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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • भारत में 16वीं और 17वीं शताब्दियों के दौरान कृषि एवं शिल्प उत्पादन के प्रमुख अभिलक्षणों की रूप-रेखा प्रस्तुत कीजिये। देश के सामाजिक ताने-बाने पर उनका किस प्रकार प्रभाव पड़ा था?

    11 Nov, 2020 वैकल्पिक विषय इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण-

    • मुगल काल में कृषि तथा शिल्प
    • सामाजिक व्यवस्था पर इसका प्रभाव
    • निष्कर्ष

    मुगल साम्राज्य की स्थापना के कारण भारत में आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले। जहाँ राज्य द्वारा कृषि क्षेत्र में दिये गये प्रोत्साहन, नकदी फसलों के विकास एवं कृषि में आधुनिक तकनीकी के प्रयोग ने नवीन संरचना का विकास किया। वही दूसरी ओर वस्त्र उत्पादन के क्षेत्र में भारत की भूमिका बढ़ी। कृषि तथा शिल्प के विकास ने ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्र में सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित किया।

    अगर गौर किया जाय तो ज्ञात होता है कि प्राचीन काल से ही भारत की भौगोलिक दशा कृषि के विकास के लिये अनुकूल रही है मुगल काल मे भी कृषि विकास के लिये कार्य किये गये। शासक वर्ग ने न केवल किसानों से भू-राजस्व प्राप्त किया बल्कि कृषि के विकास के लिये उपयोगी कदम भी उठाये। उदाहरण के लिये चंद्रगुपत ने काव्यिावाड़ क्षेत्र में सुदर्शन झील का निर्माण कराया तो वहीं फिरोज तुगलक ने सिंचाई के लिये कई नहरों का निर्माण कराया ,मोहम्मद बिन तुगलक ने भी तकावी ऋण की व्यवस्था की। इसी तरह कई अन्य शासकों ने भूमि की माप, किस्म एवं गुणवाता को आधार मानकर भू-राजस्व का निर्धारण किया साम्राज्य में भी कृषि के विकास के लिये नये स्रोतों में कृषि के प्रसार को प्रोत्साहन दिया। चूंकि भू-राजस्व राजकीय आय का प्रमुख स्रोत माना जाता था अतः राजकीय आय में वृद्धि के लिये केवल भू-राजस्व दर में वृद्धि करना ही काफी नहीं था बल्कि विकास के लिये बेहतर कदम उठाने की भी ज़रूरत थी। इसलिये मुगलों ने बंजर भूमि आबाद करने पर विशेष बल दिया तथा अमालगुजार नामक अधिकारी को किसानों की सहायता के लिये नियुक्त किया गया साथ-ही-साथ राज्य द्वारा नये कृषि उपकरण उपलब्ध कराये गए । सिंचाई की व्यवस्था जिनमें कुएं तथा जलाशय का निर्माण किया गया। उदाहरण के लिये शाहजहाँ ने सिंचाई के लिये रावी नहर से लाहौर तक निर्माण करवाया जिसे शहर-ए-फैज भी कहा जाता है।

    अबुल फ़जल के अनुसार मुगल काल में रावी एवं खरीफ दोनों प्रकार की फसलों को उत्पादन होता था। इस समय खाद्यान्न फसलों में गेंहूँ चना विभिन्न प्रकार की दालों की खेती होती थी। मुगल काल की कृषि संरचना में एक और विशेषता नकदी फसलों का विकास था इसमें कपास, नील, गन्ना और अफीम की खेती का जिक्र मिलता है जबकि पुर्तगिजों के आगमन से तंबाकू की खेती का प्रचलन बढ़ा। आगे चलकर मक्का एवं बाजरा की भी खेती होने लगी।

    कृषि संरचना में जाये परिवर्तनों ने सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित किया जिसमें नकदी फसलों के विकास ने ग्रामीण क्षेत्रों में मुद्रा के प्रसार को बढ़ावा दिया तथा इसने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित यजमानी प्रथा को भी प्रभावित किया मुगल काल में कृषक वर्गों को तीन भागों में विभाजित किया गया था जिनमें खुदकाश्त, पाहीकाश्त तथा मुजारिम थे।

    • खुदकाशतः ये वैसे खेतिहर होते थे जो अपने ही गांव की भूमि पर कृषि करते थे, तथा इस भूमि पर इनका स्थायी एवं वंशानुगत स्वामित्व होता था।
    • पाहीकाश्तः ये बँटाईदार कृषक होते थे तथा दूसरे गाँवों में जाकर अस्थायी रूप से खेती करते थे।
    • मुजरियानः ये अत्यंत गरीब किसान होते थे इनके पास उतनी कृषक भूमि नहीं होती थी। जिनसे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके इसलिये खुदकाश्त की जमीन को लेकर बटाई के रूप में कृषि करते थे।

    इसके साथ ही एक बड़ी जनसंख्या कृषक मजदूरों को भी थी जो दूसरे की ज़मीनों पर खेती करते थे। इस नवीन कृषि अर्थव्यवस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक विभाजन को और प्रोत्साहन दिया तथा एक विशेषाधिकार वर्ग का उदय हुआ जिसे राज्य द्वारा मान्यता प्रदान की गयी।

    अगर मुगल साम्राज्य में शिल्प उत्पादन की बात की जाय तो इसके अंतर्गत वस्त्र उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका रही इसके अंतर्गत सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र उद्योग एवं रेशमी वस्त्र उद्योग को प्रोत्साहन दिया। गुजरात तथा बंगाल सूती वस्त्र के प्रमुख केंद्र थे। बंगाल में मलमल का भी उत्पादन होता था। अबुल फज़ल ने कश्मीर का रेशम उत्पादन का केंद्र के रूप में ज़िक्र किया है। अकबर ने ईरानी मॉडल पर आधारित कालीन बुनाई को प्रोत्साहन दिया। वारंगल तथा मसुलीपट्नम को भी कालीन बुनाई की जाती थी। कालांतर में मसुलीपट्नम बंदरगाह सूती वस्त्रों के निर्यात् का प्रमुख केंद्र बना।

    आगे चलकर लगभग 17वीं सदी के उत्तरार्ध में शिल्पियों पर व्यापारियों का प्रमुत्व बढ़ने लगा जिसे दादनी पद्धति के रूप में देखा जा सकता है। इसके अंतर्गत व्यापारी कच्चे मालों तथा शिल्पियों पर नियंत्रण स्थापित कर रहे थे। इस काल में श्रेणियों के प्रधान की विशिष्ट स्थिति का पता चलता है जिसे अकबर द्वारा भूमि अनुदान दिये जाने का जिक्र मिलता है। हालांकि सल्तनत काल में शिल्प कार्यों में दासों को लगाया गया था। परंतु इस काल में स्वतंत्र कारीगरों ने शिल्प विकास को बढ़ावा दिया। इसी तरह शिल्प गतिविधियों के विकास के कारण जाति नियंत्रण को नजर अदांज किया गया अर्थात् जाति बंधन को तोड़कर शिल्पियों ने नये-नये शिल्पों को अपनाया।

    इस प्रकार कहा जा सकता है कि मुगल काल में कृषि एवं शिल्प उत्पादन ने कृषि अर्थव्यवस्था एवं शिल्प उद्योग को मज़बूती प्रदान की परंतु इससे हुये सामाजिक परिवर्तन को इंकार नहीं किया जाता सकता।

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