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प्रश्न :
प्रश्न. “चुनौती केवल उपनिवेशकालीन अवशेषों को हटाने की नहीं है बल्कि नई बौद्धिक निर्भरताओं के निर्माण से बचने की भी है।” शिक्षा के वि-उपनिवेशीकरण पर चल रहे विवाद के संदर्भ में विश्लेषण कीजिये कि भारत किस प्रकार स्वदेशी संवेदनाओं तथा वैज्ञानिक-सामयिक आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है। (250 शब्द)
08 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहासउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- वि-उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
- मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि कौन-से अवशेष अब भी बने हुए हैं और बौद्धिक निर्भरताओं के नए रूप क्या हैं।
- बताइये कि स्वदेशी लोकाचार और वैज्ञानिक-सामयिक आधुनिकता के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है।
- उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये।
परिचय:
वि-उपनिवेशीकरण केवल पाठ्यक्रम में पारंपरिक ग्रंथों या स्वदेशी विषयों को शामिल करना मात्र नहीं है। यह शिक्षा की ज्ञान-मीमांसीय आधारभूमि को नए सिरे से गढ़ने की प्रक्रिया है, जिसमें भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप, भारतीय दृष्टि से और वैज्ञानिक अनुशासन के साथ ज्ञान का निर्माण किया जाता है।
आज वैश्वीकरण और डिजिटल प्रभुत्व नए दबाव उत्पन्न कर रहे हैं, जो यह दर्शाते हैं कि उपनिवेशवाद-उन्मूलन का उद्देश्य केवल अतीत की त्रुटियों को सुधारना नहीं, बल्कि भारत-केंद्रित आधुनिक ज्ञान-प्रणाली का निर्माण करना भी होना चाहिये।
मुख्य भाग:
आज की शिक्षा प्रणाली में विद्यमान औपनिवेशिक अवशेष:
- भाषायी पदानुक्रम: अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों को श्रेष्ठ माना जाता है, जो अक्सर रोज़गार, सामाजिक प्रतिष्ठा और उच्च शिक्षा तक पहुँच को निर्धारित करते हैं।
- यह एक दास मानसिकता उत्पन्न करता है, जिसमें कई माता-पिता अपने बच्चों को मातृभाषा की सहजता के बावजूद अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाने के लिये मजबूर महसूस करते हैं।
- उदाहरण के लिये जो छात्र क्षेत्रीय भाषा के बोर्ड में अच्छे अंक प्राप्त करता है, वह अक्सर राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ा हुआ महसूस करता है, क्योंकि अधिकांश कोचिंग, अध्ययन सामग्री और मूल्यांकन प्रणाली अंग्रेज़ी पर आधारित होती हैं।
- स्वदेशी ज्ञान की तुलना में पश्चिमी दृष्टिकोण को प्राथमिकता देने वाला पाठ्यक्रम: सामाजिक विज्ञान में अक्सर पश्चिमी विचारकों, जैसे– डुर्कहाइम, वेबर, एडम स्मिथ, जॉन लॉक पर अधिक निर्भरता होती है, जबकि भारतीय विचारक, जैसे– कौटिल्य, बसावा या सावित्रीबाई फुले को केवल कुछ चुनिंदा अध्यायों तक सीमित रखा जाता है।
- भारत की गणित में प्रगति (आर्यभट्ट), खगोलशास्त्र (वराहमिहिर), राजनीति शास्त्र (अर्थशास्त्र) और चिकित्सा (आयुर्वेद) को अक्सर “सांस्कृतिक धरोहर” के रूप में पढ़ाया जाता है, न कि स्वतंत्र ज्ञान प्रणाली के रूप में।
- उदाहरण के लिये अर्थशास्त्र की पाठ्यपुस्तकें अक्सर केंसियन और नव-उदारवादी (नीओलिबरल) दृष्टिकोण को विस्तार से पढ़ाती हैं, जबकि स्वदेशी विचारों, जैसे– स्वदेशी अर्थशास्त्र, गांधीवादी ट्रस्टीशिप या अर्थशास्त्र में राजनीतिक अर्थव्यवस्था (अर्थशास्त्र के संदर्भ में) पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।
