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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • भारत में नवपाषाण काल की प्रादेशिक विशिष्टताओं की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिये और उनके विशेषताओं का कारण बताइये? (250 शब्द)

    20 Aug, 2020 वैकल्पिक विषय इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • भूमिका
    • कथन के पक्ष में तर्क
    • उदाहरण
    • निष्कर्ष

    भारत में नवपाषाण काल की सभ्यता का प्रारंभ लगभग चार हज़ार ईसा पूर्व के समय माना जाता है। इस समय की नवपाषाण संस्कृतियों के जो अवशेष मिले है उनके आधार पर इन्हें छह भागों में बाँटा गया है, जैसा कि उत्तरी भारत, विंध्य क्षेत्र, दक्षिण भारत, मध्यम गंगा घाटी का क्षेत्र, मध्य पूर्व का क्षेत्र एवं पूर्वोत्तर भारत का क्षेत्र।

    उत्तरी भारत क्षेत्र में नवपाषाणिक संस्कृति का उल्लेख कश्मीर क्षेत्र के अंतर्गत किया जाता है जिसमें बुर्जहोम एवं गुफकराल का विशेष महत्त्व है। बुर्जहोम की खोज 1935 ई. में डी. टेरा एवं पीटरसन द्वारा की गई थी, वर्ष 1960 में पुरातत्त्व विभाग ने इसकी खुदाई का कार्य शुरू किया, यहाँ से हसुली, खुरपी, छेनी, कुदाल के साक्ष्य प्राप्त हुए तथा इसी के साथ भेड़-बकरी आदि की हड्डियों के साक्ष्य भी मिले, इसी प्रकार बुर्जहोम से गढ्ढे वाले घरों के अवशेष प्राप्त हुए तथा शवाधान के साक्ष्यों में मनुष्य के साथ कुत्ते को दफनाए जाने के साक्ष्य भी प्राप्त हुए।

    विंध्य क्षेत्र में नवपाषाण काल के साक्ष्य बेलन घाटी से प्राप्त हुए जहाँ प्रमुख स्थल महागढ़ा कोल्डीहवा तथा पंचोह है। कोल्डीहवा से नवपाषण काल के साक्ष्यों के साथ ताम्र एवं लौह युगीन संस्कृति के भी प्रमाण मिले है। नव महागढ़ा एवं पंचोह से नवपाषण काल के ही साक्ष्य मिले है। इस क्षेत्र से नवपाषण उपकरणों के साक्ष्य के रूप में पत्थर की कुल्हाड़ियाँ, हथौड़ा, छेनी एवं बसुली के प्रमाण प्राप्त हुए तथा मानव निवास के साक्ष्य प्राप्त हुए। इसी के साथ पशुपालन के साक्ष्यों के रूप में भेड़, बकरी, सुअर, हिरण की हड्डियों के साक्ष्य प्राप्त हुए। कोल्डीहवा से खेती किये जाने के साक्ष्य भी प्राप्त हुए है जिसमें धान की खेती का सबसे प्राचीनतम प्रमाण प्राप्त हुआ है।

    मध्य गंगा घाटी में सबसे महत्त्वपूर्ण नव पाषाणकालीन स्थल चिरान्द है। चिरान्द से पुरातात्त्विक साक्ष्यों के रूप में सिलबट्टे, पत्थर की कुल्हाड़ी, कुदाल, बाण एवं चूड़ी आदि मिले हैं तथा मृदभांड के रूप में घड़े, बर्तन आदि के साक्ष्य पाए गए। इस क्षेत्र के लोग अपने निवास के लिये बाँस-बल्ली की झोपड़ियाँ बनाते थे तथा धान, मसूर, गेंहूँ, मूँग, जौ आदि की खेती करते थे तथा यहाँ के लोग हाथी, बारहसिंगा, हिरण, गैंडा आदि पशुओं से परिचित थे जैसा कि साक्ष्यों से प्रमाणित हुआ है।

    मध्य पूर्वी क्षेत्र तथा पूर्वोत्तर भारत में कुछ स्थल नवपाषाण कालीन खोजे गए जैसा कि उड़ीसा के मयूरभंज ज़िले से कुचाई, यहाँ से पॉलिशदार पत्थर की कुल्हाड़ियाँ, कुदाल, छेनी के प्रमाण मिले। वरूडीह से सलेटी और काले मृदभांड मिले। पूर्वोत्तर भारत के असम तथा मेघालय की पहाड़ियों से कुछ नवपाषाणकालीन पत्थर के उपकरण प्राप्त हुए जिसमें कुल्हाड़ी, हथौड़े तथा मूसल आदि प्रमुख थे। इसी के साथ यहाँ से कुछ मृदभांडों के टुकड़े भी पाए गए जो हाथ तथा चाक से तैयार किये गए मालूम होते हैं।

    दक्षिण भारत के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु से कुछ नवपाषाण कालीन स्थल पाए गए। यहाँ की खुदाई में अनेक मृदाभांड तथा उपकरणों की प्राप्ति हुई है। कनार्टक में मुख्य पुरास्थलों में मास्की, ब्रह्मगिरि, सगनकल्लू, हल्लूर, पिक्तीहल तथा नरसीपुर आदि है तो वहीं आंध्र प्रदेश से नागार्जुनकोंडा, इतनूर आदि प्रमुख स्थल हैं। तमिलनाडु से पैयमपल्ली नामक नवपाषाणकालीन स्थल पाया गया।

    दक्षिण भारत में ये सभी उपरोक्त स्थल कृष्णा तथा कावेरी नदियों की घाटियों में पाए गए, इन उपरोक्त स्थलों से पालिशदार पत्थर की कुल्हाड़ियाँ, काले एवं स्लेटी रंग के मिट्टी के बर्तन पाए गए, इसी के साथ हड्डी से बने कुछ उपकरण भी पाए गए। यहाँ के निवासी कृषि एवं पशुपालन से परिचित थे, जो मिट्टी एवं सरकंडे की सहायता से घर बनाकर निवास करते थे, घर प्रायः गोलाकार एवं चौकोर होते थे।

    दक्षिण भारत की नवपाषाणकालीन बस्तियों के निवासी हाथ तथा चाक से बने बर्तन का प्रयोग करते थे। यहाँ से प्राप्त मृदभांडों पर चित्रकारी के साक्ष्य पाए गए। उत्खन्न के दौरान पाए गए मृदभांडों में घड़े, तस्तरी, कटोरे आदि थे।
    दक्षिण भारत के नवपाषाण स्थलों की विशेषता यह है कि यहाँ से राख का ढेर पाया गया जो मवेशी रखने वालों की बस्ती के अवशेष का द्योतक है तथा यहाँ की शवाधान प्रणाली भी काफी महत्त्वपूर्ण है, यहाँ मकानों के अंदर, फर्श के नीचे या घर से बाहर शावाधान किया जाता था। लेकिन नागार्जुनकोंडा में कब्रिस्तान के साक्ष्य आवासीय स्थल से बाहर मिले है।

    निष्कर्षतः कह सकते हैं कि नवपाषाणकालीन लोगों ने एक निश्चित स्थान पर आवास बना कर रहना सीख लिया था। प्रादेशिक विशिष्टता में भिन्नता के कारण भौगालिक स्थिति की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका रही होगी तथा बसावट में भिन्नता का कारण अलग-अलग कालावधि भी हो सकती है। अतः आर्थिक परिवर्तन के कारण सामाजिक परिवर्तन रहे होंगे। जनसंख्या वृद्धि के साथ बड़ी संख्या में पुरातात्त्विक प्रमाणों से सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन की जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है।

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