प्रयागराज शाखा पर IAS GS फाउंडेशन का नया बैच 10 जून से शुरू :   संपर्क करें
ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    ‘व्हॉलसेल एंड लोंग-टर्म फाइनेंस बैंक (WLTF Bank)’ क्या है तथा भारत में इसकी स्थापना से क्या लाभ होंगे? WLTF बैंकों को लाइसेंस प्रदान करने से पहले किन-किन मुद्दों पर गौर करना आवश्यक हैं?

    22 Apr, 2017 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    उत्तर :

    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में WLTF बैंकों की आवश्यकता पर एक परिचर्चा-पत्र प्रकाशित किया है। ये एसे विशेषीकृत बैंक हैं जो विशेष क्षेत्रों, यथा- कॉर्पोरेट क्षेत्र, छोटे एवं मध्यम व्यवसायों और आधारभूत संरचना क्षेत्रों के लिये लंबी अवधि के लिये ऋण प्रदान करेंगें।

    भारत में WLTF बैंकों की स्थापना से लाभ-

    • ये बैंक विशेषीकृत संस्थान के रूप में कार्य करेंगे अतः ये दीर्घकालिक परियोजनाओं के मूल्यांकन एवं वित्तपोषण में वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में बेहतर स्थिति में होंगे।
    • ये बैंक अपना ध्यान मुख्यतः उन क्षेत्रों पर केंद्रित करेंगे जिनका परिपक्वन काल (Gestation period) लंबा हो। चूंकि इन क्षेत्रों में सामान्य बैंकों द्वारा दिये गये ऋणों की वापसी लंबे समय तक नहीं होने के कारण इन बैंकों में बैलेंस शीट की समस्याएँ (Balance Sheet Problems) उत्पन्न हो जाती है। अतः WLTF बैंक इन क्षेत्रों को ऋण प्रदान कर सामान्य बैंकों को Balance Sheet Problems से निजात दिलाने में सहायक होंगे। 
    • WLTF बैंक प्रतिभूति क्षेत्र जैसे कॉर्पोरेट बॉन्ड्स, क्रेडिट डेरिवेटिव्स, टेक-आउट फाइनेंसिंग आदि में बाजार निर्माता की तरह काम कर सकते हैं। ये बैंक ऋण प्रदान करने वाले संस्थानों का पुनर्वितयन (Refinancing) भी कर सकेंगे।
    • इन बैंको की स्थापना से प्रतिस्पर्द्धा में भी बढ़ोतरी होगी जिससे वित्तीय संसाधनों के आवंटन में कुशलता बढ़ेगी।

    किंतु, WLTF बैंकों की स्थापना से पूर्व निम्नलिखित तीन मुद्दों पर ध्यान देना आवश्यक है-

    • WLTF बैंकों की स्थापना में सरकारी भागीदारी को टाला जाना चाहिये क्योंकि सरकारी स्वामित्व उसी प्रकार की समस्याएँ पैदा करेगा जैसी समस्याओं का सामना सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कर रहे हैं। इसके अलावा ये बैंक अत्यधिक विशेषीकृत होगें और इन्हें परिचालन-स्वतंत्रता की आवश्यकता होगी, जो सरकारी स्वामित्व के अंतर्गत संभव नहीं है।
    • लाइसेंस केवल ऐसी संस्थाओं को प्रदान किया जाना चाहिए जो ऐसे विशेषीकृत बैंकों के निर्माण की क्षमता दिखा सके एवं विनियामक आवश्यकताओं को पूरा करने और व्यवसाय चलाने के लिये पूँजी ला पाने की स्थिति में हों।
    • RBI को ऐसा नियामक ढांचा बनाना होगा जो पर्याप्त रक्षोपायों के साथ विकास को संभव बना सके। उदाहरण के लिये, निमायक इन बैंकों को नकद आरक्षित अनुपात (CRR) और वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) की अनिवार्यता से छूट प्रदान कर सकता है।

    निष्कर्षः इस प्रकार उचित स्वामित्व, पर्याप्त रक्षोपायों के साथ ये बैंक वित्तीय प्रणाली की दक्षता में सुधार कर और बड़े और दीर्घकालीन वित्तपोषण की जरूरतों को पूरा कर विकास की दर को तीव्र कर सकते हैं।

    To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

    Print
close
एसएमएस अलर्ट
Share Page
images-2
images-2