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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. भारत में जनजातीय समुदायों पर विस्थापन और पुनर्वास के प्रभाव का मूल्यांकन कीजिये तथा समावेशी एवं सतत् विकास के उपाय प्रस्तावित कीजिये। (250 शब्द)

    17 Nov, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाज

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • भारत में जनजातीय समुदायों का संक्षिप्त परिचय दीजिये। 
    • भारत में जनजातीय समुदायों पर विस्थापन और पुनर्वास के प्रभाव का मूल्यांकन कीजिये। 
    • समावेशी और सतत विकास के लिये उपाय प्रस्तावित कीजिये। 
    • उचित निष्कर्ष दीजिये। 

    परिचय: 

    जनजातीय समुदाय भारत के सर्वाधिक सुभेद्य सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों में से एक हैं, जिनका जीवन भूमि, वनों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र से गहन रूप से जुड़ा हुआ है। बड़े पैमाने की विकास परियोजनाएँ—जैसे बाँध, खनन, उद्योग तथा वन्यजीव अभयारण्य प्रायः इनके विस्थापन का कारण बनी हैं, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक संरचना में गहरा विघटन हुआ है। यद्यपि समय के साथ पुनर्वास नीतियों में सुधार हुआ है, फिर भी उन नीतियों के कार्यान्वयन में अनेक खामियाँ बनी हुई हैं। समावेशी और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिये अधिकार-आधारित एवं सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।

    मुख्य भाग:

    जनजातीय समुदायों पर विस्थापन का प्रभाव

    • भूमि, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान की हानि: जनजातीय समुदायों के लिये भूमि केवल एक आर्थिक संपत्ति नहीं है, बल्कि पहचान, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक निरंतरता का मूल आधार है।
      • उदाहरण: नर्मदा बांध परियोजना के कारण हुए विस्थापन ने दिखाया कि किस प्रकार वन-आधारित आजीविका के नुकसान ने मात्स्यिकी, झूम कृषि और वनोपज संग्रह जैसे पारंपरिक व्यवसायों को बाधित किया।
      • विस्थापन/पुनर्वास के बाद समुदायों को प्रायः अपरिचित भौगोलिक-सांस्कृतिक परिवेश में जाने के लिये विवश होना पड़ता है, जिससे भूमि और वनों पर उनके परंपरागत अधिकार कमज़ोर हो जाते हैं।
    • सामाजिक संस्थाओं का विघटन: जनजातीय समाज सामूहिक निर्णय-निर्माण, संबंध-नेटवर्क,पर्व-त्योहारों और कबीलाई संरचनाओं पर आधारित होता है। विस्थापन के समय, ये संरचनाएँ खंडित हो जाती हैं, जिस सामुदायिक सहनशीलता कमज़ोर हो जाती है।
      • उदाहरण: झारखंड के कोयल-कारो क्षेत्र में खनन-जनित विस्थापन ने ग्राम परिषदों और उन अनुष्ठानिक स्थलों को बाधित किया, जो जनजातीय प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में थे।
    • आर्थिक रूप से उपेक्षित होना: अधिकांश पुनर्वास स्थलों पर पर्याप्त बुनियादी अवसंरचना, सिंचाई, बाज़ार या रोज़गार के अवसरों की कमी होती है, जिसके परिणामस्वरूप बेरोज़गारी, ऋणग्रस्तता और निर्धनता बढ़ती है।
      • उदाहरण: ओडिशा के कोरापुट में बॉक्साइट खनन के कारण विस्थापित कोंध जनजातीय समुदाय वनोपज एवं प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण खोकर मज़दूरी पर निर्भर हो गये।
    • मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक आघात: जबरन विस्थापन प्रायः अलगाव की भावना, गरिमा की हानि एवं मानसिक पीड़ा का कारण बनता है, क्योंकि समुदाय अपने पैतृक भूदृश्यों को खो देते हैं जिनका गहन आध्यात्मिक और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्त्व होता है।
    • पारंपरिक ज्ञान और पारिस्थितिकी का क्षरण: औषधीय पादप, कृषि पद्धतियों और वन प्रबंधन से जुड़ा जनजातीय पारिस्थितिक ज्ञान तब क्षीण हो जाता है, जब समुदाय परिचित पारिस्थितिक तंत्रों से दूर हो जाते हैं।
      • उदाहरण: कान्हा और सिमलीपाल में स्थित बाघ अभ्यारण्यों से विस्थापन के कारण वन जैवविविधता तक अभिगम्यता सीमित हो गई, जिससे पारंपरिक प्रथाएँ प्रभावित हुईं।

