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भारत में संघ और राज्यों के बीच राजकोषीय संबंधों पर नए आर्थिक उपायों का प्रभाव।

  • 08 May 2018
  • 14 min read

केंद्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय व राजकोषीय संबंधों की व्याख्या संविधान के भाग-12 के अध्याय (1) में की गई है। संघ तथा राज्यों के मध्य वित्तीय साधनों का विभाजन किया गया है। भारतीय संविधान में यह विभाजन 1935 के अधिनियम में किये गए विभाजन पर आधारित है। वर्तमान विभाजन के अनुसार कुछ ‘कर’ केवल राज्य सरकारों को सौंपे गए हैं। राज्य सरकारें अपने द्वारा लगाए गए करों को स्वयं एकत्रित करती हैं और स्वयं ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये उस धन को व्यय करती हैं। अनुच्छेद 266 के अंतर्गत भारत और राज्यों की संचित निधियों और लोक लेखाओं की स्थापना की गई है। संविधान के अनुच्छेद 273, 275 एवं 282 के अंतर्गत राज्यों को तीन प्रकार के सहायता अनुदान प्रदान किये जाते हैं। अनुच्छेद 280 के अनुसार संघ और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों के वितरण, राज्यों के बीच ऐसे आगमों के आवंटन भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्वों में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धांतों, राज्यों में पंचायतों नगरपालिकाओं के संसाधनों की पूर्ति के लिये किसी राज्य की संचित निधि के आवश्यक उपायों आदि के बारे में वित्त आयोग सर्वप्रथम राज्य सरकारों को पत्र लिखकर उनसे आगामी पाँच वर्षों में उनके सामान्य राजस्व व्यय और राजस्व से प्राप्त आय के आकलन देने को कहता है। आकलनों के प्राप्त होने पर इनकी विश्वसनीयता की जाँच करने और आवश्यक स्पष्टीकरण के लिये राज्यों के संबंधित अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श करने इत्यादि हेतु ही वित्त आयोगों का गठन किया जाता है।

पिछले पाँच दशकों में तकरीबन सभी वित्त आयोगों की अनुशंसाएँ केंद्र सरकार ने स्वीकार की हैं। इन आयोगों ने निरंतर राज्य सरकारों की वित्तीय परेशानियों को समझते हुए राजस्व का हिस्सा बढ़ाने की सिफारिश की है। 80वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2000 के माध्यम से संघ व राज्यों के मध्य किये जाने वाले राजस्व वितरण में परिवर्तन किया गया है। इस संशोधन में यह भी कहा गया है कि संघ सूची में निर्दिष्ट सभी कर और शुल्कों का विभाजन संघ और राज्यों के बीच होगा। सहकारी संघवाद को मजबूत बनाने के लिये नीति आयोग की स्थापना की गई है। FRBM अधिनियम पर गठित एन.के. सिंह आयोग की सिफारिशों की वजह से केंद्र व राज्यों के राजकोषीय संबंध भी प्रभावित हुए हैं। इस आयोग का सुझाव है कि एक ऐसी राजकोषीय परिषद की स्थापना की जानी चाहिये जो कि राजकोषीय पूर्वानुमान के साथ-साथ निगरानी वाली भूमिका भी अदा कर सके।

हाल के वर्षों में कई ऐसे सुझाव दिये गए जिनके कारण संघ व राज्यों के मध्य वित्तीय संघवाद को मजबूती मिली है। वाई.वी. रेड्डी की अध्यक्षता वाले 14वें वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट में केंद्रीय राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी को 32% से बढ़ाकर 42% तक करने का सुझाव दिया है जिसे केंद्र सरकार द्वारा स्वीकार कर लिया गया है। इससे केंद्र से राज्यों की ओर फंडों का बिना शर्त अंतरण बढ़ेगा और सभी प्रकार का अंतरण 45% स्तर पर पहुँचने की संभावना है। इससे फिस्कल स्पेस क्रिएट होगा और राज्यों की वित्तीय स्थिति बेहतर होगी, बिना शर्त संसाधनों की उपलब्धता बढ़ने से राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता भी बढ़ेगी। 2015-16 में राज्यों को 50% से अधिक राजस्व अंतरित हुआ। निश्चय ही केंद्रीय राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी में वृद्धि के साथ केंद्र के लिये संसाधनों की उपलब्धता प्रभावित होगी। इसके मद्देनजर वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट में केंद्र द्वारा चलाई जा रहीं आठों योजनाओं को बंद करने का सुझाव दिया और कई केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के लिये केंद्र द्वारा होने वाले अंशदान में भारी कटौती करने की सिफारिश की। बीस केंद्र प्रायोजित स्कीमों से केंद्रीय समर्थन की वापसी का सुझाव दिया गया। पुलिस बलों का आधुनिकीकरण, राजीव गांधी पंचायत सशक्तीकरण, स्वच्छ भारत मिशन, राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण जैसी योजनाओं को बंद करने का सुझाव दिया गया जिससे सामाजिक-आर्थिक समावेशन की प्रक्रिया अवरुद्ध होने की संभावना है। इस रिपोर्ट में सामान्य राज्यों और विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों के वर्गीकरण को समाप्त करने की सिफारिश की गई।

