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25 Jul 2025
सामान्य अध्ययन पेपर 3
आंतरिक सुरक्षा
दिवस 35 : “धन शोधन वह अँधेरी नदी है जो वित्तीय शुचिता को नष्ट करती है और अपराध को बढ़ावा देती है।” धन शोधन की कार्यप्रणाली तथा धनशोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के अंतर्गत भारत द्वारा अपनाई गयी प्रतिरोधात्मक रणनीतियों पर चर्चा कीजिये। (250 शब्द)
उत्तर
हल करने का दृष्टिकोण:
- धन शोधन और उसके वैश्विक प्रभाव को परिभाषित कीजिये।
- धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के अंतर्गत भारत के प्रतिवादों का आकलन कीजिये।
- एक उपयुक्त प्रस्तावना के साथ उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
मनी लॉन्ड्रिंग अथवा धन शोधन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से अवैध तरीकों से प्राप्त धन को वैध रूप देने का प्रयास किया जाता है। इसे प्रायः काला प्रवाह (Dark River) कहा जाता है, जो संगठित अपराध, भ्रष्टाचार, मादक द्रव्य तस्करी, आतंकवाद के वित्तपोषण और आर्थिक धोखाधड़ी जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देता है। यह वित्तीय प्रणाली की पारदर्शिता एवं विधि के शासन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
UNODC के अनुसार, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 2 से 5 प्रतिशत भाग (लगभग 800 अरब से 2 ट्रिलियन डॉलर तक) प्रतिवर्ष धन शोधन में प्रयुक्त होता है।इस चुनौती से निपटने के लिये भारत ने वर्ष 2002 में धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) लागू किया, जो धन शोधन के विरुद्ध भारत की प्रमुख विधिक रूपरेखा है। यह अधिनियम अपराध से अर्जित संपत्ति को ज़ब्त करने, दोषियों को दंडित करने तथा वित्तीय प्रणाली को सुरक्षित रखने हेतु एक सशक्त माध्यम है।
मुख्य भाग:
PMLA, 2002 के अंतर्गत भारत के प्रतिवाद
- स्पष्ट उद्देश्य: वर्ष 2002 में अधिनियमित और वर्ष 2005 में लागू PMLA का उद्देश्य है:
- धन शोधन को रोकना और नियंत्रित करना।
- अपराध की आय से प्राप्त संपत्ति को ज़ब्त करना और कुर्क करना।
- वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (FATF) द्वारा निर्धारित अंतर्राष्ट्रीय धन शोधन रोधी (AML) मानकों का पालन करना।
- प्रमुख विशेषताओं में शामिल हैं:
- धन शोधन की परिभाषा (धारा 3): अपराध की आय को छिपाना, रखना, प्राप्त करना या उपयोग करना।
- संपत्ति की कुर्की: अवैध संपत्तियों के हस्तांतरण को रोकने के लिये प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा अनंतिम कुर्की।
- रिपोर्टिंग दायित्व: बैंकों, वित्तीय संस्थानों और मध्यस्थों को वित्तीय खुफिया इकाई-भारत (FIU-IND) को संदिग्ध लेनदेन की सूचना देने की प्रतिबद्धता।
- विशेष न्यायालय: PMLA के तहत अपराधों की त्वरित सुनवाई के लिये नामित।
- संस्थागत तंत्र:
- प्रवर्तन निदेशालय (ED): PMLA के तहत अपराधों की जाँच करता है, छापे, कुर्की और गिरफ्तारियाँ करता है।
- FIU-IND: वित्तीय आँकड़ों का विश्लेषण करता है, नकद लेन-देन की निगरानी करता है और एजेंसियों के साथ खुफिया जानकारी साझा करता है।
- अंतर-एजेंसी सहयोग: CBI, NIA, RBI और FATF, INTERPOL जैसी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय।
- ED के वर्ष 2023 के आँकड़ों के अनुसार, PMLA के तहत 5,400 से अधिक मामलों में ₹1.25 लाख करोड़ से अधिक मूल्य की संपत्ति कुर्क की गई।
हाल के संशोधन और विकास
- अनुसूचित अपराधों की सूची को विस्तारित किया गया है, जिससे अब अधिक अपराधों को PMLA के दायरे में लाया गया है।
- डिजिटल परिसंपत्तियों और क्रिप्टो लेन-देन को भी अब इस कानून के अंतर्गत शामिल कर लिया गया है।
- प्रतिवर्ती प्रमाण भार (Reverse burden of proof) लागू किया गया है अर्थात् आरोपी को यह सिद्ध करना होता है कि उसकी संपत्तियाँ वैध हैं।
- विजय मदनलाल बनाम भारत संघ (2022) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने PMLA के अधिकांश प्रावधानों को संवैधानिक माना, हालाँकि कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा पर चिंता भी व्यक्त की।
कार्यान्वयन में चुनौतियाँ
- दोषसिद्धि की दर में कमी: वर्ष 2023 तक प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दर्ज 5,000 से अधिक मामलों में केवल 40 से भी कम दंड लागू किये गए, जिससे प्रभावी कार्यवाही पर प्रश्न उठते हैं।
- राजनीतिक दुरुपयोग के आरोप: PMLA का विपक्षी नेताओं और कार्यकर्त्ताओं के विरुद्ध असंगत रूप से उपयोग किया जा सकता है, जिससे चयनात्मक अनुप्रयोग को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
- अपराध से अर्जित आय की अस्पष्ट परिभाषा: अधिनियम में प्रयुक्त कुछ शब्दों की अस्पष्टता और प्रक्रियात्मक खामियाँ न्यायिक प्रक्रिया को जटिल बनाती हैं।
- प्रवर्तन निदेशालय की अति-सक्रियता: गिरफ्तारी की व्यापक शक्तियाँ, लंबी पूर्व-विचाराधीन हिरासत और न्यायिक निगरानी की कमी जैसे मुद्दे विधिक संतुलन एवं मूल अधिकारों पर असर डालती हैं।
निष्कर्ष:
धन शोधन पर अंकुश लगाने के लिये पारदर्शिता, संस्थागत समन्वय और स्पष्ट कानूनी प्रावधानों पर आधारित संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करने के साथ-साथ नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिये न्यायिक निगरानी को सुदृढ़ करना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित उपकरणों का अंगीकरण, विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना तथा संविधानिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है।
यह संतुलन भारत की वित्तीय प्रणाली की साख बनाए रखने और प्रशासनिक दुरुपयोग की आशंका को रोकने के लिये महत्त्वपूर्ण है, जहाँ विधायी व प्रशासनिक सुधार एवं संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाये रखना नीति निर्माण का एक प्रमुख उद्देश्य है।