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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    देश में जल संकट से निपटने के लिये नीति आयोग द्वारा ज़ारी प्रयासों और नीतियों की चर्चा करें।

    23 Jul, 2018 सामान्य अध्ययन पेपर 3 आपदा प्रबंधन

    उत्तर :

    उत्तर की रूपरेखा

    • प्रभावी भूमिका में देश में जल संकट की स्थिति को बताएँ।
    • तार्किक तथा संतुलित विषय-वस्तु में नीति आयोग द्वारा जारी प्रयासों और नीतियों की चर्चा करें।
    • प्रश्नानुसार संक्षिप्त और सारगर्भित निष्कर्ष लिखें।

    कुछ समय से जल संसाधनों के प्रति चिंता और उनसे संबंधित जागरूकता का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। शिमला में पानी की कमी से उत्पन्न समस्या के कारण गर्मियों के दौरान शहर की अर्थव्यवस्था को चलाने वाले पर्यटकों को शहर से दूर जाने के लिये मज़बूर होना पड़ा। शिमला जल संकट तथा देश में पानी की कमी की गंभीर समस्या को देखते हुए नीति आयोग द्वारा इस संदर्भ में जारी समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (CWMI) एक समन्वित प्रयास है -

    • CWMI एक अग्रणी प्रक्रिया है जो प्रमुख जल संसाधनों से संबंधित संकेतकों की पहचान करने, उन्हें लक्षित करने और उनमें सुधार की कोशिश करता है।
    • इस सूचकांक ने जल संसाधनों की वर्तमान दुर्दशा को उजागर किया है कि कैसे इस सूची में खराब प्रदर्शन करने वाले प्रमुख 21 राज्यों (जहाँ भारत की लगभग 50% से अधिक आबादी निवास करती है) को वर्ष 2021 तक भूजल स्तर की कमी के कारण विभिन्न समस्यायों का सामना करना पड़ सकता है 
    • इस सूचकांक में जल निकायों की पुनर्स्थापना, सिंचाई, खेती के तरीके, पेयजल, नीति और प्रबंधन  के विभिन्न पहलुओं के 28 विभिन्न संकेतकों के साथ 9 विस्तृत क्षेत्र शामिल हैं।
    • यह सूचकांक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को जल के प्रभावी और अधिकतम उपयोग करने और ज़रूरत के हिसाब से जल के पुनर्भरण के लिये  प्रेरित करने की कोशिश करता है।
    • गौरतलब है कि जल संसाधनों की सीमित उपलब्धता और जल की बढ़ती मांग को देखते हुए जल संसाधनों के सतत् प्रबंधन का महत्त्व काफी बढ़ गया है।
    • इस सूचकांक का इस्तेमाल जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिये उचित उपाय तय करने और उन्हें लागू करने में होगा। 
    • हालाँकि, अगला लक्ष्य यथार्थवादी, क्रियाशील और विशिष्ट नीतियों के एक समूह की पहचान करना है, जिससे राज्य जल संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ सकें।

    इस संबंध में कुछ और उपाय भी किये गए हैं, जिनमें कुछ प्रमुख नीतियाँ भी शामिल हैं जो राज्यों को जल उपयोग दक्षता पर त्वरित और महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त करने में मदद करेंगी और साथ ही  बेहतर संसाधन प्रबंधन में भी मदद करेंगी।

    • पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तेलंगाना और अन्य जल की कमी वाले राज्यों को तुरंत सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली की ओर बढ़ना चाहिये।
    • उल्लेखनीय है कि देश में सूक्ष्म सिंचाई की कुल क्षमता का लगभग 69 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। परंपरागत सतही सिंचाई 60-70% दक्षता प्रदान करती है, जबकि स्प्रिंकलर से 70-80% तक की उच्च दक्षता और ड्रिप सिंचाई प्रणाली के साथ यह 90% तक हासिल की जा सकती है
    • राज्यों को कमांड एरिया डेवलपमेंट (सीएडी) पर ध्यान देना जारी रखना चाहिये तथा फसल पैटर्न को कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अनुसार बदला जाना चाहिये।
    • अनुचित फसल पैटर्न, फसल उत्पादकता और सिंचाई दक्षता दोनों को प्रभावित करते हैं। अनुचित फसल पैटर्न का ऐसा एक उदाहरण पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों के विभिन्न हिस्सों में गन्ना उत्पादन के कारण गंभीर जल संकट की स्थिति है।
    • भारत हरित क्रांति के दिनों के बाद से काफी लंबा सफर तय कर चुका है और अब इसे जल उपयोग क्षमता तथा कृषि उत्पादकता के अधिक प्रचलित पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
    • इसी तरह, पंजाब में जहाँ भूजल का 14.9% उपयोग किया जा चुका है वहाँ धान की खेती पानी के अप्रभावी उपयोग की ओर इंगित करती है।
    • हमें खेती के विखंडन के मुद्दे को उभारने की ज़रूरत है दरअसल, आय और उत्पादकता के विभिन्न पहलुओं से इस मामले का अध्ययन किया गया है, लेकिन इसमें जल उपयोग दक्षता को बढ़ाने के लिये अत्यधिक महत्त्व देने की आवश्यकता है। इस मुद्दे से निपटने के लिये निम्नलिखित दो उपाय हैं-
      ♦ सबसे पहले, राज्य मॉडल कृषि भूमि लीजिंग अधिनियम, 2016 (Model Agricultural Land Leasing Act, 2016) को अपनाने में तेज़ी लाई जा सकती है जो छोटे खेतों के एकीकरण की स्थिति उत्त्पन्न कर सकता है।
      ♦ हालाँकि, भारत में कृषि की अनौपचारिकता को देखते हुए, दूसरा विकल्प यानी किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) का गठन प्रारंभिक स्तर पर लाभ प्रदान कर रहा है।

    एफपीओ किसानों को स्वामित्व की भावना प्रदान करते हैं और कम लेन-देन लागत के साथ सामुदायिक स्तर की भागीदारी को प्रोत्साहित करते हैं। भारत में लगभग 70% सीमांत किसान हैं और औसत कृषि आकार 1.15 हेक्टेयर है। इसलिये एफपीओ के गठन का एक बड़ा अवसर है। इससे कृषि उपज, जल उपयोग और उत्पादन की लागत पर बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ पैदा होंगी।

    उपरोक्त उपायों में सिंचाई क्षेत्र में जल दक्षता के परिदृश्य को बदलने की बहुत बड़ी गुंजाइश है, जो भारत में जल संसाधन के बढ़ते उपभोग के लिये ज़िम्मेदार है। वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य एक बड़े दृष्टिकोण को दर्शाता है, लेकिन भारत के सतत् विकास के लिये जल संसाधनों को संरक्षित करना भी महत्त्वपूर्ण है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब दोनों लक्ष्यों को एक-दूसरे से अलग न मानते हुए पूरी तरह से एक-दूसरे का पूरक माना जाए।

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