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ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. भारत में जाति व्यवस्था की अवधारणा की व्याख्या कीजिये और समाज के विभिन्न समूहों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति पर इसके प्रभाव की चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    02 Jan, 2023 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाज

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण

    • भारत में जाति व्यवस्था की व्याख्या करते हुए अपना उत्तर प्रारंभ कीजिये।
    • समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर जाति व्यवस्था के प्रभाव की चर्चा कीजिये
    • तदनुसार निष्कर्ष लिखिये

    परिचय

    • भारत में जाति व्यवस्था एक जटिल सामाजिक पदानुक्रम है जिसने परंपरागत रूप से भारतीय समाज के भीतर व्यक्तियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति निर्धारित की है।
    • पारंपरिक हिंदू जाति व्यवस्था में चार मुख्य जातियाँ हैं: ब्राह्मण (पुजारी और विद्वान), क्षत्रिय (योद्धा और शासक), वैश्य (व्यापारी और ज़मींदार), और शूद्र (कारीगर और मज़दूर)।

    मुख्य भाग

    • समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर जाति व्यवस्था का प्रभाव:
      • सामाजिक प्रगति में बाधा: जाति व्यवस्था सामाजिक प्रगति में बाधा उत्पन्न करती है क्योंकि यह समाज में परिवर्तनों को आसानी से लागू नहीं होने देती है।
        • जाति व्यवस्था के तहत, व्यक्ति स्वतंत्र नहीं है क्योंकि उसे अपनी जाति के सदियों पुराने रीति-रिवाजों के अनुरूप होना पड़ता है। व्यवस्था की इस कठोरता ने हमारे समाज में सामाजिक प्रगति में बाधा उत्पन्न की है।
      • बाधित आर्थिक प्रगति: चूँकि व्यवसायों को स्थिति द्वारा निर्धारित किया जाता है, अतः कार्यकर्ता को अपनी पसंद का व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है।
      • यह श्रम की गतिहीनता और अक्षमता की ओर जाता है और इस तरह आर्थिक प्रगति बाधित होती है।
      • राजनीतिक विभाजन की ओर ले जाता है: जाति व्यवस्था में, किसी व्यक्ति को किसी अन्य समूह की तुलना में अपनी जाति के प्रति अधिक वफादार होना आवश्यक है। इसलिये, यह लोगों के बीच राष्ट्रवाद के बजाय जातिवाद को बढ़ावा देता है।
      • सामाजिक असमानताओं को कायम रखता है: जाति व्यवस्था ने समाज में अपनी खुद की विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति को बनाए रखने के लिये ऊँची जातियों के हाथों में एक उपकरण के रूप में काम किया है।
        • इसने उच्च जातियों की निरंकुशता को जन्म दिया है और निचली जातियों के लोगों के मन में हीनता और असुरक्षा की स्थायी भावनाएँ पैदा की हैं।
      • महिलाओं पर दबाव डालता है: कई मामलों में, जाति व्यवस्था महिलाओं के लिये शोषणकारी साबित हुई है। जाति व्यवस्था के तहत, जाति पदानुक्रम में अपनी स्थिति को बढ़ाने की इच्छा रखने वाली जाति को बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह पर रोक और महिलाओं को अलग-थलग करने जैसी कुछ प्रथाओं का पालन करना चाहिए, जो उनके लिये कठिनाइयों का कारण बनती हैं और समाज में उनकी स्थिति में गिरावट आती हैं।
      • अस्पृश्यता की भावना पैदा करता है: यह प्रथा, जैसा कि इस देश में ऐतिहासिक रूप से विकसित हुई है, हिंदू जाति व्यवस्था का एक उत्पाद है, जिसके अनुसार हिंदुओं के बीच विशेष वर्ग को उस समाज के अन्य वर्गों द्वारा अछूतों के रूप में देखा जाता था। अस्पृश्यता अब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत निषिद्ध है।
      • लोकतांत्रिक आदर्शों के विरुद्ध: जाति व्यवस्था लोकतांत्रिक भावना के विपरीत है। लोकतांत्रिक आदर्श मानव समानता की पूर्वधारणा रखते हैं, परंतु जाति व्यवस्था असमानता में विश्वास करती है। जातियों की चार गुना पदानुक्रमित व्यवस्था थी जहाँ उच्च जातियों द्वारा निचली जातियों का हर क्षेत्र में शोषण किया जाता था।
      • विवाह: भारत में होने वाले अधिकाँश विवाह माता-पिता द्वारा तय किये जाते हैं। आदर्श जीवनसाथी खोजने के लिये उनके द्वारा कई कारकों पर विचार किया जाता है, जिनमें से जाति एक महत्वपूर्ण कारक है।
      • लोग नहीं चाहते कि उनका बेटा या उनकी बेटी किसी दूसरी जाति के व्यक्ति से शादी करें। जैसे शब्द "अछूत" बताता है, एक ब्राह्मण कभी भी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति से विवाह नहीं करेगा।
      • शिक्षा: सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिये जाति आधारित आरक्षण है। इसलिये, सामाजिक पिछड़े समुदाय का एक व्यक्ति आरक्षण के आधार पर शीर्ष स्तरीय कॉलेज में सीट सुरक्षित कर सकता है।
      • नौकरियाँ: गरीब समुदायों के लोगों को बड़ी मात्रा में सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियाँ मिलती हैं क्योंकि नौकरियाँ जातिगत आरक्षण के आधार पर आवंटित की जाती हैं।

