र भूमियां विश्व के हर देश और लगभग प्रत्येक जलवायु प्रदेश में पायी जाती हैं। भारत में लगभग 4.6% भूभाग आर्द्र भूमि के अंतर्गत आता है जो करीब 15.25 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल पर फैली हुई हैं। देश में 49 महत्वपूर्ण रामसर स्थल चिन्हित किये गये हैं जो 1 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल से अधिक भाग में फैले हैं। विश्व में लगभग 2400 रामसर स्थल हैं जिनका कुल क्षेत्रफल 25 लाख वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है।

वर्तमान में भारत सहित विश्व के सभी देश आर्द्र भूमियों के संरक्षण व संवर्धन पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। ये आर्द्र भूमियां (Wet lands) जिन्हें पहले 'वेस्ट लैंड (Waste lands - व्यर्थ भूमि)' कहा जाता था, वर्तमान में पारिस्थितिकीय समस्याओं से निपटने हेतु वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा सर्वाधिक कारगर अस्त्र के रूप में देखी जा रही हैं। वैज्ञानिकों के मध्य अब एक बात काफी प्रमुखता से की जाती है कि "प्रकृति में विकराल रूप धारण कर रही पर्यावरणीय समस्याओं का निदान वास्तव में स्वयं प्रकृति में ही मौजूद है।" इस धारणा का आशय वास्तव में इन आर्द्र भूमियों से ही होता है। इसके पीछे उत्तरदायी वे प्रमुख पारिस्थितिकीय लाभ हैं जो इन आर्द्र भूमियों से प्राप्त होते हैं–

1. जल शुद्धिकरण – आर्द्र भूमियां पर्यावरण में शानदार प्राकृतिक फिल्टर की तरह कार्य करती हैं। ये अवसादों को रोकती है, और जल में मौजूद संदूषकों को जैव उपचार विधि से अवशोषित करती हैं। इसका बेहतरीन उदाहरण भारत में पूर्वी कोलकाता आर्द्र भूमि क्षेत्र है। यह विश्व का विशालतम प्राकृतिक जल शोधन क्षेत्र है जो 125 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है और वास्तव में कई छोटी-बड़ी प्राकृतिक व कृत्रिम झीलों, तालाबों और कृषि भूमियों का एक जटिल नेटवर्क है। यह 1 करोड़ से अधिक की आबादी वाले कोलकाता शहर के कुल सीवेज के एक-तिहाई भाग का शोधन प्रतिदिन करता है तथा प्राप्त जल का इस्तेमाल कृषि कार्यों व मछली पालन में किया जाता है। यह विश्व का विशालतम सीवेज जल आधारित मत्स्य पालन क्षेत्र भी है।
इसी कार्य को करने हेतु करोड़ों रुपयों की लागत से बने कृत्रिम सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और उसमे व्यय होने वाली लाखों यूनिट बिजली का यदि हिसाब किया जाये तो पूर्वी कोलकाता आर्द्र भूमि का कितना अधिक महत्व है, यह आंका जा सकता है।
श्रीलंका में कोलंबो शहर में स्थित तलंगामा आर्द्र भूमि भी इसी प्रकार की भूमिका अदा करती है व शहर की जीवन-रेखा की तरह कार्य करती है। 2018 में कोलंबो विश्व का प्रथम राजधानी शहर बना जिसे अंतरराष्ट्रीय आर्द्र भूमि शहर घोषित किया गया।
अब तक रामसर कन्वेंशन के अंतर्गत 18 ऐसे शहरों को चिन्हित किया गया है जिन्होंने अपनी आर्द्र भूमियों को बचाने और उन्हें और भी अधिक स्वच्छ बनाने के लिये असाधारण प्रयास किये हैं।

2. अतिरिक्त जल संग्रहण - आर्द्र भूमियां एक वृहत् स्पंज की तरह कार्य करती हैं जो अतिरिक्त जल को संगृहीत कर लेती हैं और शुष्क मौसम में जब जल की कमी हो जाती है, वे धीरे-धीरे उस अतिरिक्त जल को पारितंत्र में वापस छोड़ती हैं। महाराष्ट्र का प्रसिद्ध 'रालेगण सिद्धि जल संरक्षण मॉडल' आर्द्र भूमियों के इसी गुण पर आधारित है जिसके जरिये उस क्षेत्र में सूखे की समस्या का सामना सफलतापूर्वक किया गया।

3. बाढ़ और मृदा अपरदन पर नियंत्रण – आर्द्र भूमियां बाढ़ की रोकथाम और मृदा अपरदन को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती हैं। बाढ़ या अधिक वर्षा की स्थिति जब नदियों के तटबंध क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, तब ये आर्द्र भूमियां जल की अधिक मात्रा अपने अंदर समाहित कर लेती हैं जिससे बाढ़ का फैलाव अधिक नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त आर्द्र भूमि की वनस्पतियां भी अपनी जड़ों के कारण मृदा अपरदन को रोकती हैं।