- याद करने और लिखित/प्रशासनिक कौशल पर केंद्रित मूल्यांकन: परीक्षाओं में क्रिएटिविटी के बजाय याद करने पर, पूछताछ के बजाय अनुरूपता पर ज़ोर दिया जाता है और वास्तविक समस्याओं को हल करने के बजाय तय पाठ्यक्रम में दक्षता को सफलता मानती हैं।
- हालाँकि NEP 2020 लगातार मूल्यांकन को बढ़ावा दे रहा है, फिर भी महत्त्वपूर्ण अंतराल अब भी मौजूद हैं।
- अकादमिक मान्यता के लिये पश्चिमी विश्वविद्यालयों पर अधिक निर्भरता: औपनिवेशिक वर्षों ने भारतीयों को यह सिखाया कि पश्चिमी संस्थान “अच्छे ज्ञान” के अंतिम निर्णयकर्त्ता हैं। विदेशी डिग्री अब भी उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। इसके अलावा कई भारतीय शोधपत्र वैधता के लिये पश्चिमी जर्नल्स का अनुसरण करते हैं।
- उदाहरण के तौर पर, नीतिनिर्माता भारत-विशिष्ट समस्याओं पर भी भारतीय विश्वविद्यालयों के शोध की बजाय हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड के शोध को उद्धृत करना अधिक प्राथमिकता देते हैं।
नई प्रकार की बौद्धिक निर्भरताएँ जिनसे बचना आवश्यक है
- स्थानीय अनुकूलन के बिना पश्चिमी शिक्षण मॉडल पर निर्भरता: MOOCs, लिबरल आर्ट्स संरचनाएँ, क्षमता-आधारित शिक्षा और क्रेडिट सिस्टम जैसे सुधार अक्सर केवल वैश्विक ट्रेंड के कारण अपनाए जाते हैं। इन्हें बिना स्थानीय आवश्यकताओं को अनुकूलित किये लागू करने से सार्थक सुधार के बजाय केवल सतही अनुकरण होता है।
- भारतीय कक्षाएँ अक्सर पश्चिमी “प्रोजेक्ट-आधारित शिक्षा” का अनुकरण करती हैं, लेकिन इसके लिये आवश्यक संरचना और शिक्षक प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया जाता।
- साथ ही लिबरल आर्ट्स मॉडल स्थानीय ज्ञान परंपराओं, जैसे– न्याय तर्कशास्त्र, क्षेत्रीय साहित्य और स्वदेशी विज्ञान को नज़रअंदाज़ कर देता है।
- उदाहरणतः विश्वविद्यालय अमेरिकी शैली की चार-वर्षीय स्नातक प्रणाली का अनुकरण करते हैं, लेकिन इसके लिये इंटर्नशिप, मेंटरिंग सिस्टम या अकादमिक सलाहकार उपलब्ध नहीं कराते, जिससे इसकी प्रभावशीलता घट जाती है।
- वैश्विक तकनीकी प्लेटफॉर्म और एल्गोरिद्मिक नियंत्रण पर निर्भरता: बड़ी तकनीकी कंपनियाँ (Google, YouTube, Meta, OpenAI, Coursera आदि) यह तय करती हैं कि छात्र क्या देखें, खोजें और अध्ययन करें, जिससे उनके सोचने के तरीके पर प्रभाव पड़ता है। इससे डिजिटल निर्भरता उत्पन्न होती है, जिसमें भारत का बौद्धिक परिदृश्य विदेशी एल्गोरिद्म द्वारा आकारित होता है।
- उदाहरण के लिये, यदि हम किसी वैश्विक AI मॉडल से “धर्म,” “राग,” या “न्याय” के बारे में पूछते हैं, तो यह अक्सर सरल या विकृत व्याख्या देता है, क्योंकि इसके प्रशिक्षण डेटा में भारतीय स्रोतों की कमी होती है।
- वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिंग का अविचारपूर्वक पालन करने का जोखिम: विश्वविद्यालयों द्वारा वैश्विक रैंकिंग सिस्टम को अंधाधुंध अपनाना उन्हें उन मापदंडों का पीछा करने के लिये प्रेरित करता है, जो पश्चिमी दृष्टिकोण से तैयार किये गए हैं।
- रैंकिंग की होड़ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों से संसाधनों को स्थानांतरित कर सकती है, जैसे– शिक्षक विकास, समावेशी शिक्षा के लिये अवसंरचना और स्थानीय संदर्भ में नवाचार।
- सच्ची शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिये वैश्विक पहचान और स्थानीय प्रासंगिकता के बीच संतुलन आवश्यक है।
- रैंकिंग की होड़ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों से संसाधनों को स्थानांतरित कर सकती है, जैसे– शिक्षक विकास, समावेशी शिक्षा के लिये अवसंरचना और स्थानीय संदर्भ में नवाचार।