    भेदभाव को खत्म करने के लिये की गई पहलें:

    • संवैधानिक प्रावधान:
      • विभेद का प्रतिषेध:
        • भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 में कहा गया है कि ‘‘राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।’’
      • अवसर की समता:
        • भारत के संविधान के अनुच्छेद 16 में कहा गया है कि ‘‘राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिये अवसर की समता होगी।’’
        • ‘‘राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।’’
      • अनिवार्य शिक्षा:
        • संविधान के अनुच्छेद 21A में अंतःस्थापित ‘शिक्षा का अधिकार’ के तहत कहा गया है कि ‘‘राज्य, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले सभी बच्चों के लिये निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का ऐसी रीति में, जो राज्य विधि द्वारा अवधारित करे, उपबंध करेगा।’’
    • भूमि सुधार:
      • भूमि की सीमा:
        • कानूनों ने एक सीमा निर्धारित की कि कोई व्यक्ति या निगम कितनी भूमि धारण कर सकता है, (जिसे ‘सीलिंग’ के रूप में भी जाना जाता है) और सरकार को भूमिहीनों को अधिशेष भूमि का पुन:वितरण करने की अनुमति दी गई है।
    • मानव विकास:
      • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY):
        • यह उत्पादकता बढ़ाने और देश की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण एवं प्रमाणन को संरेखित करने के उद्देश्य से युवाओं को कौशल प्रशिक्षण लेने के लिये प्रेरित करने पर लक्षित है।
        • संकल्प योजना:
      • आजीविका संवर्द्धन के लिये कौशल अधिग्रहण और ज्ञान जागरूकता या ‘संकल्प’ (SANKALP- Skills Acquisition and Knowledge Awareness for Livelihood Promotion)कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) का एक परिणाम-उन्मुख कार्यक्रम है जहाँ विकेंद्रीकृत योजना-निर्माण और गुणवत्ता सुधार पर विशेष बल दिया गया है।
        • ‘स्टैंड अप इंडिया’ योजना:
      • इसे अप्रैल, 2016 में आर्थिक सशक्तिकरण और रोज़गार सृजन पर ध्यान केंद्रित रखते हुए ज़मीनी स्तर पर उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिये लॉन्च किया गया।
      • इसका उद्देश्य संस्थागत ऋण संरचना की पहुँच अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला उद्यमियों जैसे सेवा-वंचित समूहों तक सुनिश्चित करना है ताकि वे इसके लाभ उठा सकें।
        • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना:
      • यह बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) और सूक्ष्म वित्त संस्थानों (MFIs) जैसे विभिन्न अंत-पहुँच वित्तीय संस्थानों के माध्यम से गैर-कॉर्पोरेट लघु व्यवसाय क्षेत्र को वित्तपोषण प्रदान करती है।
      • इसके तहत समाज के वंचित वर्गों, जैसे महिला उद्यमियों, एससी/एसटी/ओबीसी उधारकर्ताओं, अल्पसंख्यक समुदाय के उधारकर्ताओं आदि को ऋण दिया गया है। योजना ने नए उद्यमियों का भी विशेष ध्यान रखा है।

    निष्कर्ष

    हाल के वर्षों में सकारात्मक कार्रवाई नीतियों और शिक्षा जैसे उपायों के माध्यम से जाति व्यवस्था को खत्म करने और अधिक सामाजिक तथा आर्थिक समानता को बढ़ावा देने के प्रयास किये गए हैं। हालाँकि, जाति व्यवस्था भारतीय समाज का एक गहरा उलझा हुआ पहलू है और इसके नकारात्मक प्रभावों को दूर करना एक बड़ी चुनौती है।

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