बिहार Switch to English
बिहार में दूसरा टाइगर रिज़र्व
चर्चा में क्यों?
बिहार सरकार ने कैमूर वन्यजीव अभयारण्य को राज्य के दूसरे टाइगर रिज़र्व के रूप में विकसित करने की स्वीकृति प्रदान की।
मुख्य बिंदु
- प्रशासनिक स्वीकृति: इस प्रस्ताव को राज्य मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृति प्रदान की जा चुकी है तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) से अंतिम स्वीकृति की प्रतीक्षा की जा रही है।
- बिहार का प्रथम टाइगर रिज़र्व: वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व है, जो भारत–नेपाल सीमा के समीप पश्चिमी चंपारण ज़िले में अवस्थित है।
- पर्यावास का विस्तार: प्रस्तावित रिज़र्व बाघों के प्रसार हेतु अतिरिक्त पर्यावास उपलब्ध कराकर वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व पर दबाव को कम करेगा।
- गलियारे का सामरिक महत्त्व: कैमूर क्षेत्र बिहार और मध्य प्रदेश के वन क्षेत्रों को जोड़ने वाले एक महत्त्वपूर्ण वन्यजीव गलियारे के रूप में कार्य करता है।
- जैव विविधता का मूल्य: यह क्षेत्र समृद्ध वनस्पति, विविध जीव-जंतुओं, पठारी भू-आकृतियों, झरनों तथा शेरगढ़ किले जैसे ऐतिहासिक स्थलों से समृद्ध है।
- कैमूर वन्यजीव अभयारण्य:
- संरक्षणात्मक प्रभाव:टाइगर रिज़र्व घोषित करने से जैव विविधता संरक्षण को सुदृढ़ता मिलेगी, अवैध शिकार पर प्रभावी नियंत्रण होगा तथा पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन को प्रोत्साहन प्राप्त होगा।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA)
- यह पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है।
- इसकी स्थापना वर्ष 2006 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों में संशोधन करके की गई। प्राधिकरण की पहली बैठक नवंबर 2006 में हुई थी।
- यह राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के प्रयासों का ही परिणाम है कि देश में विलुप्त होते बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
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