इसी रिपोर्ट में ग्यारह राज्यों को अंतरण पश्चात् राजस्व घाटे की भरपाई के लिये 1.94 लाख करोड़ रुपए की राशि प्रदान की गई। आयोग ने सहयोगी संघवाद की भावनाओं को मजबूती प्रदान करने के लिये अंतर्राज्यीय परिषद के विस्तार पर बल दिया और इससे यह अपेक्षा की गई कि यह राज्यों के लिये विशिष्ट अनुदानों की पहचान करेगी। राज्यों को आश्वस्त करने के लिये आयोग ने विधायी कार्यवाही के जरिये स्वायत्त GST मुआवजा फंड की स्थापना का सुझाव दिया। इसने पहले तीन वर्षों के दौरान शत-प्रतिशत, चौथे वर्ष के दौरान 75% और पाँचवे वर्ष में तकरीबन 50% का मुआवजा दिये जाने का सुझाव दिया।

चौदहवें वित्त आयोग ने राजस्व-वितरण के फार्मूले में भी संशोधन का सुझाव दिया। जहाँ तेरहवें वित्त आयोग ने राजस्व वितरण में जनसंख्या का 25% भारांश दिया, वहीं 14वें वित्त आयोग ने इसे बढ़ाकर 27.5% कर दिया। 13वें वित्त आयोग ने 1971 की जनसंख्या को राजस्व वितरण का आधार बनाया, जबकि 14वें वित्त आयोग ने 17.5% भारांश 1971 की जनसंख्या को तथा 10%, 2011 की जनसंख्या को दिया, इसका फायदा उत्तर प्रदेश, बिहार सहित उन राज्यों को मिलेगा जहाँ की जनसंख्या अधिक है और जहाँ 1971-2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर भी अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक रही है। तेरहवें वित्त आयोग ने क्षेत्रफल को 10% भारांश दिया, जबकि 14वें वित्त आयोग 15% भारांश, इसका फायदा उन राज्यों को होगा जो बड़े आकार वाले हैं। तेरहवें वित्त आयोग ने राजकोषीय अनुशासन को 17.5 प्रतिशत भारांश दिया था लेकिन चौदहवें वित्त आयोग ने राजकोषीय अनुशासन की जगह वन-क्षेत्रों के विस्तार को 7.5% भारांश दिया जो सतत् विकास के प्रति उसकी आग्रहशीलता को प्रदर्शित करती थी। इसका लाभ आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक तथा जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों को मिलेगा।

14वाँ वित्त आयोग केंद्र-राज्य के राजकोषीय संबंधों में प्रभावी हस्तक्षेप करता है। इस आयोग ने राज्यों के साथ-साथ पंचायतों की स्थिति को भी मजबूत किया है। यह संसाधनों के उपयोग के संबंध में राज्यों की अधिकारिता में केंद्र के हस्तक्षेप को सीमित करेगा, क्योंकि इससे 70% राजस्व अंतरण बिना शर्त होगा। इस आयोग से कम विकसित व निम्न जी-डी-पी- वाले राज्यों को अधिक संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे। इस रिपोर्ट के कारण केंद्र का फिस्कल स्पेस सीमित होता दिखाई पड़ रहा है जिसके कारण केंद्र के द्वारा सामाजिक क्षेत्र पर किये जाने वाले सार्वजनिक व्यय में कटौती की जा रही है। दूसरी बात यह कि केंद्र अब सामाजिक क्षेत्रों के खर्चे की जिम्मेवारी राज्यों को सौंप रहा है, जबकि इस संदर्भ में राज्यों को न तो अनुभव है और न ही विशेषज्ञता।