4. भूजल स्तर में वृद्धि – आर्द्र भूमि और उनकी वनस्पतियां भूजल संरक्षण व संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऊष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में इनकी यह भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है जहाँ ये कृषि का प्रमुख आधार बनती हैं। हमारे गाँवों में कहावत भी है कि "एक तालाब कई कुओं को जिंदा रखता है। " इसके पीछे आर्द्र भूमियों का यही गुण उत्तरदायी है।

5. खाद्य श्रृंखला में विविधता व संतुलन – आर्द्र भूमियों के उथले जल में उच्च मात्रा में सूक्ष्म पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो जल में उपस्थित सूक्ष्म जीवों जैसे नवजात हरे पौधों, नवजात मछलियों, नवजात उभयचरों आदि का प्रमुख भोजन होते हैं। ये सूक्ष्म जीव ही आर्द्र भूमि पारितंत्र का आधार है जिसके कारण खाद्य श्रृंखला में विविधता व स्थायित्व बना रहता है।

6. भू-जैव रासायनिक चक्रों में बड़ी भूमिका – आर्द्र भूमियां अपने उथले जल में मौजूद अधिक पोषक तत्वों के कारण भू जैव रासायनिक चक्रों (नाइट्रोजन चक्र, सल्फर चक्र आदि) के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं तथा पर्यावरण में इनका संतुलन बनाये रखती हैं।

7. जैव विविधता हेतु अति महत्वपूर्ण – आर्द्र भूमियां विश्व की सर्वाधिक उत्पादक पारितंत्रों (Highest productive ecosystems) में गिनी जाती हैं। विश्व की लगभग 40% जीव प्रजातियों का मूल आवास आर्द्र भूमियां हैं। विश्व के कुल मत्स्य उत्पादन का करीब 60% हिस्सा भी आर्द्र भूमियों से ही आता है।

8. कार्बन सिंक के रूप में महत्वपूर्ण – हाल के वर्षों में, जब जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन अत्यधिक विकराल समस्या के तौर पर सामने आ रहे हैं, आर्द्र भूमियों की कार्बन सिंक के रूप में भूमिका अति महत्वपूर्ण हो गयी है। आर्द्र भूमियां अपनी वनस्पतियों और मिट्टी के भीतर कार्बन की विशाल मात्रा को अवशोषित करने की क्षमता रखती हैं (विश्व के 12% कार्बन को) जिससे ग्रीन हाऊस प्रभाव पर नियंत्रण करने में मदद मिलती है। समुद्रतटीय आर्द्र भूमि क्षेत्रों को 'ब्लू कार्बन इकोसिस्टम' भी कहते हैं जो कार्बन अवशोषण में अहम भूमिका निभाते हैं।

9. तटीय क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदा सुरक्षा बैरियर – समुद्रतटीय क्षेत्रों में ये आर्द्र भूमियां तथा इनकी वानस्पतिक सम्पदा वास्तव में समुद्री लहरों से होने वाले भूमि कटाव, चक्रवाती तूफानों, सूनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कुप्रभावों को कम करने में मददगार सिद्ध होती हैं। दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देशों में 2004 की सूनामी के बाद विशेषतः तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव्स वनों के विस्तार पर अधिक बल दिया गया है जिसके अच्छे परिणाम भी सामने आये हैं। भारत में भी विशेष रूप से पूर्वी तटीय भागों में मैंग्रोव्स वनों का विस्तार इसी उद्देश्य से किया जा रहा है क्योंकि देश का यह भाग प्रायः चक्रवाती तूफानों से प्रभावित रहता है।

10. मानव समुदाय के लिये आर्थिक महत्व – विश्व के कुल मत्स्य उत्पादन का दो-तिहाई भाग आर्द्र भूमियां उत्पादित करती हैं। यदि कृषि व अन्य कृषि-सह-गतिविधियों को शामिल किया जाए तो विश्व की लगभग 1 अरब से अधिक आबादी अपनी आजीविका हेतु इन पर निर्भर हैं। पूर्वी कोलकाता आर्द्र भूमि तंत्र लगभग 20 हजार से अधिक लोगों को आजीविका के साधन प्रदान करता है। विकासशील देशों में आर्द्र भूमि क्षेत्रों में विशेषकर चावल की खेती और मत्स्य पालन बड़े पैमाने पर होते हैं। भारत व बांग्लादेश में फैला सुंदरबन आर्द्र भूमि क्षेत्र इसका एक सुन्दर उदाहरण है जहाँ चावल व जूट की काफी अधिक उपज होती है।

आर्द्र भूमियों के सम्मुख संकट –

आर्द्र भूमियों के पर्यावरण व मनुष्यों के लिये इतने अधिक लाभप्रद होने के बाद भी यह एक सत्य है कि वर्तमान में विश्व की अधिकाँश आर्द्र भूमियां संकटग्रस्त दशा में हैं। इनके नष्ट होने की दर वर्तमान में होने वाले वनीय विनाश की दर से तीन गुनी है। 'ग्लोबल वेटलैंड आउटलुक' के अनुसार पिछले सिर्फ 40 वर्षों में विश्व की 40% से भी अधिक आर्द्र भूमियां समाप्त हो चुकी हैं और इनके नष्ट होने की दर वर्ष 2000 के बाद बेतहाशा बढ़ी है। 'वेटलैंड इंटरनेशनल साउथ एशिया' के अनुसार भारत में पिछले 30 वर्षों में 30% से अधिक आर्द्र भूमियां समाप्त हो चुकी हैं। महानगरों में मुंबई की 71%, दिल्ली की 40%, 'सिटी ऑफ लेक्स' कहे जाने वाले बंगलुरु की 57% आर्द्र भूमियां अपना वजूद खो चुकी हैं।

