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ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    मासिक धर्म के सवैतनिक अवकाश संबंधी नीतियों को लागू करने से लैंगिक समानता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। परीक्षण कीजिये। (250 शब्द)

    26 Feb, 2024 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाज

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • उत्तर की शुरुआत परिचय के साथ कीजिये, जो प्रश्न के लिये एक संदर्भ निर्धारित करता है।
    • मासिक धर्म के सवैतनिक अवकाश के समर्थन में तर्कों को बताइये।
    • लैंगिक समानता पर मासिक धर्म के सवैतनिक अवकाश के नकारात्मक प्रभावों का वर्णन कीजिये।
    • तद्नुसार निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय:

    मासिक धर्म की सवैतनिक अवकाश संबंधी नीतियों का उद्देश्य मासिक धर्म स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करना और कार्यबल में महिलाओं का समर्थन करना है। हालाँकि ऐसी आशंका है कि भारत में ऐसी नीतियों के कार्यान्वयन से लैंगिक समानता के मुद्दे सुधरने के बजाय और बिगड़ सकते हैं।

    मुख्य भाग:

    मासिक धर्म के सवैतनिक अवकाश का समर्थन करने वाले तर्क:

    • किफायती स्वच्छता उत्पादों तक पहुँच का अभाव: भारत में किफायती और स्वच्छ मासिक धर्म उत्पादों तक पहुँच एक बड़ी चुनौती है। कई महिलाएँ, विशेष रूप से न्यूनतम आय वाली पृष्ठभूमि से, सैनिटरी पैड खरीदने के लिये संघर्ष करती हैं।
      • हालिया राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) -5 रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में 15 से 24 वर्ष की आयु के बीच की लगभग 50% महिलाएँ मासिक धर्म की सुरक्षा के लिये कपड़े का उपयोग करती हैं।
    • जागरुकता की कमी: मासिक धर्म स्वच्छता और संबंधित मुद्दों के बारे में जागरुकता की कमी भारत में एक महत्त्वपूर्ण बाधा है। कई लड़कियों और महिलाओं को, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, मासिक धर्म स्वास्थ्य के बारे में सीमित ज्ञान है, जिसमें उचित स्वच्छता प्रथाएँ, स्वच्छता उत्पादों का उपयोग एवं मासिक धर्म संबंधी असुविधा का प्रबंधन शामिल है।
    • कलंक और शर्म: भारत के कई हिस्सों में मासिक धर्म अभी भी सामाजिक कलंक और सांस्कृतिक वर्जनाओं से घिरा हुआ है। मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को प्रायः भेदभाव, प्रतिबंध एवं अलगाव का सामना करना पड़ता है, जिससे शर्मिंदगी की भावना उत्पन्न होती है।
      • CRY रिपोर्ट में पाया गया कि 61.4% लड़कियों ने स्वीकार किया है कि मासिक धर्म को लेकर समाज में शर्मिंदगी की भावना मौजूद है।
    • अपर्याप्त स्वच्छता सुविधाएँ: अनौपचारिक कार्य (जैसे- निर्माण कार्य, घरेलू कार्य, आदि) में महिलाओं को प्रायः शौचालय, स्नान के लिये स्वच्छ जल, लागत प्रभावी स्वच्छता उत्पादों और उनके सुरक्षित निपटान तक पहुँच नहीं होती है। उनके पास अपने मासिक धर्म उत्पादों को बदलने के लिये गोपनीयता की भी कमी होती है।
    • नीतिगत उपाय: वर्ष 2022 'महिलाओं को मासिक धर्म के अवकाश का अधिकार और मासिक धर्म स्वास्थ्य उत्पादों तक मुफ्त पहुँच विधेयक' में महिलाओं एवं ट्रांसवुमेन को उनके मासिक धर्म के दौरान तीन दिनों का सवैतनिक अवकाश तथा छात्रों के लिये अतिरिक्त लाभ निर्दिष्ट किया गया है, जो अभी तक एक अधिनियम नहीं बन पाया है।
      • वर्तमान में केवल दो राज्यों, केरल और बिहार में महिलाओं के लिये मासिक धर्म अवकाश की नीतियाँ कार्यान्वयन में हैं।

    लैंगिक समानता पर मासिक धर्म के सवैतनिक अवकाश का नकारात्मक प्रभाव:

