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सफल खिलाड़ी किंतु असफल कप्तान की कहानी

कप्तानी की पंचवर्षीय योजना पूरी करने से पहले ही बीसीसीआई ने भारतीय वनडे टीम के कप्तान विराट कोहली की इस पद से विदाई कर दी। बीसीसीआई ने आगामी दक्षिण अफ्रीका दौरे के लिए टीम की घोषणा करते हुए बताया कि रोहित शर्मा अब आगे से भारतीय एकदिवसीय क्रिकेट टीम के कप्तान होंगे। सोशल मीडिया ही आजकल मास मीडिया है बल्कि मानस मीडिया है। ऐसे में 8 दिसम्बर को इस खबर के रिलीज होते ही कोहली फैंस का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया और उन्होंने हैशटैग शेम ऑन बीसीसीआई ट्रेंड करा दिया। खैर! ऐसे ट्रेंड के नतीजे कम ही मौकों पर असरकारी होते है। बाद में फैंस की खेल देखने की भावना का ध्यान रखते हुए बीसीसीआई ने विराट कोहली के लिए दो पंक्ति का थैंक यू नोट देते हुए इस मुद्दे से इतिश्री कर ली। यह खबर तो यहीं समाप्त हो जाती है लेकिन इससे हमें कप्तानी से जुड़े कुछ दिलचस्प प्रसंगों की चर्चा का अवसर भी मिल जाता है।

विराट इकलौते ऐसे क्रिकेटर नहीं हैं जो शाहकार खिलाड़ी होने के बावजूद अच्छा नेतृत्व न दे पाए हों या यूं कहें कि बड़े अभियानों में टीम को विजय न दिला पाए हों। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर से लेकर कई अन्य लीजेंडरी खिलाड़ी इस सूची में शामिल हैं। प्रतिभावान होने मात्र से ही टीम की सदारत करने के गुण विकसित नहीं हो सकते, इस बात की पुष्टि के कई उदाहरण मौजूद हैं। वहीँ दूसरी ओर क्रिकेट के बहुतेरे सफल कप्तान ऐसे भी हैं जिनकी सामूहिक तौर पर अर्जित की गई उपलब्धि के बरक्स उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि बौनी प्रतीत होती है। हाँ, रिकी पोंटिंग सरीखे अपवाद जरूर हैं जिन्होंने व्यक्तिगत और टीम के तौर पर ऐसे रिकॉर्ड बनाए हैं जिन्हें आज भी तोड़ा न जा सका है।

अगर भारतीय क्रिकटरों का संदर्भ दें तो ऐसे हतभाग्यसदर की सूची में सबसे ऊपर हैं -सचिन तेंदुलकर। इन्हें टीम की कमान तब सौंपी गई जब कि कपिल देव को क्रिकेट छोड़े लगभग चार बरस हो चुके थे और टीम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रही थी। चयनकर्ताओं को लगा कि एक प्रतिभाशाली क्रिकेटर अच्छा योजनाकार और लीडर हो सकता है। मगर सचिन इन उम्मीदों पर खरे न उतर सके। टीम के कप्तान के रूप में सचिन ने 25 टेस्ट मैच खेले जिसमें उन्हें केवल 4 में ही जीत मिली जबकि उनकी कप्तानी में खेले गए 73 एकदिवसीय मैचों में टीम ने मात्र 23 मैचों में ही जीत का स्वाद चखा। आज भी क्रिकेट के छोटे-मोटे कुल व्यक्तिगत रिकार्डों में तकरीबन 50 प्रतिशत रिकॉर्ड सचिन के नाम ही हैं मगर कप्तानी के तौर पर वो बेहद असफल साबित हुए।

किंग कोहली जिनके बारे में कहा जाता है कि दूसरी पारी में जब वो बल्लेबाजी करने आते हैं तो उनकी निगाहें सिर्फ स्कोर बोर्ड पर होती हैं और जब तक उनके बल्ले से निकली गेंद स्कोर बोर्ड पर ‘भारत की जीत' चस्पा नहीं कर देती है तब तक उनके बल्ले का अश्वमेध रुकता नहीं है। कोहली की ऐसी सधी बल्लेबाजी, विपक्षी टीम की आँखों मे आँखें डालकर जवाब देने की आक्रामक शैली और अंडर-19 में सफल कप्तानी को ध्यान में रखकर भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने उन्हें टीम की कमान सौंपी। उन्होंने टीम को ढेर सारे मैचों में विजय भी दिलाई और कई मायनों में वो भारत के सफलतम कप्तान भी हैं। आँकड़ों के हवाले से देखें तो इन्होंने टीम को अपनी कप्तानी में खेले गए 95 वनडे मैचों में से 65 में विजय दिलाई और इनके नेतृत्व में खेले गए 66 टेस्ट मैचों में 39 में टीम ने जीत हासिल की। ये रिकॉर्ड किसी भी कप्तान को सफल सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। हालाँकि कोहली के आलोचक इसके बरक्स वैकल्पिक तथ्य को भी रखते हैं कि कोहली का ये विजयी चेतक सिर्फ हिंदुस्तानी धरती पर सरपट दौड़ा है, विदेशी धरती पर इसकी चाल धीमी ही रही है। दरअसल, कोहली ने कप्तान के रूप में विदेश में 35 टेस्ट मैच खेले हैं जिनमें उन्हें सिर्फ 15 में जीत मिली है। इतना ही नहीं इन 15 मैचों में से अधिकांश तो उन्होंने कमजोर टीमों के खिलाफ जीते हैं, अच्छी टीमों के विरुद्ध उनका रिकॉर्ड कमतर ही रहा है। उदाहरण के तौर पर कोहली की कप्तानी में साउथ अफ्रीका, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ विदेशी सरजमीं पर खेले गए कुल 22 मैचों में मात्र 6 में उन्हें जीत मिली है। पूर्वकाल की अपराजेय और वर्तमान काल की अपेक्षाकृत कमजोर टीमें; वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्होंने 4 जबकि श्रीलंका के खिलाफ 5 मैच जीतें है। इन तथ्यों के बाद भी टेस्ट प्रारूप में कोहली काफी सफल कप्तान रहे हैं। कोहली की कप्तानी का सबसे बुरा पक्ष है कोई भी आईसीसी ट्रॉफी न जीत पाना। यहाँ तक कि वो अपनी आईपीएल टीम को भी विजयी खिताब नहीं दिला सके। ऐसे में कोहली का जाना आश्चर्यजनक नहीं है, हाँ उनकी विदाई के तरीके पर जरूर पक्ष-विपक्ष हो सकते हैं।