संसाधनों के इस्तेमाल में राज्यों को मिलने वाली स्वायत्तता अगर इसका सकारात्मक पक्ष है तो सामान्य श्रेणी एवं विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों के वर्गीकरण की समाप्ति और पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि की समाप्ति संतुलित एवं समावेशी विकास की संभावनाओं को हतोत्साहित करेगी। नीति आयोग का गठन, जिसके पीछे सहकारी संघवाद को मजबूत करने की भावना है, उसकी गवर्निंग काउंसिल में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और संघशासित प्रदेशों के लेफ्रिटनेंट गवर्नर शामिल होते हैं। नीति आयोग न तो राज्यों से बिना पूछे योजनाओं का निर्माण करता है और न ही उन्हें राज्यों के ऊपर थोपने का काम करता है। जी-एस-टी- भी राज्यों की राजकोषीय स्थिति पर बहुत अंतर डालेगा। जी.एस.टी. के बाद टैक्स वे राज्य सरकारें वसूल करेंगी जहाँ उत्पाद की खपत होती है। इसलिये उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे कम विकसित राज्यों को अधिक संसाधन मिलेंगे, क्योंकि वहाँ उपभोक्ताओं की बड़ी संख्या है। राज्य सरकारों के राजस्व के लिये अहम माने जाने वाले ईंधन, रीयल एस्टेट और आबकारी विभाग इससे अलग हैं। सरकार ने रॉयल्टी भुगतान के नियम भी बदले हैं। राज्यों को मिलने वाला वैट, मनोरंजन कर, लक्जरी टैक्स, लॉटरी टैक्स, एंट्री टैक्स, चुंगी इत्यादि अब समाप्त हो जाएंगे।

नीति आयोग राज्यों के प्रदर्शन हानि को मापने के लिये (स्वास्थ्य, शिक्षा और जलप्रबंधन) एक सूचकांक लेकर आया है ताकि राज्यों के सामाजिक कार्यक्रमों के परिणामों को जानने, एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने और नवाचारों को साझा करने में मदद मिल सके।

अंतर्राज्यीय आम असमानता लगातार बढ़ रही है। तमिलनाडु में रहने वाले एक व्यक्ति की सालाना आय बिहार में रहने वाले व्यक्ति से आज चार गुना अधिक है। जी.एस.टी. इस असमानता को और बढ़ा सकता है, ऐसी आशंका है। पहले से ही औद्योगिक रूप से पिछड़ा यह क्षेत्र कंपनियों को टैक्स में छूट देकर अपने यहाँ आमंत्रित कर सकता था पर अब ऐसा नहीं हो पाएगा, क्योंकि उसे अन्य राज्यों के समान ही दरें रखनी होंगी। यह नए आर्थिक उपायों का एक बड़ा प्रतिगामी कदम है।

कुछ आर्थिक आलोचक यह भी कह रहे हैं कि GST से राज्य अपनी राजकोषीय स्वायत्तता खो देंगे क्योंकि वे अपनी आवश्यकतानुसार कर नहीं लगा पाएंगे;  किंतु जिस प्रकार से मुआवजे का प्रावधान किया गया है वह इस आशंका को नकार देता है। FRBM के बारे में एन.के. सिंह समिति ने एक राजकोषीय परिषद के गठन का सुझाव दिया है जो की एक स्वतंत्र निकाय होगा। यह किसी भी दिये गए वर्ष के लिये सरकार की राजस्व घोषणाओं की निगरानी करेगा। इससे राजकोषीय नीतियों में राज्यों की स्थिति और भी मजबूत होगी क्योंकि कर्जमाफी और इस तरह की लोकप्रिय योजनाओं का भार अब केंद्र के ऊपर डालने की परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो रही है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि एन.के. सिंह समिति की थ्त्ठड रिपोर्ट, 13वें एवं 14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट, नीति आयोग की स्थापना एवं उसके कुछ कदमों तथा जी.एस.टी. के लागू होने से केंद्र तथा राज्यों के राजकोषीय संबंध बहुत प्रभावित हुए हैं। एक तरफ जहाँ ये कदम धीरे-धीरे राज्यों को राजकोषीय स्वायत्तता प्रदान कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ ये राज्यों को जवाबदेह व जिम्मेदार बनाने का भी कार्य कर रहे हैं। इससे सहकारी संघवाद की भावना मज़बूत हो रही है।

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