आर्द्र भूमियों के इस विनाश के पीछे अनेक कारण उत्तरदायी हैं –

1. जनसंख्या वृद्धि, अनियोजित शहरीकरण व भूमि उपयोग में परिवर्तन – पिछले 100 वर्षों में जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ नगरों की संख्या में भी दो गुने से अधिक की वृद्धि हुई है जिसका कुप्रभाव आर्द्र भूमि क्षेत्रों पर पड़ा है। बिहार की कांवर ताल झील जो कभी एशिया में ताजे पानी की विशालतम गोखुर झील (Oxbow lake) हुआ करती थी वर्तमान में अपने मूल आकार का मात्र एक-तिहाई रह गयी है।

2. कृषि के रासायनिक अवशेष – कृषि में रासायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग बहुत अधिक बढ़ा है जिसने सुपोषण (eutrophication) जैसे कुप्रभावों के चलते आर्द्र भूमियों को नष्ट करने में बड़ी भूमिका निभायी है।

3. औद्योगिक प्रदूषण – हानिकारक औद्योगिक प्रदूषकों, बिना शोधन किये जहरीले कचरे आदि के आर्द्र भूमियों में पहुँचने की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं जिससे आर्द्र भूमियां समाप्त हो रही हैं। बंगलुरू की प्रसिद्ध बेलांदूर झील में प्रदूषकों की मात्रा इतनी अधिक हो चुकी है कि वर्ष 2018 और 2019 में झील में भीषण आग लगने की घटनाएँ भी सामने आ चुकी हैं।

4. निर्वनीकरण – लगातार बड़े पैमाने पर जारी वनीय विनाश के कारण मृदा अपरदन बढ़ रहा है जिससे झीलों में गाद की समस्या (Siltation) बढ़ती जा रही है।

5. कृषि भूमि क्षेत्र द्वारा अतिक्रमण – बढ़ती आबादी के साथ-साथ कृषि भूमि का क्षेत्रफल भी बढ़ा है और इसकी मार भी आर्द्र भूमि क्षेत्रों को काफी ज्यादा झेलनी पड़ी है।

6. अपवाह तंत्रों में जबरन बदलाव – जलीय क्षेत्रों से जलाभाव वाले क्षेत्रों में सिंचाई हेतु जल पहुँचाने के लिये नहरों के अधिक निर्माण करने और जलधाराओं का रुख मोड़ने के कारण क्षेत्रों के अपवाह तंत्र में परिवर्तन आया है और आर्द्र भूमियों पर काफी बुरा प्रभाव देखा गया है।

7. आक्रमणकारी प्रजातियाँ – वर्तमान में आर्द्र भूमियों के लिये ये बहुत बड़ा खतरा हैं। जीवों की आक्रमणकारी प्रजातियाँ (जैसे कैटफिश, साल्वीनिया आदि) जहाँ स्थानीय प्रजातियों को समाप्त करते हुये अपनी संख्या तेजी से बढ़ा रही हैं, जैव विविधता समाप्त कर रही हैं, वहीं पानी बहने के प्राकृतिक रास्तों को भी अवरुद्ध कर रही हैं।

8. जलवायु परिवर्तन – लगातार बढ़ता तापमान, वर्षा के पैटर्न में स्थनिक व सामायिक बदलाव, प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति व तीव्रता, समुद्री जल स्तर का बढ़ना आदि ऐसी घटनाएँ हो रहीं हैं जो आर्द्र भूमियों पर बेहद बुरा असर डाल रही हैं। आर्द्र भूमि क्षेत्रों के नष्ट होने के कारण वहाँ मौजूद विशाल जीव समुदाय का प्राकृतिक आवास भी समाप्त होने और उन जीवों के लुप्त हो जाने की भी संभावना है।

अतः यह कहा जा सकता है कि आर्द्र भूमियों द्वारा पर्यावरण को जो दीर्घकालिक लाभ प्राप्त होते हैं, उन्हें देखते हुए हमें अपने लघुकालिक स्वार्थ को वरीयता नहीं देनी चाहिये बल्कि अपनी आर्द्र भूमियों के संरक्षण व संवर्धन के अधिकाधिक प्रयास करने चाहिये। जलवायु परिवर्तन व वैश्विक तापन की समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुये यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

  हर्ष कुमार त्रिपाठी  

हर्ष कुमार त्रिपाठी ने पूर्वांचल विश्वविद्यालय से बी. टेक. की उपाधि प्राप्त की है तथा DU के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से भूगोल विषय में परास्नातक किया है। वर्तमान में वे शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार के अधीन Govt. Boys. Sr. Sec. School, New Ashok Nagar में भूगोल विषय के प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हैं।

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