कुछेक क्रिकेटर ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर या दबाव न झेल पाने के कारण या फिर बीसीसीआई अधिकारियों की क्रिकेट से इतर प्राथमिकताओं के कारण कप्तानी छोड़ी है। देश के दो दिग्गज खिलाड़ी सुनील गावस्कर और कपिल देव तो आया राम-गया राम की तर्ज की तौर पर टीम के कप्तान के तौर पर बदले जा रहे थे। इससे तंग आकर सुनील गावस्कर ने 1985 में चैंपियंस ऑफ चैंपियंस ट्रॉफी जीतने के बाद टीम की कप्तानी को अलविदा कह दिया। इक्कीसवीं सदी के क्रिकेट के द्रोणाचार्य और इंडियन बेंच स्ट्रेंथ को सार्वकालिक मजबूती देने वाले क्रिकेटर राहुल द्रविड़ ने वर्ष 2007 में इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज जीतने के बावजूद भी बीसीसीआई की नूराकुश्ती में टीम की सदारत छोड़ दी।

अगर रूठे हुए भाग्य वाले विदेशी खिलाड़ियों के बारे में लिखूं तो ये फेहरिस्त बहुत लंबी हो जाएगी, फिर भी उनमें कुछेक मानीखेज खिलाड़ी जरूर हैं जिन्होंने क्रिकेट तो ऐसा खेला कि कालजयी बन गए मगर उसी अनुरूप कप्तानी नहीं कर सके ।

इन सूची में सबसे ऊपर हैं – ब्रायन लारा। वेस्टइंडीज में ‘द प्रिंस' उपनाम से चर्चित ब्रायन लारा ऐसे करिश्माई खिलाड़ी हैं जो आज सुबह अगर पिच पर उतरे तो सांझ तक खेलते रहेंगे और अगली सुबह से अगली सांझ भी हो जाएगी, फिर भी ये टस से मस न होंगे। टेस्ट क्रिकेट की एक पारी में सर्वाधिक 400* रन बनाने का विश्व रिकार्ड इनके नाम भले है मगर ये कप्तान के तौर पर बेहद फिसड्डी साबित हुए हैं। इनकी कप्तानी में टीम ने 125 वनडे मैच खेले और मात्र 40 मैच में जीत मिली। इतना ही नहीं इनकी कप्तानी में खेले गए 47 टेस्ट मैच में से टीम ने मात्र 9 मैच जीते। इनकी कप्तानी के 9 वर्षों में टीम कुछेक मौके पर ही आईसीसी सूची के निचले स्थानों से ऊपर आई, वर्ना स्थायी तौर पर टीम नीचे के स्थानों पर ही काबिज रही।

बांग्लादेश के एक खिलाड़ी हैं जिन्हें लड़ने को लेकर उतनी ही आस्था है जितनी कि गांधी जी को अहिंसा को लेकर थी। खेलने के अनुपात में बैन झेलने वाले क्रिकेटर शाकिब अल हसन ने 13 टेस्ट मैच में कप्तानी की, जिसमें दस में वो हारे हैं जबकि 50 वनडे मैचों में उनकी टीम ने 30 बार हार का सामना किया है। जबकि टी ट्वेंटी वर्ल्ड कप में सबसे अधिक विकेट लेने सहित इनके नाम अनेक रिकॉर्ड हैं और साथ ही ये विश्व के सर्वश्रेष्ठ ऑलराउंडर में से एक है। भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के एक धुआँधार बल्लेबाज है शाहिद आफरीदी। पाकिस्तान की कमान संभालने पर जैसे वो इस बात को ही भूल गए कि वो टीम के कप्तान है। जैसे अपनी बल्लेबाजी में वो उतावलापन दिखाते है वैसे ही उन्होंने कप्तानी में भी जोखिम लिए। नतीजा ये रहा कि उनकी कप्तानी में खेले गए 85 एकदिवसीय मैचों में पाकिस्तान को महज 15 में ही जीत नसीब हुई।

जिन कुछेक खिलाड़ियों ने टी ट्वेंटी क्रिकेट के व्याकरण को बदल कर रख दिया है, उनमें से एक हैं क्रिस गेल। हाल ही में वो अपनी टीम के चयनकर्ता कर्टनी एम्ब्रोस के साथ उनके चयन को लेकर की गई जुबानी जंग की वजह से भी चर्चा में थे। क्रिस गेल निर्विवाद रूप से एक अच्छे हिटर हैं मगर उनके नेतृत्व में खेले गए 53 वनडे मैचों में टीम ने 30 मैच गंवा दिए। इतना ही नहीं टीम आईसीसी की रैंकिंग में खिसक कर सबसे नीचे के स्थान पर भी चली गई।

संकर्षण शुक्ला

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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