    • कंपनियों को महिलाओं को काम पर रखने से हतोत्साहित करना: श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में काफी कम है और यहाँ तक कि न्यूनतम महिलाएँ ही नेतृत्व की स्थिति रखती हैं।
      • यदि इसमें मासिक धर्म के लिये अनिवार्य सवैतनिक अवकाश जोड़ दिया जाता है, तो यह कंपनियों को महिलाओं को काम पर रखने से हतोत्साहित कर देगा।
    • मासिक धर्म सामाजिक कलंक को मान्य करता है: यदि सरकार मासिक धर्म वाली महिलाओं के लिये 'विशेष स्थिति' की पुष्टि करती है, तो यह मासिक धर्म के सामाजिक कलंक को मान्य कर सकती है। यह उस देश में पीरियड शेमिंग को बढ़ा देगा जहाँ बड़ी संख्या में लोग (पुरुष और महिलाएँ दोनों) मासिक धर्म को 'अशुद्ध' मानते हैं।
    • लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाले जापान का मामला: जापान जैसे देश हैं, जो दर्दनाक माहवारी के लिये अवकाश प्रदान करते हैं - लेकिन यह ज़्यादातर अवैतनिक और अप्रयुक्त है।
      • महिलाओं का दावा है, कि वे यौन उत्पीड़न के भय से इस अवकाश का लाभ उठाने और 'प्रसारित' करने में अनिच्छुक हैं कि वे अपने मासिक धर्म पर हैं।
    • इसके कार्यान्वयन से संबंधित चिंताएँ: यदि मासिक धर्म के लिये सवैतनिक अवकाश की शुरुआत की जानी थी, तो चुनौती इसके कार्यान्वयन में है। ऐसे अवकाश का वैध उपयोग निर्धारित करना और संभावित दुरुपयोग को रोकना जटिल होगा।

    प्रभावी मासिक धर्म अवकाश संबंधी नीतियों को अपनाने के लिये सुझाव:

    • मासिक धर्म की स्वास्थ्य साक्षरता को बढ़ावा देना: कार्यस्थल में मासिक धर्म स्वास्थ्य में सुधार का मुख्य हिस्सा यह सुनिश्चित करना होगा कि नियोक्ता, कर्मचारी (और उनके डॉक्टर) सभी को मासिक धर्म स्वास्थ्य के बारे में उच्च गुणवत्ता वाली जानकारी तक पहुँच हो।
    • पर्याप्त विश्राम को शामिल करना: जिन श्रमिकों को मासिक धर्म होता है, उनके लिये ब्रेक लेने और शौचालय एवं स्वच्छ जल तक पहुँचने में सक्षम होना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, लेकिन सभी श्रमिकों को बेहतर कामकाजी परिस्थितियों से लाभ होगा।
    • लैंगिक-विशिष्ट नीतियों को न अपनाना: विगत कई दशकों से रोज़गार नीतियों के वैश्विक मूल्यांकन ने निरंतर यह प्रदर्शित किया है कि लैंगिक या लैंगिक-विशिष्ट नीतियाँ (चाहे उनका आशय कितना भी 'अच्छा' क्यों न हो) उन्हीं लोगों को नुकसान पहुँचाती है, जिनकी वे मदद करना चाहती हैं।
      • यह क्रिया उन 'महिलाओं' (और आदर्श रूप से अन्य हाशिये पर रहने वाले समूहों) की आवश्यक्ताओं की पहचान करने एवं सभी कर्मचारियों के लिये नीतियाँ तैयार करती हैं, जो उन्हें उचित ध्यान में रखती हैं।
    • समान वेतन और नौकरी के अवसर सुनिश्चित करना: समान वेतन और नौकरी के अवसर सुनिश्चित करना काम पर लैंगिक समानता में सुधार के लिये मासिक धर्म के अवकाश से कहीं आगे होगा।

    निष्कर्ष:

    मासिक धर्म के सवैतनिक अवकाश संबंधी नीतियों को बनाते समय, इसे केवल जैविक क्षति के रूप में लेबल करने के बजाय, मासिक धर्म के विभिन्न अनुभवों को स्वीकार करना और तद्नुसार सहायता प्रदान करना आवश्यक है। इन नीतियों के कार्यान्वयन में दुरुपयोग के जोखिम पर विचार किया जाना चाहिये और व्यक्तिगत गोपनीयता तथा गरिमा के सम्मान को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।

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