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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    बढ़ता हुआ मानव-पशु संघर्ष समाज व प्रकृति दोनों के लिये नुकसानदायक है। मानव-पशु सामंजस्य के उपाय सुझाते हुए चर्चा कीजिये।

    07 Sep, 2019 सामान्य अध्ययन पेपर 3 पर्यावरण

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • मानव-पशु संघर्ष की पृष्ठभूमि लिखिये।

    • मानव-पशु संघर्ष के कारणों की विवेचना कीजिये।

    • इसे कम करने के उपायों पर प्रकाश डालिये।

    • संतुलित निष्कर्ष लिखिये।

    विकास की भूख बहुमूल्य वन्यजीवों को नष्ट कर रही है। जानवरों के लगातार हो रहे शिकार और मानव एवं वन्यजीवों के बीच संघर्ष ने कई अहम प्रजातियों के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। इसके अतरिक्त पशुओं के मानव बस्ती में प्रवेश से मनुष्यों की जान को भी खतरा उत्पन्न होता है तथा यह समाज में भय भी उत्पन्न करता है। वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया औऱ उत्तर प्रदेश सरकार की एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच टकराव तथा संघर्ष लगातार बढ़ रहा है।

    मानव-पशु संघर्ष के करण

    आवास की क्षति: भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का सिर्फ 5 प्रतिशत हिस्सा ही संरक्षित क्षेत्र के रूप में विद्यमान है। यह क्षेत्र वन्यजीवों के आवास की दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त बड़े वन्यजीवों जैसे बाघ, हाथी, भालू, आदि के शिकारों के पनपने के लिये भी पर्याप्त परिवेश उपलब्ध नहीं हो पाता। उपर्युक्त स्थिति के कारण वन्यजीव भोजन आदि की ज़रूरतों के लिये खुले आवासों अथवा मानव बस्तियों के करीब आने को मजबूर होते हैं। यह स्थिति मानव-वन्यजीव संघर्ष (MAC) को जन्म देती है।

    विकास कार्यों में वृद्धि: वर्तमान में सरकार द्वारा विभिन्न विकासात्मक एवं अवसंरचनात्मक गतिविधयों में वृद्धि के लिये विभिन्न नियम और कानूनों में छूट दी है, इससे राजमार्ग एवं रेल नेटवर्क का विस्तार संरक्षित क्षेत्रों के करीब हो सकेगा। इससे मानव-वन्य जीव संघर्ष में और अधिक वृद्धि होने की आशंका व्यक्त की गई है। इससे पूर्व वाणिज्यिक लाभ तथा ट्रॉफी हंटिंग (मनोरंजन के लिये शिकार) के कारण पहले ही बड़ी संख्या में वन्यजीवों का शिकार किया जाता रहा है।

    मानव-पशु संघर्ष को रोकने हेतु उपाय -

    • वन्यजीवों के लिये सुरक्षित क्षेत्र के साथ-साथ इस प्रकार के संरक्षित क्षेत्र जो जन भागीदारी पर आधारित हों, के निर्माण पर भी बल देना चाहिये।
    • मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने हेतु एकीकृत पूर्व चेतावनी तंत्र (Integrating Early Warning System) की सहायता से नुकसान को कम करने के लिये प्रयास किया जा सकता है। इसके लिये खेतों में बाड लगाना तथा पालतू एवं कृषि से संबंधित पशुओं की सुरक्षा के लिये बेहतर प्रबंधन आदि उपाय किये जा सकते हैं।
    • पशुओं के व्यवहार का अध्ययन कर उचित वन्यजीव प्रबंधन के प्रयास किये जाने चाहिये ताकि आपात स्थिति के समय उचित निर्णय लिया जा सके और मानव-वन्यजीव संघर्ष से होने वाली हानि को रोका जा सके।
    • वन्यजीवों से होने वाले फसलों के नुकसान के लिये फसल बीमा का प्रावधान होना चाहिये, इससे स्थानीय कृषकों में वन्यजीवों के प्रति बदले की भावना में कमी आएगी और वन्यजीवों की हानि को रोका जा सकता है।
    • भारत में हांथी गलियारों का निर्माण किया गया है, इसी तर्ज पर बाघ गलियारा एवं अन्य बड़े वन्यजीवों के लिये भी गलियारों का निर्माण किया जाना चाहिये, इसके साथ ही ईको-ब्रिज आदि के निर्माण पर भी ज़ोर देना चाहिये। इन कार्यों के लिये कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्त्व से कोष की प्राप्ति की जा सकती है।

    वन्यजीवों के संरक्षण हेतु, भारत के संविधान में 42वें संशोधन (1976) अधिनियम के द्वारा दो नए अनुच्छेद 48-। 51 को जोड़कर वन्य जीवों से संबंधित विषय को समवर्ती सूची में शामिल किया गया है। जब तक जंगल कटते रहेंगे, मानव-वन्यजीव संघर्ष को टालने की बजाय बचाव के उपाय करना ही इस समस्या का हल हो सकता है। ऐसे में संघर्ष को टालने का सबसे बेहतर विकल्प है पर्यावरण के अनुकूल विकास अर्थात् तुम भी रहो, हम भी रहें...चलती रहे जिंदगी। इस सबके मद्देनज़र ऐसी नीतियाँ बनाने की ज़रूरत है, जिससे मनुष्य व वन्यजीव दोनों ही सुरक्षित रहें।

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