भारत कैसे सांस्कृतिक जड़ों और आधुनिक वैज्ञानिक सोच के बीच संतुलन बना सकता है
- सांस्कृतिक जड़ों और सांस्कृतिक आदर्शों को सुदृढ़ करने हेतु:
- भारतीय ज्ञान प्रणालियों (IKS), जैसे– आयुर्वेद, न्याय, अर्थशास्त्र, गणित, खगोलशास्त्र और पर्यावरणीय नैतिकता को NEP 2020 के अनुसार स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करना।
- भारतीय भाषाओं को केवल संचार के साधन के रूप में नहीं बल्कि ज्ञान सृजन के माध्यम के रूप में पुनरुज्जीवित करना। इससे विचारों को प्राकृतिक रूप से व्यवहार्य ज्ञान में परिवर्तित किया जा सकता है।
- पाठ्यक्रम में स्थानीय इतिहास, क्षेत्रीय बौद्धिक परंपराओं और सामुदायिक ज्ञान को शामिल करना, ताकि समृद्ध सभ्यतात्मक परंपरा को प्रदर्शित किया जा सके।
- सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देना, जैसे– बहुलतावाद, जिज्ञासा (अन्विक्षिकी) और समग्र/संपूर्ण शिक्षा।
- वैज्ञानिक-सामयिक आधुनिकता को सुदृढ़ करना: छात्रों में प्रश्न करने की आदत, साक्ष्य-आधारित तर्क और निष्पक्ष सहकर्मी समीक्षा को बढ़ावा देना, ताकि वे अनुमानों की बजाय तथ्यों पर भरोसा करना सीखें।
- उदाहरणतः जलवायु विज्ञान को वास्तविक डेटा विश्लेषण के माध्यम से पढ़ाना या छात्रों को कक्षा में सरल प्रयोग डिज़ाइन करने के लिये मार्गदर्शन करना, वैज्ञानिक सोच को सैद्धांतिक ज्ञान के बजाय जीवंत अनुभव बनाता है।
- STEM अवसंरचना को सुदृढ़ करना: अच्छी तरह से सुसज्जित स्कूल प्रयोगशालाएँ, युवा नवप्रवर्तकों के लिये उपलब्ध अनुसंधान अनुदान या विश्वविद्यालय स्तर के इन्क्यूबेशन सेंटर ऐसे वातावरण का निर्माण करते हैं जहाँ विचार नवाचार में बदल सकते हैं।
- उदाहरण के लिये अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और वैक्सीन विकास जैसे क्षेत्रों में भारत की सफलताएँ दर्शाती हैं कि ऐसे पर्यावरण तथा प्रणालीगत ढाँचे वैश्विक स्तर पर परिणाम दे सकते हैं।
- भारत को ज्ञान-सृजक के रूप में: नई प्रकार की निर्भरताओं से बचने के लिये भारत को केवल ज्ञान का उपभोक्ता नहीं बल्कि निर्माता बनना चाहिये।
- ग्लोबल साउथ के मानक स्थापित करना: पश्चिमी रैंकिंग को पीछे छोड़ते हुए भारत को ग्लोबल साउथ के लिये ऐसे मापदंड विकसित करने में नेतृत्व करना चाहिये, जो केवल उद्धरणों पर नहीं बल्कि वास्तविक विकासात्मक प्रभाव पर केंद्रित हों।
- अंतर-विषयक केंद्र: ऐसे केंद्र स्थापित करना जहाँ संस्कृत विद्वान और कंप्यूटर वैज्ञानिक सहयोग करें (जैसे– IITs में कंप्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स)। पाणिनि की व्याकरण प्रणाली नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) के लिये अत्यंत प्रासंगिक है।
- “ग्लोकल” शोध एजेंडे: ऐसे शोध को वित्तपोषित करना जो स्थानीय समस्याओं (जैसे– पराली जलाना, कुपोषण) का समाधान वैश्विक तकनीकों का उपयोग करके करना, बजाय इसके कि केवल पश्चिमी जर्नल्स में प्रकाशित होने के लिये विषयों का अनुसंधान किया जाए।
निष्कर्ष
शिक्षा का वि-उपनिवेशीकरण एक परिवर्तनकारी, सजावटी नहीं, प्रयास है। इसके लिये आयातित ज्ञान ढाँचे से हटकर ऐसा ढाँचा बनाना आवश्यक है जो बौद्धिक रूप से भारतीय और वैज्ञानिक दृष्टि से वैश्विक हो। सांस्कृतिक जड़ों और वैज्ञानिक-सामयिक आधुनिकता के मिश्रण के माध्यम से, भारत ऐसा पारिस्थितिक तंत्र तैयार कर सकता है जो आत्मविश्वासी, रचनात्मक और आलोचनात्मक रूप से जागरूक नागरिकों का निर्माण करे, जो न तो औपनिवेशिक प्रभावों के अधीन हों और न ही उभरती वैश्विक निर्भरताओं के।
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