    वर्तमान पुनर्वास प्रक्रियाओं की चुनौतियाँ

    • भूमि-के-बदले-भूमि मुआवज़े की अपर्याप्त व्यवस्था।
    • सरकारी विभागों के बीच समन्वय का अभाव।
    • निर्णय लेने की प्रक्रिया में जनजातीय समुदायों की सीमित भागीदारी।
    • मुआवजे में विलंब और कानूनी जागरूकता की कमी।
    • लैंगिक भेदभाव से जुड़े ऐसे प्रभाव जहाँ महिलाओं को वन उत्पादों और सामुदायिक स्थानों तक अभिगम्यता से वंचित होना पड़ता है।

    समावेशी और सतत विकास के उपाय

    • कानूनी और भूमि अधिकारों को सुदृढ़ बनाना: वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 और PESA अधिनियम, 1996 का पूर्ण कार्यान्वयन करते हुए, ग्राम सभाओं के माध्यम से सामुदायिक सहमति सुनिश्चित की जानी चाहिये।
      • दंपतियों के नाम पर सुरक्षित स्वामित्व के साथ भूमि-के-बदले-भूमि मुआवज़ा दिया जाना चाहिये।
    • सहभागी और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील पुनर्वास: योजना निर्माण और निगरानी में जनजातीय संस्थाओं को शामिल किया जाना चाहिये।
      • स्थानीय भाषाओं में सामाजिक प्रभाव आकलन तैयार किया जाना चाहिये।
      • सांस्कृतिक स्थलों, पवित्र उपवनों और पारंपरिक शासन संरचनाओं का संरक्षण किया जाना चाहिये।
    • आजीविका पुनर्स्थापन और कौशल विकास: लघु वनोपज-आधारित उद्यमों, इको-टूरिज़्म, पारंपरिक शिल्पकला और कृषि-वानिकी को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
      • स्थानीय क्षमता के अनुरूप व्यावसायिक प्रशिक्षण, जैसे: बाँस के शिल्प, हर्बल औषधि, शहद संग्रह और लौह शिल्प कला के प्रशिक्षण प्रदान किये जाने चाहिये।
      • LMP (वृहत आकार की जनजातीय बहुउद्देशीय समितियाँ) जैसे सहकारी व्यवस्थाओं के माध्यम से बाज़ार से संपर्क सुनिश्चित किया जाना चाहिये।
    • स्वास्थ्य, शिक्षा और अवसंरचना में सुधार: मोबाइल स्वास्थ्य काइयों, बहुभाषी शिक्षा और एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों (EMRS) जैसे आवासीय विद्यालयों की तैनाती।
      • MGNREGS के तहत सड़कों, पेयजल, बिजली और स्थानीय रोज़गार को सुनिश्चित किया जाना चाहिये।
    • पर्यावरण एवं सामाजिक सुरक्षा उपाय:
      • परियोजनाओं में पारिस्थितिक रूप से सतत डिज़ाइन अपनाये जाने चाहिये।
      • स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति (FPIC) जैसी वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को लागू किया जाना चाहिये।
      • समुदाय के नेतृत्व वाली संरक्षण प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।

    निष्कर्ष

    यदि विस्थापन का प्रबंधन सही ढंग से न किया जाये, तो यह जनजातीय समुदायों के लिये आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और भावनात्मक स्तर पर बहुआयामी अभाव का कारण बनता है। समावेशी और सतत विकास का लक्ष्य तभी साकार हो सकता है, जब राष्ट्रीय विकास एवं जनजातीय अधिकारों, पहचान तथा पारिस्थितिक विवेक के बीच संतुलन स्थापित किया जाये। अधिकार-आधारित, भागीदारीपूर्ण एवं सांस्कृतिक रूप से सुसंगत पुनर्वास कार्यढाँचा यह सुनिश्चित कर सकता है कि प्रगति जनजातीय समुदायों की कीमत पर नहीं बल्कि उनके सशक्तीकरण और सक्रिय सहभागिता के साथ हो।

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