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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • "कल्हण की राजतरंगिणी कश्मीर के राजनीतिक इतिहास का एक विश्वसनीय स्रोत है।" कथन का सतर्क विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द )

    28 Jul, 2020 वैकल्पिक विषय इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • भूमिका

    • कथन के पक्ष में तर्क

    • उदाहरण

    • निष्कर्ष

    कल्हण कृत राजतरंगिणी प्राचीन भारतीय साहित्य में पहला युद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है। यह संस्कृत में है इसकी मुख्य विषय वस्तु कश्मीर का इतिहास है। इसकी रचना महाभारत की शैली के आधार पर की गई है।

    राजतरंगिणी की विश्वसनीयता इस बात से और अधिक पुष्ट होती है कि कल्हण किसी के दरबार में नहीं रहा तथा चाटूकारितापूर्ण विवरण न देकर तटस्थ विवरण देता है। इस ग्रंथ के लेखन में यथासंभव सावधानी बरती गई है। उसने कश्मीर के शासकों के लिखित आदेशों तथा प्राचीन शासकों के जीवन चरित्रों का अध्ययन करके संभवतः सभी चित्र प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। कल्हण ने अपने विवरण में सभी शासकों के गुण-दोषों का निष्पक्ष विवेचन किया है।

    राजतरंगिणी मात्र कश्मीर की अनुक्रमणिका ही नहीं है जैसा कि इसके नाम से विदित होता है। उसने जिन शासकों से संबंधित विवरण दिया उनकी समकालीन घटनाओं तथा जीवन की अन्य घटनाओं पर भी दृष्टिपात किया है। इस संबंध में उसने ज़ोर देकर कहा कि कवि को निष्पक्ष होना चाहिये। कल्हण ने अपने विवरण में सांसारिक जीवन एवं भौतिक ऐश्वर्य की नश्वरता को प्रकट करने का प्रयास किया। उसकी इच्छा थी कि लोग अपने अतीत की गलतियों से सबक लें। यही उद्देश्य उसकी रचना की प्रमाणिकता और विश्वसनीयता को और बढ़ा देता है।

    राजतरंगिणी की रचना 8 सर्गों में विभक्त है जिसमें 8000 से ऊपर श्लोक है। पहले तीन सर्गों में 3000 से अधिक श्लोकों को शामिल किया गया है जिसमें सिर्फ राजवंशों की सूचियाँ ही दी गई हैं। इस युग के इतिहास के लिये कल्हण ने पौराणिक स्रोतों, अनुश्रुतियों का प्रयोग किया है।

    राजतरंगिणी ने चौथे, पाँचवें और छठे सर्गों में कार्कोट तथा उत्पन्न रजवंशों का विवरण प्रस्तुत किया है। इन्हीं सर्गों के साथ राजतरंगिणी के उचित ऐतिहासिक दृष्टिकोण का उभरना शुरू हो जाता है। अंतिम दोनों सर्गों में लोहार राजवंश पर विचार व्यक्त किये गए हैं। रचना के आरंभिक भाग में जिन लोक प्रचलित पौराणिक स्रोतों एवं जनश्रुतियों का संग्रह किया गया है जिनके आधार पर आलोचना के कुछ बिंदु उभर कर सामने आते हैं। किंतु जैसे-जैसे विवरण में आगे बढ़ते हैं वैसे-वैसे आलोचना की दृष्टि साफ होती चली जाती है। जैसा कि हर्ष की मृत्यु के बाद का विवरण राजनीतिक अस्थिरता की बात करता है और वह सभी तथ्यों के साथ स्पष्ट हो जाता है।

    कल्हण की राजतरंगिणी में विवरण मिलता है कि वह एक शक्तिशाली राजा की बात करता है- कि राजा को इतना शक्तिशाली होना चाहिये कि वह समाज के विविध तत्त्वों को भी नियंत्रण में रख सके। उसे यह निश्चित कर लेना चाहिये कि कोई भी क्षेत्र चाहे वह गाँव ही क्यों न हो, में संपत्ति को इकट्ठा नहीं होने देना चाहिये, क्योंकि संपत्ति राजनीतिक विद्रोह को प्रेरणा देती है। इस दृष्टिकोण से कल्हण द्वारा राजनीतिक एवं आर्थिक शक्तियों में एक स्पष्ट संबंध देखा गया। उसने अनुभव किया कि भूस्वामियों की आर्थिक शक्ति ने उन्हें इतना शक्तिशाली बना दिया है कि वे राजा को चुनौती दे सकते हैं जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण राजनीतिक षडयंत्रों में स्पष्टता से देखा गया।

    कल्हण की राजतरंगिणी में दिये गए तमाम स्रोतों एवं दृष्टिकोणों के साथ यथा अनुरूप तिथियों का प्रयोग इस ग्रंथ की प्रमाणिकता को पुष्ट करता है। इन्हीं उपरोक्त विवरण के आधार पर राजतरंगिणी को प्राचीन भारतीय इतिहास में पहला शुद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है। इसमें समकालीन शासकों का उनके गुणों के साथ दोषों का भी निष्पक्ष विवेचन किया जाता है।

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