दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: भारतीय उपमहाद्वीप जलवायु, अपवाह तंत्र और जनसंख्या वितरण को निर्धारित करने में हिमालयी पर्वत शृंखला की भूमिका की समीक्षा कीजिये। (250 शब्द)

    27 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भूगोल

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • उत्तर की शुरुआत हिमालयी पर्वत शृंखला को उजागर करके कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह समझाएँ कि यह जलवायु, अपवाह तंत्र और जनसंख्या वितरण को निर्धारित करने में किस प्रकार महत्त्वपूर्ण है।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय 

    हिमालयी पर्वत प्रणाली एक युवा वलित पर्वत शृंखला है जो भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक, जलवायु और जलविज्ञान संबंधी गतिविधियों को नियंत्रित करने वाला एक शक्तिशाली तंत्र है।

    • जलवायु अवरोध, जल-भंडार और जनसंख्या पुनर्वितरक के रूप में कार्य करके हिमालय ने भारत के मानसून प्रणाली, नदी तंत्र तथा मानव बस्तियों के स्वरूप को निर्णायक रूप से आकार दिया है।

    मुख्य भाग: 

    हिमालयी पर्वत प्रणाली की जलवायु निर्धारण में भूमिका

    • शीत महाद्वीपीय पवनों के लिये अवरोध: हिमालय एक विशाल ओरोग्राफिक वाॅल की तरह कार्य करता है, जो मध्य एशिया और साइबेरिया से आने वाली शीत, शुष्क पवनों को रोकता है तथा भारतीय मैदानों में कठोर सर्दियों की स्थितियों को टालता है। यह नियमन उत्तर भारत में उपोष्णकटिबंधीय परिस्थितियों को बनाए रखने में सहायक होता है।
      •  उदाहरण के लिये, समान अक्षांशों के बावजूद, हिमालयी ढाल के कारण उत्तर भारत की सर्दियाँ मध्य एशिया की तुलना में सौम्य होती हैं।
    • दक्षिण-पश्चिम मानसून पर नियंत्रण: हिमालय मानसून की आर्द्र दक्षिण-पश्चिम पवनों को पर्वतों के ऊपर उठने के लिये बाध्य करता है, जिससे संघनन होता है और इंडो-गैंगेटिक मैदानों में व्यापक वर्षा होती है। यदि यह अवरोध न होता तो मानसून की पवनें उत्तर की ओर निकल जातीं।
      • इसके परिणामस्वरूप ऊर्ध्वगमन के प्रभाव से असम और गंगा के मैदानों में मानसून के दौरान निरंतर वर्षा होती है।
    • पश्चिमी विक्षोभों पर प्रभाव: पश्चिमी हिमालय पश्चिमी विक्षोभों के मार्गदर्शन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो उत्तर-पश्चिम भारत में सर्दियों की वर्षा और हिमपात लाते हैं। यह वर्षा रबी की फसलों के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
      • उदाहरण के लिये, पंजाब और हरियाणा को इन विक्षोभों से जुड़ी सर्दियों की वर्षा से कृषि में लाभ मिलता है।

    अपवाह तंत्र निर्धारित करने में हिमालय की भूमिका

    • बारहमासी नदियों का स्रोत: हिमालय ‘दक्षिण एशिया का जल-भंडार’ के रूप में कार्य करता है, जो ग्लेशियर और हिमक्षेत्रों के माध्यम से बारहमासी नदियों को जल प्रदान करता है। यहाँ से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ उत्पन्न होती हैं।
      •  उदाहरण के लिये, गंगोत्री हिमनद (ग्लेशियर) गंगा को जल प्रदान करता है, जिससे यह पूरे वर्ष प्रवाहित रहती है, जो प्रायद्वीपीय नदियों से भिन्न है।
    • विशाल जलोढ़ मैदानों का निर्माण: हिमालयी नदियाँ अपने साथ भारी मात्रा में तलछट लेकर आती हैं, जिससे उत्तरी मैदानों में उपजाऊ जलोढ़ मृदा का जमाव होता है। इस प्रक्रिया ने विश्व के सबसे उत्पादक कृषि क्षेत्रों में से एक का निर्माण किया है।
      • इंडो-गैंगेटिक-ब्रह्मपुत्र मैदान निरंतर तलछट जमाव के कारण गहन कृषि को समर्थ बनाते हैं।
    • अपवाह अभिविन्यास और नदी अपहरण: हिमालय का पूर्व-पश्चिम संरेखण नदियों की दिशा और अपवाह तंत्र को नियंत्रित करता है, जिसके परिणामस्वरूप लंबी, पूर्ववर्ती नदियाँ पर्वत शृंखलाओं को काटकर अपना मार्ग बनाती हैं।
      • सिंधु और सतलुज नदियाँ गहरे महाखड्डों का निर्माण करती हैं, जो यह दर्शाते हैं कि उनका अपवाह तंत्र पूर्ववर्ती है और हिमालय के उत्थान से भी पुराना है।

    जनसंख्या वितरण के निर्धारण में भूमिका

    • उपजाऊ और सघन आबादी वाले मैदानों का निर्माण: हिमालयी नदियों द्वारा निर्मित जलोढ़ मैदान उपजाऊ मृदा, समतल भू-भाग और जल की उपलब्धता के कारण सघन आबादी का आधार बनते हैं। 
      • उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जनसंख्या का उच्च घनत्व इसी भौगोलिक लाभ पर आधारित है।
    • पर्वतीय क्षेत्रों में विरल जनसंख्या: ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति, खड़ी ढलान, भूकंपीय सक्रियता और कठोर जलवायु हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बसावट को सीमित करती है। 
      • उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के ज़िलों में छितरी हुई और कम घनत्व वाली बस्तियाँ देखने को मिलती हैं।
    • आर्थिक और सांस्कृतिक प्रतिरूपों पर प्रभाव: ऐतिहासिक रूप से हिमालय ने एक 'बाधा' एवं 'गलियारे' दोनों के रूप में कार्य किया है, जिसने व्यापार मार्गों, सांस्कृतिक विनिमय और रणनीतिक बस्तियों को आकार दिया है। 
      • नाथू ला जैसे दर्रों ने बड़े पैमाने पर होने वाले प्रवास को सीमित करते हुए ट्रांस-हिमालयी व्यापार को सुगम बनाया।
      • यद्यपि यहाँ जनसंख्या का घनत्व कम है, फिर भी यह क्षेत्र पर्यटन, बागवानी (सेब, केसर) और तीर्थयात्रा पर केंद्रित विशिष्ट आर्थिक क्लस्टरों का समर्थन करता है, जिससे विशिष्ट जनसांख्यिकीय केंद्र (जैसे शिमला, दार्जिलिंग, काठमांडू) विकसित हुए हैं।

    निष्कर्ष

     हिमालय पर्वत शृंखला भारत की जलवायु, अपवाह और जनसंख्या वितरण का एक बुनियादी निर्धारक बनी हुई है। हालाँकि, जलवायु परिवर्तन इसकी इस नियामक भूमिका को कमज़ोर कर रहा है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप की पारिस्थितिक और मानवीय सुरक्षा के लिये स्थायी पर्वतीय प्रबंधन एवं जलवायु-अनुकूल योजनाएँ अनिवार्य हो गई हैं।

    To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

    Print
close
Share Page
images-2
images-2