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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. 19वीं और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रणाली पर उपनिवेशवाद के प्रभाव का विश्लेषण कीजिये। औपनिवेशिक शासन की प्रतिक्रिया में उदित होने वाले प्रतिरोध के विभिन्न रूपों की चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    02 Jan, 2023 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    दृष्टिकोण:

    • उपनिवेशवाद के बारे में संक्षेप में वर्णन करते हुए अपना उत्तर प्रारंभ कीजिये।
    • 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान पड़े उपनिवेशवाद के विभिन्न प्रभावों की चर्चा कीजिये।
    • औपनिवेशिक शासन की प्रतिक्रिया में उभरने वाले विभिन्न प्रतिरोधों की चर्चा कीजिये।
    • तदनुसार निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    • उपनिवेशवाद का तात्पर्य लोगों के जीवन और संस्कृति पर प्रभुत्व स्थापित करना है। उपनिवेशवाद का मुख्य लक्ष्य आर्थिक लाभ प्राप्त करना होता है। उपनिवेशवाद के कारण राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में लोगों के जीवन पर नियंत्रण स्थापित होता है।

    मुख्य भाग:

    • 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में भारत के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक ढाँचे पर विभिन्न तरीकों से उपनिवेशवाद का गहरा प्रभाव पड़ा था जैसे:
      • आर्थिक:
        • ब्रिटिशों द्वारा शुरू की गई आर्थिक नीतियों का उद्देश्य देश से अधिकतम संसाधनों और धन का निष्कासन करना था।
        • खाद्य फसलों की जगह वाणिज्यिक फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहन देना: ब्रिटिशों ने नील और अफीम की खेती के रुप में कृषि के नए रूपों की शुरुआत की थी जिसके कारण पारंपरिक कृषि पद्धतियों का विस्थापन होने के साथ स्थानीय किसानों का शोषण हुआ था।
        • भारत के संसाधनों का दोहन: ब्रिटिशों द्वारा स्थापित रेलवे और बंदरगाहों के नेटवर्क से भारत, कच्चे माल के निर्यात और ब्रिटेन की निर्मित वस्तुओं का आयात स्थल बन गया था।
          • इससे भारत का वि-औद्योगीकरण हुआ और अर्थव्यवस्था भी निर्भर हो गई थी।
        • शोषणकारी नीतियाँ: इन नीतियों में भारतीय वस्तुओं पर उच्च शुल्क लगाना, एकाधिकार को प्रोत्साहन देना और नई भू- राजस्व प्रणाली की शुरुआत करना शामिल था जिसका उद्देश्य भारतीय किसानों से अधिक धन की उगाही करना था।
        • इन नीतियों का अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था क्योंकि इससे भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता कम होने के साथ किसानों पर बोझ बढ़ गया था।
      • सामाजिक:
        • सामाजिक विभाजन का लाभ उठाना: ब्रिटिशों ने जाति-आधारित भेदभाव की प्रणाली को लागू किया था जिसे "फूट डालो और राज करो" की नीति के रूप में जाना जाता है। जिससे मौजूदा सामाजिक विभाजनों को प्रोत्साहन मिलने के साथ कुछ समूह हाशिए पर चले गए थे।
        • पश्चिमी विचारों को थोपना: ब्रिटिशों ने पश्चिमी शिक्षा और मूल्यों को बढ़ावा दिया था जिसके कारण भारत में पश्चिमी-शिक्षित अभिजात वर्ग का उदय हुआ था। जिससे पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं का क्षरण हुआ था।
      • राजनीतिक:
        • संसदीय प्रणाली की शुरुआत करना: ब्रिटिशों ने संसदीय लोकतंत्र प्रणाली की शुरुआत की थी लेकिन इसमें केवल कुलीन लोगों को ही लाभ मिल पाया था।
        • केंद्रीकृत प्रशासन: केंद्रीकृत प्रशासनिक प्रणाली लागू करने के कारण शासन के पारंपरिक रूपों का क्षरण होने के साथ स्थानीय स्वायत्तता की हानि हुई थी।
    • औपनिवेशिक शासन की प्रतिक्रिया में उभरे प्रतिरोध के विभिन्न रूप:
      • औपनिवेशिक शासन की प्रतिक्रिया में भारत में कई प्रकार के प्रतिरोध और विद्रोह सामने आए थे। इनमें अहिंसक आंदोलन जैसे असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह के साथ ही सशस्त्र विद्रोह जैसे 1857 का विद्रोह और भारत छोड़ो आंदोलन शामिल थे।
        • राजनीतिक आंदोलन: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, भारत में ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिये एक राजनीतिक संघर्ष था। इसका नेतृत्व महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे लोगों ने किया था और इसमें सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं असहयोग आंदोलन के साथ ब्रिटिश सरकार के साथ वार्ता करने जैसी रणनीतियों को अपनाया गया था।
        • सशस्त्र प्रतिरोध: भारत में 1857 का विद्रोह, गदर पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) से संबंधित कई अन्य क्रांतिकारियों ने ब्रिटिशों को भारत से बाहर करने के लिये सशस्त्र बल का सहारा लिया था।
        • सांस्कृतिक प्रतिरोध: कुछ भारतीय राष्ट्रवादियों ने औपनिवेशिक शासन के प्रतिरोध के साधन के रूप में सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का इस्तेमाल किया था। इसमें भारतीय पहचान पर बल देने और ब्रिटिश सांस्कृतिक वर्चस्व को समाप्त करने के तरीके के रूप में भारतीय भाषाओं, साहित्य और कला को बढ़ावा देना शामिल था।
        • धार्मिक प्रतिरोध: भारत में कुछ धार्मिक आंदोलनों जैसे कि आर्य समाज द्वारा हिंदू धर्म के "शुद्धिकरण" को बढ़ावा देते हुए औपनिवेशिक शासन का विरोध किया गया था। जिसमें पश्चिमी प्रभाव को समाप्त करने के साथ ब्रिटिशों के खिलाफ हिंदुओं को एकजुट करना शामिल था।
        • श्रमिक प्रतिरोध: औपनिवेशिक नीतियों के विरोध के साथ बेहतर कार्य स्थितियों की मांग के लिये भारतीय श्रमिकों द्वारा हड़तालों एवं कार्रवाई के अन्य साधनों का उपयोग किया गया था।

    निष्कर्ष:

    • इन आंदोलनों की प्रभावशीलता अलग-अलग थी। असहयोग आंदोलन जैसे अहिंसक आंदोलन से ब्रिटिशों पर दबाव डालने के साथ भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हुआ था।
    • हालाँकि सशस्त्र विद्रोह अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में काफी हद तक असफल रहे थे लेकिन अहिंसक और हिंसक प्रतिरोध आंदोलनों के समन्वित प्रभाव की परिणति भारत में औपनिवेशिक शासन के अंत के रुप में हुई थी।

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